Month: July 2019
  • महाकाली कृपा प्राप्ति साधना – २

    सामान्य
    किन्तु साहसी लोगों के लिए
    ——————————–
               महाकाली इस ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च
    शक्ति ,जिसका नाम सुनकर भी बहुत से लोगों में भय व्याप्त हो जाता है |इनकी साधना
    ,उपासना कम लोग करते हैं क्योकि डरते हैं इनसे और मानते हैं की यह केवल तांत्रिकों
    की देवी हैं |कुछ लोग कहते हैं की महाकाली की तस्वीर और मूर्ती घर में नहीं रखनी
    चाहिए तो कुछ कहते हैं की इनकी उपासना गृहस्थों को नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह
    विनाश की देवी हैं ,यह श्मशान वासिनी हैं |यह सब सत्य नहीं है ,यह समस्त
    ब्रह्माण्ड में व्याप्त मूल शक्ति हैं जिनके बिना तो शिव भी शव समान हैं |यह
    श्मशान में ही नहीं समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं ,यहाँ तक की आपके शरीर में
    सबसे मुख्य चक्र का अधिपत्य इन्हें प्राप्त है और सबसे पहले यही चक्र भ्रूण में
    बनता भी है |यही नव दुर्गा हैं और यही दस महाविद्या हैं |नव दुर्गा और दस
    महाविद्या इन्ही के स्वरूपों और गुणों का विस्तार हैं |यह विनाशक शत्रुओं
    ,दुर्गुणों और पापियों के लिए हैं ,भक्त के लिए तो महा कृपालु माता हैं |जब आप
    दुर्गा को पूज सकते हैं ,नव दुर्गा की आराधना कर सकते हैं ,दस महाविद्या को उपासित
    कर सकते हैं तो काली को क्यों नहीं |वही तो इन सब में भी हैं |इनकी आराधना ,उपासना
    भी सभी कर सकते हैं ,यह डरावनी नहीं ,यह तो महा कृपालु हैं |इनका स्वरुप आराधक के
    शत्रुओं के लिए डरावना है ,उनके लिए घातक है ,साधक के लिए नहीं |इनकी तो आराधना
    करने वाला सभी दुखों ,कष्टों से मुक्त हो जाता है ,सभी भय समाप्त हो जाते हैं उसके
    |
              जो सामान्य लोग हैं ,वह भी इनकी उपासना
    कर सकते हैं और इनकी कृपा ,शक्ति पा सकते हैं |शक्ति सबके लिए होती है ,इनपर किसी
    का एकाधिकार नहीं |इसे कोई भी प्राप्त कर सकता है |जिनके पास गुरु हैं ,जो दीक्षित
    हैं उन्हें तकनीकियों का ज्ञान होता रहता है जिससे वह सुरक्षित जल्दी कृपा पा जाते
    हैं और अधिक मात्रा में भी पा जाते हैं ,पर जिनके पास गुरु नहीं हैं ,जो दीक्षित
    नहीं हैं वह भी काली की शक्ति पा सकते हैं |अंतर बस समय और मात्रा का हो सकता है
    ,पर मिलता जरुर है |इसके लिए बहुत समय तक या घंटों आराधना ,उपासना करना भी आवश्यक
    नहीं ,कुछ मिनट भी यदि एकाग्र हुआ जाए तो इनकी कृपा और शक्ति पाई जा सकती है |यदि
    हम ऐसा कहते हैं तो लोगों को आश्चर्य हो सकता है ,हो सकता है कुछ लोग आलोचनात्मक
    भी हो जाएँ ,क्योकि बहुतेरे वर्षों साधना करते रहते हैं ,घंटों करते रहते हैं
    किन्तु परिणाम समझ में नहीं आता ,फिर भी स्वयं को सिद्ध समझे हुए होते हैं |सोचते
    हैं की बिना गुरु ,बिना तकनिकी ,बिना शास्त्रीय जानकारी यह नहीं हो सकता |ऐसे में
    वह लोग आलोचना भी कर सकते है ,अथवा कुछ महाज्ञानी जो लम्बे
    चौड़े कर्मकांड को ही सिद्धि और साधना के सूत्र
    मानते हैं वह भी आलोचना कर सकते हैं |किन्तु हम फिर भी कहना चाहेंगे की काली की
    ऊर्जा केवल १५ से ३० मिनट प्रतिदिन के प्रयास से पायी जा सकती है |हम कोई सिद्ध
    नहीं हैं ,कोई सन्यासी नहीं हैं ,अज्ञानी और बेहद सामान्य श्रद्धालु  हैं किन्तु फिर भी अनुभव किया है, अपने
    नजदीकियों को अनुभव कराया है कि यदि हम चाहें तो काली की शक्ति प्राप्त कर सकते
    हैं केवल थोड़े से गंभीर प्रयास से |हमने मात्र काली सहस्त्रनाम के पाठ से काली की
    उस शक्ति का आभास अपने मित्रों और कष्ट में फंसे लोगों को कराया है ,जिसके लिए
    तांत्रिक भी तरसते हैं |जो समस्या तांत्रिक दूर ना कर पाए ,वह समस्या मात्र काली
    सहस्त्रनाम के पाठ से दूर हुई है |ऐसे में अगर मूल काली की शक्ति को खुद में पाने
    का प्रयास किया जाए तो सोचिये कितना कल्याण होगा आराधक का |[[काली सहस्त्रनाम की
    विधि हमने इसके पहले के अंक में ,महाकाली कृपा प्राप्ति साधना -१ या महाकाली की
    साधना और सिद्धि कैसे हो ,के नाम से लिखा और पोस्ट किया है |
            सामान्य काली की ऊर्जा, जिससे हमारा
    भौतिक जीवन सुखमय हो सके ,नकारात्मक ऊर्जा हट सके ,सफलता बढ़ सके आदि के लिए बहुत
    गंभीर साधना करनी पड़े ,तंत्र की गंभीर क्रियाएं करनी पड़े आवश्यक नहीं है | साधारण
    तौर पर महाकाली की शक्ति कोई भी, कभी भी, कहीं भी प्राप्त कर सकता है ,केवल कुछ
    सूत्रों ,कुछ नियमों ,कुछ निर्देशों को गंभीरता से पालन करने की जरुरत है |हम अपने
    इस पोस्ट में एक ऐसी महत्वपूर्ण, अति तीब्र प्रभावकारी किन्तु बेहद सरल साधना को
    प्रस्तुत कर रहे हैं ,जिससे किसी को भी महाकाली की अलौकिकता का आभास हो सकता है
    |किसी का भी जीवन बदल सकता है |कोई भी काली की ऊर्जा प्राप्त कर सकता है ,केवल कुछ
    मिनट के प्रयास से |हमने बहुतों को यह बताया है ,कुछ सफल हुए ,कुछ घबराकर हट गए
    ,कुछ नियमित न रह पाने से अथवा अत्यंत सरल पद्धति होने से मजाक समझ अविश्वास में
    छोड़ बैठे |कुछ इसे करके अत्यंत सफल हो गए और खुद को सिद्ध ही मानने लगे |यह है तो
    बहुत ही छोटा और सरल प्रयोग पर इसकी शक्ति अद्वितीय है |इससे महाकाली की शक्ति तो
    निश्चित रूप से प्राप्त होती ही है ,अगर एकाग्रता और लगन बना रहा तो ईश्वर साक्षात्कार
    अथवा प्रत्यक्षीकरण भी हो जाता है |भूत
    भविष्य-वर्तमान के ज्ञान की शक्ति प्राप्त हो सकती है |किसी भी शक्ति की
    प्राप्ति हो सकती है ,केवल मार्गदर्शन और तकनिकी ज्ञान मिलता रहे |इस प्रयोग में
    किसी कर्मकांड की ,लम्बे चौड़े पद्धति की ,विशिष्ट पूजा
    पद्धति की भी आवश्यकता नहीं है |कोई भी कर सकता है |हाँ एक अनिवार्य शर्त
    तो है आपको भयमुक्त होना चाहिए |डरपोक लोग साधना काली की तो नहीं ही कर सकते हैं |
    साधना विधि
    ::–इस साधना को आप किसी भी शनिवार अथवा कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी से प्रारम्भ
    कर               
    ==========
    सकते हैं | आप नित्यकर्म और स्नान आदि से स्वच्छ हो ,ऊनि लाल अथवा रंगीन आसन पर
    स्थान ग्रहण करें |भगवती महाकाली का एक सुन्दर सा चित्र लें जिसमे वह तरुणी हों
    ,सुन्दर और सौम्य दिखें [चित्र पहले से लाकर रखे रहें ] |इस चित्र को अपने पूजा
    स्थान पर किसी चौकी आदि पर लाल वस्त्र बिछाकर स्थापित करें | फिर उनकी स्थापना
    करें |आप हाथ जोड़कर अपने ध्यान में भगवती काली जी को लायें और फिर आँखें खोलकर
    कल्पना द्वारा उस काल्पनिक भगवती को धीरे
    धीरे लाकर चित्र में स्थापित कर दें और कल्पना करें की भगवती ने आकर उस
    चित्र में अपने को समाहित कर लिया है |अब उनकी विधिवत पूजा कर दें |पूजा आपको रोज
    सुबह करनी है किन्तु चित्र स्थापना और भगवती की मानसिक प्रतिष्ठा चित्र में एक बार
    ही करनी है |पूजा में सिन्दूर
    , लाल
    फूल और लौंग यथासंभव प्रतिदिन चढ़ाएं |पूजा करने के बाद आप उठ सकते हैं |इस समय इस
    स्थान पर अगर हत्थाजोड़ी -सियार्सिंगी अथवा हमारे द्वारा निर्मित दिव्य गुटिका
    /डिब्बी की भी स्थापना की जाए तो सफलता और बढ़ जायेगी |इसके बाद आप भगवती के चित्र
    के सामने टेनिस की गेंद के आकार की एक क्रिस्टल बाल अर्थात पारदर्शी शीशे का गोला
    जिसमे कोई बूँद ,दरार अथवा दाग आदि न हो उसके स्टैंड पर स्थापित करें |क्रिस्टल
    बाल की साइज अथवा मोटाई कम से कम दो इंच की हो यदि पूजा स्थान में छाया आदि एक ही
    दिशा में अधिक हो तो आप एक लाल जीरो वाट का बल्ब क्रिस्टल बाल के पीछे इस प्रकार
    स्थापित करें की आपके सामने क्रिस्टल बाल के बाद बल्ब न दिखे और केवल लाल प्रकाश
    ही बाल में नजर आये |
              अब आपको दिन में किसी भी समय का एक
    निश्चित समय निश्चित करना है जब आप रोज नियमित उन्हें १५ मिनट का समय दे सकें
    |बेहतर हो यह समय रात्री १० बजे के बाद का हो |यह समय बिलकुल एकांत का होना चाहिए
    ,कोई आवाज अथवा विघ्न नहीं होनी चाहिए |इसके लिए स्थान आपका शयन कक्ष भी हो सकता
    है अथवा पूजा स्थान अथवा कोई भी एकांत स्थान |पूजन रोज सुबह और साधना रात्री में
    करें |जब आप समय निश्चित कर लें की अमुक समय आप रोज साधना कर सकते हैं तो फिर उस
    समय और स्थान में परिवर्तन न हो |इसीलिए आपको जहाँ और जब सुविधा हो एक बार में ही
    चुनाव कर लें |रात्री आदि में साधना करने के पूर्व स्नान आदि करके स्वच्छ हो एक
    ऊनि लाल अथवा रंगीन ऊनि कम्बल अपनी सुविधानुसार स्थान पर बिछाएं |आपका आसन
    क्रिस्टल बाल से दो फुट की दूरी पर हो | अब एक घी का दीपक और अगर बत्ती जलाएं
    |इन्हें भगवती को दिखा -समर्पित कर प्रणाम करें और ध्यान से उनके चित्र को देखें |
    अब आसन पर आराम से सुखासन में बैठ जाएँ |आसन के चारो और पहले से सुरक्षा घेरा
    बनाकर रखें |इसके लिए सिन्दूर
    कपूर
    और लौंग को चूर्णकर घी में मिला भगवती के किसी मंत्र को पढ़ते हुए आसन के चारो और
    घेरा बना दें और भगवती से प्रार्थना करें की वह आपकी सब प्रकार से सुरक्षा करें
    |[पंडित जितेन्द्र मिश्र ]
            अब आसन पर बैठ कर अपनी अपलक दृष्टि आपको
    क्रिस्टल बाल पर जमानी है ठीक बीचोबीच | मन में सदैव एक ही कल्पना रहे की इस
    क्रिस्टल बाल के लाल प्रकाश में भगवती मुझे दिखेंगी और आशीर्वाद देंगी |मन में
    प्रबल विश्वास रखें की वह जरुर दिखेंगी और मुझे उनकी कृपा प्राप्त होगी |इस अवधि
    में कोई मंत्र जप तभी कर सकते हैं जब आपको किसी सिद्ध साधक अथवा गुरु से काली का
    मंत्र प्राप्त हो ,अन्यथा मंत्र जप न करें |कोई भी शाबर मंत्र तो कदापि न करें
    |प्रक्रिया में सदैव अपने ध्यान को काली पर ही केन्द्रित करने का प्रयास होना
    चाहिए |यद्यपि मन बहुत भटकता है पर कुछ दिन में एकाग्रता आने लगती है और बाल में
    आकृतियाँ उभरने लगती हैं ,जिससे रोमांच भी होता है |कभी क्षणों के लिए भगवती भी
    दिख सकती हैं जो कभी किसी रूप में तो कभी किसी रूप में दिख सकती हैं |यह सब आपकी
    पूर्व कल्पनाओं की आकृतियाँ होंगी पर प्रयास आपको चित्र वाली देवी को ही लाने का
    होना चाहिए |इसके साथ ही भिन्न भिन्न लोग भिन्न भिन्न आकृतियाँ ,भिन्न दृश्य उभरते
    हैं |यह सब अवचेतन के चित्र होते हैं जिन्हें देखकर आप भी हतप्रभ होते रहते हैं
    ,किन्तु हमेश दिमाग में एक ही निश्चय रखें की हमें भगवती स्पष्ट दिखेंगी और
    आशीर्वाद देंगी |कुछ दिन बाद भगवती की आकृति उभरने लगती है ,क्षणों
    क्षणों के लिए ,कभी कुछ कभी कुछ |फिर धीरे धीरे
    अनवरत प्रयास से आकृति स्थायी होने लगती है |यदि जब कभी आपकी एकाग्रता एक मिनट के
    लिए भी स्थायी हो जाती है अथवा एक मिनट भी भगवती स्थायी होकर रुकती हैं अथवा
    स्पष्ट दीखते हुए आशीर्वाद मुद्रा में आशीर्वाद देने लगती हैं आपकी साधना सफल होने
    लगती है |आपको अनेक परिवर्तन स्वतः नजर आने लगते हैं |एक मिनट की आत्म विस्मृति
    [खुद की सुध भूल जाना ] प्राप्त होते ही आप सिद्धि की शक्ति से साक्षात्कार करने
    लगते हैं |
             भगवती का चित्र बाल में स्थायी होना और
    आशीर्वाद देने का मतलब आप द्वारा उनकी ऊर्जा को वातावरण से बुलाने पर वह आ रही है
    और उसका सम्बन्ध आपके मष्तिष्क और अवचेतन से बन गया है |आपमें इसके साथ ही आतंरिक
    रासायनिक परिवर्तन भी होने लगते हैं और वाह्य भौतिक परिवर्तन भी होने लगते हैं
    ,क्योकि आपके आज्ञा चक्र की तरंगों की प्रकृति बदल जाती है ,उसकी क्रिया तीब्र हो
    जाती है |भगवती की ऊर्जा के अनुरूप भावना होने से शरीर और सोच में परिवर्तन आता है
    |अंगों में अथवा चक्र में स्फुरण हो सकता है | इस स्थिति में आपकी कुंडलिनी में भी
    स्फुरण हो सकता है |आपकी सोची इच्छाएं पूर्ण होने लगती हैं क्योकि आपकी मानसिक
    तरंगों में इतनी शक्ति आ जाती है की वह लक्ष्य पर पहुचकर उसे आंदोलित और आपके पक्ष
    में करने लगती हैं |
             जब भगवती की आकृति रोज स्थायी होने लगे
    तो उसे अधिकतम देर तक स्थायी रखने का प्रयास करें |कुछ दिनों के प्रयास में यह
    संभव हो सकता है |फिर उन्हें आप अपने मानसिक बल और मन के भावों से घुमाने का
    प्रयास करें ,अथवा कभी यह हाथ कभी वह हाथ उठायें ,कभी उन्हें घुमाने का प्रयास
    करें |एकाग्रता, लगन और निष्ठां से यह भी संभव हो जाएगा |,उनके घुमते ही आपके
    आसपास का माहौल भी आपकी मानसिक ईच्छाओं के साथ प्रभावित होने लगता है |यह साधना की
    उच्च स्थिति है |यह स्थिति आने पर समाधि की भी स्थिति संभव है अथवा भाव में डूबने
    पर साक्षात भगवती आपके सामने आकर खडी हो सकती हैं |आपकी कुंडलिनी जाग सकती है |आप
    समाधि में जा सकते हैं |आपसे भगवती का वार्तालाप हो सकता है |आपको वरदान आदि
    प्राप्ति की स्थिति आ सकती है |इस प्रकार इस साधना की शक्ति की कोई सीमा नहीं है
    |इस साधना से आप दुनिया में कुछ भी पा सकते हैं |त्रिकाल दर्शिता की क्षमता भी
    |सर्वत्र विजय भी ,मन के सोचने मात्र से शत्रु संहार भी |इस साधना की सबसे
    अनिवार्य शर्त है की आप डरपोक न हों ,आपको भयभीत नहीं होना है किसी भी स्थिति में
    ,क्योकि यह उग्र शक्ति है और अनियंत्रित होने पर क्षति संभव है |
            इस साधना की शुरुआत केवल  ५ मिनट से करें ,क्योकि आँखों पर बहुत जोर पड़ता
    है |लगातार बाल देखते हुए जब आँखों में जलन हो या अत्यधिक पानी आये तो कुछ सेकण्ड
    के लिए आँखें बंद कर लें किन्तु ध्यान भगवती पर ही एकाग्र रखें |फिर आँखें खोलकर
    क्रिस्टल में उन्हें देखने का प्रयास करें |इसे प्रति सप्ताह एक मिनट बढ़ते जाएँ और
    अंततः १५ मिनट तक जाए |इससे अधिक नहीं |यह पूरी प्रक्रिया ३ महीने की सामान्य रूप
    से है |तीन महीने में भगवती की शक्ति का अनुभव आपको होने लगता है |,यदि तीन महीने
    में आप सफल नहीं होते हैं तो मान लीजिये की आपके पूर्व कर्म बहुत अच्छे नहीं रहे
    और आपको ईश्वरीय ऊर्जा या दर्शन या आपकी मुक्ति मुश्किल है |आप में भारी कमियां
    हैं |आपकी एकाग्रता बहुत खराब है |आपकी श्रद्धा और विश्वास में कमियां हैं |आप
    बहुत ही गंभीर नकारात्मकता से ग्रस्त हैं |फिर तो आपका कल्याण केवल गुरु के हाथों
    ही संभव हो सकता है |यद्यपि पूर्ण साक्षात्कार की स्थिति विरले को ही मिलती है पर
    शक्तियां तो मिलने ही लगती हैं ,सिद्धियाँ तो प्राप्त होती ही है |यदि मंत्र और गुरु
    मार्गदर्शन है तो अधिक अन्यथा कुछ कम पर प्राप्ति होती जरुर है |पूर्ण प्रक्रिया
    की कोई समय सीमा नहीं क्योकि यह साधना है कोई अनुष्ठान ,उपासना अथवा आराधना नहीं |
    आप इसे करके देखें ,और नीचे लिखी सावधानी और चेतावनी पर ध्यान देते हुए साधना
    मार्ग पर अग्रसर हों ,हमें पूरा विश्वास है आपका जीवन बदल जाएगा ,आपको भगवती की
    ऊर्जा का साक्षात्कार होगा ,भले आपने कभी कोई साधना न की हो ,भले आप साधक न हों
    ,पर इससे आप साधक बन जायेंगे और गंभीर प्रयास से सिद्ध भी हो जायेंगे एक विशेष
    शक्ति के |इस शक्ति के प्राप्त होने पर इसके अनेकानेक प्रयोग हैं जिससे आप अपने
    परिवार का ,मित्रों का ,लोगों का भला कर सकते हैं ,उनके दुःख दूर कर सकते हैं जबकि
    आपका भला तो खुद ब खुद होता है |
    विशेष जानकारी
    और चेतावनी
    =====================
    –यह साधना कोई भी कर सकता है ,किन्तु यह तांत्रिक साधना है |मूल तांत्रिक पद्धति
    क्लिष्ट और गुरुगम्य होती है किन्तु इसे कोई भी थोड़ी सावधानी से कर सकता है |
    साधना में साधित की जा रही शक्ति शिव परिवार की और ब्रह्माण्ड की सर्वाधिक उग्र शक्ति
    हैं ,इनसे किसी प्रकार की हानि भी संभव है और लाभ भी |यह परम तामसिक और उच्चतम
    सकारात्मक शक्ति होने से इनकी साधना से जब सकारात्मकता का संचार बढ़ता है तो ,आसपास
    और व्यक्ति में उपस्थित अथवा उससे जुडी नकारात्मक शक्तियों को कष्ट और तकलीफ होती
    है ,उनकी ऊर्जा का क्षरण होता है ,फलतः वह तीब्र प्रतिक्रया करती है और साधक को
    विचलित करने के लिए उसे डराने अथवा बाधा उत्पन्न करने का प्रयास करती हैं |इस
    साधना को करते समय आपको कभी विचित्र अनुभव भी हो सकते हैं ,कभी लग सकता है की कोई
    आगे से चला गया ,कोई पीछे से चला गया ,कोई पीछे है ,या कमरे में है या कोई और भी
    आसपास है ,कभी अनापेक्षित घटनाएं भी संभव हैं |सबका उद्देश्य आपको विचलित करना
    होता है |
           यह सब काली नहीं करती ,अपितु आपके आस पास
    की नकारात्मक शक्तियां करती हैं जिससे आप साधना छोड़ दें |,कभी कभी पूजा से भी
    दूसरी नकारात्मक शक्ति आकर्षित हो सकती हैं |व्यक्ति के काम को बिगाड़ने और
    दिनचर्या प्रभावित करने का प्रयस भी यह नकारात्मक उर्जायें कर सकती हैं ,इसलिए यह
    अति आवश्यक होता है की साधना की अवधि में साधक किसी उच्च सिद्ध काली साधक द्वारा
    बनाया हुआ शक्तिशाली काली यन्त्र
    ताबीज
    अवश्य धारण करे ,जिससे वह सुरक्षित रहे और साधना निर्विघ्न संपन्न करे |तीब्र
    प्रभावकारी साधना होने से प्रतिक्रिया भी तीब्र हो सकती है अतः सुरक्षा भी तगड़ी
    होनी चाहिए |यह गंभीरता से ध्यान दें की आप जो काली यन्त्र
    ताबीज धारण कर रहे हैं वह वास्तव में काली को
    सिद्ध किया हुआ साधक ही अपने हाथों से बनाए और अभिमंत्रित किये हुए हो ,अन्यथा बाद
    में सामने खतरे या समस्या आने पर मुश्किल हो सकती है |सिद्ध अथवा साधक के यहाँ की
    भीड़ ,अथवा प्रचार से उनका चुनाव आपको गंभीर मुसीबत में डाल सकता है |साधना पूर्ण
    है ,किन्तु इसमें किसी भी प्रकार की त्रुटी होने अथवा समस्या
    मुसीबत आने पर हम जिम्मेदार नहीं होंगे |गुरु का
    मार्गदर्शन और समुचित सुरक्षा करना साधक की जिम्मेदारी होगी |हमारा उद्देश्य सरल
    ,सात्विक ,तंत्रोक्त साधना की जानकारी देना मात्र है |..
    जिन
    लोगों के पास गुरु हैं किन्तु गुरु को ही तकनिकी ज्ञान नहीं है ,जिनके पास गुरु
    हैं किन्तु गुरु किसी और मार्ग के अथवा सात्विक मार्ग के हैं |जिन लोगों के पास
    गुरु हैं किन्तु गुरु आडम्बरी हैं और मात्र पैसे को महत्त्व देने वाले हैं |जिनके
    गुरु तो हैं किन्तु उनके पास मार्गदर्शन के लिए समय नहीं या जिनकी प्रसिद्धि और
    प्रचार देखकर गुरु बना लिया है अथवा किसी कथा वाचक को गुरु बना लिया है जिनको कोई
    तन्त्र की जानकारी ही नहीं तो ऐसे लोगों के लिए भी हमारे पास काली साधना के रास्ते
    हैं |हमने इस साधना पद्धति से भी विशेष और उत्कृष्ट साधना पद्धति बनाई है उनके लिए
    जो साधक हैं ,साहसी हैं और तंत्र समझते हैं |किसी कारण गुरु का लाभ नहीं पा रहे
    किन्तु साधना करना चाह रहे |उस पद्धति को भी समय मिला तो प्रकाशित करेंगे थोड़े काट
    छांट के साथ क्योंकि पूर्ण तकनिकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती तंत्र के
    गोपनीयता के नियमों के अनुसार |तंत्र का मतलब तकनिकी साधना होता है जो सनातन
    विज्ञानं के सूत्रों पर सिद्धियाँ देता है |यह लेख इन्ही तकनिकी ज्ञान का विस्तार
    है जहाँ आज्ञा चक्र और विशुद्ध चक्र की ऊर्जा से काली की सिद्धि हमने बताई है |मूलाधार
    को तो हमने छुआ ही नहीं इस लेख में जबकि काली की वास्तविक शक्ति वहीँ होती है |वह
    ज्ञान केवल हमारे शिष्यों के लिए सुरक्षित है ,हम अपने शिष्यों के लिए विशेष तकनीक
    अलग रखते हैं चूंकि तांत्रिक तकनीके सामान्य लोगों के लिए नहीं होती |………………
    ………………………………………………हरहर महादेव

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  • क्या है शिवलिंग ? [ Shivlingam :: Univarsal Energy]

    :::::::::::: क्या है शिवलिंग::::::::::::
    =====================
     समस्त संसार में शिवलिंग पाए जाते हैं ,विभिन्न धर्मों तक में इनकी किसी न किसी रूप में प्रतीकाकृति मिलती हैं |हिन्दू धर्म में यह परम पवित्र शिव के प्रतीक माने जाते हैं और इनकी पूजा की जाती है |यह शिवलिंग है क्या ,कभी इस पर सामान्यतया विचार सामान्य लोग नहीं करते जा इसके बारे में बहुत नहीं जानते |इसलिए जो जैसी परिभाषा इसकी गढ़ कर सुना देता है सामान्य रूप से मान लिया जाता है और कल्पना कर ली जाती है |कुछ महाबुद्धिमान प्राणियों ने परम पवित्र शिवलिंग को जननांग समझ कर पता नही क्या-क्या और कपोल कल्पित अवधारणाएं फैला रखी हैं परन्तु…वास्तव में. शिवलिंग. वातावरण सहित घूमती धरती तथा  सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का प्रतिनिधित्व करता है |इसका अक्ष /धुरी (axis) ही लिंग है।
    दरअसल.इसमें ये गलतफहमी.. भाषा के रूपांतरण और, मलेच्छों द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने  तथा, अंग्रेजों द्वारा इसकी व्याख्या से उत्पन्न हुआ  हो सकता है. |जैसा कि…. हम सभी जानते है कि. एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में. अलग-अलग अर्थ निकलते हैं….! उदाहरण के लिए.- यदि हम हिंदी के एक शब्द “”सूत्र”’ को ही ले लें तो सूत्र मतलब. डोरी/धागा, .गणितीय सूत्र ,.कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है जैसे कि. नारदीय सूत्र ,.ब्रह्म सूत्र इत्यादि | उसी प्रकार “”अर्थ”” शब्द का भावार्थ: सम्पति भी हो सकता है और मतलब (मीनिंग) भी |
    ठीक बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय  चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।
    ध्यान देने योग्य बात है कि””लिंग”” एक संस्कृत का शब्द है जिसके निम्न अर्थ है :
    @ त आकाशे न विधन्ते -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० ५
    अर्थात….. रूप, रस, गंध और स्पर्श ……..ये लक्षण आकाश में नही है ….. किन्तु शब्द ही आकाश का गुण है ।
    @ निष्क्रमणम् प्रवेशनमित्याकशस्य लिंगम् -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० २ ०
    अर्थात….. जिसमे प्रवेश करना व् निकलना होता है ….वह आकाश का लिंग है ……. अर्थात ये आकाश के गुण है ।
    @ अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं क्षिप्रमिति काललिङ्गानि । -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० ६
    अर्थात….. जिसमे अपर, पर, (युगपत) एक वर, (चिरम) विलम्ब, क्षिप्रम शीघ्र इत्यादि प्रयोग होते है, इसे काल कहते है, और ये …. काल के लिंग है ।
    @ इत इदमिति यतस्यद्दिश्यं लिंगम । -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० १ ०
    अर्थात……. जिसमे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर व् नीचे का व्यवहार होता है ….उसी को दिशा कहते है……. मतलब कि….ये सभी दिशा के लिंग है ।
    @ इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिंगमिति -न्याय० अ ० १ । आ ० १ । सू ० १ ०
    अर्थात….. जिसमे (इच्छा) राग, (द्वेष) वैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, सुख, दुःख, (ज्ञान) जानना आदि गुण हो, वो जीवात्मा है…… और, ये सभी जीवात्मा के लिंग अर्थात कर्म व् गुण है ।
    इसीलिए……… शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने के कारन………. इसे लिंग कहा गया है…।
    स्कन्दपुराण में स्पष्ट कहा है कि……. आकाश स्वयं लिंग है…… एवं , धरती उसका पीठ या आधार है …..और , ब्रह्माण्ड का हर चीज ……. अनन्त शून्य से पैदा होकर….. अंततः…. उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है .|यही  कारण है कि इसे कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे कि प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam)  इत्यादि |
    यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि. इस ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और प्रदार्थ | इसमें से हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है जबकि आत्मा एक ऊर्जा है |ठीक इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं | क्योंकि ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है |इसीलिए शास्त्रों में शक्ति की विवेचना में कहा जाता है की जब शक्ति [काली] शिव से निकल जाती है तो शिव भी शव हो जाते हैं ,अर्थात शिव तभी ताल शिव हैं जब तक उनके साथ शक्ति हैं |वैसे ही  पदार्थ में तभी तक जीवन है जबतक उसमे आत्मा है |
    अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की दृष्टि से बोलने की जगह … शुद्ध वैज्ञानिक भाषा में बोला जाए तो. हम कह सकते हैं कि शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि हमारे ब्रह्मांड की आकृति है.,उसकी ऊर्जा संरचना की प्रतिकृति है ,और अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की भाषा में बोला जाए तो शिवलिंग ,भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-अनादि एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक है. | अर्थात शिवलिंग हमें बताता है कि…… इस संसार में न केवल पुरुष का  और न ही केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है बल्कि, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही समान हैं |एक दुसरे की परिकल्पना अथवा पूर्णता एक दुसरे के बिना संभव नहीं है |
    हमें ज्ञात है की ब्रहमांड की प्रत्येक संरचना पदार्थ है जो परमाणुओं से मिलकर बनता है |परमाणु सर्वत्र विद्यमान हैं |जल-आकाश-वायु सर्वत्र |परमाणु की संरचना में नाभिक में प्रोटान और न्यूट्रान होते हैं और इस नाभिक के चारो और इलेक्ट्रान चक्कर लगता रहता है |न्यूट्रान तो उदासीन होता है किन्तु फिर भी नाभिक धनात्मक होता है क्योकि प्रोटान धनात्मक आवेश वाला कण होता है जो पूरे नाभिक को धनात्मक बनाए रखता है ,इस धनात्मक के आकर्षण में बंधकर ऋणात्मक आवेश का कण इलेक्ट्रान उसके चारो और चक्कर लगता रहता है और परमाणु का निर्माण होता है |इलेक्ट्रान का चक्कर लगभग गोलाकार होता है जिसकी तुलना हम शिवलिंग के योनी या अर्ध्य से कर सकते हैं |धनात्मक नाभिक की तुलना लिंग से कर सकते हैं जो स्थिर रहता है |इसमें स्थित न्यूट्रान परम तत्त्व का प्रतीक है जो उदासीन रहता है |इस विज्ञान को हमारा वैदिक ज्ञान जानता था और उसने शिवलिंग की परिकल्पना की |समस्त ब्रह्माण्ड परमाणुओं से बना है ,परमाणु हर कण कण में विद्यमान है |अर्थात ईश्वरीय ऊर्जा हर कण कण में है ,तभी तो हम कहते हैं कण कण में भगवान |इस परमाणु से ही शरीर की कोशिकाएं बनती हैं और शरीर बनता है ,,इससे ही वनस्पतियों की कोशिकाएं और शारीर बनता है |यहा तक की धातु-पत्थर-मिटटी भी इसी से बनते हैं |अर्थात शिवलिंग इस परमाणु का प्रतिनिधित्व करता है |धनात्मक-ऋणात्मक ऊर्जा के साथ निर्विकार शिव का प्रतिनिधित्व करता है |
    अगर पुरुष-स्त्री के परिप्रेक्ष्य में देखें तभी यह शिवलिंग स्थूल रूप से लिंग -योनी का प्रतिनिधित्व करता दीखता है ,परन्तु यह वास्तव में ब्रह्मांडीय ऊर्जा धारा-संरचना का प्रतिनिधित्व करता है | लिंग -योनी में परिभाषित करने का शायद कारण इसके पुरुष और स्त्री अथवा पुरुष और प्रकृति का धनात्मक और ऋणात्मक ऊर्जा रूप है |इस ऊर्जा धरा या संरचना की अनेक परिभाषाएं और विवरण हैं ,पर यह मूल रूप से उर्जा को ,शक्ति को, उसकी क्रियाविधि को व्यक्त करता है |…………………………………………………………….हर-हर महादेव 


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  • शिवलिंग के पूजन का विधान क्यों है ?


    क्यों है शिवलिंग के पूजन का विधान   
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    ॐ माता शक्ति ने १०८ बार जनम ग्रहण किया है| शिव की प्राप्ति हेतु माता शक्ति के पास स्थूल शरीर को अमर करने का ज्ञान न होने के कारण हि उनकी मृत्यु होती गई और प्रत्येक जनम में वो शिव स्वरूप शंकर जी कि अर्धांगिनी बनती गई | जिस का प्रमाण उनके गले में माता के १०८ नर मुंडों से प्रतीत होता है | स्थूल शरीर को अमर करने का ज्ञान माता शक्ति को परमात्मा शिव ने १०८ वे जन्म में परमात्मा शिव ने दिया जब को परवत राज हिमालय की पुत्री पार्वती के नाम से व्यख्यात हुई | माता अपने १०७वें जन्म में राजा दक्ष की पुत्री बनी और उनका नाम सती कहलाया | माता सती के पिता राजा दक्षजी ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन रखा और पूर्ण पृथ्वी के राजा, महाराजाओं इत्यादि को उस यज्ञ में बुलवाया | शंकरजी उनके दामाद होते हुए भी उन को आमंत्रण नहीं दिया गया | भूतनाथ होने के कारण ही राजादक्ष उनसे घृणा करते थे | माता सती ने जब महादेवजी से यज्ञ में पधारने को कहा तो उन्होंने आमंत्रण न दिए जाने की वजह से यज्ञ में जाने से इनकार कर दिया | बिन आमंत्रण के जाने से उचित सम्मान की प्राप्ति नहीं होती | पिता मोह के कारण माता सती से नहीं रूका गया और वो यज्ञ के लिए अकेले ही चल पड़ी | माता जब यज्ञस्थल पर पहुंची तो उन्होंने देखा की पूर्ण यज्ञ में कहीं भी उनके पति महादेवजी का आसन मात्र भी नहीं है | यह देखकर माता को क्रोध आ गया और उन्होंने अपने पिता राजा दक्षजी से इस बात पर तर्क किया | उस समय राजा दक्षजी ने बड़े ही हीन वचन शंकरजी के बारे में कहें जिन को माता न सुन पाई और यज्ञ के अग्नि कुंड में कूदकर स्वयं को उन्होंने भस्म कर लिया | इस बात की सूचना जब महादेवजी को मिली तो वे अत्यंत क्रोधित हुए और उनके गणों ने पूर्ण यज्ञ का विध्वंस कर दिया | महादेवजी ने राजा दक्ष का सिर काट दिया और उसके शरीर पर बकरे का सिर जोड़ दिया | माता सती के पार्थिव शरीर को उठकर शंकरजी वहां से चल दिए | माता का शरीर अग्नि में जलकर कोयला हो चुका था | शक्ति के बिना शिव फिर से अधूरे हो गए | इस समय काल में ही उनकी लिंग का पतन बारह टुकड़ों में हुआ और उसी समय ब्रह्माण्ड से यह बाराह ज्योतिलिंगों की स्थापना पृथ्वी पर हुई |


    इनकी स्थापना के समय पूर्ण पृथ्वी में कंपन मच गई | जिस प्रकार से पृथ्वी का विराट है उसी प्रकार शिव बाबा का भी विराट रूप मौजूद है ब्रह्माण में जिस के दर्शनों तक पहुंचने हेतु मानव के पास कोई यंत्र नहीं है | परमात्मा शिव विराट रूप में भी हैं और ज्योर्तिबिंदू रूप में भी है | ज्योर्तिबिंदू रूप में वो परकाया प्रवेश कर पाते हैं | उनके इस विराट रूपी ज्योर्तिलिंगों ने पूर्ण सृष्टी में कोहराम मचा दिया | सृष्टि को विनाश से बचाने हेतु ब्राह्मणों ने ब्रह्माजी का आव्हान किया और इस समस्या का समाधान उनसे पूछा | उस समय ब्रह्माजी नेे स्पष्ट रूप से बताया कि शिवलिंग पूजन नारी के लिए वर्जित है |


    शिवलिंग पूजन के समय नारी अपने पति के बाएं हाथ पर स्थानग्रहण करेगी और शिवलिंग पूजन का फल पति- पत्नी दोनों ग्रहण कर पाएंगे | यज्ञ आदि के अनुष्ठान में पत्नी नर के दाहिने हाथ पर आसन ग्रहण करती है क्योंकि उस समय वो लक्ष्मी का रूप मानी जाती हैं | नारी अगर शिवलिंग की पूजा आराधना अकेले संपन्न करती है तो वो पाप कर्म की अभागी होती है | शिवलिंग अभिषेक पति- पत्नी दोनों द्वारा ही संपन्न होने चाहिए | ब्रह्माजी ने चारों वर्णों के लिए अलग- अलग शिवलिंग की व्याखा भी बताई है |


    1. ब्राह्मण वर्ग- परशिव (मिट्टी के) बामी मिट्टी जिसमें सर्प का वास होता है |
    2. छत्रिय वर्ग- सफेद मिट्टी
    3. वैश्य वर्ग- पिली मिट्टी
    4. शूद्र वर्ग- काली मिट्टी


    मानव अपने जीवन में अनेकों प्रकार के कष्टों से घिरा रहता है | इन कष्टों के निर्वाण हेतु ही भिन्न- भिन्न तत्वों से रूद्रा अभिषेक के विधान बताऐं गए | जिस प्रकार गाय के दूध से शिवलिंग अभिषेक से स्वास्थ अच्छा रहता है उसी प्रकार से गन्ने के रस से लक्ष्मी की प्राप्ति इत्यादि- इत्यादि | जैसा कष्ट वैसा समाधान …………………………………………………………………………हर-हर महादेव

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  • मृतसंजीवनी यन्त्र /कवच :: मृत्यु जब निश्चित लगे

    मृत संजीवनी यन्त्र ::मृत्यु जब समीप हो
    ———————————–
    मृत संजीवनी मंत्र साधना में मृत संजीवनी यन्त्र का प्रयोग किया जाता है और प्रतिदिन इसकी पूजा विधिवत की जाती है |इसके बाद मंत्र जप होता है |मृत संजीवनी मंत्र के साधक इसे स्वतंत्र रूप से भी मृत्यु के समीप पहुँच रहे व्यक्ति के लिए बनाते हैं और अभिमंत्रित कर धारण कराते हैं |कैंसर ,ह्रदय रोग ,एड्स ,गंभीर दुर्घटना ,ह्रदय की खराबी ,किडनी की खराबी ,मश्तिश्काघात आदि जैसी बीमारियों अथवा जब भी मृत्यु की संभावना बन रही हो इसका प्रयोग किया जाता है |आज के समय में मृत संजीवनी विद्या से भी मृत को जीवित करने की क्षमता रखने वाला साधक मिलना बेहद मुश्किल है ,यद्यपि असंभव कुछ भी नहीं और अपवाद हमेशा उपलब्ध होता है पर जिनके पास यह क्षमता हो वह आज के समय में सामाजिक रूप से सक्रीय होगा ,कहना मुश्किल है |अतः मृत्यु समीप वाले पर ही इसका प्रयोग अधिक उपयुक्त है और ऐसे व्यक्ति को धारण कराने से दो तरह की क्रिया होती है |एक तो उसकी प्राण शक्ति बढ़ जाती है गायत्री के प्रभाव से ,दुसरे आसन्न मृत्यु को टाला जा सकता है महामृत्युंजय भगवान् शिव के प्रभाव से |अतः जब भी किसी की मृत्यु की आशंका समीप हो उसे मृत संजीवनी यन्त्र कम से कम २१००० मन्त्रों से अभिमंत्रित करके धारण कराना चाहिए |
    आध्यात्म विज्ञान के अनुसार संजीवनी मंत्र के जाप से व्यक्ति में बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है जिसे हर व्यक्ति सहन नहीं कर सकता। नतीजतन आदमी कुछ सौ जाप करने में ही पागल हो जाता है या तो उसकी मृत्यु हो जाती है। इसे गुरू के सान्निध्य में सीखा जाता है और धीरे-धीरे अभ्यास के साथ बढ़ाया जाता है। इसके साथ कुछ विशेष प्राणायाम और अन्य यौगिक क्रियाएं भी सिखनी होती है ताकि मंत्र से पैदा हुई असीम ऊर्जा को संभाला जा सके। इसीलिए इन सभी चीजों से बचने के लिए इस मंत्र की साधना किसी अनुभवी गुरू के दिशा- निर्देश में ही करनी चाहिए।
    इस यन्त्र का प्रयोग केवल विशिष्ट परिस्थितियों में ही किया जा सकता है जबकि मृत्यु से बचने का कोई अन्य विकल्प न सूझे |यह बेहद तीव्र उपाय है और बेहद पवित्र भी |इसके साथ सावधानियां भी रखनी होती हैं |संजीवनी यन्त्र का निर्माण या तो इसके साधक से हो या कम से कम जिसे कोई उग्र महाविद्या सिद्ध हो उसके द्वारा हो |न तो सामान्य साधक इसे उर्जीकृत कर पायेगा और ही पर्याप्त तंत्रोक्त पद्धति का पालन ही कर पायेगा |…………………………………………..हर-हर महादेव 

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  • धर्मपत्नी और पत्नी में अंतर

    पत्नी और
    धर्मपत्नी में अंतर

    ==============
    हमारे देश में
    पत्नी को धर्मपत्नी कहा जाता है ,किन्तु सभी पत्नियाँ धर्मपत्नी नहीं होती |इस
    सम्बन्ध में भारी भ्रम है और लोग समझते हैं की पूर्ण विधि विधान से पूरे रीती
    रिवाज से मंत्र और कर्मकांड से होने वाले विवाह के बाद कोई भी स्त्री धर्मपत्नी बन
    जाती है |धर्म द्वारा स्थापित परम्पराओं के अनुसार विवाह होने से किसी स्त्री को
    धर्मपत्नी कहा तो जरुर जा सकता है किन्तु वह वास्तव में धर्म पत्नी होगी यह जरुरी
    नहीं |विवाह तो लगभग हर जोड़े का आज भी भारत में धर्म अनुसार ही होता है तो क्या हम
    सभी को धर्म पत्नी मान लें |मेरा मत कुछ भिन्न है और मैं अलग सोचता हूँ जिसके
    अनुसार मेरा मानना है की वास्तव में आज के समय में शायद कुछ प्रतिशत स्त्रियाँ ही
    धर्म पत्नियाँ होती हैं अन्य सभी मात्र पत्नियाँ होती है |इसी तरह मात्र कुछ
    प्रतिशत पुरुष भी परमेश्वर या धर्म पति हो सकते है ,अन्य सभी मात्र पति ही होते
    हैं |हम आपको पत्नी ,धर्म पत्नी और पति तथा पतिपरमेश्वर या धर्म पति की अपनी सोच
    के अनुसार और अपने अनुभव के अनुसार परिभाषा बताने का प्रयत्न कर रहे हैं ,आप
    इन्हें देखें ,समझें और निर्णय लें की कौन पत्नी है ,कौन धर्मपत्नी है ,कौन पति है
    और कौन धर्मपति है |हमारा विश्लेषण ब्रह्माण्ड के ऊर्जा सूत्रों ,सनातन विज्ञानं
    और तंत्र के आधार पर है जहाँ वास्तविक स्थिति बताई गयी है |
            यद्यपि भारत में सभी लोग गर्व से अपनी
    पत्नी को धर्मपत्नी की संज्ञा देते हैं किन्तु वह होती पत्नी है तथा लोग भ्रम में
    जीते हैं |पत्नी वह होती है जो पति को संतान उत्पन्न करने में योग देती है |संतान
    से समाज वर्धन होता है |यदि संतान विक्सित और मेघा युक्त है तो समाज विकसित बनेगा
    |यदि संतान अविकसित शरीर ,या विकृत शरीर या विकृत मानसिकता या मेघा हीन हुई तो
    समाज भी वैसा ही रुग्ण और पंगु बन जाएगा |अतः पत्नी को धर्म पत्नी और पति को धर्म
    पति बनाकर इससे संतान और समाज दोनों को विकसित बनाने के उद्देश्य से पति पत्नी के
    लिए कुछ रास्ते बनाये गए |अब संतान उत्पन्न करने भर के लिए किसी की पत्नी बनना एक
    सामाजिक रिश्ता है ,जिसे मान्यता देने के लिए रीती रिवाज से संस्कारित किया जाता
    है |मंत्र और पूजा पाठ के साथ ईश्वर को साक्षी मानकर पाणिग्रहण इसलिए कराया जाता
    है की इसी संस्कार से धर्मपत्नी भी प्राप्त होती है तथा पहले के समय में
    धर्मपत्निय ही अधिक मिलती थी |आज के समय में संस्कार में बदलाव से पत्नियाँ अधिक
    मिलती हैं धर्म पत्नियाँ खोजनी पड़ेंगीं अगर वास्तविक तथ्यों का अनुसरण हो तो |मात्र
    संतान उत्पन्न करने वाली पत्नी धर्मपत्नी नहीं है |पत्नी का धर्मपत्नीपन उस समय
    शुरू होता है जब पति के लिए कोई पत्नी धर्म के विकास में सहायक हो ,जब कोई पत्नी
    पति के आध्यात्मिक उन्नति में सहायक हो ,जब पत्नी के पूजा पाठ का सम्पूर्ण आधा
    हिस्सा पति को प्राप्त हो सके |यह धार्मिक विकास सम्भोग से समाधि और उन्नति के
    सूत्रों पर आधारित होता है |आज के समय में अधिकतर पत्नियों अथवा पतियों के पूजा
    -पाठ धर्म -कर्म का आधा हिस्सा किसी भी पति या पत्नी को नहीं मिलता |क्यों नहीं
    मिलता इसे हम संक्षेप में आगे बताएँगे जबकि इस विषय पर हमने पूर्ण और विस्तृत लेख
    अपने ब्लॉग पर तथा यू ट्यूब चैनल पर विडिओ प्रकाशित कर रखा है |
         पत्नी को ही धर्मपत्नी बनने का अधिकार मिला
    हुआ है क्योंकि वह पति से इस प्रकार अन्तरंग सम्बन्ध रखती है की वह अगर साथ दे तो
    पति परमेश्वर बन सकता है और पति के मामले में भी ऐसा ही है |सामाजिकता के सन्दर्भ
    में सम्भोग से समाधि की तरह का धर्म निर्वाह अत्यंत गुप्त रखा जाता है जो की पति
    पत्नी के लिए सहज सम्भव होता है |यह गुप्त धर्म कुंडलिनी तंत्र साधना है |जो
    व्यक्ति [
    shiv के समान] अपनी पत्नी [शिवा के समान] के साथ कुल कुंडलिनी धर्म का विकास करता है
    उसके लिए पत्नी अर्धांगिनी बन जाती है |इस विधि को अकेला पुरुष अथवा अकेली स्त्री
    नहीं कर सकती |दोनों एक होकर ही इस धर्म निर्वाह को पूरा कर पाते हैं अतः पति भी
    आधा अधूरा है और पत्नी भी आधी अधूरी है और दोनों एक दुसरे के पूरक अर्धांग हैं
    |पत्नी तब अर्धांगिनी बनती है जब वह पति के लिए सम्बन्धों के माध्यम से आध्यात्मिक
    उन्नति की सहयोगिनी बनती है |सम्बन्धों के द्वारा आध्यात्मिक उन्नति मात्र
    कुंडलिनी तंत्र साधना द्वारा ही सम्भव है |कुछ लोग सोचेंगे की पत्नी के साथ
    धार्मिक अनुष्ठान ,पूजा -पाठ ,हवन -पूजन में बैठने से पत्नी का धर्म पत्नीपन पूरा
    हो जाएगा |ऐसा नहीं है |इन कामों के लिए तो किसी भी स्त्री को आप बिठा सकते हैं
    ,कोई भी रिश्ता हो सकता है |कोई तात्विक बाधा नहीं आएगी |हमने सूना है की पत्नी के
    न होने पर श्री रामचंद्र जी ने अपने अश्वमेध यज्ञ में सोने की सीता बनाकर बिठा ली
    थी |वहां सोने की ,लोहे की या खून मांस की कोई भी सीता बिठा सकते हैं परन्तु कुल
    कुंडलिनी के धर्मानुष्ठान में जहाँ सम्भोग ही समाधि का द्वार हो असली पत्नी की ही
    आवश्यकता होगी |पूजा में बैठने मात्र वाली पत्नी न अर्धांगिनी होगी न धर्मपत्नी
    अपितु जो पीटीआई को पूर्णता दे वह अर्धांगिनी होगी जो पति के धर्म में सहायक हो वह
    धर्मपत्नी होगी |पत्नी अर्धांग होकर कुंडलिनी साधना में जब पति को पूर्णता देती है
    तब वह अर्धांगिनी होती है अन्यथा तो सभी मनुष्य अपने आप में आतंरिक रूप से
    अर्धनारीश्वर हैं |
             कुल कुंडलिनी का तत्व ज्ञान जानने वाले
    के लिए बाहरी अनुष्ठानों का विशेष महत्व नहीं होता |उसके सारे अनुष्ठान अपने अंदर
    चलते हैं और उसकी अपनी पूर्णता इन आतंरिक गुप्त धर्म अनुष्ठानों को करने के लिए
    केवल अपनी पत्नी से ही प्राप्त होती है |इसके कारण ही धर्म पत्नी अर्धांगिनी कही
    जाती है |इन तथ्यों से व्यक्ति के लिए धर्मपत्नी और अर्धांगिनी की जीवन में कितनी
    आवश्यकता है यह स्पष्ट हो जाता है |इस आवश्यकता को देखते हुए उन तांत्रिक लोगों
    नें बहुत से उपाय किये जिनकी पत्नी नहीं थी |इसमें पहला उपाय उन्होंने यह किया की
    पत्नी का उद्धरण समाप्त कर उसके स्थान पर नारी शब्द जोड़ दिया |आप जानते हैं पत्नी
    की अपेक्षा नारी मिलना अधिक सुगम होता है क्योंकि पत्नी बनना अपने जीवन को दांव पर
    लगाना होता है |पत्नी से धर्म पत्नी फिर अर्धांगिनी और भी कठिन है |यही हाल पतियों
    का है |पत्नी शब्द के स्थान पर नारी शब्द लगा देने से तंत्र बदनामी की ओर उन्मुख
    हुआ |अतः जहाँ तहां तंत्र शास्त्रों में जब नारी शब्द किसी विशेष अनुष्ठान हेतु
    उपयोग में आया है वहां पत्नी शब्द लगा देने से सम्पूर्ण तंत्र गंगाजल की भाँती
    पवित्र और समाज मान्य हो जाता है |
                वास्तव में कुंडलिनी तंत्र साधना या
    कुल कुंडलिनी की अवधारणा गृहस्थ के लिए ही शुरू हुई थी |जो गृहस्थ धर्म में रहते
    हुए संतान उत्पन्न करते हुए ,समाज संवर्धन करते हुए भी साधना कर आध्यात्मिक उन्नति
    करना चाहते थे उनके लिए महेश्वर शिव ने उसी मार्ग से कुंडलिनी साधना की अवधारणा
    विकसित की जिस मार्ग पर चलना उन्हें आवश्यक था गृहस्थ धर्म निभाने के लिए |महेश्वर
    नें व्यक्ति की श्रृष्टि रचना की क्षमता अर्थात जनन क्षमता को ही इसका आधार बना
    ऐसी विधि विकसित की जो अन्य सभी माध्यमों से भी शीघ्र कुंडलिनी जागरण करा देती है
    |इसमें पत्नी बराबर की भागीदार होने से अर्धांगिनी कहलाई और धर्म तथा आध्यात्मिक
    उन्नति इस मार्ग से होने से वह धर्म पत्नी भी हुई |धर्म पत्नी उसे कहते हैं जो पति
    के अपनी परम्परानुसार धार्मिक आध्यात्मिक विकास में सहायक हो |अर्धांगिनी तो मात्र
    कुंडलिनी साधना के क्षेत्र में कही जा सकती है पत्नी किन्तु धर्म पत्नी वह बिना
    कुंडलिनी साधना के भी कही जा सकती है बशर्ते उसके पूजा पाठ धर्म कर्म का आधा
    हिस्सा उसे और आधा हिस्सा उसके पति को प्राप्त हो |आज के समय में मात्र कुछ
    प्रतिशत पत्नियों अथवा पति का ही आधा हिस्सा उनके पति या पत्नी को प्राप्त होता है
    और अधिकतर द्वारा प्राप्त पूजा पाठ की शक्ति या ऊर्जा कई लोगों में बंट जाती है
    |खुद को तो आधा मिलता है किन्तु पति या पत्नी को कम हिस्सा मिलता है |
              ऊर्जा सूत्रों और शारीरिक आध्यात्मिक
    ऊर्जा विज्ञान के अनुसार कोई भी पति या पत्नी का पूजा पाठ ,धर्म कर्म का आधा
    हिस्सा उसके पति या पत्नी को इसलिए मिलता है की उनके बीच शारीरिक सम्बन्ध होता है
    जहाँ दोनों के मूलाधार चक्र की कामनात्मक तरंगों और विशुद्ध चक्र की भावनात्मक
    तरंगों का आपस में सम्बन्ध बन जाता है जो आपसी ऊर्जा स्थानान्तरण करता है |अब कोई
    पति या पत्नी किसी अन्य पुरुष या महिला से शारीरिक सम्बन्ध रखता है तो उनमे भी इन
    चक्रों की तरंगों से एक अदृश्य सम्बन्ध बन जायेंगे |तो यह दोनों जब भी कोई पूजा
    पाठ धर्म कर्म करेंगे इनको प्राप्त होने वाली ऊर्जा उस व्यक्ति को भी प्राप्त होगी
    जिससे उनके सम्बन्ध शारीरिक रूप से बने हैं |सम्बन्ध की संख्या और मानसिक
    भावनात्मक लगाव जितना अधिक होगा ऊर्जा स्थानान्तरण उतना अधिक होगा |इसी सूत्र पर
    तो पति या पत्नी को ऊर्जा या धार्मिक शक्ति आधा स्थानांतरित होने की बात कही गयी
    है अन्यथा कर्मकांड से कोई पति पत्नी बनता तो जो कर्मकांड के बिना विवाह करते हैं
    वह कैसे पति पत्नी होते |यदि किसी स्त्री के पति के अतिरिक्त किसी अन्य से भी
    सम्बन्ध रहे हों या किसी पुरुष के पत्नी के अतिरिक्त किसी अन्य से भी सम्बन्ध रहे
    हों तो उसकी ऊर्जा पति या पत्नी को आधा नहीं मिल पायेगा और उतने हिस्से होकर
    मिलेगा जितने लोगों से उनके सम्बन्ध होंगे |ऐसी स्थिति में पत्नी ,धर्मपत्नी कभी
    नहीं बन सकती और पति धर्मपति कभी नहीं बन सकता |आज के समय में आपको ऐसा बहुत
    मिलेगा लेकिन भ्रम में जीते लोग सोचते हैं की उनकी पत्नी धर्म पत्नी है या उनका
    पति धर्मपति है |यह तो इस तरह कईयों के धर्मपति या धर्मपत्नी हो गए जबकि पहले ऐसा
    नहीं होता था और तभी पत्नी धर्म पत्नी और पति धर्म पति होता था
    |………………………………………हर हर महादेव 

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