Month: January 2018
  • नवग्रह दुष्प्रभाव नाशक कवच /ताबीज

    नवग्रह शांति
    कवच /ताबीज

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    व्यक्ति का
    जीवन ग्रहों से प्रभावित होता है |इनकी रश्मियों की प्रकृति और मात्रा जन्म समय
    व्यक्ति के भाग्य का निर्धारण करती है जबकि इनकी प्रतिदिन की चाल उसी जन्मकालिक
    प्रभावों के अनुसार प्रतिदिन के क्रियाकलाप निश्चित करती है |इनके प्रभावानुसार
    व्यक्ति का शरीर और उसके अवयव बने होते हैं और तदनुरूप व्यक्ति की सोच ,क्षमता
    ,कर्म होते हैं |सुख -दुःख इनकी स्थिति के अनुसार ही मिलते हैं और इसे ही भाग्य
    कहा जाता है |सभी के लिए सभी ग्रहों के प्रभाव समान नहीं होते तथा जैसा ,जिसका
    प्रभाव जिसके लिए हो उसी अनुसार उसका भाग्य ,कर्म और सुख -दुःख के साथ ही शारीरिक
    स्थिति हो जाता है |
    सभी के लिए
    सभी ग्रह शुभ नहीं होते और सभी के लिए सभी अशुभ नहीं होते |इनके संतुलन पर ही
    व्यक्ति के जीवन की दशा ,दिशा नियत होती है |कुछ के लिए शुभ ग्रह ही कष्टकारक हो
    जाते हैं तो कुछ के लिए क्रूर और पापी ग्रह भी सुखकारक हो जाते हैं |अक्सर सबके
    लिए कोई न कोई ग्रह कष्ट का कारण बनता है अपनी स्थिति और चाल के अनुसार |ऐसे में
    उसकी शान्ति कराई जाती है ,उपाय किये जात हैं |चूंकि नैसर्गिक कुंडली की स्थिति
    बदली नहीं जा सकती ,अतः कोई भी उपाय ग्रह प्रभाव को पूरी तरह नहीं बदल पाता |उसके
    दुष्प्रभाव को कम -अधिक किया जा सकता है |इस स्थिति में शुभ और सुख कारक ग्रहों के
    प्रभाव को और बढ़ा देने से ,कष्टकारक ग्रह के प्रभाव में कमी आ जाती है |
    हमारे
    विश्लेषण के अनुसार अक्सर उपाय करते समय एक ही प्रकार का उपाय उपाय किया जाता है
    ,चाहे वह ज्योतिष के रत्न आदि हों ,या कर्मकांड के वैदिक हवन -पूजा -पाठ आदि या
    तंत्र के मंत्रादी का जप और टोने -टोटके |विशेषज्ञता ,विशिष्टता और पूर्ण पद्धति
    के अनुसार किये गए उपाय प्रभावी होते हैं इसमें संदेह नहीं किन्तु अक्सर पूर्ण
    उपाय श्रमसाध्य और काफी खर्च कराने वाले साबित होते हैं उपर से इनमे सीधे प्रभावित
    व्यक्ति की संलिप्तता कम ही होती है जिससे उसे पूर्ण अंश कम ही मिल पाता है |यदि
    व्यक्ति एक से अधिक ग्रहों की प्रतिकूलता का सामना कर रहा हो तब तो उसके लिए उपाय
    करना और खर्च उठाना या सभी के मूल रत्न आदि धारण करना कठिन हो जाता है |कुछ
    स्थितियों में एक ही पूजा -शान्ति का खर्च इतना होता है की व्यक्ति वही नहीं करवा
    पाता |
    इन स्थितियों
    का विश्लेषण करते हुए हमने पाया है की यदि तीनों उपायों के यानी वैदिक ज्योतिषीय
    ,कर्मकाण्डीय और तंत्रोक्त पद्धतियों के कुछ अंशों को एक साथ समायोजित किया जाय तो
    ग्रहों की शुभता को बढ़ाया जा सकता है ,अनिष्ट कारक ग्रहों के दुष्प्रभाव को कम
    किया जा सकता है ,साथ ही उन्हें अनुकूल और प्रसन्न भी रखा जा सकता है |इसके लिए
    हमने नवग्रह यन्त्र ,नवग्रहों के वैदिक वनस्पतियों के साथ नवग्रहों से सम्बन्धित
    और उन्हें प्रभावित करने वाले तांत्रिक जड़ी बूटियों को एक साथ सम्मिलित कर
    नवग्रहों के मंत्र से प्राण प्रतिष्ठा करके ,जप -अभिमन्त्रण और हवन किया |इसके साथ
    कुछ अन्य वस्तुओं का संयोग किया जो की व्यक्ति की क्षमता का विकास कर सकें तथा
    उसकी नकारात्मकता को हटा सकें जो की पृथ्वी की शक्तियों के कारण उत्पन्न हो रही
    हों |यह वस्तुएं हमारे महाविद्या साधना में अभिमंत्रित की हुई थी जिससे यह
    महाविद्याओं की शक्ति से श्क्तिकृत हो चुकी थी |इन्हें कवच में सम्मिलित करने पर
    यह कवच /ताबीज अद्भुत प्रभाव देने वाले साबित हुए |खुद पर और परिचितों पर प्रयोग
    करने के बाद इन्हें हमने बहुतों को प्रदान किया जिसके बहुत अच्छे परिणाम मिले |

    यह कवच
    नवग्रहों में से किसी के भी दुष्प्रभाव या कई के सम्मिलित दुष्प्रभाव को कम करने
    के साथ ही शुभद ग्रहों के प्रभाव को बढ़ा देता है जिससे उनकी पूर्ण शुभता मिलती है
    |इस कारण अनिष्ट कारक ग्रह का प्रभाव और कम हो जाता है |इसके साथ ही यदि कोई
    नकारात्मक प्रभाव व्यक्ति पर हो तो वह भी दूर हो जाता है तथा व्यक्ति को भगवती की
    भी सुरक्षा मिलती है |इस कवच में नवग्रहों के भोजपत्र निर्मित यन्त्र ,उनकी
    ज्योतिषीय वनस्पतियाँ जैसे पीपल ,शमी ,अपामार्ग आदि ,उनसे सम्बन्धित तांत्रिक जड़ी
    बूटियों जैसे भारंगी ,अम्लवेत ,नागदौन के जड़ आदि को प्राण प्रतिष्ठित कर उन्हें
    तंत्रोक्त नवग्रहीय मन्त्रों से अभिमंत्रित किया गया होता है और तब इनमे अन्य
    वस्तुओं जो की भगवती की ऊर्जा को समाहित करती हों को सम्मिलित किया जाता है ताकि
    नवग्रहों पर भी प्रभाव पूर्ण हो और भगवती की भी शक्ति अलग से मिले
    |

    इस कवच /ताबीज का एक लाभ तो यह होता है की यह व्यक्ति के शरीर के सीधे संपर्क में होता है अर्थात सभी उर्जाओं ,शक्तियों ,वस्तुओं को व्यक्ति के शरीर के साथ जोड़ दिया जाता है जिससे उसे पूर्ण लाभ शीघ्र प्राप्त होता है ,इसके साथ इसकी ऊर्जा निश्चित रूप से प्राप्त होती है |दूसरा लाभ यह होता है की व्यक्ति को बार बार अलग अलग ग्रहों आदि के उपाय की बहुत जरूरत नहीं रहती और वह बड़े अनुष्ठानों पूजा -पाठ ,कर्मकांड से भी बचता है तथा खुद कुछ करने की जरूरत भी नहीं होती |तीसरा लाभ इससे यह होता है की इससे टोने -टोटके ,अभिचार ,किये कराये ,नजर दोष आदि से भी सुरक्षा हो जाती है |इस प्रकार यह एक साथ अनेकों उद्देश्य पूर्ण करता है |यह हमारे वर्षों के अनुभव की खोज है जिसके परिणाम बहुत अच्छे मिले हैं |……………………………………………………………..हर हर महादेव 
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  • मांगलिक कार्य में विघ्न क्यों आ रहे ?

    विवाह योग पर भी विवाह नहीं हो रहा

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    मांगलिक कार्य में बाधा
    ——————–
    विवाह हिन्दुओं के सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है और यह लगभग सभी धर्म सम्प्रदायों में विभिन्न रूपों में मान्यताप्राप्त है |इस संस्कार द्वारा देव अनुमति से संतानोत्पत्ति की अनुमति प्रदान की जाती है और इसके बाद दो लोग एक साथ जीवन के सुख दुःख बांटने को साथ आते हैं |विवाह हर युवक युवती का सपना होता है जो विवाह का अर्थ समझ आने के बाद से ही उनके मष्तिष्क में काल्पनिक रूप से घूमता रहता है |भारत जैसे हिन्दू संस्कार के देश में युवक युवती तो कम चिंतित होते हैं विवाह को लेकर लेकिन माता पिता की चिंता उनके युवा होते ही विभन्न रूपों में उनके दिमाग में आने लगती है |युवती को लेकर अधिक ,तो युवा को लेकर कुछ कम माता पिता चिंतित होते हैं |पहले के समय में अधिकतर वैवाहिक निर्णय परिवार के बुजुर्ग और बड़े लिया करते थे अतः कुछ कम चिंताएं थी किन्तु आज युवा अधिक स्वतंत्र हो खुद के निर्णय को अधिक प्राथमिकता दे रहे अतः समस्या बढ़ी है |उच्च शिक्षा ,वैवाहिक आयु में तुलनात्मक वृद्धि ,स्वावलंबन की सोच भी विवाह में देरी का कारण बन रहे |कुछ लोगों के साथ अलग ही समस्या आती है की विवाह ही नहीं होता टा विवाह में अनावश्यक देरी होती है और समय निकलता जाता है जबकि प्रत्यक्ष तौर पर कहीं कोई कमी नजर नहीं आती |
    ज्योतिष के अनुसार विवाह की कुछ निश्चित समयावधियां हर व्यक्ति के जीवन में कुछ बार आती हैं और अक्सर उन्ही समयों में विवाह सम्पन्न होता है |कभी कभी बहुत प्रबल विवाह योग होता है और उस समय ही विवाह होता है |कुछ मामलों में विवाह योग के साथ कुछ बाधाएं भी जुडी होती हैं ,जिनके लिए विवाह बाधा निवारण के उपायों की परिकल्पना की गयी है और ऐसे समय बाधा निवारण के उपाय कराये जाते हैं तब विवाह हो पाता है |कुछ मामले इनसे भी गंभीर होते हैं जहाँ हर ज्योतिषीय उपाय असफल होने लगता है ,अथवा प्रबल विवाह योग कुंडली में होने पर भी विवाह नहीं हो पाता ,अथवा अनेक विवाह योग निकल जाते हैं पर विवाह नहीं हो पाता |ज्योतिषीय उपाय ग्रहीय स्थितियों को संतुलित कर सकते हैं किन्तु यदि समस्या ग्रहीय न होकर अलग हो तो यह उपाय काम नहीं करते और विवाह बाधा बनी रहती है |कोई भी उपाय भाग्य से अधिक नहीं दिला सकता किन्तु कभी कभी कुछ स्थितियां ऐसी भी उत्पन्न होती हैं की भाग्य का भी पूरा नहीं मिल पाता चाहे कितने भी ज्योतिषीय उपाय करें |इसका कारण समस्या ऐसी बाधाओं से उत्पन्न होना है जो ग्रहीय नहीं नहीं हो किन्तु भाग्यावारोध उत्पन्न करें |
    इस तरह की ही अधिकतर बाधाएं इस प्रकार समस्या उत्पन्न करते हैं की विवाह नहीं हो पाता ,घर परिवार में मांगलिक कार्य नहीं होता ,किसी भी उन्नति के कार्य में बाधा आती है ,शुभ कार्य में अवरोध उत्पन्न होता है ,यहाँ तक की सोच -व्यवहार तक बदलने लगता है ,अनावश्यक कलह ,विवाद ,मतभिन्नता ,स्वविचार की प्राथमिकता उत्पन्न होती है |आपस में दूरी बनती है ,अलग रहने की भावना उत्पन्न होती है और कभी कभी समाज -संस्कार से अलग रहन सहन विकसित हो जाता है |जो बाधाएं ज्योतिषीय बाधाओं से अलग होती हैं उनके पृथ्वी की सतह से जुडी नकारात्मकता होती हैं जो जब प्रभावित करती हैं तो ग्रहीय भाग्य में अवरोध उत्पन्न होता ही है अनेक अलग समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं |कुंडली जन्म पूर्व की वास्तु समस्या ,पित्र समस्या ,देव दोष आदि तो व्यक्त करता है किन्तु जन्म बाद के परिवर्तन कुंडली व्यक्त नहीं करता अतः यदि कोई व्यक्ति या परिवार बाद में किसी बाधा से पीड़ित हुआ हो अथवा पूर्व की ही कोई बाधा बढ़ी हो तो कुंडली उसकी स्थिति व्यक्त नहीं करता और इसलिए ज्योतिषीय उपाय अक्सर इस समस्या को पूर्ण रूपें हल नहीं कर पाते |
    सामान्यतया लडकियाँ परन्तु कभी कभी लड़के भी किसी ऐसी बाधा से पीड़ित हो जाते हैं जबकि कोई आत्मिक शक्ति उनके पीछे पड़ जाए और उनके हर प्रकार के मांगलिक कार्य में रुकावट बन उन्हें अपनी इच्छापूर्ति का माध्यम बनाए |यह शक्ति राह चलते लग सकती हैं ,आसक्त हो लग सकती है या इसी द्वारा भेजे जाने पर लग सकती है |यह व्यक्ति या पीड़ित के सोच और व्यवहार तक को बदल सकती है जिससे उसकी रूचि बदल जाए अथवा वह सही समय सही निर्णय न ले पाए |कभी कभी कोई शक्ति किसी परिवार को ही परेशान करने लगती है जिससे परिवार के मांगलिक कार्यों में विघ्न आते हैं ,विलम्ब होते हैं ,स्थितियां बिगडती जाती हैं ,आर्थिक स्थिति खराब हो जाती है ,लोग दुसरे ही उलझनों में उलझे रह जाते हैं और विवाह योग होने पर भी कन्या अथवा पुत्र का विवाह नहीं कर पाते या स्थिति ऐसी होती है की विवाह की नहीं सोच पाते |प्रत्यक्ष तो कोई ग्रहीय बाधा नहीं किन्तु पारिवारिक स्थिति बिगड़ गयी और विवाह नहीं हो पा रहा |
    आज के भाग दौड़ के युग में बहुत अधिक स्थान परिवर्तन हो रहे और लोग यहाँ वहां नए पुराने मकानों में रह रहे |हर मकान वास्तु अनुसार बना हो जरुरी नहीं ,हर जमीं का शोधन कर उस पर माकन बना हो जरुरी नहीं |ऐसे में जिसका भाग्य बहुत प्रबल होगा अथवा जिसके घर में कम नकारात्मक ऊर्जा होगी उसका विवाह वहां रहते हो जाएगा ,उन्नति होगी और मांगलिक कार्य होंगे और अन्य के रुक जायेंगे ,चाहे कितने भी संस्कारी हों अथवा पूजा पाठ करें ,सात्विकता से रहे ,बाधाएं अपना असर दिखाएंगी ही |वास्तु दोष की नकारात्मकता ,उस जमींन में दबी कोई शक्ति अपना प्रभाव देगी ही |यदि कुलदेवता कमजोर हुए ,सुरक्षा ठीक से नहीं कर रहे ,पित्र दोष आदि है अथवा पित्र रुष्ट हैं तो स्थिति और बिगड़ जायेगी क्योकि नकारात्मक प्रभावों का प्रतिशत बढ़ जाएगा |एक बार स्थिति बिगड़ी तो फिर सम्भालनी मुश्किल हो जायेगी क्योकि संसाधन कम होते चले जायेंगे |
    एक समस्या आज और देखने में आ रही की कुछ लोग अनावश्यक किसी के प्रति बैर भाव रखते हैं अथवा किसी का अहित चाहते हैं और ऐसे में वह खुद सामने न आकर टोने टोटकों का सहारा ले लोगों को परेशान करते हैं |हर टोने टोटके की एक निश्चित ऊर्जा या शक्ति होती है जो कुछ प्रभाव तो देती ही है |कभी कभी लोग अपनी समस्या का उतारा करके भी किसी अन्य को दे देते हैं जिससे उसके यहाँ एक बाधा आ जाती है जो हर कार्य में बाधा उत्पन्न करती है |कभी कभी किन्ही दो लोगों के बीच अथवा प्रेमी प्रेमिका के बीच कोई विद्वेषण अथवा उच्चाटन करा देता है और उनके सम्बन्ध बिगड़ जाते हैं |मानसिक स्थिति ठीक न होने से यह लोग बहुत दिन विवाह से दूर रहना चाहते हैं |कभी कभी वशीकरण आदि के भी दुष्प्रभाव आते हैं की व्यक्ति किसी और से विवाह करना चाहता है और परिवार अथवा अवचेअतन किसी और तरफ खींचते हैं ,व्यक्ति अंतर्द्वंद में उलझ जाता है |
    ज्योतिष में विवाह योग है किन्तु कोई बाधा भी उसके साथ है अथवा कुंडली में मांगलिक योग है या कालसर्प योग है और उपाय किये जा रहे ,साथ में कोई बाहरी बाधा भी है तो भी विवाह की सम्भावना कम हो जाती है क्योकि चाहे कितने भी उपाय किये जाएँ ज्योतिषीय योगों को पूरी तरह नहीं बदला जा सकता ,बस उनके प्रभाव में कुछ कमी जरुर आ जाती है |ऐसे में कुछ ज्योतिषीय योगों की बाधा और कुछ बाहरी बाधा मिलकर संतुलन बिगाड़ देते हैं |यदि ज्योतिष के उपाय सटीक न हुए अथवा समस्या कहीं और और उपाय कहीं और तो भी काम नहीं बनता |यदि माता -पिता या परिवार का समग्र भाग्य विपरीत हो तो भी बाधा उत्पन्न होगी क्योकि वह अपना पूरा प्रयास नहीं कर पाते हैं अथवा सही समय आगे नहीं बढ़ पाते |ऐसे समय मात्र प्रबल भाग्य ही विवाह करा पाता है और तब कहा जाता है की अमुक का भाग्य इतना प्रबल था की कोई इंतजाम न होने पर भी विवाह उत्तम सम्पन्न हो गया |
    जब विवाह में देरी हो अथवा विवाह योग होने पर भी विवाह न हो पाए तो सबसे पहले तो किसी विद्वान् ज्योतिषी से संपर्क करना चाहिए और विस्तृत विश्लेषण करा उपाय गंभीरता से करने चाहिए |यदि तब भी विवाह बाधा बनी रहे और विवाह में विलम्ब हो तो किसी अच्छे तंत्र जानकार से संपर्क कर विभिन्न बाधाओं को समझने का प्रयत्न करना चाहिए जो मांगलिक कार्य में विघ्न उत्पन्न कर रही हो अथवा कन्या या व्यक्ति को पीड़ित कर रही हों ,इन्हें हटाने का प्रयत्न करना चाहिए |इनके साथ ही घर के वास्तु पर ध्यान देना चाहिए और पितरों को संतुष्टि का प्रयत्न करना चाहिए तथा कुलदेवता /देवी की पूजा करनी चाहिए |यदि कभी कोई मान्यता किसी अन्य विषय की कहीं मानी गयी हो तो उसे पहले पूरा कर देना चाहिए क्योकि कभी कभी कोई शक्ति अपनी मान्यता पूर्ण न करने से रुष्ट हो अन्य कार्यों में भी विघ्न उत्पन्न करती है |ज्योतिषीय और तंत्रिकीय बाधा निवारक प्रयोग ,विशिष्ट विवाहोपयोगी समग्र प्रयोग ,विघ्न -बाधा हटाने के टोटके ,तांत्रिक उपाय ,वैदिक और शास्त्रोक्त उपाय हम अपने इस श्रृंखला के आगामी लेखों में प्रकाशित कर रहे हैं जिससे हमारे blog और फेसबुक पेजों के पाठक लाभान्वित हो सकें |…………………………………………..हर -हर महादेव 
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  • पिशाच मोचन कुण्ड [Pishach Mochan Kund]: वाराणसी

    पिशाच
    मोचन कुण्ड : वाराणसी

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    काशी को मोक्ष की नगरी भी कहा जाता है |यह प्रलय काल में भगवान् शिव के त्रिशूल पर विराजित होता है और प्रलय में
    भी सुरक्षित होता है |यही से भगवान् शिव ने सृष्टि रचना का प्रारम्भ किया था |
    कहते हैं यहां जो इंसान अंतिम सांस लेता है उसे मोक्ष की प्राप्ती होती है। जिन लोगों की मृत्यु यहां नहीं होती उनका अंतिम संस्कार यहां  पर कर देने मात्र से ही मोक्ष मिलता है। इसके साथ ही काशी में एक ऐसा कुंड भी है जहां पर मृत आत्माओं की शांति के लिए देश भर से लोग पिंड दान के लिए आते है। कहते है कि पित्र पक्ष के दिनों इस कुंड पर भूतों का मेला लगता है। इस कुंड का नाम है पिशाचमोचन कुंड। जहां पितृपक्ष में अकाल मौत मरने वालों को श्राद्ध करने से मुक्ति मिलती है। तामसी आत्माओं से छुटकारे के लिए कुंड के पेड़ में कील ठोक कर बांधा जाता है। कुछ लोग नारायन बलि पूजा भी कराते है जिससे मरने वाले की आत्मा को शांति मिलती है।
    मंदिर के पुजारी बताते है कि काशी से पहले इस शहर को आनंदवन के नाम से जाना जाता था। यहां एक मान्यता ऐसी भी है कि अकाल मौत मरने वालों की आत्माएं तीन तरह की होती है जिसमें तामसी राजसी और सात्विक होती है तामसी प्रवित्ति की आत्माओ को यहां के विशाल काय वृक्ष में कील ठोककर बांध दिया जाता है, जिससे वो यहीं पर इस वृक्ष पर बैठ जाए और किसी भी परिवार के सदस्य को परेशान करें। इस पेड़ में अब तक लाखों कील ठोकी जा चुकी है ये परंपरा बेहद पुरानी है जो आज भी चली रही है।
    कहते हैं कि जब पुरखों की आत्माओं का
    आशीष इंसान को जिंदगी में मिलता रहता है
    , तो उसके जीवन में खुशियां ही
    खुशियां बनी रहती हैं। माना जाता है कि आकाश से हमारे पुरखे व धरती पर हमारे
    बुजुर्ग अपनी दुआओं से हमारे जिंदगी में रौशनी बिखेरते रहते हैं।ये पुरखे हमारे
    पित्र कहलाते हैं |इनकी तृप्ति के लिए
    हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी माना जाता है। मान्यतानुसार अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती और वह भूत के रूप में इस संसार में ही रह जाता है। पितरों
    के श्राद्ध के लिए विधिविधान पूर्वक तर्पण आदि करना सभी के लिए आवश्यक होता है
    जिससे जीवन सुखमय बना रहे। धर्म और आध्यात्म की नगरी काशी वैसे तो मोक्ष की नगरी
    के नाम से जानी जाती है। कहा जाता है कि यहा प्राण त्यागने वाले हर इंसान को भगवन
    शंकर खुद मोक्ष प्रदान करते हैं। मगर जो लोग काशी से बाहर या काशी में अकाल प्राण
    त्यागते हैं उनके मोक्ष की कामना से काशी के पिशाच मोचन कुण्ड पर त्रिपिंडी
    श्राद्ध किया जाता है। 
    देश भर में सिर्फ काशी के ही अति प्राचीन पिशाच मोचन कुण्ड पर यह
    त्रिपिंडी श्राद्ध होता है। जो पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के
    बाद व्याधियों से मुक्ति दिलाता है। इसीलिये पितृ पक्ष में तीर्थ स्थली पिशाच मोचन
    पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से आश्विन कृष्ण
    पक्ष अमावस्या तिथि तक पितृ पक्ष कहलाता है
    ,जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि के दिन हुई हो उनका भाद्रपद माह के पूर्णिमा तिथि के दिन ही श्राद्ध करने का नियम है। मान्यताएं ऐसी हैं कि पिशाचमोचन पर श्राद्ध कार्य करवाने से अकाल मृत्यु में मरने वाले पितरों को प्रेत बाधा से मुक्ति के साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस धार्मिक स्थल का उद्भव गंगा के धरती पर आने से पूर्व हुआ है। इस पिशाच मोचन तीर्थ स्थली का वर्णन गरुण पुराण में भी मिलता है।
     मान्यता
    के अनुसार, काशी के प्राचीन पिशाच मोचन कुंड पर होने वाले त्रिपिंडी श्राद से पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद विकारों से मुक्ति मिल जाती है। इसीलिए पितृ पक्ष के दिनों तीर्थ स्थली पिशाच मोचन पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। यह भी मान्‍यता है कि वाराणसी में पिंड दान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है क्योंकि काशी भगवान शिव की नगरी है। बताते चलें कि 12 महीने चैत्र से फाल्गुन तक 15-
    15
    दिन का शुक्ल और कृष्ण पक्ष का होता है, लेकिन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के प्रथम दिन से पित्र पक्ष शुरू होता है जो १५ दिनों तक रहता है। पितृ पक्ष के 15 दिन पितरों की मुक्ति के माने जाते हैं और इन 15 दिनों के अंदर देश के विभिन्न तीर्थ स्थलों पर श्राद्ध और तर्पण का कार्य होता है। इसके लिए काशी के अति प्राचीन पिशाच मोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद होता है। यह पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद विकारों से मुक्ति दिलाता है। इस श्राद कार्य में इस पवित्र तीर्थ पर संस्कृत के श्लोकों के साथ तीन मिट्टी के कलश की स्थापना की जाती है, जो काले, लाल और सफेद झंडों से सजाए जाते हैं।
    कर्मकांडी ब्राम्हणों के आचार्यत्व में पितरों को जौ के आटे की गोलियां, काला तिल, कुश और गंगाजल आदि से विधिविधान पूर्वक पिण्ड दान, श्राद्धकर्म तर्पण किया जाता है। मान्यता अनुसार परिवार के मुख्य सदस्य क्षोरकर्म (सिर के बाल, दाढ़ी मूंछ आदि मुंडवाना) मंत्रोच्चार की ध्वनि के साथ पितरों का श्राद्धकर्म करते हैं। श्राद्धकर्म के पश्चात् गौ, कौओं और श्वानों को आहार दिया जाता है। पिशाच मोचन में पिण्डदान की सदियों पुरानी परम्परा रही है। इसी के निमित्त आस्थावानों द्वारा हर वर्ष यहां कुण्ड पर पिण्डदान श्राद्धकर्म कर गया में श्राद्धकर्म का संकल्प लिया जाता है।
    अपने
    पितरों के मुक्ति की कामना से पिशाच मोचन कुण्ड पर श्राद्ध और तर्पण करने के लिए
    लोगों की भीड़ पितृ पक्ष के महीने में जुटती है। मान्यताएं हैं कि जिन पूर्वजों की
    मृत्य अकाल हुई है वो प्रेत योनि में जाते हैं और उनकी आत्मा भटकती है। इनकी शांति
    और मोक्ष के लिये यहां तर्पण का कार्य किया जाता है। गया का भी काफी महत्व है
    , लेकिन जो भी श्राद्ध करने की इच्छा रखता है वो
    पहले काशी आता है और उसके पश्चात् ही गया प्रस्थान करता है।
    कुंड के महत्व पर प्रकाश डालते हुए पिशाचमोचन कुंड के पंडा बताते हैं ​कि
    यह त्रेतायुग का कुंड है। उस समय पिशाच नाम का ब्राहम्ण था जो दान नहीं देता था।
    सिर्फ लोगों से दान लेता था। इन्होंने इतना दान ले लिया कि आत्मा की शांति नहीं
    मिल रही थी। एक बार जब वाल्मीकि जी यहां पूजा कर रहे थे तो पिशाच ब्राह्मण आए तो
    पूछा कि महराज मुझे आत्मा की शांति नहीं मिल रही है तो उन्होंने तालाब में नहाने
    को बोला तो जैसे ही ब्राह्मण उसमें उतरे पानी भागने लगा।
     इसके बाद गिलास में पानी लिये तो वो भी सूख गया, क्योंकि वो 1520 साल से प्यासे थे और उसके बाद उन्होंने वाल्मिकी जी से कहा कि महाराज हमारे कष्ट को दूर करें और हमें ठीक करें तो उन्होंने कहा कि मैं ठीक नहीं कर पाऊंगा। इस पर पिशाच ब्राह्मण ने कहा कि मैं आत्महत्या कर लूंगा। इसके बाद वाल्मिकी जी ने उन्हें यहां विष्णु जी शंकर जी का उनसे तपस्या कराया, जिसके बाद शंकर जी यहां आए और पिशाच से कहा कि क्या कष्ट है तो उन्होंने शिव जी को कष्ट बताया। शिव जी ने
    ब्राह्मण से पानी में उतरने को कहा। जब वो तालाब में उतरे तो ये एक कदम चले तो
    पानी दो कदम दूर भाग जाये
    , इसके बाद जब इनके शरीर पर तालाब का पानी पड़ा
    तो वो जलाशय हो गये। इसके बाद इन्होंने यहीं लोगों के मुक्ति के लिए उनसे आशिर्वाद
    मांगा और यही भोले शंकर के सामने विराजमान हो गए। जिसके बाद से यहां की मान्यता है
    कि यहां किसी के घर भी अकाल मृत्यु आदि हो तो यहां श्राद्ध करने से मुक्ति मिल
    जाती है।
    पितृ
    पक्ष में पिशाचमोचन कुंड पर श्राद्ध करने के साथ ही यहां से एक और परम्परा भी जुड़ी
    है। दरअसल समीप में ही वर्षों पुराने पीपल के वृक्ष में यहां आने वाले कुछ
    श्रद्धालु सिक्का भी गाड़ते हैं। पिशाचमोचन पर श्राद्ध कराने वाले पंडित
    बताते हैं कि पीपल के वर्षों पुराने पेड़ में सिक्का गाड़े जाने के पीछे लोगों की
    आस्था जुड़ी है। मनोकामना के लिए कुछ लोग सिक्का गाड़ते हैं। जैसे कोई
    बच्चों के लिए या कोई अप्राकृतिक मृत्यु प्राप्त हो जाये उसके लिए भी सिक्का
    गाड़ते हैं। और मनोकामना पूरी होने पर उसे निकाल लेते हैं। इतना ही नहीं मानना यह
    भी है कि अगर कोई प्रेत घर में है जिससे मुक्ति नहीं मिल रही तो यहां पीपल के पेड़
    में सिक्के गाड़ने से उससे मुक्ति भी मिल जाती है और एक को लाभ मिलता है तो कई
    अन्य और यहां आते हैं।
    प्रेत बधाएं तीन तरीके की होती हैं। इनमें सात्विक, राजस, तामस शामिल हैं। इन तीनों बाधाओं से पितरों को मुक्ति दिलवाने के लिए काला, लाल और सफेद झंडे लगाए जाते हैं। इसको भगवान शंकर, ब्रह्म और कृष्ण के ताप्‍तिक रूप में मानकर तर्पण और श्राद का कार्य किया जाता है। पुरोहितों ने बताया कि यहां अपने पितरों के साथसाथ अन्य पिशाच बाधाएं भी दूर की जाती हैं, जिनका प्रमाण सिर्फ देखने से मिलता है जिसमे प्रमुख रूप से महिला ओझा पुरोहितों के साथ बैठकर भूतों से कबूल करवाती हैं कि वह दुबारा उस मानव शरीर को परेशान नहीं करेगा। इसके लिए लोग यहां स्थित पीपल के पेड़ में उस भूत के नाम का सिक्का गाड़ते हैं। मान्यता है की वह भूत यही रहेगा और परेशान नहीं करेगा। तीर्थ पुरोहित के अनुसार, पितरों के लिए 15 दिन स्वर्ग का दरवाजा खोल दिया जाता है। उन्होंने बताया कि यहां के पूजापाठ और पिंड दान करने के बाद ही लोग गया के लिए जाते हैं। उन्‍होंने बताया कि जो कुंड वहां है वो अनादि काल से है भूतप्रेत सभी से मुक्ति मिल जाती है। पितरों का पिण्डदान व श्राद्धकर्म से जहां
    पितृ ऋण से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। वहीं पितरों से धन
    धान्य व यश की प्राप्ति के आशीष का द्वार भी खुल जाता है। इसलिए यह पूरी
    श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए।
    …………………………………………………हर
    हर महादेव

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  • शक्तिपीठ क्या होते हैं ?

    ::::::::::::शक्तिपीठ ::::::::::::::

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    शक्ति पीठ ऐसे स्थल होते हैं जो स्वयं सिद्ध होते हैं और वहाँ पर दैवीय शक्तियों कि प्रचुरता होती है तथा साथ ही वहाँ पर किये जप या साधनात्मक कार्य आश्चर्यजनक रूप से अन्य सामान्य स्थलों कि अपेक्षा शीघ्र फलीभूत होते हैं अक्सर देखने में आता है कि कई साधक ऐसे होते हैं कि बार बार साधना करते हैं लेकिन उनकी साधनाएं सफल होती हैं और सिद्धियाँ ऐसे साधकों को कम से कम एक बार किसी शक्तिपीठ में जाकर अपनी साधना सम्पन्न करनी चाहिए इसके पश्चात् उन्हें इनका महत्व खुद ही पता चल जायेगा |
    पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि जिस समय राजा दक्ष के यज्ञ में सती ने छुभित होकर आत्मदाह कर लिया और इस सम्बन्ध में जो शिवगण माता सती के साथ गए थे जब उन्होंने उपद्रव शुरू किया तो राजा दक्ष के सैनिकों के द्वारा उन्हें बलपूर्वक यज्ञस्थल से बहार निकाल दिया गया जब यह समाचार भगवान् शिव को मिला तो उन्होंने क्रोधातिरेक से अपनी जटाओं कि एक लट को पत्थर पर पटक दिया जिससे वीरभद्र नमक एक अति तामसी गण का प्रादुर्भाव हुआ भगवान शिव कि इच्छा समझकर उस गण ने जाकर दक्ष के यज्ञ का भंग कर दिया –! इसके पश्चात् भगवान् शिव सती का पार्थिव शरीर लेकर अखिल ब्रह्माण्ड में चक्कर लगाने लगे उनके वेग और क्रोध से समस्त ब्रह्माण्ड का अस्तित्व खतरे में गया तब देवताओं ने भगवान् विष्णु कि प्रार्थना कि जिसके जवाब में भगवान् विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के पार्थिव शरीर को छिन्नभिन्न कर दिया और वे टुकड़े जहाँ जहाँ पर गिरे वही एक शक्तिपीठ कहलाया इस तरह से कुल ५१ इक्यावन शक्तिपीठों का अस्तित्व बना |

    शक्तिपीठ , द्वादश ज्योतिर्लिंग और देव स्थान आदि पर गहन चिंतन करें तो हम पाते हैं की समस्त प्रकृति दो प्रकार के गुणों [आवेशो, प्रकृतियों ] के आपसी संयोग से निर्मित होती है ,यहाँ तक की ब्रह्माण्ड के समस्त चराचर |यह है धनात्मक और ऋणात्मक गुण |शक्तिपीठ में ऋणात्मक प्रकृति के गुण की अधिकता होती है |यह ऐसे स्थानों पर निर्मित हैं जहाँ से ऋणात्मक गुणों ,आवेशों ,प्रकृतियों की तरंगें धरती से अधिक मात्र में निकलती है ,प्रकृति से अधिक मात्र में वहां संघनित होती हैं ,जिससे उनकी प्राप्ति वहां से अधिक मात्र में संभव है |चुकी सभी देवियाँ ,स्त्रियाँ ऋणात्मक गुण का प्रतिनिधित्व करती हैं अतः शक्तिपीठ देवी स्थान होते हैं और वहां इनकी शक्ति सिद्धि अधिक आसान होती है |इनके साथ धनात्मक गुण अर्थात देवता अवश्य जुड़े होते हैं अतः इनके वहां भिन्न भैरव निर्धारित हैं |……………………………………………………हरहर महादेव 

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  • संग्रीला घाटी [Sangrila Ghati]:: एक रहस्य लोक

    संग्रीला घाटी ::पृथ्वी का आध्यात्मिक नियंत्रण केंद्र

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    चीन के भारत
    पर आक्रमण का कारण
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    संग्रीला घाटी सामान्य
    जन के लिए अनजान जगह हो सकती है ,किन्तु उच्च स्तरीय अध्यात्म क्षेत्र से जुड़ा
    व्यक्ति इससे अनजान नहीं रह सकता ,फिर वह चाहे वह व्यक्ति योग से जुड़ा हो ,
    tantra से जुड़ा हो अथवा किसी तरह के अध्यात्म क्षेत्र से जुड़ा हो ,हाँ
    उसकी स्थिति उच्च अवश्य होनी चाहिए |यह घाटी भारत ही नहीं पूरे विश्व के अध्यात्म
    जगत का नियंत्रण और पथ प्रदर्शक क्षेत्र है ,साथ ही यह सामान्य व्यक्ति की दृष्टि
    से देखा भी नहीं जा सकता | न इसे कोई देख सकता है न वहां जा सकता है ,जब तक की
    वहां रहने वाले सिद्ध न चाहें |यहाँ तक की पूरी चीनी सेना खोज कर थक गई किन्तु इस
    क्षेत्र को न खोज पायी |
    जिस प्रकार वायु मंडल में बहुत से स्थान हैं जहाँ वायु शून्यता रहती है,उसी प्रकार इस धरती पर अनेक ऐसे स्थान है जो भू हीनता के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं। भू हीनता और वायु शून्यता वाले स्थान चौथे आयाम से प्रभावित होते हैं। ऐसे स्थान देश और काल से परे होते हैं। यदि उनमें कोई वस्तु या व्यक्ति अनजाने में चला जाय तो इस तीन आयाम वाले स्थूल जगत में उसका अस्तित्व लुप्त हो जाता है। वह वस्तु इस दुनिया से गायब हो जाती है।
    आपने सुना होगा ,समाचार पत्रों में पढ़ा होगा की बरमूढा
    त्रिकोनाकृति एक ऐसा समुद्र में स्थान है जहाँ कोई पानी का जहाज चला जाय या उसके
    ऊपर आकाश में हवाई जहाज़ चला जाय तो एकाएक वह गायब हो जायेगा। वह स्थान भू हीनता के
    क्षेत्र में आता है।
    ऐसी ही तिब्बत और अरुणांचल की सीमा स्थित
    संग्रिला घाटी है। लेकिन भू हीनता और चौथे आयाम से प्रभावित होने के कारण वह घाटी
    अभी तक रहस्यमयी बानी हुई है। वह इन चर्म चक्षुओं से दिखाई नहीं देती है। ऐसा माना
    जाता है कि इस घाटी का सम्बन्ध अंतरिक्ष के किसी लोक से है।
    इस विषय से सम्बंधित एक प्राचीन पुस्तक हैकाल
    विज्ञान। तिब्बती भाषा में लिखी यह पुस्तक तवांग मठ के पुस्तकालय में विद्यमान है।
    काल विज्ञान के अनुसार इस तीन आयाम वाली दुनियां की हर चीज़ देश
    ,काल और निमित्त से बंधी हुई है। लेकिन संग्रीला घाटी में काल नगण्य है।
    वहां प्राण
    ,मन और विचार की शक्ति एक विशेष सीमा तक बढ़
    जाती है। शारीरिक क्षमता और मानसिक चेतना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।
    काल की नगण्यता के फलस्वरूप वहां आयु अति धीमी गति से बढ़ती है। यदि किसी
    व्यक्ति ने उसमे
    25 वर्ष की उम्र में प्रवेश किया है तो उसका
    शरीर लंबे समय तक युवा बना रहेगा।
    स्वर्ग जैसी वातावरण
    में डूबी हुई यह घाटी एक कालंजयी की इच्छा सृष्टि है। जो लोग इस घाटी से परिचित
    हैं उनका कहना है कि प्रसिद्द योगी श्यामा चरण लाहिड़ी के गुरु अवतारी बाबा
    जिन्होंने आदि शंकराचार्य को भी दीक्षा दी थी
    ,संग्रीला
    घाटी के किसी सिद्ध आश्रम में अभी भी निवास कर रहे हैं। जब कभी आकाश मार्ग से चल
    कर अपने शिष्यों को दर्शन भी देते हैं।
    यहाँ के तीन साधना केंद्र प्रसिद्द हैं। पहला है-“ज्ञानगंज मठ“, दूसरा है-“सिद्ध विज्ञान आश्रमऔर तीसरा है-” योग सिद्धाश्रम। यहाँ पर
    दीर्घजीवी
    ,कालंजयी योगी अपने आत्म शरीर से निवास करते
    हैं ।सूक्ष्म शरीर से विचरण करते हैं और कभी कदा स्थूल शरीर भी धारण कर लेते हैं।
    स्वामी विशुद्धानन्द परमहंस जो सूर्य विज्ञान में पारंगत थे ज्ञानगंज मठ से जुड़े
    हुए थे।
    इस संग्रीला घाटी में रहने वाले योगी आचार्य
    गण संसार के योग्य शिष्यों को खोज खोज कर इस घाटी में लाते हैं और उन्हें दीक्षा
    देकर पारंगत बना कर फिर इसी संसार में ज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए भेज देते
    हैं।
    इन तीनों आश्रमों के आलावा वहाँ तंत्र के भी
    अनेक केंद्र हैं जहाँ उच्च कोटि के कापालिक और शाक्त साधक निवास करते हैं। इसी
    प्रकार बौद्ध लामाओं के भी वहां मठ हैं। उनमें रहने वाले साधक स्थूल जगत के
    निवासियों से अपने को गुप्त रखे हुए हैं।
    संग्रीला
    घाटी में प्रवेश करने वाले एक योगी साधक के अनुभव के अनुसार
    वहां न सूर्य का प्रकाश है और न चाँद की चांदनी। वातावरण में एक दूधिया
    प्रकाश फैला हुआ है जो कहाँ से आ रहा है इसका पता किसी को नहीं है। एक अनिर्वचनीय
    सुंदरता और शांति का साम्राज्य है वहां। यह सम्पूर्ण घाटी एक महान योगी की इच्छा
    शक्ति के वशीभूत है।
    मैंने लामा के साथ उस आश्रम में प्रवेश किया तो मुंह बाये उस
    महान् योगी की कृति देखता ही रह गया। तभी वहां एक अद्भुत घटना घटी। मैंने देखा कि
    न जाने कहाँ से दर्जनों युवतियां वहां आ गईं। आश्चर्य की बात यह थी कि सभी की आयु
    बराबर थी। रूप
    ,रंग और कद भी समान था। 16 वर्ष की आयु से अधिक की नहीं थी वे। सभी के बाल खुले हुए थे ।शरीर पर
    गेरुये रंग की रेशमी साड़ियां थी और गले में स्फटिक की मालाएं पड़ी हुई थी। सभी के
    चहरे अपूर्व तेज से दमक रहे थे और एक विलक्षण शांति छाई थी वहां पर।
    युवतियों के
    हाव भाव से ऐसा लग रहा था कि वे किसी के आने की प्रतीक्षा कर रही हैं। मेरा अनुमान
    गलत नहीं था। थोड़ी ही देर बाद देखा की एक तेज पुंज सहसा वहां प्रकट हुआ। अद्भुत था
    वह प्रकाश पुंज
    ! प्रकाश पुंज धीरे धीरे आश्रम के भीतर के ओर
    जाने लगा। युवतियां भी उसके पीछे पीछे चलने लगीं। मेरे उस लामा से पूछने पर उसने
    बताया कि यह आत्म शरीर है। योगियों का आत्म शरीर ऐसा ही होता है। यह आत्म शरीर उसी
    परम योगी का है जिसकी यह अलौकिक सृष्टि है यह घाटी
    ! ये युवतियां योग कन्यायें हैं। कई जन्मों की
    साधना के बाद इन्होंने इस दिव्य अवस्था को प्राप्त किया है। योग में इसी को कैवल्य
    अवस्था कहते हैं। ये सब भी आत्म शरीर धारिणी हैं। लेकिन विशेष अवसर के कारण
    इन्होंने भौतिक देह की रचना कर ली है।
    आत्म शरीर को
    उपलब्ध योगत्माएँ इच्छा अनुसार कभी भी भौतिक देह की रचना कर सकती हैं।
    यह
    एक सामान्य विवरण है |इस घाटी के सम्बन्ध
    में अनेक लेखकों ने ,योगियों ने चर्चा की है ,किन्तु वास्तव में यहाँ से जुड़ने
    वाला इसके बारे में नहीं बताता |भारत के कुछ तथाकथित स्वयंभू गुरुओं -लेखकों ने तो
    खुद को इस घाटी अथवा इसमें स्थित आश्रमों से जोडकर अनेक कहानियां प्रचारित कर राखी
    हैं ,अथवा खुद को वर्षों वहां साधना किया हुआ बताया है अपनी पुस्तकों में |पर यह
    उनकी आत्म प्रशंशा मात्र है |सोचने वाली बात है जिस जगह को कोई सामान्य साधक जान
    नहीं सकता ,उच्च साधक भी अपनी इच्छा से देखा नहीं सकता ,ऐसी जगह ये लेखक और मामूली
    साधक जाकर साधना कर आयें और बताते भी रहें ,बात कुछ हजम नहीं होती |इस अवस्था को
    पहुंचा साधक जो वहां जा सके और साधना कर सके ,वापस आकर ज्ञान और साधना का प्रकाश
    फैलाएगा जरुर किन्तु आत्म प्रशंशा अथवा उस जगह के बारे में कदापि नहीं बताएगा |कुछ
    लोगों ने तो इन आश्रमों से मिलते जुलते नाम वाले आश्रम भी बना रखे हैं ,जबकि
    इन्हें गुरु तक की मान्यता नहीं मिली |खैर यह एक अलग विषय है |
    यह घाटी तो है ,क्योकि
    अनेकानेक योगियों और
    tantra गुरुओं द्वारा इनका कहीं न कहीं उल्लेख मिलता
    है |यह घाटी ही चीन के भारत पर आक्रमण का कारण रही है ,अन्यथा चीन को पहाड़ों में
    क्या मिलता ,वह उतने के बाद ही क्यों रुक जाता |कमजोर भारतीय सेना को कुचलते वह
    भारत पर भी नियंत्रण कर सकता था ,हिमांचल ,अरुणांचल तो कम से कम ले ही सकता था ,किन्तु
    उसने कोई राज्य नहीं लिया ,उन क्षेत्रों पर ही आधिपत्य किया जहाँ इस क्षेत्र के
    होने की समभावना है |माओ को अपनी आयु बढाने और चिरंजीवी होने की सनक थी और वह इस
    क्षेत्र पर कब्जा करके मृत्यु मुक्त होना चाहता था |
    विवरण
    के अनुसार चीन को पता था की संगरीला घाटी सिद्ध लामाओं ,तांत्रिकों ,योगियों का केंद्र है |यह जो चाहते हैं
    वही होता है |अतः वह बलात इसपर नियंत्रण करना चाहता था |उसकी सेना एक लामा का पीछ
    करते हुए भारत में घुसी थी |जिस क्षेत्र में उस लामा के गायब होने की आशंका थी
    वहां वहां चीन ने आक्रमण कर दिया क्योकि उसका मानना था की वह लामा इस क्षेत्र को
    जानता है |बहुत दिनों चीन की सेना ने इन क्षेत्रों के चप्पे चप्पे को छाना किन्तु
    यह उनकी दृष्टि में नहीं आया |उन क्षेत्रों पर आजतक उसने कब्जा जमाये रखा है |जब
    वहां यह क्षेत्र नहीं मिल रहा तो उसका संदेह है की सिक्किन अथवा अरुणांचल में यह
    क्षेत्र हो सकता है ,अतः गाहे बगाहे इन क्षेत्रों को अपना बताता रहता है |

    यह संग्रीला घाटी की
    अलौकिकता है जो चीन को परेशान किये हुए है |यहाँ केवल भारत ,तिब्बत ,चीन ही नहीं
    पूरे विश्व के अलौकिक ऊर्जा संपन्न साधकों को मार्गदर्शन मिलता है ,चाहे वह किसी
    धर्म के हों |यहाँ अनेकानेक ऐसे साधक -योगी होते हैं जो हजारों हजार साल से साधना
    रत होते हैं |उन पर आयु का कोई प्रभाव नहीं होता |हम सब ने अनेक कथाओं कहानियों
    में सुना है की अमुक योगी -महात्मा -साधू हिमालय पर तप करने चला गया |सोचिये वह
    हिमालय के बर्फ में कहाँ जाएगा |वह एक निश्चित योग्यता प्राप्त कर यहाँ बुला लिया
    जाता है आगे की साधना और मार्गदर्शन के लिए |यहाँ से पूर्णता प्राप्त कर कुछ वापस
    भी लौट आते हैं और यहाँ के साधकों का मार्गदर्शन करते हैं |यह क्षेत्र मानसरोवर -कैलाश
    के आसपास है ,जिसे शिव का वासस्थान माना जाता है |किन्तु दृष्टव्य नहीं है |अलुकिक
    उर्जा से घिरा और अदृश्य है |दृष्टव्य क्षेत्र में स्वर्ग की सीढियां भी मिली हैं |महाभारत
    बाद इसी क्षेत्र में पांडव भी गए |संभव है उस क्षेत्र में ही गए हों |जो भी हो पर
    निर्विवाद रूप से यह क्षेत्र तो है जो हरेक उच्च स्तर के साधकों का मार्गदर्शक
    होता है और जिन्हें इस घाटी के सिद्ध स्वयं खोज लेते हैं |……………………………………………………..हर
    हर महादेव 

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