वजौली मुद्रा [ VAJROLI MUDRA ]

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    बज्रौली मुद्रा :: तेजस्वी बनाए ==================== बज्रौली मुद्रा भी मूलबंध का अच्छा अभ्यास किए बिना किसी प्रकार संभव नहीं है| यह मुद्रा केवलयोगी के लिए ही नहीं, भोगी के लिए भी अत्यंत लाभकारी है| इस मुद्रा में पहले दोनों पांवों को भूमिपर दृढ़तापूर्वक टिकाकर, दोनों पांवों को धीरे–धीरे दृढ़तापूर्वक ऊपर आकाश में उठा दें| इससे बिंदु–सिद्धि होती है| शुक्र को धीरे–धीरे ऊपर की आकुंचन करें अर्थात् इंद्रिय के आंकुचन के द्वारा वीर्य को ऊपर की ओरखींचने का अभ्यास करें तो यह मुद्रा सिद्ध होती है| विद्वानों का मत है कि इस मुद्रा के अभ्यास मेंस्त्री का होना आवश्यक है, क्योंकि भग में पतित होता हुआ शुक्र ऊपर की ओर खींच लें तो रज औरवीर्य दोनों ही चढ़ जाते हैं| यह क्रिया अभ्यास से ही सिद्ध होती है| कुछ योगाचार्य इस प्रकार काअभ्यास शुक्र के स्थान पर दुग्ध से करना बताते हैं| जब दुग्ध खींचने का अभ्यास सिद्ध हो जाए, तबशुक्र को खींचने का अभ्यास करना चाहिए| वीर्य को ऊपर खींचनेवाला योगी ही ऊर्ध्वरेता कहलाता है| इस मुद्रा से शरीर हृष्ट–पुष्ट, तेजस्वी, सुंदर, सुडौल और जरा–मृत्यु रहित होता है| शरीर के सभीअवयव दृढ़ होकर मन में निश्‍चलता की प्राप्ति होती है| इसका अभ्यास अधिक कठिन नहीं है| यदिगृहस्थ भी इसके करें, तो बलवर्द्धन और सौंदर्यवर्द्धन का पूरा लाभ प्राप्त कर सकते हैं| Vajroli Mudra…