Month: June 2019
  • कापालिक क्या होते हैं ?

    कापालिक
    : भैरवी तंत्र साधक

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               भारतीय साधना अथवा उपासना जगत में पांच सम्प्रदाय रहे हैं |शैव ,शाक्त ,वैष्णव ,सौर और गाणपत्य |सौर और गाणपत्य सम्प्रदाय को मानने वाले अब कम पाए जाते हैं जबकि वैष्णव
    सम्प्रदाय अधिकतर
    वैदिक मार्गी
    और कर्मकांड की प्रमुखता वाले सांसारिक लोग अथवा सन्यासी मानते हैं |तंत्र जगत में मूल रूप से शैव और शाक्त सम्प्रदाय हैं |इनमे कापालिक सम्प्रदाय के लोग शैव सम्प्रदाय के अंतर्गत आते हैं जिनके मुख्य आराध्य
    शिव हैं |ये लोग मानव खोपड़ियों को पात्र के रूप में उपयोग करते हैं और उसके माध्यम
    से ही खाते पीते हैं इसलिए इन्हें कापालिक कहा जाता है |माहेश्वर सम्प्रदाय के चार मूल सम्प्रदायों में कापालिक सम्प्रदाय भी है |इन्हें कापालिक शैव कहा जाता है कापालिक संप्रदाय को महाव्रतसंप्रदाय भी माना जाता है। इसे तांत्रिकों का संप्रदाय माना गया है। नर कपाल धारण करने के कारण ये लोग कापालिक कहलाए। कुछ विद्वान इसे नहीं मानते हैं। उनके अनुसार कपाल में ध्यान लगाने के चलते उन्हें कापालिक कहा गया। पुराणों अनुसार इस मत को धनद या कुबेर ने शुरू किया था।
                    बौद्ध आचार्य हरिवर्मा और असंग के समय में भी कापालिकों के संप्रदाय विद्यमान थे। सरबरतंत्र में 12 कापालिक गुरुओं
    और उनके 12 शिष्यों के नाम सहित वर्णन मिलते हैं। गुरुओं के नाम हैंआदिनाथ, अनादि, काल,
    अमिताभ, कराल, विकराल आदि। शिष्यों के नाम हैंनागार्जुन, जड़भरत, हरिश्चन्द्र, चर्पट आदि। ये सब शिष्य तंत्र के प्रवर्तक रहे हैं। कापालिक एक तांत्रिक शैव सम्प्रदाय है जो अपुराणीय था |इन्होने भैरव तंत्र तथा कॉल तंत्र की रचना की |कापालिक सम्प्रदाय पाशुपत
    या शैव सम्प्रदाय का वह अंग है जिसमे वामाचार अपने चरम रूप में पाया जाता है |कापालिक सम्प्रदाय के अंतर्गत नकुलीश तथा लकुलीश को पाशुपत
    मत का प्रवर्तक माना जाता है |यह कहना कठिन है की लकुलीश
    [जिसके हाथ में लकुट ] हो ऐतिहासिक व्यक्ति था या काल्पनिक |इनकी मूर्तियाँ लकुट के साथ हैं ,इस कारण इन्हें लकुटीश कहते हैं |इतिहासवेत्ताओं की दृष्टि
    में तो पाशुपत सम्प्रदाय की उत्पत्ति का समय .पूदूसरी शताब्दी है ,किन्तु
    जिस तरह तांत्रिक सम्प्रदाय वैदिक युग में भी था उससे अनुमान
    है की यह इससे पूर्व गुप्त और समाज से दूर क्रियाशील था |
    कापालिक सम्प्रदाय के रहन सहन और साधना पद्धतियों से ज्ञात होता है की इसका मूल उद्गम हिमालय और पर्वतीय क्षेत्र हैं |चूंकि यह मूलतः कुंडलिनी साधना से सम्बंधित सम्प्रदाय रहा है और यह तंत्र साधना से कुंडलिनी जागरण में विश्वास रखता है अतः इनकी पद्धतियाँ भी उसी अनुरूप हैं |पर्वतीय पर्यावरण के अनुरूप
    रहने के लिए इन्होने मांस– मदिरा और पंचमकार को अपनाया
    और काम भाव द्वारा कुंडलिनी जागरण को माध्यम बनाने से इन्होने मैथुन को इसमें स्थान दिया |इनका पंचमकार उपयोग बहुत हद तक एक विशिष्ट वातावरण के अनुकूल
    रहने और ऊर्जा प्राप्ति के लिए था ,केवल मैथुन और मुद्रा कुंडलिनी साधना के लिए विशिष्ट आवश्यक
    तत्व के रूप में लिया गया था |मांस ,मदिरा ,मीन
    विशिष्ट वातावरण की अनुकूलता और एकाग्रता हेतु था जो अलग पर्यावरण में आवशक तत्व
    नहीं था किन्तु
    चूंकि बाद के अधिकतर वाम मार्गी
    पंथ और सम्प्रदाय इसी से विकसित हुए अतः सबमे यह आता गया और कुछ के अतिरिक्त अधिकतर
    में विकृत रूप लेता गया |
                  कापालिक मत में प्रचलित साधनाएं बहुत कुछ वज्रयानी साधनाओं में गृहीत हैं ,अर्थात इनसे यह बौद्धों की वज्रयान सम्प्रदाय में भी गया ,चूंकि
    वज्रयानों का
    भी उद्गम हिमालयीय क्षेत्र ही था |इनकी पद्धतिय अन्य शैव सम्प्रदायों और नाथ सम्प्रदाय में भी गयी |यक्ष देव परम्परा के देवताओं और साधनाओं का सीधा प्रभाव शैव और बौद्ध कापालिकों पर पड़ा क्योकि तीनो में ही प्रायः
    कई देवता समान गुण धर्म और स्वभाव के हैं |चर्याचर्यविनिश्चय की टीका में एक श्लोक आया है जिसमे प्राणी को वज्रधर
    कहा गया है और जगत की स्त्रियों को स्त्री जन साध्य होने के कारण यह साधना कापालिक कही गयी |
                 पाशुपत सम्प्रदाय से ही कालमुख और कापालिक शाखाएं उद्भूत
    हुई |कालमुख मुख्य रूप से राज दरबारों और नगरों में सीमित रहा किन्तु कापालिक मत दक्षिण और उत्तर भारत में गुह्य साधना के रूप में फैला |कापालिकों के देवता माहेश्वर थे |गोरक्ष
    सिद्धांत संग्रह
    के अनुसार
    श्री नाथ के दूतों ने जब विष्णु के चौबीस अवतारों के कपाल काट लिए तब वे कापालिक कहलाये |इससे तथा बहुत सी अन्य कथाओं के द्वारा
    वैष्णव सम्प्रदाय से कापालिक या शैव सम्प्रदाय का विरोध लक्षित होता है |अधिकतर
    कहानियों में शिव को राक्षसों और दानवों
    का उपास्य
    देव बताया जाता है और उनकी शक्ति से वे देवताओं को भी पराजित करते हैं |यह भी इन्ही सम्प्रदायों की आपसी विरोधात्मक रचनाएँ हैं |आर्य
    लोग
    विष्णु ,इंद्र ,रूद्र आदि के आराधक थे जबकि आर्येतर जातियां शिव जैसे देवता की उपासना
    करती थी |बाद में भक्तिवाद का प्रभाव शैव धर्म पर पड़ा और वैदिक देवता तथा आर्येतर स्रोत के देवता एक हो गए |रूद्र को शिव कहा जाने लगा और अन्य देवताओं को भी आपस में मिला दिया गया |वैदिक कर्मकांड ,तंत्र में घुस गया |भक्तिवादी उपासना में शिव उदार और भक्त वत्सल चित्रित किये गए |गुह्य साधनाओं में शिव का आदिम रूप न्यूनाधिक रूप में विद्यमान रहा जिसके अनुसार वे विलासी
    और घोर क्रियाकलापों से सम्बद्ध थे |
               बौद्ध सम्रदाय में सहजयान और वज्रयान में भी स्त्री साहचर्य की अनिवार्यता स्वीकार की गयी है और बौद्ध साधक अपने को कपाली कहते थे |[चर्यापद ११ ,चर्या गीत कोष ]|यह प्रकट करता है की बौद्ध सम्प्रदाय से पहले से कापालिक सम्प्रदाय था और बौद्ध सम्प्रदाय ने इनके काफी कुछ नियम और पद्धतियाँ अपनी साधनाओं में ली हैं |प्राचीन साहित्य [जैसे मालती माधव ]में कपाल कुंडला
    और अघोरघंट का उल्लेख
    आया है |इस ग्रन्थ से कापालिक मत के सम्बन्ध में कुछ स्थूल तथ्य स्थिर किये जा सकते हैं |कापालिक मत ,नाथ संप्रदायियों और हठ योगियों की तरह चक्र और नाड़ियों में विश्वास करता था |उसमे जीव और शिव में अभिन्नता मानी गयी है |
                योग से ही शिव का साक्षात्कार संभव है |शिव का शक्ति संयुक्त रूप ही समर्थ और प्रभावकारी है |शिव और शक्ति के इस मिलनसुख को ही कापालिक अपनी कपालिनी के माध्यम
    से अनुभव करता है जिसे वह महासुख की संज्ञा देता है |सोम को कापालिक [ उमा ]शक्ति सहित शिव का भी प्रतीक
    मानता है और उसके पान से उल्लसित हो योगिनी के साथ विहार करते हुए अपने को कैलास स्थित शिव उमा जैसा अनुभव करता है |मद्य ,मांस ,मत्स्य ,मुद्रा और मिथुन इस पंचमकारों के साथ कापालिकों ,शाक्तों और वज्रयानी सिद्धों का समानतः सम्बन्ध था और पूर्व मध्यकाल की साधनाओं में इनका महत्वपूर्ण स्थान था |
                  कापालिक साधना एक वाम मार्गीय तीव्र
    प्र
    भावी साधना पद्धति रही है जिससे इसके साधकों
    को अतुलनीय शक्तियां और सिद्धियाँ प्राप्त होती थी ,चूंकि यह कुंडलिनी से सम्बंधित साधना भी रही है और इसमें नारी को भी सहयोगिनी बनाया जाता रहा है ,इसलिए
    कापालिक
    साधना को विलास और वैभव का परिरूप मानकर आकर्षणबद्ध कई साधक इसमें शामिल हुए और उद्देश्य पवित्र
    होने से उचित स्थान नहीं प्प्राप्त कर सके ,किन्तु
    उन्होंने इसे भोग का मार्ग बना दिया और इसके मूल स्वरुप
    को विकृत जरुर कर दिया |मूल कापालिक ,समाज से दूर रहा और धीरे धीरे इन तथाकथित कापालिकों को देखकर निर्लिप्त होता गया और मूल साधना लगभग विलुप्त हो गई |मूल अर्थों में कापालिकों की चक्र साधना एक उत्तमोत्तम साधना थी किन्तु इसे भोग विलास तथा काम पिपासा शांत करने का साधन बना दिया गया |इसमें आई विकृतियों और भ्रष्ट
    साधकों के कारण धीरे धीरे इस मार्ग को घृणा भाव से देखा जाने लगा |जो सही अर्थों में कापालिक थे ,उन्होंने पृथक पृथक होकर व्यक्तिगत साधनाएं शुरू कर दी |आदि शंकराचार्य तक आते आते इसका मूल स्वरुप विलुप्त होकर विकृत रूप ही दिख रहा था |आदि शंकराचार्य ने कापालिक सम्प्रदाय में
    अनैतिक
    आचरण का विरोध किया ,जिससे इस सम्प्रदाय का एक बहुत बड़ा हिस्सा
    नेपाल के सीमावर्ती इलाके में तथा तिब्बत में चला गया |यह सम्प्रदाय तिब्बत में लगातार गतिशील रहा ,जिससे की बौद्ध कापालिक साधना के रूप में यह सम्प्रदाय जीवित रह सका |
    असंख्य इतिहारकार मानते हैं की इसी सम्प्रदाय से शैव शाक्त कौल मार्ग का प्रचलन
    हुआ |इस सम्प्रदाय से सम्बंधित साधनाएं अत्यधिक महत्वपूर्ण रही हैं |कापालिक चक्र में मुख्य साधक भैरव तथा साधिका को त्रिपुर सुन्दरी कहा जाता है ,तथा काम शक्ति के विभिन्न साधन से इनमे असीम शक्तियां जाती हैं |फल की इच्छा मात्र से अपने शारीरिक अवयवों पर नियंत्रण रखना या किसी भी प्रकार
    के निर्माण तथा विनाश करने की बेजोड़ शक्ति इस मार्ग से प्राप्त की जा सकती थी |इस मार्ग में कापालिक अपनी भैरवी साधिका को पत्नी के रूप में भी स्वीकार कर सकता था |इनके मठ जीर्ण शीर्ण अवस्था
    में उत्तरी
    पूर्व राज्यों में आज भी देखे जाते हैं |
                 कापालिक साधनाओं में महाकाली ,भैरव ,चाण्डाली ,चामुंडा ,शिव तथा त्रिपुरा जैसे देवी देवताओं की साधना होती है |वहीं बौद्ध कापालिक साधना में वज्र भैरव ,महाकाल ,हेवज्रा जैसे तिब्बती देवी देवताओं की साधना होती है |पहले के समय में मन्त्र मात्र से मुख्य कापालिक ,साथी कापालिकों की काम शक्ति को न्यूनता या उद्वेग
    देते थे ,जिससे योग्य मापदंड में यह साधना पूरी होती थी |इस प्रकार
    यह अद्भुत
    मार्ग लुप्त होते हुए भी गुप्त रूप से सुरक्षित तो है पर सामान्य के लिए अप्राप्य है |विभिन्न तांत्रिक मठों में आज भी गुप्त रूप से कापालिक अपनी तंत्र साधनाओं को करते हैं |
    जो समाज में भैरवी साधना करने या करवाने के दावे कर रहे अथवा जो हिमालय क्षेत्र के विभिन्न मठों ,आश्रमों के नाम पर खुद को महागुरु प्रचारित कर रहे वास्तव में वह तो भैरवी साधक हैं , कापालिक , कौल |यह केवल इन आश्रमों ,मठों के नाम पर समाज में व्यवसाय कर रहे हैं और लोगों को लूट रहे हैं |जो भोग लिप्सा ,कापालिक सम्प्रदाय को विकृत कर गई आज उससे बढ़कर बचे खुचे तंत्र को भी यह महागुरु घंटाल समाप्त करने पर अमादा हैं |भोली भाली जनता और लोग अपनी समस्याओं से निजात पाने अथवा शक्ति ,समृद्धि पाने के लालच में इनके हाथों मूर्ख बन रहे |वास्तव में जो साधक हैं वह खुद को प्रचारित करते हैं , खुद को व्यक्त करते हैं |उनका तो बस एक ही लक्ष्य होता है अपनी मुक्ति |चूंकि उनके पास शक्ति और सिद्धि होती है अतः इस तरह प्रचार करने और दीक्षाएं बांटने की उन्हें जरुरत ही नहीं होती |वह तो समाज और लोगों से दूर खुद में रमा रहता है |समाज में रहने वाला कुंडलिनी साधक तक खुद को कभी व्यक्त नहीं करता |……………………………………………….हर– हर महादेव 

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  • नाथ सम्प्रदाय [Nath Sampradaya]

    नाथ सम्प्रदाय [Nath Sampradaya]
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    नाथ सम्प्रदाय की उत्पत्ति कापालिक सम्प्रदाय से हुई है जो शैव सम्प्रदाय का अंग रहा है |कापालिक सम्प्रदाय में समयक्रम में अनेक विकृतियाँ उत्पन्न हुई और मूल शैव साधकों को भी इनसे परेशानी होने लगी |तब योग्य साधकों ने नाथ सम्प्रदाय के रूप में एक अलग सिद्धात केसाथ भिन्न स्वरुप लिया |इन पंथ के साधक पहले से थे किन्तु वह संगठित नहीं थे और अन्य से बहुत सरोकार नहीं था | नाथ सम्प्रदाय का उदय यौगिक क्रियाओं के उद्धार के लिए हुआ था। जब तान्त्रिकों और सिद्धों के चमत्कार एवं अभिचार बदनाम हो गये, मद्य, माँस आदि के लिए तथा सिद्ध, तान्त्रिक आदि स्त्री-सम्बन्धी आचारों के कारण घृणा की दृष्टि से देखे जाने लगे तथा जब इनकी यौगिक क्रियाएँ भी मन्द पड़ने लगीं, तब ‘नाथ सम्प्रदाय’ का उदय हुआ। इसमें नव नाथ मुख्य कहे जाते हैं : ‘गोरक्षनाथ’, ‘ज्वालेन्द्रनाथ’, ‘कारिणनाथ’, ‘गहिनीनाथ’, ‘चर्पटनाथ’, ‘रेवणनाथ’, ‘नागनाथ’, ‘भर्तृनाथ’ और ‘गोपीचन्द्रनाथ’। गोरक्षनाथ ही गोरखनाथ के नाम से प्रसिद्ध हैं।
    इस सम्प्रदाय के परम्परा संस्थापक आदिनाथ स्वयं शंकर के अवतार माने जाते हैं। इसका सम्बन्ध रसेश्वरों से है और इसके अनुयायी आगमों में आदिष्ट योग साधन करते हैं। अत: इसे अनेक इतिहासयज्ञ शैव सम्प्रदाय मानते हैं। परन्तु और शैवों की तरह न तो लिंगार्चन करते हैं और न ही शिवोपासना के और अंगों का निर्वाह करते हैं। किन्तु ये तीर्थ, देवता आदि को मानते हैं। शिव मन्दिर और देवी मन्दिरों में दर्शनार्थ जाते हैं। कैला देवीजी तथा हिंगलाज माता के दर्शन विशेषत: करते हैं, जिससे इनका शाक्त सम्बन्ध भी स्पष्ट है। योगी भस्म भी रमाते हैं, परन्तु भस्म स्नान का एक विशेष तात्पर्य है- जब ये लोग शरीर में श्वास का प्रवेश रोक देते हैं, तो रोमकूपों को भी भस्म से बन्द कर देते हैं। प्राणायाम की क्रिया में यह महत्व की युक्ति है। फिर भी यह शुद्ध योगसाधना का पन्थ है। इसीलिए इसे महाभारत काल के योग सम्प्रदाय की परम्परा के अन्तर्गत मानना चाहिए। विशेषतया इसीलिए कि पाशुपत सम्प्रदाय से इसका सम्बन्ध हल्का-सा ही दीख पड़ता है। साथ ही योग साधना इसके आदि, मध्य और अन्त में है। अत: यह शैव मत का शुद्ध योग सम्प्रदाय है।
    इस पन्थ वालों की योग साधना पातञ्जल विधि का विकसित रूप है। उसका दार्शनिक अंश छोड़कर हठयोग की क्रिया छोड़ देने से नाथपन्थ की योगक्रिया हो जाती है। नाथपन्थ में ‘ऊर्ध्वरेता’ या अखण्ड ब्रह्मचारी होना सबसे महत्व की बात है। माँस-मद्यादि सभी तामसिक भोजनों का पूरा निषेध है। यह पन्थ चौरासी सिद्धों के तान्त्रिक वज्रयान का सात्विक रूप में परिपालक प्रतीत होता है। उनका तात्विक सिद्धान्त है कि, परमात्मा ‘केवल’ है। उसी परमात्मा तक पहुँचना मोक्ष है। जीव का चाहे उससे जैसा सम्बन्ध माना जाये, परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से उससे सम्मिलन ही कैवल्य मोक्ष या योग है। इसी जीवन में इसकी अनुभूति हो जाए, पन्थ का यही लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रथम सीढ़ी काया की साधना है। कोई काया को शत्रु समझकर भाँति-भाँति के कष्ट देता है और कोई विषयवासना में लिप्त होकर उसे अनियंत्रित छोड़ देता है। परन्तु नाथपन्थी काया को परमात्मा का आवास मानकर उसकी उपयुक्त साधना करता है। काया उसके लिए वह यन्त्र है, जिसके द्वारा वह इसी जीवन में मोक्षनुभूति कर लेता है। जन्म-मरण जीवन पर पूरा अधिकार कर लेता है, जरा-मरण-व्याधि और काल पर विजय पा लेता है।
    इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह पहले काया शोधन करता है। इसके लिए वह यम, नियम के साथ हठयोग के षट् कर्म (नेति, धौति, वस्ति, नौलि, कपालभाति और त्राटक) करता है कि काया शुद्ध हो जाए। यह नाथपन्थियों का अपना आविष्कार नहीं है; हठयोग पर लिखित ‘घेरण्डसंहिता’ नामक प्राचीन ग्रन्थ में वर्णित सात्त्विक योग प्रणाली का ही यह उद्धार नाथपन्थियों ने किया है।
    इस मत में शुद्ध हठयोग तथा राजयोग की साधनाएँ अनुशासित हैं। योगासन, नाड़ी ज्ञान, षट्चक्र निरूपण तथा प्राणायाम द्वारा समाधि की प्राप्ति इसके मुख्य अंग हैं। शारीरिक पुष्टि तथा पंच महाभूतों पर विजय की सिद्धि के लिए रसविद्या का भी इस मत में एक विशेष स्थान है। इस पन्थ के योगी या तो जीवित समाधि लेते हैं या फिर शरीर छोड़ने पर उन्हें समाधि दी जाती है। वे जलाये नहीं जाते। यह माना जाता है कि उनका शरीर योग से ही शुद्ध हो जाता है, उसे जलाने की आवश्यकता नहीं होती है।
    नाथपन्थी योगी अलख (अलक्ष) जगाते हैं। इसी शब्द से इष्टदेव का ध्यान करते हैं और इसी से भिक्षाटन भी करते हैं। इनके शिष्य गुरु के अलक्ष कहने पर ‘आदेश’ कहकर सम्बोधन का उत्तर देते हैं। इन मन्त्रों का लक्ष्य वही प्रणवरूपी परम पुरुष है, जो वेदों और उपनिषदों का ध्येय है। नाथपन्थी जिन ग्रन्थों को प्रमाण मानते हैं, उनमें सबसे प्राचीन हठयोग सम्बन्धी ग्रन्थ ‘घेरण्डसंहिता’ और ‘शिवसंहिता’ हैं। गोरक्षनाथ कृत हठयोग, गोरक्षनाथ ज्ञानामृत, गोरक्षकल्प, गोरक्षसहस्रनाम, चतुरशीत्यासन, योगचिन्तामणि, योगमहिमा, योगमार्तण्ड, योगसिद्धान्त पद्धति, विवेकमार्तण्ड, सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति, गोरखबोध, दत्त गोरख संवाद, गोरखनाथजी रा पद, गोरखनाथ के स्फुट ग्रन्थ, ज्ञानसिद्धान्त योग, ज्ञानविक्रम, योगेश्वरी साखी, नरवैबोध, विरहपुराण और गोरखसार ग्रन्थ भी नाथ सम्प्रदाय के प्रमाण ग्रन्थ हैं।
    इनमे कनफटा योगी भी होते हैं |कनफटा योगियों का सम्बंध ‘गोरख सम्प्रदाय’ से है, क्योंकि इस सम्प्रदाय के लोग कान छिदवाकर उसमें मुद्रा या कुंडल धारण करते हैं, इसीलिए इन्हें ‘कनफटा’ कहा जाता है। कनफटा योगियों में विधवा स्त्रियाँ तथा योगियों की पत्नियाँ भी कुंडल धारण करती देखी जाती हैं| इन योगियों द्वारा धारण की जाने वाली मुद्रा अथवा कुंडल को ‘दर्शन’ और ‘पवित्री’ भी कहते हैं। इसी आधार पर कनफटा योगियों को ‘दरसनी साधु’ भी कहा जाता है। नाथयोगी संप्रदाय में ऐसे योगी, जो कान नहीं छिदवाते और कुंडल नहीं धारण करते, वे ‘औघड़’ कहलाते हैं। औघड़ योगी ‘जालंधरनाथ’ के और कनफटा योगी ‘मत्स्येंद्रनाथ’ तथा ‘गोरखनाथ’ के अनुयायी माने जाते हैं। क्योंकि प्रसिद्ध है कि जालंधरनाथ औघड़ थे और मत्स्येंद्रनाथ एवं गोरखनाथ कनफटा।
    कनफटा योगियों में विधवा स्त्रियाँ तथा योगियों की पत्नियाँ भी कुंडल धारण करती देखी जाती हैं। यह क्रिया प्राय: किसी शुभ दिन अथवा अधिकतर बसंत पंचमी के दिन संपन्न की जाती है और इसमें मंत्रों का प्रयोग भी होता है। कान चिरवाकर मुद्रा धारण करने की प्रथा के प्रवर्तन के संबंध में दो मत मिलते हैं। एक मत के अनुसार इसका प्रवर्तन मत्स्येंद्रनाथ ने और दूसरे मत के अनुसार गोरक्षनाथ ने किया था। कर्णकुंडल धारण करने की प्रथा के आरंभ की खोज करते हुए विद्वानों ने एलोरा गुफा की मूर्ति, सालीसेटी, एलीफैंटा, अर्काट ज़िले के परशुरामेश्वर के शिवलिंग पर स्थापित मूर्ति आदि अनेक पुरातात्विक सामग्रियों की परीक्षा कर निष्कर्ष निकाला है कि मत्स्येंद्र और गोरक्ष के पूर्व भी कर्णकुंडल धारण करने की प्रथा थी और केवल शिव की ही मूर्तियों में यह बात पाई जाती है।
    यह माना जाता है कि गोरक्षनाथ ने (शंकराचार्य द्वारा संगठित शैव सन्न्यासियों से) अवशिष्ट शैवों का 12 पंथों में संगठन किया था, जिनमें गोरखनाथी प्रमुख हैं। इन्हें ही ‘कनफटा’ कहा जाता है। एक मत यह भी मिलता है कि गोरखनाथी लोग गोरक्षनाथ को संप्रदाय का प्रतिष्ठाता मानते हैं, जबकि कनफटा उन्हें पुनर्गठनकर्ता कहते हैं। इन लोगों के मठ, तीर्थस्थानादि बंगाल , सिक्किम , नेपाल ,कश्मीर , पंजाब , सिंध , काठियावाड़ , मुंबई , राजस्थान , उडीसा आदि प्रदेशों में पाए जाते हैं।………………………………………………..हर हर महादेव 

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  • शिव के १९ अवतार कौन कौन से ?

    भगवान शिव के १९ अवतार 
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    भगवान शिव का पिप्पलाद अवतार 
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    मानव जीवन में भगवान शिव के पिप्पलाद अवतार का बड़ा महत्व है,शनि पीड़ा का निवारण पिप्पलाद की कृपा से ही संभव हो सका|कथा है कि पिप्पलाद ने देवताओं से पूछा- क्या कारण है कि मेरे पिता दधीचि जन्म से पूर्व ही मुझे छोड़कर चले गए? देवताओं ने बताया शनिग्रह की दृष्टि के कारण ही ऐसा कुयोग बना। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए। उन्होंने शनि को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे दिया। शाप के प्रभाव से शनि उसी समय आकाश से गिरने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है। शिव महापुराण के अनुसार स्वयं ब्रह्मा ने ही शिव के इस अवतार का नामकरण किया था।
    पिप्पलादेति तन्नाम चक्रे ब्रह्मा प्रसन्नधी:।
    -शिवपुराण शतरुद्रसंहिता 24/61
    अर्थात ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर सुवर्चा के पुत्र का नाम पिप्पलाद रखा .
    भगवान शिव का नंदी अवतार 
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    भगवान शंकर सभी जीवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भगवान शंकर का नंदीश्वर अवतार भी इसी बात का अनुसरण करते हुए सभी जीवों से प्रेम का संदेश देता है। नंदी (बैल) कर्म का प्रतीक है, जिसका अर्थ है कर्म ही जीवन का मूल मंत्र है। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- शिलाद मुनि ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद ने अयोनिज और मृत्युहीन संतान की कामना से भगवान शिव की तपस्या की। तब भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को भूमि से उत्पन्न एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। भगवान शंकर ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष बनाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ।
     भगवान शिव का वीरभद्र अवतार 
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    यह अवतार तब हुआ था, जब दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में माता सती ने अपनी देह का त्याग किया था। जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने क्रोध में अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे रोषपूर्वक पर्वत के ऊपर पटक दिया। उस जटा के पूर्वभाग से महाभंयकर वीरभद्र प्रकट हुए। शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है-
    क्रुद्ध: सुदष्टïोष्ठïपुट: स धूर्जटिर्जटां तडिद्वह्लिïसटोग्ररोचिषम्।
    उत्कृत्य रुद्र: सहसोत्थितो हसन् गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि॥
    ततोऽतिकायस्तनुवा स्पृशन्दिवं।
    भगवान् शिव का भैरव अवतार 
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    शिव महापुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। एक बार भगवान शंकर की माया से प्रभावित होकर ब्रह्मा व विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे। तब वहां तेज-पुंज के मध्य एक पुरुषाकृति दिखलाई पड़ी। उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा- चंद्रशेखर तुम मेरे पुत्र हो। अत: मेरी शरण में आओ। ब्रह्मा की ऐसी बात सुनकर भगवान शंकर को क्रोध आ गया। उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात कालराज हैं। भीषण होने से भैरव हैं। भगवान शंकर से इन वरों को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा के पांचवें सिर को काट दिया।
    ब्रह्मा का पांचवां सिर काटने के कारण भैरव ब्रह्महत्या के पाप से दोषी हो गए। तब काशी में भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल गई। काशीवासियों के लिए भैरव की भक्ति अनिवार्य बताई गई है।
    भगवान शिव का अंशावतार ::अश्वत्थामा 
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    महाभारत के अनुसार पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के अंशावतार हैं। आचार्य द्रोण ने भगवान शंकर को पुत्र रूप में पाने की लिए घोर तपस्या की थी और भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया था कि वे उनके पुत्र के रूप मे अवतीर्ण होंगे। समय आने पर सवन्तिक रुद्र ने अपने अंश से द्रोण के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में अवतार लिया। ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा अमर हैं तथा वह आज भी धरती पर ही निवास करते हैं। इस विषय में एक श्लोक प्रचलित है-
    अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
    कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
    सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
    जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
    अर्थात अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय ये आठों अमर हैं।
    शिवमहापुराण(शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा के किनारे निवास करते हैं। वैसे, उनका निवास कहां हैं, यह नहीं बताया गया है।
    भगवान शिव का शरभावतार 
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    भगवान शंकर का छठे अवतार हैं शरभावतार। शरभावतार में भगवान शंकर का स्वरूप आधा मृग (हिरण) तथा शेष शरभ पक्षी (आख्यानिकाओं में वर्णित आठ पैरों वाला जंतु जो शेर से भी शक्तिशाली था) का था। इस अवतार में भगवान शंकर ने नृसिंह भगवान की क्रोधाग्नि को शांत किया था। लिंगपुराण में शिव के शरभावतार की कथा है, उसके अनुसार हिरण्यकश्पू का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंहावतार लिया था।
    हिरण्यकश्यपू के वध के पश्चात भी जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवता शिवजी के पास पहुंचे। तब भगवान शिव शरभ के रूप में भगवान नृसिंह के पास पहुंचे तथा उनकी स्तुति की, लेकिन नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत नहीं हुई तो शरभ रूपी भगवान शिव अपनी पूंछ में नृसिंह को लपेटकर ले उड़े। तब भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत हुई। उन्होंने शरभावतार से क्षमा याचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की।
    भगवान शिव का गृहपति अवतार 
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    भगवान शंकर का सातवां अवतार है गृहपति। इसकी कथा इस प्रकार है- नर्मदा के तट पर धर्मपुर नाम का एक नगर था। वहां विश्वानर नाम के एक मुनि तथा उनकी पत्नी शुचिष्मती रहती थीं। शुचिष्मती ने बहुत काल तक नि:संतान रहने पर एक दिन अपने पति से शिव के समान पुत्र प्राप्ति की इच्छा की। पत्नी की अभिलाषा पूरी करने के लिए मुनि विश्वनार काशी आ गए। यहां उन्होंने घोर तप द्वारा भगवान शिव के वीरेश लिंग की आराधना की।
    एक दिन मुनि को वीरेश लिंग के मध्य एक बालक दिखाई दिया। मुनि ने बालरूपधारी शिव की पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने शुचिष्मति के गर्भ से अवतार लेने का वरदान दिया। कालांतर में शुचिष्मती गर्भवती हुई और भगवान शंकर शुचिष्मती के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट हुए। कहते हैं पितामह ब्रह्म ने ही उस बालक का नाम गृहपति रखा था।
    भगवान शिव के अंशावतार :: ऋषि दुर्वासा 
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    भगवान शंकर के विभिन्न अवतारों में ऋषि दुर्वासा का अवतार भी प्रमुख है। धर्म ग्रंथों के अनुसार सती अनुसूइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा के निर्देशानुसार पत्नी सहित ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्रकामना से घोर तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों उनके आश्रम पर आए। उन्होंने कहा- हमारे अंश से तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोक में विख्यात तथा माता-पिता का यश बढ़ाने वाले होंगे। समय आने पर ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा हुए, जो देवताओं द्वारा समुद्र में फेंके जाने पर उससे प्रकट हुए। विष्णु के अंश से श्रेष्ठ संन्यास पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्त उत्पन्न हुए और रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया। शास्त्रों में इसका उल्लेख है-
    अत्रे: पत्न्यनसूया त्रीञ्जज्ञे सुयशस: सुतान्।
    दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मïसम्भवान्॥
    -भागवत 4/1/15
    अर्थ- अत्रि की पत्नी अनुसूइया से दत्तात्रेय, दुर्वासा और चंद्रमा नाम के तीन परम यशस्वी पुत्र हुए। ये क्रमश: भगवान विष्णु, शंकर और ब्रह्मा के अंश से उत्पन्न हुए थे।
    भगवान शिव के अवतार हनुमान 
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    भगवान शिव का हनुमान अवतार सभी अवतारों में श्रेष्ठ माना गया है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक वानर का रूप धरा था। शिवमहापुराण के अनुसार देवताओं और दानवों को अमृत बांटते हुए विष्णुजी के मोहिनी रूप को देखकर लीलावश शिवजी ने कामातुर होकर वीर्यपात कर दिया।
    सप्तऋषियों ने उस वीर्य को कुछ पत्तों में संग्रहीत कर लिया। समय आने पर सप्तऋषियों ने भगवान शिव के वीर्य को वानरराज केसरी की पत्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे अत्यंत तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी श्री हनुमानजी उत्पन्न हुए।
    भगवान शिव का वृषभ अवतार 
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    भगवान शंकर ने विशेष परिस्थितियों में वृषभ अवतार लिया था। इस अवतार में भगवान शंकर ने विष्णु पुत्रों का संहार किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार जब भगवान विष्णु दैत्यों को मारने पाताल लोक गए तो उन्हें वहां बहुत सी चंद्रमुखी स्त्रियां दिखाई पड़ी। विष्णु जी ने उनके साथ रमण करके बहुत से पुत्र उत्पन्न किए, जिन्होंने पाताल से पृथ्वी तक बड़ा उपद्रव किया। उनसे घबराकर ब्रह्माजी ऋषिमुनियों को लेकर शिवजी के पास गए और रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे। तब भगवान शंकर ने वृषभ रूप धारण कर विष्णु पुत्रों का संहार किया।
    भगवान शिव का यतिनाथ अवतार 
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    भगवान शंकर ने यतिनाथ अवतार लेकर अतिथि के महत्व का प्रतिपादन किया है। उन्होंने इस अवतार में अतिथि बनकर भील दम्पत्ति की परीक्षा ली थी। भील दम्पत्ति को अपने प्राण गंवाने पड़े। धर्म ग्रंथों के अनुसार अर्बुदाचल पर्वत के समीप शिवभक्त आहुक-आहुका भील दम्पत्ति रहते थे। एक बार भगवान शंकर यतिनाथ के वेष में उनके घर आए। उन्होंने भील दम्पत्ति के घर रात व्यतीत करने की इच्छा प्रकट की। आहुका ने अपने पति को गृहस्थ की मर्यादा का स्मरण कराते हुए स्वयं धनुषबाण लेकर बाहर रात बिताने और यति को घर में विश्राम करने देने का प्रस्ताव रखा। इस तरह आहुक धनुषबाण लेकर बाहर चला गया। प्रात:काल आहुका और यति ने देखा कि वन्य प्राणियों ने आहुक को मार डाला है। इस पर यतिनाथ बहुत दु:खी हुए। तब आहुका ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि आप शोक न करें। अतिथि सेवा में प्राण विसर्जन धर्म है और उसका पालन कर हम धन्य हुए हैं। जब आहुका अपने पति की चिताग्नि में जलने लगी तो शिवजी ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में पुन: अपने पति से मिलने का वरदान दिया।
    भगवान शिव का कृष्णदर्शन अवतार 
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    भगवान शिव ने इस अवतार में यज्ञ आदि धार्मिक कार्यों के महत्व को बताया है। इस प्रकार यह अवतार पूर्णत: धर्म का प्रतीक है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इक्ष्वाकुवंशीय श्राद्धदेव की नवमी पीढ़ी में राजा नभग का जन्म हुआ। विद्या-अध्ययन को गुरुकुल गए। जब बहुत दिनों तक न लौटे तो उनके भाइयों ने राज्य का विभाजन आपस में कर लिया। नभग को जब यह बात ज्ञात हुई तो वह अपने पिता के पास गया। पिता ने नभग से कहा कि वह यज्ञ परायण ब्राह्मणों के मोह को दूर करते हुए उनके यज्ञ को सम्पन्न करके उनके धन को प्राप्त करे। तब नभग ने यज्ञभूमि में पहुंचकर वैश्य देव सूक्त के स्पष्ट उच्चारण द्वारा यज्ञ संपन्न कराया। अंगारिक ब्राह्मण यज्ञ अवशिष्ट धन नभग को देकर स्वर्ग को चले गए। उसी समय शिवजी कृष्णदर्शन रूप में प्रकट होकर बोले कि यज्ञ के अवशिष्ट धन पर तो उनका अधिकार है। विवाद होने पर कृष्णदर्शन रूपधारी शिवजी ने उसे अपने पिता से ही निर्णय कराने को कहा। नभग के पूछने पर श्राद्धदेव ने कहा-वह पुरुष शंकर भगवान हैं। यज्ञ में अवशिष्ट वस्तु उन्हीं की है। पिता की बातों को मानकर नभग ने शिवजी की स्तुति की।
    भगवान शिव का अवधूत अवतार 
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    भगवान शंकर ने अवधूत अवतार लेकर इंद्र के अंहकार को चूर किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार एक समय बृहस्पति और अन्य देवताओं को साथ लेकर इंद्र शंकर जी के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। इंद्र की परीक्षा लेने के लिए शंकरजी ने अवधूत रूप धारण कर उसका मार्ग रोक लिया। इंद्र ने उस पुरुष से अवज्ञापूर्वक बार-बार उसका परिचय पूछा तो भी वह मौन रहा। इस पर क्रुद्ध होकर इंद्र ने ज्यों ही अवधूत पर प्रहार करने के लिए वज्र छोडऩा चाहा त्यों ही उसका हाथ स्तंभित हो गया। यह देखकर बृहस्पति ने शिवजी को पहचान कर अवधूत की बहुविधि स्तुति की। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने इंद्र को क्षमा कर दिया।
    भगवान शिव का भिक्षुवर्य अवतार 
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    भगवान शंकर देवों के देव हैं। संसार में जन्म लेने वाले हर प्राणी के जीवन के रक्षक भी ही हैं। भगवान शंकर का भिक्षुवर्य अवतार यही संदेश देता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार विदर्भ नरेश सत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला। उसकी गर्भवती पत्नी ने शत्रुओं से छिपकर अपने प्राण बचाए। समय पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया। रानी जब जल पीने के लिए सरोवर गई तो उसे घडिय़ाल ने अपना आहार बना लिया। तब वह बालक भूख-प्यास से तड़पने लगा। इतने में ही शिवजी की प्रेरणा से एक भिखारिन वहां पहुंची।
    तब शिवजी ने भिक्षुक का रूप धर उस भिखारिन को बालक का परिचय दिया और उसके पालन-पोषण का निर्देश दिया तथा यह भी कहा कि यह बालक विदर्भ नरेश सत्यरथ का पुत्र है। यह सब कह कर भिक्षुक रूपधारी शिव ने उस भिखारिन को अपना वास्तविक रूप दिखाया। शिव के आदेश अनुसार भिखारिन ने उसे बालक का पालन पोषण किया। बड़ा होकर उस बालक ने शिवजी की कृपा से अपने दुश्मनों को हराकर पुन: अपना राज्य प्राप्त किया।
     सुरेश्वर अवतार
    ============
    भगवान शंकर का सुरेश्वर (इंद्र) अवतार भक्त के प्रति उनकी प्रेमभावना को प्रदर्शित करता है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक छोटे से बालक उपमन्यु की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपनी परम भक्ति और अमर पद का वरदान दिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु अपने मामा के घर पलता था। वह सदा दूध की इच्छा से व्याकुल रहता था। उसकी मां ने उसे अपनी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए शिवजी की शरण में जाने को कहा। इस पर उपमन्यु वन में जाकर ऊँ नम: शिवाय का जाप करने लगा।
    शिवजी ने सुरेश्वर (इंद्र) का रूप धारण कर उसे दर्शन दिया और शिवजी की अनेक प्रकार से निंदा करने लगा। इस पर उपमन्यु क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए खड़ा हुआ। उपमन्यु को अपने में दृढ़ शक्ति और अटल विश्वास देखकर शिवजी ने उसे अपने वास्तविक रूप के दर्शन कराए तथा क्षीरसागर के समान एक अनश्वर सागर उसे प्रदान किया। उसकी प्रार्थना पर कृपालु शिवजी ने उसे परम भक्ति का पद भी दिया।
     किरात अवतार
    =============
    किरात अवतार में भगवान शंकर ने पाण्डुपुत्र अर्जुन की वीरता की परीक्षा ली थी। महाभारत के अनुसार कौरवों ने छल-कपट से पाण्डवों का राज्य हड़प लिया व पाण्डवों को वनवास पर जाना पड़ा। वनवास के दौरान जब अर्जुन भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे, तभी दुर्योधन द्वारा भेजा हुआ मूड़ नामक दैत्य अर्जुन को मारने के लिए शूकर( सुअर) का रूप धारण कर वहां पहुंचा।
    अर्जुन ने शूकर पर अपने बाण से प्रहार किया। उसी समय भगवान शंकर ने भी किरात वेष धारण कर उसी शूकर पर बाण चलाया। शिव की माया के कारण अर्जुन उन्हें पहचान न पाया और शूकर का वध उसके बाण से हुआ है, यह कहने लगा। इस पर दोनों में विवाद हो गया। अर्जुन ने किरात वेषधारी शिव से युद्ध किया। अर्जुन की वीरता देख भगवान शिव प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर अर्जुन को कौरवों पर विजय का आशीर्वाद दिया।
     सुनटनर्तक अवतार
    ==============
    पार्वती के पिता हिमाचल से उनकी पुत्री का हाथ मागंने के लिए शिवजी ने सुनटनर्तक वेष धारण किया था। हाथ में डमरू लेकर जब शिवजी हिमाचल के घर पहुंचे तो नृत्य करने लगे। नटराज शिवजी ने इतना सुंदर और मनोहर नृत्य किया कि सभी प्रसन्न हो गए।
    जब हिमाचल ने नटराज को भिक्षा मांगने को कहा तो नटराज शिव ने भिक्षा में पार्वती को मांग लिया। इस पर हिमाचलराज अति क्रोधित हुए। कुछ देर बाद नटराज वेषधारी शिवजी पार्वती को अपना रूप दिखाकर स्वयं चले गए। उनके जाने पर मैना और हिमाचल को दिव्य ज्ञान हुआ और उन्होंने पार्वती को शिवजी को देने का निश्चय किया।
     ब्रह्मचारी अवतार
    ===============
    दक्ष के यज्ञ में प्राण त्यागने के बाद जब सती ने हिमालय के घर जन्म लिया तो शिवजी को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया। पार्वती की परीक्षा लेने के लिए शिवजी ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास पहुंचे। पार्वती ने ब्रह्मचारी को देख उनकी विधिवत पूजा की।
    जब ब्रह्मचारी ने पार्वती से उसके तप का उद्देश्य पूछा और जानने पर शिव की निंदा करने लगे तथा उन्हें श्मशानवासी व कापालिक भी कहा। यह सुन पार्वती को बहुत क्रोध हुआ ,पार्वती की भक्ति व प्रेम को देखकर शिव ने उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप दिखाया। यह देख पार्वती अति प्रसन्न हुईं।
     यक्ष अवतार
    ===========
    यक्ष अवतार शिवजी ने देवताओं के अनुचित और मिथ्या अभिमान को दूर करने के लिए धारण किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार देवताओं व असुरों द्वारा किए गए समुद्रमंथन के दौरान जब भयंकर विष निकला तो भगवान शंकर ने उस विष को ग्रहण कर अपने कंठ में रोक लिया। इसके बाद अमृत कलश निकला। अमृतपान करने से सभी देवता अमर तो हो गए, साथ ही उन्हें अभिमान भी हो गया कि वे सबसे बलशाली हैं।
     देवताओं के इसी अभिमान को तोड़ने के लिए शिवजी ने यक्ष का रूप धारण किया व देवताओं के आगे एक तिनका रखकर उसे काटने को कहा। अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी देवता उस तिनके को काट नहीं पाए। तभी आकाशवाणी हुई कि यह यक्ष सब गर्वों के विनाशक शंकर भगवान हैं। सभी देवताओं ने भगवान शंकर की स्तुति की तथा अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी।…………………………………………………….हर हर महादेव 

    READ MORE: शिव के १९ अवतार कौन कौन से ?
  • सिद्धियाँ कैसे प्राप्त होती हैं ?

    सिद्धियाँ
    कैसे प्राप्त होती हैं ?

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    पूजा -पाठ रोज
    करोड़ों लोग करते हैं और विश्व परिप्रेक्ष्य में देखें तो अरबों लोग रोज कहीं न
    कहीं पूजा आराधना करते हैं भले उनके आराध्य ईश्वर अलग हों |सभी अपने ईश्वर से अपनी
    मनोकामना कहते हैं और अधिकतर चाहते हैं की उनकी इच्छा उनका ईश्वर सुने और पूर्ण
    करे किन्तु बहुत ही कम लोगों की इच्छाएं पूर्ण होती हैं क्योकि वह लेने की तकनीक
    ही नहीं जानते |कुछ लोग ईश्वर को अपने पास बुलाना चाहते हैं और चाहते हैं की
    उन्हें उनके आराध्य की शक्ति मिले ,सिद्धि मिले |साधना तो हजारों हजार करते हैं पर
    सबको सफलता नहीं मिलती ,केवल कुछ को सफलता मिलती है उनमे भी कुछ को ही वास्तविक
    सिद्धि प्राप्त हो पाती है ,अन्य के कुछ काम हो जाते हैं और वह उसी आत्म संतुष्टि
    में खुद को सिद्धि का भी कभी कभी स्वामी मान लेता है |सिद्धि का अर्थ है सम्बंधित
    विषय से सम्बंधित शक्ति का साधक के नियंत्रण में आ जाना अथवा वशीभूत हो जाना ,यह
    बहुत कम होता है और इसकी अपनी एक तकनिकी है |इसका आडम्बर आदि से कोई लेना देना
    नहीं होता |इसमें सबसे मुख्य भूमिका मष्तिष्क की होती है ,अवचेतन मन की होती है
    ,अन्य सभी माध्यम सम्बंधित ऊर्जा उत्पन्न करने अथवा बढाने का काम करते हैं |
    आप जब साधना
    करें तो यह बात हमेशा याद रखें की आप किसी शक्ति को नहीं साध सकते ,आप तो हाथ जोड़े
    खड़े हैं ,कोई भी शक्ति आपसे बड़ी है ,अधिक क्षमता वान है तभी तो आप उसकी साधना कर
    रहे हैं ,तो आप उसे कैसे साध सकते हैं |आप उसकी साधना में खुद को साध रहे हैं |खुद
    को साधना है आपको और ऐसा बनाना है की वह शक्ति आपमें समाहित हो सके ,आपमें आ सके
    तभी आपको सिद्धि मिलेगी ,आपकी साधना सफल होगी और आपको उस शक्ति की शक्ति प्राप्त
    हो पाएगी |खुद को साधने के क्रम में खुद को उस शक्ति के गुण ,स्वभाव ,आचरण के
    अनुकूल आपको अपने शरीर और भाव को बनाना होता है तभी आप उससे तालमेल बना पाते हैं
    और आपके पुकारने पर वह शक्ति जब आपको और आपके शरीर को अपने अनुकूल पाती है तभी वह
    आपके पास आती है और आपमें समाहित होती है ,आपका शरीर और आसपास का वातावरण उसकी
    ऊर्जा से संतृप्त होता है |आपको अनुकूल न पाने पर या तो वह शक्ति आएगी ही नहीं और
    आ भी गयी तो वापस चली जायेगी या उसकी उर्जा एकत्र नही हो पाएगी और बिखर जायेगी
    |याद कीजिये कि विष्णु ,सरस्वती की पूजा -उपासना में पवित्रता ,सुचिता ,शुद्धता के
    लिए क्यों कहा जाता है ,जबकि कर्ण पिशाचिनी ,श्मशानिक शक्तियों आदि की उपासना में
    क्यों तामसिक वातावरण में साधना को निर्देशित किया जाता है |कारण है की जिस तरह की
    शक्ति की उपासना कर रहे उसके अनुकूल वातावरण ,पूजा का तरीका ,चढ़ाए जाने वाले सामान
    और आपका भाव होना चाहिए तभी वह आ पाएगी और जुड़ पाएगी |विपरीत भाव ,विपरीत वस्तुएं
    और विपरीत पद्धति शक्ति को प्रतिकर्षित कर देती है |
           किसी एक भाव में डूबिये ,उद्देश्य के
    अनुसार भाव बनाइये ,यदि वह किसी देवी
    देवता का भाव है |अपने उद्देश्य के अनुसार देवीदेवता का चुनाव करें और खूब अच्छी तरह उसे समझें -जानें ,उसके कर्मगुणभाव के अनुसार अपना भाव बनाएं [उग्र शक्ति हेतु उग्र भाव और सौम्य शक्ति
    हेतु सौम्य भाव ],उसके प्रति अपने मन में भाव उत्पन्न करें की आप किस रूप में उस
    शक्ति का अपने लिए आह्वान कर रहे हैं |अब उस भाव में डूबकर विधिवत निश्चित समय
    ,दिशा ,सामग्री ,हवन समिधा आदि के द्वारा विधि पूर्वक प्रत्येक तकनिकी और पूजा
    पद्धति को अपनाकर उसी में लींन हो जाएँ ,डूब जाएँ |५ मिनट की स्मृति विहीनता
    प्राप्त हो जाए तो आप कोई भी देवता ,कोई भी मंत्र सरलता से सिद्ध कर सकते हैं |यह
    ठीक उसी प्रकार है ,जैसा बस के ड्राइवर को ट्रक ड्राइविंग का अभ्यास करना पड़े |यह
    केवल वाहन बदलना है और उसकी तीब्रता को नियंत्रित करने जैसा है |हां इसके लिए पहले
    तो आपको बस चलाना ,उसके पहले हलके वाहन और उसके पहले छोटा वाहन चलाना आना ही चाहिए
    ,|अचानक तो बस या ट्रक जान ले लेगा |अतः सर्व प्रथम तो एकाग्रता का अभ्यास ही होना
    चाहिए और छोटी-छोटी क्रियाएं ,तकनीकियाँ आनी चाहिए |
    वाम मार्ग की
    तकनीकियों में संयम की कठोरता इतनी नहीं है |इसमें साधक के लिए ,साधना के समय संयम
    रखने के लिए केवल काली ,भैरव आदि की साधना में विशेष आवश्यकता पड़ती है |इसमें
    तकनिकी ,तंत्र -सामग्री ,शरीर के अंगों आदि का महत्व है ,जिन्हें अभ्यासित करना
    पड़ता है |इससे शक्ति उत्पन्न होती है |साधक को उस शक्ति को नियंत्रित करने भर का
    अभ्यास करना होता है |इस नियंत्रण के लिए ही तंत्र साधना की जाती है ,खुद को साधा
    जाता है |जैसे काम भाव जाग्रत कीजिये पर स्खलन किये बिना समाधिस्थ हो जाइए |इसमें
    पहले रीढ़ की हड्डी से होकर ऊर्जा उपर खींचा जाता है |यह सब तकनीकियाँ हैं |इन्ही
    तकनीकियों के लिए गुरु की आवश्यकता पड़ती है |कैसे क्या क्रिया करनी चाहिए ,यह जाने
    बिना सफलता नहीं मिल सकती |इसीलिए तंत्र साधना बिना गुरु के नहीं हो सकती |
    सिद्धि की
    विधि कोई हो ,मार्ग कोई हो ,यदि सफलता चाहिए तो मानसिक शक्ति की तीब्रता ,दृढ़ता
    ,भाव को स्थिर किये रहने की क्षमता का विकास ही उद्देश्य होता है |जिसने इसे
    प्राप्त कर लिया उसके लिए सभी सिद्धियाँ आसान हैं |विधि और मार्ग के अनुसार केवल
    कुछ तकनीकियाँ बदलती हैं मूल सूत्र यथावत रहते हैं |मानसिक एकाग्रता और भाव के
    बिना कोई सिद्धि या साधना सफल नहीं हो सकती |तकनिकी और सामग्री ऊर्जा उत्पन्न करते
    या बढाते हैं और उसे नियंत्रित करने का तरीका बताते हैं पर मूल शक्ति का आकर्षण और
    नियंत्रण मानसिक बल से ही होता है |मानसिक बल ,आत्मबल ,साहस ,धैर्य ,अट्टू निष्ठां
    और खुद पर विश्वास के साथ जब भाव गहन हो ,एकाग्रता हो तो कोई भी शक्ति सिद्ध की जा
    सकती है ,इन गुणों को विकसित करना ही तो खुद को साधना है जो आप साधते हैं |इनके बल
    पर ही शक्तियाँ आती हैं और वशीभूत ,आकर्षित होती हैं ,उनकी ऊर्जा आपमें और आसपास
    संघनित होती है |मानसिक बल से से ,मानसिक तरंगों की क्रिया से ही यह उर्जा काम
    करती है जिसे सिद्धि कहते हैं |…………………………………………………….हर हर महादेव 

    READ MORE: सिद्धियाँ कैसे प्राप्त होती हैं ?
  • मूलाधार चक्र के जागरण पर क्या शक्तियां /सिद्धियाँ मिलती हैं ?

    मूलाधार के जागरण से भौतिक जीवन में क्या लाभ होते हैं ?

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    सामान्य रूप से योग मार्ग व्यक्ति को कठोरता से स्व नियंत्रण की बात करता
    है अतः इससे कुंडलिनी जागरण पर सामान्य जीवन में कम ही साधक शक्तियों का उपयोग
    करते है और उनकी मन स्थिति पहले ही ऐसी बन जाती है की वह समाज से एकाकी होने लगते
    हैं |अधिकतर कुंडलिनी शक्ति का उपयोग तंत्र मार्गीय साधक ही भौतिक जीवन में करते
    हैं ,क्योंकि तंत्र मार्ग से कुंडलिनी साधना भोग से मोक्ष की ओर की प्रक्रिया पर
    आधारित होती है |मूलाधार के जाग्रत हुए बिना कुंडलिनी जागरण नहीं होता और मूलाधार
    जागरण ही सबसे कठिन होता है |मूलाधार जागरण से ही सबसे अधिक शक्तियां और सिद्धियाँ
    भी मिलती हैं तो सबसे अधिक पतित भी साधक इसी चक्र के प्रभाव से होते हैं |योग में
    इस चक्र के जागरण के पूर्व की साधक शरीर और मन को नियंत्रित भी कर चूका होता है और
    योग से जागरण धीरे धीरे भी होता है अतः पतन कम होता है किन्तु तंत्र मार्ग में भोग
    से साधना होने से काम शक्ति की प्रमुखता होती है अतः कामशक्ति के तीव्र ऊर्जा
    प्रवाह से जागरण होने पर मूलाधार का जागरण जल्दी तो होता है किन्तु इसका प्रभाव
    इतना तीव्र होता है की व्यक्ति इन सिद्धियों के चक्कर में फंसकर भोग की ओर भागने
    लगता है |बहुत ही कम साधक इस तीव्र ऊर्जा प्रवाह को नियंत्रित कर आगे बढ़ पाते हैं
    और तब उनकी कुंडलिनी का जागरण योग मार्ग की अपेक्षा बहुत ही कम समय में हो जाता है
    |हम आपको अब बताते हैं की कुंडलिनी में मूलाधार के जागरण से क्या -क्या सिद्धियाँ
    ,क्या क्या उपलब्धियां प्राप्त होती हैं और कैसे व्यक्ति मानव से महामानव बन जाता
    है |उसका जीवन कैसे बदलता है ,भौति जीवन में उसे क्या लाभ प्राप्त होते हैं ,वह
    क्या -क्या कर सकता है |
    मूलाधारचक्र वह चक्र है जहाँ पर शरीर का संचालन वाली कुण्डलिनी महाशक्ति ,शक्ति से युक्त मूल’ आधारित अथवा स्थित है। यह चक्र शरीर के अन्तर्गत गुदा और लिंग मूल के मध्य में स्थित है जो अन्य स्थानों से कुछ उभरा सा महसूस होता है। शरीर के अन्तर्गत मूल’, शिवलिंग आकृति का एक मांस पिण्ड होता है, जिसमें शरीर की संचालिका शक्ति रूप कुण्डलिनीशक्ति साढ़े तीन फेरे में लिपटी हुई शयनमुद्रा में रहती है। चूँकि यह कुण्डलिनी जो शरीर की संचालिका शक्ति है और वही इस मूल रूपी मांस पिण्ड में साढ़े तीन फेरे में लिपटी रहती है इसी कारण इस मांसपिण्ड को मूल और जहाँ यह आधारित है, वह मूलाधारचक्र कहलाता है।मनुष्य में रीढ़ के
    नीचे तिकोनी हड्डी और मांस पिंड तो होता है किन्तु भौतिक रूप से कुंडलिनी को वहां
    नहीं देखा जा सकता क्योंकि यह सूक्ष्म शरीर में स्थित ऊर्जा है |इसकी कोई भी
    क्रिया भौतिक शरीर को तुरंत प्रभावित करती है ,भौतिक शरीर की उर्जा इसे प्रभावित
    करती है किन्तु फिर भी इसका भौतिक अस्तित्व नहीं होता ,जैसे कि आपमें प्राण तो
    होते हैं किन्तु आप उसे देख नहीं सकते |प्राण को देखन के लिए आपको कुंडलिनी के
    किसी चक्र को जगाना होगा |
    मूलाधारचक्र अग्नि वर्ण का त्रिभुजाकार एक आकृति होती है जिसके मध्य कुण्डलिनी सहित मूल स्थित रहता है| इस त्रिभुज के तीनों उत्तंग कोनों पर इंगला, पिंगला और सुषुम्ना आकर मिलती है| इसके अन्दर चार अक्षरों से युक्त अग्नि वर्ण की चार पंखुणियाँ नियत हैं। ये पंखुणियाँ अक्षरों से युक्त हैं वे , , , यहाँ के अभीष्ट देवता के रूप में गणेश जी नियत किए गए हैं ,जबकि यहाँ की मूल शक्ति काली हैं जिनको केवल गणेश की शक्ति से ही
    संतुलित किया जा सकता है ,बिना विवेक के यह शक्ति महिसासुर बना देती है ।
    जो साधक साधना के माध्यम से कुण्डलिनी जागृत कर लेता है अथवा जिस साधक की स्वासप्रस्वास रूप साधना से जागृत हो जाती है ,और जागृत अवस्था में उर्ध्वगति में जब तक मूलाधार में रहती है,, तब तक वह साधक गणेश जी की शक्ति से युक्त व्यक्ति हो जाता है|जागरण की अवस्था में काली का प्रभाव पूर्ण
    शक्ति से उदित होता है जिसे यदि नियंत्रित कर लिया गया तभी साधक गणेश की शक्ति से
    युक्त हो पाता है
    ,अन्यथा साधक
    पतित हो जाता है |
     मनुष्य के मूलाधार चक्र में कुंडलिनी का सम्पर्क तंतु है जो व्यक्ति सत्ता को विश्व सत्ता के साथ जोड़ता है कुण्डलिनी जागरण से चक्र संस्थानों में जागृति उत्पन्न होती है उसके फलस्वरूप पारभौतिक (सुपर फिजीकल) और भौतिक (फिजीकल) के बीच आदानप्रदान का द्वार खुलता है यही है वह स्थिति जिसके सहारे मानवी सत्ता में अन्तर्हित दिव्य शक्तियों का जागरण सम्भव हो सकता है |मूलाधार चक्र में वीरता और आनन्द भाव का निवास है मूलाधार का जागरण योग के
    अंतर्गत योगासनों ,मुदाओं और ध्यान साधना से की जाती है ,जबकि तंत्र में इसका
    जागरण भैरवी तंत्र या कौल तंत्र के अंतर्गत की जाती है जहाँ मनुष्य की जनन शक्ति
    की मुख्य भूमिका होती है और यौनांगों की क्रिया होती है जिससे तीव्र उर्जा उत्पन्न
    कर नियंत्रण रखते हुए कुंडलिनी जागरण किया जाता है |एक और मार्ग से मूलाधार का
    जागरण होता है और यह मार्ग है महाविद्या साधना |महाविद्या में काली साधना से काली
    की सिद्धि होने पर मूलाधार चक्र का जागरण होता है किन्तु पूर्ण कुंडलिनी पर इसका
    प्रभाव तभी होता है जब काली का प्रत्यक्षीकरण हो जाय और वह इच्छानुसार क्रिया करने
    लगे |इस स्थिति में काली की उर्जा व्यक्ति में इतनी बढती है की उसकी कुंडलिनी
    जाग्रत हो जाती है |
    मूलाधार चक्र के जाग्रत हो जाने पर जब साधक या सिद्ध व्यक्ति सिद्धियों के चक्कर अथवा प्रदर्शन में फँस जाता है तो, उसकी कुण्डलिनी उर्ध्वमुखी से अधोमुखी होकर पुनः शयनमुद्रा में चली जाती है, जिसका परिणाम यह होता है की वह सिद्धसाधक सिद्धि का प्रदर्शन अथवा दुरुपयोग करतेकरते पुनः सिद्धिहीन हो जाता है| परिणाम यह होता है कि वह उर्ध्वमुखी यानि सिद्ध योगी तो बन नहीं पाता, सामान्य सिद्धि से भी वंचित हो जाता है| परन्तु जो साधक सिद्धि की तरफ ध्यान देकर निरन्तर मात्र अपनी साधना करता रहता है. उसकी कुण्डलिनी उर्ध्वमुखी के कारण ऊपर उठकर स्वासप्रस्वास रूपी डोरी (रस्सी) के द्वारा मूलाधार से स्वाधिष्ठानचक्र में पहुँच जाती है|
    जब प्रयत्नशील योगसाधक जब किसी महापुरूष का सान्निध्य प्राप्त करता है तथा अपने मूलाधार चक्र का ध्यान उसे लगता है तब उसे अनायास ही क्रमशः सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है। वह योगी देवताओं द्वारा पूजित होता है तथा अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त कर वह त्रिलोक में इच्छापूर्वक विचरण कर सकता है। वह मेधावी योगी महावाक्य का श्रवण करते ही आत्मा में स्थिर होकर सर्वदा क्रीड़ा करता है। मूलाधार चक्र का ध्यान करने वाला साधक दादुरी सिद्धि प्राप्त कर अत्यंन्त तेजस्वी बनता है। उसकी जठराग्नि प्रदीप्त होती है तथा सरलता उसका स्वभाव बन जाता है। वह भूत, भविष्य तथा वर्त्तमान का ज्ञाता, त्रिकालदर्शी हो जाता है तथा सभी वस्तुओं के कारण को जान लेता है। जो शास्त्र कभी सुने हों, पढ़े हों, उनके रहस्यों का भी ज्ञान होने से उन पर व्याख्यान करने का सामर्थ्य उसे प्राप्त हो जाता है। मानो ऐसे योगी के मुख में देवी सरस्वती निवास करती है। जप करने मात्र से वह मंत्रसिद्धि प्राप्त करता है। उसे अनुपम संकल्पसामर्थ्य प्राप्त होता है।
    जब योगी मूलाधार चक्र में स्थित स्वयंभु लिंग का ध्यान करता है, उसी क्षण उसके पापों का समूह नष्ट हो जाता है। किसी भी वस्तु की इच्छा करने मात्र से उसे वह प्राप्त हो जाती है। जो मनुष्य आत्मदेव को छोड़कर बाह्य देवों की पूजा करते हैं, वे हाथ में रखे हुए फल को छोड़कर अन्य फलों के लिए इधरउधर भटकते हैं। अतः सुज्ञ सज्जनों को आलस्य छोड़कर शरीरस्थ शिव का ध्यान करना चाहिए। यह ध्यान परम पूजा है, परम तप है, परम पुरूषार्थ है।
    मूलाधार के अभ्यास से छः माह में ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इससे सुषुम्णा नाड़ी में वायु प्रवेश करती है। ऐसा साधक मनोजय करके परम शांति का अनुभव करता है। उसके दोनों लोक सुधरसँवर जाते हैं।योग मार्ग द्वारा सम्यक प्राणायाम ,आसन ,मुद्राओं और एकनिष्ठ ध्यान से ही ६ महीने से एक साल में इसका जागरण
    होता है जबकि व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान हो ,योग्य गुरु का मार्गदर्शन हो और शरीर योग
    और प्राणायाम से शुद्ध हो चूका हो |शुरूआती चरणों और शरीर शुद्धता तथा योग्य बनने
    में ही अधिक समय लगता है जिसमें वर्षों लगते हैं |
             तंत्र में इसी चक्र का
    महत्व सर्वाधिक होता है ,क्योकि यही चक्र जाग्रत करना सबसे कठिन होता है |इसके
    जाग्रत और उर्ध्वमुखी होते ही अन्य चक्र आसानी से क्रियाशील हो सकते हैं किन्तु यह
    जाग्रत ही जल्दी नहीं होता |अगर हो भी गया तो सबसे पहले इसका प्रभाव इतना बढ़ता है
    की व्यक्ति के पतित होने की ही संभावना अधिक होती है |तंत्र इसीलिए पृथ्वी का सबसे
    कठिन साधना मार्ग है की यह सबसे पहले इस मूलाधार के महिसासुर को ही नियंत्रित करता
    है जिससे बाद के देवता स्वतः अनुकूल होने लगते हैं |इसे ही तंत्र जगाकर नियंत्रित
    करता है जबकि योग मार्ग इस पर ध्यान लगाकर इसे क्रियाशील करता है |यह सभी भौतिक
    ,लौकिक ,तामसिक सिद्धियों का केंद्र है जिस पर नियंत्रण से भैरव ,काली ,डाकिनी
    ,शाकिनी ,भूत ,पिशाच ,यक्षिणी ,अप्सरा ,जैसी समस्त शक्तियां नियंत्रण में आने लगती
    हैं |इनकी साधना विशेष रूप से करने की आवश्यकता नहीं होती अपितु थोड़े प्रयास से
    ,थोड़ी तकनीकियों का प्रयोग से ,थोड़े से साधना से इन शक्तियों की सिद्धि होने लगती
    है |यह कुछ ऐसा ही होता है जैसे अतिथि दरवाजे पर आये जिसकी आवभगत करके घर में
    बैठाना होता है |मूलाधार के जागरण से व्यक्ति भूत -प्रेत -ब्रह्म -पिशाच बाधा हटा
    सकता है ,भूत -भविष्य जान सकता है ,किसी के रोग -कष्ट दूर कर सकता है ,नकारात्मकता
    हटा सकता है ,शरीर का ऊर्जा प्रवाह सुधार सकता है |उसके आशीर्वाद और श्राप फलित
    होने लगते हैं |मूलाधार के जाग्रत होने का अर्थ है भगवती काली की शक्तियों का
    जागना ,क्योंकि मूलाधार के केंद्र में ही काली का डाकिनी स्वरुप होता है और यह
    स्वरुप बेहद उग्र है |सम्पूर्ण मूलाधार में काली की ही शक्तियाँ स्थित होती हैं
    ,अतः चाहे योगी हो अथवा तांत्रिक मूलाधार जागरण पर उग्रता ,तामसिकता ,भौतिकता
    ,विलासिता ,कामुकता के भाव एक बार उभरते जरुर हैं और इन्हें ही नियंत्रित रखते हुए
    सतत साधना रत रह कुंडलिनी शक्ति को स्वाधिष्ठान तक उठाया जाता है जहाँ यह सब
    महिसासुर वाले भावों का वहां दुर्गा संहार कर देती हैं और व्यक्ति इन भावों पर विजय
    पा लेता है |
    मूलाधार के जागरण से शरीर का आभामंडल अर्थात औरा
    बदल जाती है ,शरीर तेज युक्त हो जाता है ,आँखों का तेज ऐसा हो जाता है की सामने
    वाला सहन नहीं कर पाता |यहाँ की शक्तियाँ मष्तिष्क के तरंगों के साथ क्रिया करते
    हुए व्यक्ति के सोचने की दिशा से उस लक्ष्य तक पहुँच क्रिया करने लगती हैं जहाँ
    व्यक्ति सोच रहा होता है ,इससे व्यक्ति के कोई कार्य करने के पहले ही सफलता की
    दिशा में कार्य होने का वातावरण बनने लगता है |व्यक्ति किसी को भी थोड़े एकाग्रता
    के साथ कोई भी संदेश दे सकता है और वह व्यक्ति इसे स्वप्न अथवा अचेतन के विचार के
    रूप में सुन लेगा |मूलाधार चक्र जाग्रत व्यक्ति जहाँ भी जाता है एक दबंग और उग्र
    व्यक्ति का उसका प्रभाव लोगों पर पड़ता है भले वह उग्रता न दिखाए किन्तु अनजाना भय
    लोगों में उत्पन्न होता ही है |ऐसे व्यक्ति पर की गयी कोई तांत्रिक क्रिया
    प्रभावहीन हो जाती है अथवा पलटकर करने वाले का ही नुकसान करती है |व्यक्ति का साहस
    ,आत्मबल ,आत्मविश्वास ,कर्मठता ,क्षमता ,प्रभावशालिता बहुत बढ़ जाती है जिससे उसकी
    सफलता कई गुना बढ़ जाती है तथा उसके आय के अनेक स्रोत अपने आप बनते जाते हैं |वह
    ऐसा हो जाता है की लोग उससे मदद मांगते हैं और उसे किसी के मदद की जरूरत नहीं होती
    |समृद्धि ,सम्पत्ति ,भौतिक सुखों से व्यक्ति परिपूर्ण तो होता ही है ,अत्यंत उच्च
    कोटि की आध्यात्मिक शक्ति भी उसमे होती है |इसी प्रकार ऐसे हजारों लाभ हैं जो
    मूलाधार के जागरण पर प्राप्त होते हैं ,,जिन्हें लिखने या बताने में कई पोस्ट कम
    पड़ जायेंगे |यदि आप भौतिक जीवन में सुखी रहते हुए आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं तो
    कुंडलिनी और मूलाधार जागरण का प्रयास करें |गुरु तलाश करें और साधना में भी थोडा
    समय दें तो आपका बहुविध कल्याण होगा |धन्यवाद
    ………………………………………………..हरहर
    महादेव

    READ MORE: मूलाधार चक्र के जागरण पर क्या शक्तियां /सिद्धियाँ मिलती हैं ?
  • कौन हैं आपके कुलदेवी /देवता ?क्या पूजा पद्धति है आपके कुलदेवता /देवी की ?

    कैसे
    जाने अपने कुलदेवता को ?कैसे उनकी पूजा
    पद्धति बने ?
    =============================
    कुलदेवता और
    कुलदेवी पर हमने बीसियों वर्षों से ध्यान दिया है ,अध्ययन किया है ,समझा है और
    पाया है की लोगों की अधिकतर समस्याओं के पीछे कहीं न कहीं कुलदेवी या देवता की
    भूमिका होती है ,यद्यपि यह स्वयं कोई समस्या नहीं उत्पन्न करते किन्तु इनकी
    निर्लिप्तता से ,इनके रुष्ट होने से या कमजोर होने से पित्र दोष और बाहरी बाधाएं
    ऐसी ऐसी समस्या उत्पन्न करते हैं की व्यक्ति अनेकानेक उलझनों ,दिक्कतों में घिरता
    जाता है |हमने कुलदेवता और देवी से सम्बन्धित लगभग दो दर्जन पोस्ट लिखे हैं
    जिन्हें हमने अपने ब्लॉग और फेसबुक पेजों पर कई वर्ष पहले से प्रकाशित कर रखा है
    |हमारे पेजों और ब्लॉग से हमारे पोस्टों को कापी करते हुए अनेक लोगों ने उस पर
    विडिओ बना यू ट्यूब पर डाला है किन्तु उन्होंने कुलदेवता या कुलदेवी के नाम वाले
    ही पोस्ट उठाये हैं ,अन्य तकनीकियों ,पूजा पद्धति ,सूत्र और सिद्धांत के लेख वह
    नहीं उठा पायें हैं और न ही यह विषय उनके खुद के खोज का है अतः वह समग्र और तकनिकी
    जानकारी नहीं दे पायें हैं |किसी का पोस्ट उठाकर पढ़ते हुए विडिओ बना देना आसान है
    किन्तु तकनीक जानना और वास्तविक भला करना तो केवल खुद के ज्ञान से ही सम्भव है
    |हमारे इसी लेख को की कुलदेवता या देवी का पता कैसे लगाएं ,लोगों ने कापी भी किया
    होगा और हो सकता है विडिओ भी बनाए हों किन्तु जो गंभीर इससे जुडी बातें हम बताने
    जा रहे हैं वह कोई नहीं बता सकता |इस विषय पर एक लेख तो हम भी पहले ही प्रकाशित कर
    चुके हैं किन्तु आज वह बात कहने जा रहे जो आपका वास्तविक भला करेगा और इसे न कोई
    कापी करने वाला बता सकता है न कोई तांत्रिक ,ज्योतिषी ,पंडित या ओझा -गुनिया |
    कुलदेवता या
    देवी को जानना मुश्किल नहीं ,यह तो आसान है इस छोटी सी विधि से भी ,पर असली समस्या
    उसके बाद ही है क्योंकि आप अपने कुलदेवी या देवता को जानकर भी उन्हें खुश नहीं कर
    सकते ,उन्हें नियमतः पूजा नहीं दे सकते जब तक की आपको यह जानकारी न हो जो कुलदेवता
    का पता लगाने की विधि के बाद बताई जायेगी |इसलिए यदि आप अपना वास्तविक भला चाहते
    हैं और सचमुच कुलदेवी /देवता की स्थापना पूजा करना चाहते हैं तो ध्यान से पढ़ें |
    आज के समय में बहुतायत में पाया जा रहा है की लोगों को अपने कुलदेवता/देवी का पता ही नहीं है |वर्षों
    से कुलदेवता
    /देवी को पूजा नहीं मिल रही है |घरपरिवार का सुरक्षात्मक आवरण समाप्त हो जाने से अनेकानेक समस्याएं अनायास
    घेर रही हैं |नकारात्मक उर्जाओं की आवाजाही बेरिक टोक हो रही है |वर्षीं से स्थान
    परिवर्तन के कारण पता ही नहीं है की हमारे कुलदेवता
    /देवी कौन है
    |कैसे उनकी पूजा होती है |कब उनकी पूजा होती है |आदि आदि |इस हेतु एक प्रभावी
    प्रयोग है जिससे यह जाना जा सकता है की आपके कुलदेवता कौन है | यह एक साधारण
    किन्तु प्रभावी प्रयोग है जिससे आप अपने कुलदेवता अथवा देवी को जान सकते हैं |
     प्रयोग को मंगलवार से शुरू करें
    और ११ मंगलवार तक करते रहें
    |मंगलवार
    को सुबह स्नान आदि से स्वच्छ पवित्र हो अपने देवी देवता की पूजा करें |फिर एक
    साबुत सुपारी लेकर उसे अपना कुलदेवता
    /देवी मानकर स्नान
    आदि करवाकर ,उस पर मौली लपेटकर किसी पात्र में स्थापित करें |इसके बाद आप अपनी
    भाषा में उनसे अनुरोध करें की “हे कुल देवता में आपको  जानना चाहता हूँ ,मेरे परिवार से आपका विस्मरण
    हो गया है ,हमारी गलतियों को क्षमा करते हुए हमें अपनी जानकारी दें ,इस हेतु में
    आपका यहाँ आह्वान करता हूँ ,आप यहाँ स्थान ग्रहण करें और मेरी पूजा ग्रहण करते हुए
    अपने बारे में हमें बताएं |इसके बाद उस सुपारी का पंचोपचार पूजन करें |अब रोज रात
    को उस सुपारी से प्रार्थना करें की हे कुल्द्वता
    /देवी में
    आपको जानना चाहता हूँ ,कृपा कर स्वप्न में मार्गदर्शन दीजिये |फिर सुपारी को तकिये
    के नीचे रखकर सो जाइए |सुबह उठाकर पुनः उसे पूजा स्थान पर स्थापित कर पंचोपचार
    पूजन करें |यह क्रम प्रथम मंगलवार से ११ मंगलवार तक जारी रखें |हर मंगलवार को व्रत
    रखें |इस अवधि के दौरान शुद्धता का विशेष ध्यान रखें ,यहाँ तक की बिस्तर और सोने
    का स्थान तक शुद्ध और पवित्र रखें |ब्रह्मचर्य का पालन करें और मांस
    मदिरा से पूर्ण परहेज रखें |  इस प्रयोग की अवधि के अन्दर आपको
    स्वप्न में आपके कुलदेवता
    /देवी की जानकारी मिल जायेगी |अगर खुद न समझ सकें तो योग्य जानकार से
    स्वप्न विश्लेषण करवाकर जान सकते हैं |इस तरह वर्षों से भूली हुई कुलदेवता की
    समस्या हल हो जाएगी और पूजा देने पर आपके परिवार की बहुत सी समस्याएं समाप्त हो
    जायेंगी |
    यह तो हुई कुलदेवता या देवी का पता लगाने की विधि
    किन्तु आप पता लगाकर क्या करेंगे और आज के अनुसार पूजा करके भी क्या करेंगे जब तक
    की आपको अपने वंश -परंपरा के अनुसार होने
    वाली पूजा पद्धति का पता न हों |उस तिथि का पता न हो जिस तिथि पर आपके पूर्वज पूजा
    करते आये थे |आपको कुलदेवता या देवी का नाम पता लग जाए तो भी आपका वास्तविक भला
    नहीं हो सकता जब तक की आपको अपने कुल परंपरा के अनुसार पूजा पद्धति न पता हो | कुलदेवता
    /देवी के बारे में नाम आदि कुछ सिद्ध बता सकते हैं किन्तु आपकी कुलानुसार पूजा
    पद्धति कोई नहीं बता सकता |
    ध्यान दीजिये आप सभी किसी न किसी ऋषि के ही वंशज
    हैं और आपके पूर्वज ऋषि ने अपने अनुकूल ,अपने
    कर्म के अनुकूल ,अपने संस्कारों के अनुकूल कुल देवता या कुलदेवी की स्थापना की थी
    और अपनी संस्कृति और संस्कार के अनुसार पूजा पद्धति बनाई थी जिससे उस कुलदेवता या
    देवी की कृपा उन्ह प्राप्त होती रहे |उदाहरण के लिए हम गौतम ऋषि के वंशजों को लेते
    हैं |गौतम ऋषि जहाँ रहते थे वहां स्थानिक रूप से उपलब्ध सामग्रियों में से
    उन्होंने अपने कुलदेवता के अनुकूल वस्तुओं का चयन कर एक पूजा पद्धति बनाई और पूजा
    शुरू की |फिर अपने से सम्बन्धित सम्बन्धियों के कर्मानुसार चारो कर्म के अनुकूल
    विशेष पूजा पद्धतियाँ बना दी जो उस कुलदेवता या देवी की चार विशिष्ट प्रकार की
    पूजा हो गयी |यह चार प्रकार के कर्म करने वाले ही बाद में जातियों में बदल गए ,किन्तु
    उनके पूजा पद्धति इन्ही चार प्रकारों में से रहे |ध्यान दीजिये गौतम ऋषि सहित सभी
    ऋषियों के गोत्र अन्य जातियों में भी मिलते हैं |ऊँची ,नीची जाती का कोई विशेष अलग
    गोत्र नहीं होता और सभी ऋषियों की ही संतानें हैं |तो अब उस स्थान विशेष पर
    कर्मानुसार एक देवता की चार प्रकार की पूजा हो गयी |कालान्तर में उस स्थान से कुछ
    लोग निकलकर देश -विदेश के अलग स्थानों पर बसे किन्तु उनकी पूजा पद्धति एक ही रही |
    मूल स्थान से दूरी अधिक होने पर और मूल पूजन सामग्री की उपलब्धता न होने पर
    उन्होंने अपने गुरुओं ,श्रेष्ठों से सलाह -मशवरा करके विकल्प के साथ स्थायी पूजा
    पद्धति उस स्थान पर बना ली |अब उस कुल -गोत्र की वह पूजा पद्धति स्थायी हो गयी और
    वह कुलदेवता /देवी के अनुकूल थी |ऐसा ही सभी ऋषियों के वंशजों और कर्म विशेष वाली
    जातियों के साथ हुआ |अब किसी दूर देश में अलग अलग ऋषियों के वंशजों की पूजा
    पद्धतियों में तो भिन्नता हुई ही उनके कुलदेवता या देवी भी अलग अलग हो गए ,इसके
    बाद इनमे से उत्पन्न जातियों के पूजा पद्धति और अलग हो गए जो अपने मूल ऋषि की पूजा
    पद्धति से तो मिलते जुलते थे किन्तु जाति अनुसार आपस में भी और भिन्न ऋषियों के
    वंशजों से भी बिलकुल भिन्न हो गए |इस प्रकार हर कुल -वंश के लिए अलग पूजा पद्धति
    विकसित हो गयी |विशेष पूजा पद्धति के अनुसार कई हजार वर्ष पूजा होते रहने से उनके
    कुलदेवता और देवी उस पूजा पद्धति के अनुकूल रहे |इस पूजा पद्धति में बाद में बदलाव
    नहीं किया जा सकता क्योंकि ऊर्जा प्रकृति बिगड़ने की सम्भावना रहती है |क्या पता
    किसी कुलदेवता कोई कोई चीज नापसंद हो |
             यह भी ध्यान दीजिये कि उस समय सभी वस्तुएं सभी जगहों पर न पैदा होती थी न ही
    उपलब्ध होती थी अतः स्थान विशेष की पूजा पद्धति विशेष होती थी |आज वह स्थिति नहीं
    है ,हर वस्तु हर स्थान पर उपलब्ध हो जा रही है और यह भी आप नहीं कह सकते की कोई
    वस्तु नहीं मिल रही |आपके कुलदेवता सब देख रहे हैं की आप कितने गंभीर हैं और बहाना
    तो नहीं बना रहे |आप सोचिये स्थान स्थान पर अलग अलग ऋषि वंशजों और जातियों की जब
    अलग अलग पूजा पद्धति हो गयी तो एक ही पूजा पद्धति किसी कुलदेवता या देवी के लिए
    कैसे अनुकूल होगी |कोई ज्ञानी ,जानकार ,पंडित आपके कुलदेवता या देवी के बारे में
    तो बता देगा या आप उपर बताई हमारी ही पद्धति से उनके बारे में जान तो जायेंगे पर
    आप पूजा पद्धति कहाँ से लायेंगे ,यह कौन बतायेगा ,क्या क्या उस देवता के अनुकूल है
    आपके वंश परंपरा के अनुसार आप कैसे जानेंगे ,क्या क्या चढ़ाया जाएगा या चढ़ाया जाता
    रहा है यह आप कैसे जानेंगे ,कौन सी तिथि उनकी पूजा के लिए उपयुक्त रही है और आपके
    पूर्वज किस तिथि को उन्हें पूजते रहे हैं आप कैसे जानेंगे |यह सब कोई सिद्ध ,तांत्रिक
    ,पंडित ,पुरोहित ,ज्योतिषी नहीं बता सकता |न ही कोई विधि इसके बारे में बता सकती
    है |कोई जानकार हर कुल -वंश और उनकी परंपरा के बारे नहीं बता सकता अतः मूल पद्धति
    का ,वस्तुओं का पता लगाना कुलदेवता /देवी को जानने से अधिक जरुरी है क्योंकि एक ही
    देवता की वंश -कुल के अनुसार कई तरह की पूजा पद्धतियाँ हो सकती हैं |
    यह कुलदेवता हजारों वर्षों तक विशेष प्रकार की पूजा पाते पाते
    उसके आदी हो चुके होते हैं और यह उनके अनुकूल भी होता है अतः इसमें परिवर्तन नहीं
    किया जा सकता |छोटा सा परिवरतन इन्हें रुष्ट कर देता है |उस समय के ऋषि ज्ञानी थे
    जो कहीं कहीं उन्होंने विकल्प खोज कर स्थान विशेष की पद्धति बना ली किन्तु आज उस
    स्तर का कोई ज्ञानी नहीं मिलता अतः परिवर्तन नहीं किया जा सकता |मूल पूजा पद्धति
    का कोई विकल्प नहीं |हमने खुद इतने वर्षों की खोज के बाद एक पूजा पद्धति विकसित की
    है किन्तु उसे हमने नवरात्र से जोड़ा है क्योंकि हम जानते हैं की मूल पद्धति का कोई
    विकल्प नहीं |जो भी विकल्प बनाए जायेंगे वह उतना लाभ नहीं दे पायेंगे |हमारे बनाए
    पूजा पद्धति को भी कुछ महागुरु लोग हमारे ब्लॉग से और फेसबुक पेज से कापी करके
    फेसबुक या यू ट्यूब पर डाल चुके हैं किन्तु यह लोग हमारे ज्ञान और विशेष तकनीकी
    पद्धति को कहाँ से लायेंगे जो हम अपने विडिओ में प्रकाशित करेंगे या लिखेंगे |कुलदेवता
    या देवी की पूजा पद्धति हम पहले ही इस ब्लॉग पर और फेसबुक पेजों पर प्रकाशित कर
    चुके हैं किन्तु फिर से नए लेख में विस्तार से वह तकनीकियाँ हम शामिल कर रहे जिससे
    लोगों को अधिकतम लाभ मिल सके |धन्यवाद
    ..………………………………………………………………..हरहर महादेव

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