Month: March 2020
  • शिवलिंग का अर्थ क्या है ?

    शिवलिंग का अर्थ
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     अन्य धर्म के लोग अथवा नास्तिक अथवा नासमझ लोग शिवलिंग की पूजा की आलोचना करते है.. छोटे छोटे बच्चो को बताते है कि हिन्दू लोग लिंग और योनी की पूजा करते है..इन नासमझों को संस्कृत का ज्ञान नहीं होता है..हिन्दुओ के प्रति नफ़रत पैदा करने अथवा हिन्दुओं में ही अविश्वास और संदेह उत्पन्न करने के लिए इस तरह की बातें उड़ाई जाती हैं |हमारे तथाकथित विद्वान् भी उनकी सोच का खंडन अधिकतर नहीं कर पाते क्योकि उनमे से सब को इसके सही अर्थ का खुद ज्ञान नहीं होता | इसका अर्थ इस प्रकार है..
    पहले भाषा का ज्ञान ले……
    लिंग>>> लिंग का संस्कृत भाषा में चिन्ह ,प्रतीक अर्थ होता है… जबकी जनर्नेद्रीय (मानव अंग ) को संस्कृत भाषा मे (शिशिन) कहा जाता है..
    शिवलिंग >>> शिवलिंग का अर्थ शिव का प्रतीक….
    ” शिवलिंग ” शब्द में ‘ लिंग ‘ शब्द दो शब्दों से बना है, ” लीन + गा (गति) ” अर्थात, शिव में लीन होकर ही मनुष्य को गति प्राप्त होता है;  यानी, शिव के निराकार स्वरूप में ध्यान-मग्न आत्मा सद्गति को प्राप्त होती है, उसे परब्रह्म की प्राप्ति होती है।
    तात्पर्य यह है कि हमारी आत्मा का मिलन परमात्मा के साथ कराने का माध्यम-स्वरूप है, शिवलिंग! 
    शिवलिंग साकार एवं निराकार ईश्वर का ‘प्रतीक’ मात्र है, जो परमात्मा – आत्म-लिंग का द्योतक है। 
    शिवलिंग शाश्वत-आत्मा का स्वरूप है, जो न जल से प्रभावित होता है, न अग्नि से, न पृथ्वी से, न किसी अस्त्र-शस्त्र से… जो अजित है, अजेय है! शिव और शक्ति का पूर्ण स्वरूप है, शिवलिंग।
    >>पुरुषलिंग का अर्थ पुरुष का प्रतीक  इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ स्त्री का प्रतीक और  नपुंसकलिंग का अर्थ है ..नपुंसक का प्रतीक —-
    अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य के जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है..तो वे बताये ”स्त्री लिंग ”’के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना चाहिए… और खुद अपनी औरतो के लिंग को बताये फिर आलोचना करे—-
    ”शिवलिंग”’क्या है >>>>>
    शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। 
    स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है। शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है नाही शुरुवात | जो शाश्वत है |
    ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और प्रदार्थ |  हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है|
    इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है | ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है. वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है. (The universe is a sign of Shiva Lingam.) शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान है
    अब बात करते है योनि शब्द पर —- मनुष्ययोनि ”पशुयोनी”पेड़-पौधों की योनि”’पत्थरयोनि”’ >>>> योनि का संस्कृत में प्रादुर्भाव ,प्रकटीकरण अर्थ होता है.. जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है.. कुछ धर्म में पुर्जन्म की मान्यता नहीं है ..इसीलिए योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते है जबकी हिंदू धर्म मे ८४ लाख योनी यानी ८४ लाख प्रकार के जन्म है अब तो वैज्ञानिको ने भी मान लिया है कि धरती मे ८४ लाख प्रकार के जीव (पेड, कीट,जानवर,मनुष्य आदि) है…. मनुष्य योनी >>>>पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि होता है..अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है।
    शिव लिंग ऊर्जा ब्रह्मांडीय ऊर्जा प्राप्ति का माध्यम
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    भारत का रेडियोएक्टिविटी मैप उठा लो तो हैरान हो जाओगे। क्योंकि भारत सरकार के नुक्लिएर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगो के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है |यहाँ रेडियेशन नहीं होता किन्तु रेडियेशन चित्र में रेडियेशन दिखता है अर्थात यहाँ ऊर्जा उत्पन्न होती है | शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि एक प्रकार के न्यूक्लिअर रिएक्टर्स ही हैं एक उर्जा स्रोत है ,जिनका सम्बन्ध ब्रह्मांडीय ऊर्जा धाराओं से होता है ,iइन ज्योतिर्लिंगों से ऊर्जा निकलती है जो अभिषेक करने वालों और आसपास आने वालों को प्रभावित करती है ,ज्योर्लिंगों पर अनवरत जल धारा डाली जाती है ,उनपर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे।
    महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे कि बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं | क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है तभी जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता |
    भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिव लिंग की तरह है |शिव लिंग से सम्बन्धित हम जिस रेडियो एक्टिविटी या रिएक्टिव जल की बात कर रहे वह वास्तव में युरेनियम ,थोरियम ,प्लुटोनियम रेडियेशन या एटामिक रिएक्टर्स जैसा रेडियेशन नहीं अपितु प्रबल उर्जा का प्रवाह है जो बिलकुल भिन्न होता है और चढ़ाया जल भी ऊर्जा संतृप्त होता है |शिवलिंग जिस वस्तु का बना होगा ऊर्जा की प्रकृति भिन्न होगी तभी कहा जाता है की कुछ विशेष प्रकार के शिवलिंग पर चढ़ाया प्रसाद ही खाया जा सकता है सभी शिवलिंग पर चढ़ा प्रसाद और जल नहीं ग्रहण किया जा सकता |यहाँ तक की शिवलिंग पर चढ़ी वस्तुएं भी तीव्र प्रभावकारी हो जाती है जैसे फल फूल पत्र आदि |इनसे अच्छे और बुरे दोनों ही प्रकार के प्रयोग तांत्रिक कर डालते हैं |
                        शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिल कर औषधि का रूप ले लेता है | तभी हमारे बुजुर्ग हम लोगों से कहते कि महादेव शिव शंकर अगर नराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी |
    ज़रा गौर करो, हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है  | आज इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारी परम्पराओं को समझने के लिए ,जिस विज्ञान की आवश्यकता है वो हमें पढ़ाया नहीं जाता और विज्ञान के नाम पर जो हमें पढ़ाया जा रहा है उस से हम अपनी परम्पराओं को समझ नहीं सकते | जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है वो सनातन है,, विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें |हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों द्वारा हजारों लाखों वर्ष पूर्व जिस वैज्ञानिक संस्कृति ,पंरम्परा को नियम बनाकर मानवजीवन का एक अभिन्न अंग बना दिया है |उसे देख कर ही आज के वैज्ञानिक दाँतो तले अंगुली दबा लेते है।.सोचिये शिव की पूजा तो आप करते हैं किन्तु शिवलिंग पूरे विश्व में पाए जाते हैं ,क्यों ,दुसरे धर्मों ,सम्प्रदायों में यह कहाँ से आया ,किसी न किसी रूप में अन्य स्थानों पर क्यों इनकी प्रतिष्ठा है |इससे आपको समझ आ जाएगा की शिवलिंग इतना महान क्यों हैं |…………………………………………………………..हर-हर महादेव 

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  • शिवलिंग को आप कितना जानते हैं ?

    ::::::::::: क्या है शिवलिंग::::::::::::
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     समस्त संसार में शिवलिंग पाए जाते हैं ,विभिन्न धर्मों तक में इनकी किसी न किसी रूप में प्रतीकाकृति मिलती हैं |हिन्दू धर्म में यह परम पवित्र शिव के प्रतीक माने जाते हैं और इनकी पूजा की जाती है |यह शिवलिंग है क्या ,कभी इस पर सामान्यतया विचार सामान्य लोग नहीं करते जा इसके बारे में बहुत नहीं जानते |इसलिए जो जैसी परिभाषा इसकी गढ़ कर सुना देता है सामान्य रूप से मान लिया जाता है और कल्पना कर ली जाती है |कुछ महाबुद्धिमान प्राणियों ने परम पवित्र शिवलिंग को जननांग समझ कर पता नही क्या-क्या और कपोल कल्पित अवधारणाएं फैला रखी हैं परन्तु…वास्तव में. शिवलिंग. वातावरण सहित घूमती धरती तथा  सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का प्रतिनिधित्व करता है |इसका अक्ष /धुरी (axis) ही लिंग है।
    दरअसल.इसमें ये गलतफहमी.. भाषा के रूपांतरण और, मलेच्छों द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने  तथा, अंग्रेजों द्वारा इसकी व्याख्या से उत्पन्न हुआ  हो सकता है. |जैसा कि…. हम सभी जानते है कि. एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में. अलग-अलग अर्थ निकलते हैं….! उदाहरण के लिए.- यदि हम हिंदी के एक शब्द “”सूत्र”’ को ही ले लें तो सूत्र मतलब. डोरी/धागा, .गणितीय सूत्र ,.कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है जैसे कि. नारदीय सूत्र ,.ब्रह्म सूत्र इत्यादि | उसी प्रकार “”अर्थ”” शब्द का भावार्थ: सम्पति भी हो सकता है और मतलब (मीनिंग) भी |
    ठीक बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय  चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।
    ध्यान देने योग्य बात है कि””लिंग”” एक संस्कृत का शब्द है जिसके निम्न अर्थ है :
    @ त आकाशे न विधन्ते -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० ५
    अर्थात….. रूप, रस, गंध और स्पर्श ……..ये लक्षण आकाश में नही है ….. किन्तु शब्द ही आकाश का गुण है ।
    @ निष्क्रमणम् प्रवेशनमित्याकशस्य लिंगम् -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० २ ०
    अर्थात….. जिसमे प्रवेश करना व् निकलना होता है ….वह आकाश का लिंग है ……. अर्थात ये आकाश के गुण है ।
    @ अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं क्षिप्रमिति काललिङ्गानि । -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० ६
    अर्थात….. जिसमे अपर, पर, (युगपत) एक वर, (चिरम) विलम्ब, क्षिप्रम शीघ्र इत्यादि प्रयोग होते है, इसे काल कहते है, और ये …. काल के लिंग है ।
    @ इत इदमिति यतस्यद्दिश्यं लिंगम । -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० १ ०
    अर्थात……. जिसमे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर व् नीचे का व्यवहार होता है ….उसी को दिशा कहते है……. मतलब कि….ये सभी दिशा के लिंग है ।
    @ इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिंगमिति -न्याय० अ ० १ । आ ० १ । सू ० १ ०
    अर्थात….. जिसमे (इच्छा) राग, (द्वेष) वैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, सुख, दुःख, (ज्ञान) जानना आदि गुण हो, वो जीवात्मा है…… और, ये सभी जीवात्मा के लिंग अर्थात कर्म व् गुण है ।
    इसीलिए……… शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने के कारन………. इसे लिंग कहा गया है…।
    स्कन्दपुराण में स्पष्ट कहा है कि……. आकाश स्वयं लिंग है…… एवं , धरती उसका पीठ या आधार है …..और , ब्रह्माण्ड का हर चीज ……. अनन्त शून्य से पैदा होकर….. अंततः…. उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है .|यही  कारण है कि इसे कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे कि प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam)  इत्यादि |
    यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि. इस ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और प्रदार्थ | इसमें से हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है जबकि आत्मा एक ऊर्जा है |ठीक इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं | क्योंकि ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है |इसीलिए शास्त्रों में शक्ति की विवेचना में कहा जाता है की जब शक्ति [काली] शिव से निकल जाती है तो शिव भी शव हो जाते हैं ,अर्थात शिव तभी ताल शिव हैं जब तक उनके साथ शक्ति हैं |वैसे ही  पदार्थ में तभी तक जीवन है जबतक उसमे आत्मा है |
    अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की दृष्टि से बोलने की जगह … शुद्ध वैज्ञानिक भाषा में बोला जाए तो. हम कह सकते हैं कि शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि हमारे ब्रह्मांड की आकृति है.,उसकी ऊर्जा संरचना की प्रतिकृति है ,और अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की भाषा में बोला जाए तो शिवलिंग ,भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-अनादि एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक है. | अर्थात शिवलिंग हमें बताता है कि…… इस संसार में न केवल पुरुष का  और न ही केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है बल्कि, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही समान हैं |एक दुसरे की परिकल्पना अथवा पूर्णता एक दुसरे के बिना संभव नहीं है |
    हमें ज्ञात है की ब्रहमांड की प्रत्येक संरचना पदार्थ है जो परमाणुओं से मिलकर बनता है |परमाणु सर्वत्र विद्यमान हैं |जल-आकाश-वायु सर्वत्र |परमाणु की संरचना में नाभिक में प्रोटान और न्यूट्रान होते हैं और इस नाभिक के चारो और इलेक्ट्रान चक्कर लगता रहता है |न्यूट्रान तो उदासीन होता है किन्तु फिर भी नाभिक धनात्मक होता है क्योकि प्रोटान धनात्मक आवेश वाला कण होता है जो पूरे नाभिक को धनात्मक बनाए रखता है ,इस धनात्मक के आकर्षण में बंधकर ऋणात्मक आवेश का कण इलेक्ट्रान उसके चारो और चक्कर लगता रहता है और परमाणु का निर्माण होता है |इलेक्ट्रान का चक्कर लगभग गोलाकार होता है जिसकी तुलना हम शिवलिंग के योनी या अर्ध्य से कर सकते हैं |धनात्मक नाभिक की तुलना लिंग से कर सकते हैं जो स्थिर रहता है |इसमें स्थित न्यूट्रान परम तत्त्व का प्रतीक है जो उदासीन रहता है |इस विज्ञान को हमारा वैदिक ज्ञान जानता था और उसने शिवलिंग की परिकल्पना की |समस्त ब्रह्माण्ड परमाणुओं से बना है ,परमाणु हर कण कण में विद्यमान है |अर्थात ईश्वरीय ऊर्जा हर कण कण में है ,तभी तो हम कहते हैं कण कण में भगवान |इस परमाणु से ही शरीर की कोशिकाएं बनती हैं और शरीर बनता है ,,इससे ही वनस्पतियों की कोशिकाएं और शारीर बनता है |यहा तक की धातु-पत्थर-मिटटी भी इसी से बनते हैं |अर्थात शिवलिंग इस परमाणु का प्रतिनिधित्व करता है |धनात्मक-ऋणात्मक ऊर्जा के साथ निर्विकार शिव का प्रतिनिधित्व करता है |
    अगर पुरुष-स्त्री के परिप्रेक्ष्य में देखें तभी यह शिवलिंग स्थूल रूप से लिंग -योनी का प्रतिनिधित्व करता दीखता है ,परन्तु यह वास्तव में ब्रह्मांडीय ऊर्जा धारा-संरचना का प्रतिनिधित्व करता है | लिंग -योनी में परिभाषित करने का शायद कारण इसके पुरुष और स्त्री अथवा पुरुष और प्रकृति का धनात्मक और ऋणात्मक ऊर्जा रूप है |इस ऊर्जा धरा या संरचना की अनेक परिभाषाएं और विवरण हैं ,पर यह मूल रूप से उर्जा को ,शक्ति को, उसकी क्रियाविधि को व्यक्त करता है |…………………………………………………………….हर-हर महादेव 

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  • वुडू प्रयोग ,पुतली विद्या और काला जादू [Vudoo spell ,Putli Vidya and Black Magic]

    वुडू प्रयोग ,पुतली विद्या और काला जादू [Vudoo spell ,Putli Vidya and Black Magic]

    वुडू प्रयोग ,पुतली विद्या और काला जादू
    [Vudoo spell ,Putli Vidya and Black Magic]
    ========================== [[ भाग -१ ]]
              वूडू एक ऐसी विद्या है जो एक धर्म का रूप ले चुकी है |यह जादूगरों के धर्म के रूप में जानी जाती है और मूल रूप से इसका नाम अफ्रीका के आदिवासियों से सम्बन्ध रखता है |वुडू नाम ही अफ्रीका से सम्बंधित होता है ,जबकि इस तरह के जादू से समबन्धित प्रायोगिक धर्म दुनिया के हर हिस्से में भिन्न रूप से आदिम जनजातियों में पाए जाते हैं |हर देश और क्षेत्र में इसका नाम और प्रायोगिक तरीका थोड़े बहुत फेरबदल के साथ अलग हो सकता है लेकिन मूलतः यह जादू -टोने ,झाड़ -फूंक ,स्थानीय देवता और स्थानीय परंपरा से सम्बंधित होता है |  
              इसे पूरे अफ्रीका का धर्म माना जा सकता है, लेकिन केरीबी द्वीप समूह में आज भी यह जादू की धार्मिक परंपरा जिंदा है और यहाँ इसे वास्तविक माना जाता है । इसे यहां वूडू कहा जाता है।इसी के नाम पर पुतली विद्या को लोग वुडू के नाम से जानने लगे | हाल-फिलहाल बनीन देश का उइदा गांव वूडू बहुल क्षेत्र है। यहां सबसे बड़ा वूडू मंदिर है, जहां विचित्र देवताओं के साथ रखी है जादू-टोने की वस्तुएं। धन-धान्य, व्यापार और प्रेम में सफलता की कामना लिए अफ्रीका के कोने-कोने से यहां लोग आते हैं। कई गांवों में वूडू को देवता माना जाता है. देवता से मनोकामना पूरी करने की मांग की जाती है. एक वूडू देवता का नाम जपाटा है यानि पृथ्वी का देवता.देवताओं की पूजा के दौरान एल्कोहल, बीयर और सिगरेट भी चढ़ाई जाती है. कुछ जगहों पर मुर्गी या बकरे की बलि भी दी जाती है. लोग मानते हैं कि हर देवता का खुश होने का अपना स्टाइल है.जो लोग भविष्य जानना चाहते हैं, वे फा कहे जाने वाले ओझाओं से मिलते है. कोई भी सवाल नहीं किया जा सकता. अपनी मृत्यु के बारे में सवाल करना वर्जित है..
     वूडू प्रकृति के पंचतत्वों पर विश्वास करते हैं। जैसा की भारत के आदिवासियों में समूह में गाने और नाचने की परंपरा है वैसा ही वूडू नर्तक परंपरागत ढोल-डमरूओं की ताल पर नाच कर देवताओं का आह्वान करते हैं। ये प्रार्थनागत नाच गाना कई घंटों तक चलता है। इस तरह की परंपरा को अंग्रेजी में टेबू कह सकते हैं। यह आज भी दुनिया भर में जिंदा है। नाम कुछ भी हो पर इसे आप आदिम धर्म कह सकते हैं। इसे लगभग 6000 वर्ष से भी ज्यादा पुराना धर्म माना जाता है। ईसाई और इस्लाम धर्म के प्रचार-प्रसार के बाद इसके मानने वालों की संख्या घटती गई और आज यह पश्चिम अफ्रीका के कुछ इलाकों में ही सिमट कर रह गया है। हालांकि वूडू को आप बंजारों, आदिवासियों, जंगल में रहने वालों का काल्पनिक या पिछड़ों का धर्म मानते हैं, लेकिन गहराई से अध्ययन करने पर पता चलता है कि वूडू की परंपरा आज के आधुनिक धर्म में भी न्यू लुक के साथ मौजूद है। भारत में तांत्रिकों और शाक्तों का धर्म कुछ-कुछ ऐसा ही माना जा सकता है। क्या चर्च में भूत भगाने के उपक्रम नहीं किए जाते? मंदिर में भूत -प्रेत का निवारण नहीं होता ,तांत्रिकों में आदिम मन्त्रों का प्रयोग और आदिम पद्धतियों का प्रयोग नहीं होता |यह सब प्राचीन इन्ही परम्पराओं से स्थान विशेष के साथ थोडा थोडा बदलते हुए सूदूर क्षेत्र तक जाकर अलग रूप ले लेता है |      
                  वुडू की मुख्य विशेषता इसमें इस्तेमाल होने वाले जानवरों के शरीर के हिस्से व पुतले हैं | इसमें जानवरों के अंगों से समस्या समाधान का दावा किया जाता है। इस जादू से पूर्वजों की आत्मा किसी शरीर में बुलाकर भी अपना काम करवा सकते हैं। इसके अलावा दूर बैठे इंसान के रोग व परेशानी के इलाज के लिए पुतले का भी उपयोग किया जाता है। वूडू जानने वालों का मानना है कि इस धरती पर मौजूद हर जीव शक्ति से परिपूर्ण है। इसलिए उनकी ऊर्जा का उपयोग करके बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। काला जादू के विशेषज्ञों के अनुसार यह वो ऊर्जा (शक्ति) है जिसका इस्तेमान नहीं होता।भारतीय वैदिक परंपरा और तंत्र शास्त्र दोनों में पुतली निर्माण की अवधारणा रही है और इसका भिन्न रूपों में उपयोग भी वैदिक काल से ही रहा है जबकि वैदिक काल लाखों वर्ष पूर्व का माना जाता है ,यद्यपि प्रक्रिया और पदार्थ भिन्न हो जाते हैं |एशिया की आदिम जनजातियों में यही प्रक्रिया अलग रूप में पाने जाती है और अलग धर्म में अलग रूप में |इसे यहाँ वुडू की तरह धर्म का रूप तो नहीं प्राप्त किन्तु इसका प्रयोग हमेशा से होता आया है |जैसे किसी खोये व्यक्ति के न मिलने पर उसे मृतक मान उसका पुतला बनाकर आह्वान कर उसका शव दाह करना |पूजन में विभिन्न खाद्य वस्तुओं से विभिन्न जंतु अथवा शरीर की आकृति का निर्माण कर विविध उपयोग करना |मिटटी के पुतले आदि का निर्माण कर उसपर विभिन्न क्रियाएं करना ,धातु के पुतलों का उपयोग आदि |यह वैदिक और पुरातन काल से हो रहा अर्थात वुडू से भी प्राचीन विद्या यह हमारे संस्कृति में हैं |
                वुडू को लोग काला जादू मानते हैं ,पुतली विद्या को लोग काला जादू मानते हैं जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है |दोनों में ही मूल अवधारणा लोगों की भलाई ही थी किन्तु जिस प्रकार तंत्र का उपयोग स्वार्थ हेतु करने से वह दुरुपयोग हो गया वैसा ही वुडू के साथ हुआ और हर प्रकार की ऐसी क्रियाओं के साथ हुआ |कारण यह की यह विद्या ऊर्जा उपयोग और ऊर्जा प्रक्षेपण की है जिसको इच्छानुसार प्रयोग किया जाता है |जब यह इच्छा स्वार्थ हो तो दुरुपयोग हो जाती है और जब यह इच्छा लोगो की भलाई की हो तो सदुपयोग हो जाती है |वास्तव में वुडू ,पुतली निर्माण अथवा ऐसी समस्त विद्याएँ तंत्र विज्ञान के अंतर्गत आती हैं जिनका अपना निश्चित विज्ञान होता है जो आज के विज्ञान से भी बहुत आगे हैं |यह एक बहुत ही दुर्लभ प्रक्रिया है जिसे बहुत ही विशेष परिस्थितियों में अंजाम दिया जाता है। इसे करने के लिए उच्च स्तर की विशेषज्ञता की जरूरत होती है।कुछ ही लोग इसे करने में सक्षम होते हैं। इस प्रक्रिया में गुड़िया जैसी मूर्ति का इस्तेमाल होगा है। यह गुड़िया कई तरह की खाने की चीजों जैसे बेसन, उड़द के आटे ,कपडे ,धातु ,लकड़ी ,बाल ,वनस्पति ,पौधे अथवा उनके अवयव आदि से बनाया जाता है ,जैसी क्षेत्र विशेष अथवा समुदाय विशेष की परंपरा हो अथवा जैसी जरुरत हो । इसमें विशेष मंत्रों से जान डाली जाती है। उसके बाद जिस व्यक्ति पर जादू करना होता है उसका नाम लेकर पुतले को जागृत किया जाता है। इस प्रक्रया को सीखने के लिए व्यक्ति को विशेष प्रार्थना और पूजा पाठ करनी पड़ती है। कड़ी तपस्या के बाद ही यह सिद्धि प्राप्त होती है |
                  काला जादू हो या सफ़ेद जादू अथवा कोई भी व्यक्ति विशेष पर आधारित तांत्रिक क्रिया यह और कुछ नहीं बस एक संगृहित ऊर्जा है। जो एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जाता है या कहें एक इंसान के द्वारा दूसरे इंसान पर भेजा जाता है। विज्ञान की भाषा में ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है, न खत्म किया जा सकता है, उसे सिर्फ एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है। यदि ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल है, तो नकारात्मक इस्तेमाल भी है। ऊर्जा सिर्फ ऊर्जा होती है, वह न तो पॉजीटिव होती है, न नेगेटिव। आप उससे कुछ भी कर सकते हैं।वुडू अथवा पुतली विद्या व्यक्ति विशेष अथवा किसी एक मूल व्यक्ति पर ही मूल रूप से आधारित विद्या है जबकि भारतीय मूल तंत्र आदि बहु आयामी प्रयोग पर आधारित हैं |वुडू आदि जैसी विद्याओं में स्थानीय मन्त्रों ,स्थानीय वस्तुओं का उपयोग होता है जैसे हमारे यहाँ मूलतः व्यक्ति आधारित ग्रामीण क्रियाओं में शाबर मन्त्रों का उपयोग होता है |ऐसा ही हर जाती ,जनजाति ,धर्म ,क्षेत्र में होता है और इसमें मुख्य शक्ति भी स्थानीय देवता ही होता है |  पुतले से किसी इंसान को तकलीफ पहुंचाना इस जादू का उद्देश्य नहीं है। इसे भगवान शिव ने अपने भक्तों को दिया था भारिय परंपरा और तंत्र में ,जबकि अन्य जगह इसे वहां का स्थानीय देवता अपने लोगों की भलाई के लिए दिया अथवा बताया होता है । पुराने समय में इस तरह का पुतला बनाकर उस पर प्रयोग सिर्फ कहीं दूर बैठे रोगी के उपचार व परेशानियां दूर करने के लिए किया जाता था। कुछ समय तक ऐसा करने पर तकलीफ खत्म हो जाती थी। मगर समय के साथ-साथ इसका दुरुपयोग होने लगा।वुडू में भी यही परम्परा रही और हर प्रकार के पुतला निर्माण में भी |वैदिक पुतला निर्माण बिलकुल अलग प्रक्रिया थी जिसमे इसे मुक्ति और मोक्ष तक जोड़ा गया है |    
                  कुछ स्वार्थी लोगों ने इस प्राचीन विधा को समाज के सामने गलत रूप में स्थापित किया। तभी से इसे काला जादू नाम दिया जाने लगा। दरअसल, उन्होंने अपनी ऊर्जा का उपयोग समाज को नुकसान पहुंचाने के लिए किया। गौरतलब है जिस तरह जादू की सहायता से सकारात्मक या धनात्मक ऊर्जा पहुंचाकर किसी के रोग व परेशानी को दूर किया जा सकता है। ठीक उसी तरह सुई के माध्यम से किसी तक अपनी नकारात्मक ऊर्जा पहुंचाकर। उसे तकलीफ भी दी जा सकती है। जब यह किसी को कष्ट देती है अथवा हानि पन्हुचाती है तब यह काला जादू कहलाती है ,और जब लाभ पहुचाती है तो सफ़ेद जादू ,यद्यपि यह दोनों ही नाम बस भ्रम हैं ,जादू कोई भी न काला होता है न सफ़ेद |यह तो बस ऊर्जा का उपयोग और उसका एक स्थान से दुसरे स्थान तक स्थानान्तरण और स्वरुप परिवर्तन मात्र है |सदुपयोग -दुरुपयोग दोनों उसी प्रक्रिया से हो सकता है जो करता की इच्छा पर निर्भर करता है |……….[क्रमशः ][[अगला अंक -पुतली विद्या अथवा वुडू कैसे कार्य करता है ]]………………………………………………………हर -हर महादेव

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  • पूजा से नुकसान तो नहीं ?

    क्या अपनी बर्बादी खुद लिख रहे ?
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    कभी सोचा है ?
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                           आप जिस देवता को पूजते हैं आपका अंतिम पड़ाव उस देवता तक ही अधिकतम हो सकता है ,अर्थात आप अधिक से अधिक उसके लोक तक ही जा सकते हैं ,अगर वह प्रसन्न हो गया अथवा सिद्ध हो गया तो |आप अगर भूत -प्रेत ,पिशाचिनी ,यक्षिणी ,अप्सरा ,पीर ,मजार ,शहीद ,बीर ,सती ,ब्रह्म ,साईं पूजते हैं तो आपका अंतिम पड़ाव यही होंगे आपको देवी-देवताओं का लोक नहीं मिलने वाला इन्हें पूजने से |इतना तो सभी जानते हैं की किस देवता को पूजने से क्या मिलता है ,उसी तरह जिसे आप पूजते हो वह आपको मिलता है और आपको उसका लोक मिलता है |अगर कोई मनुष्य मरा है और ब्रह्म ,पीर ,बीर ,सती ,शहीद ,साईं ,प्रेत ,भूत बना है तो उसकी तो क्षमता ही उसके लोक तक है ,जब वह खुद आत्मा रूप में घूम रहा तो आपको क्या देवताओं तक ले जाएगा |
                            इसी तरह पिशाचिनी ,यक्षिणी ,अप्सरा भी अपने लोक और क्षमता से ऊपर तो आपको नहीं ही पहुचा सकते |क्या आप गारंटी से कह सकते हैं की अमुक शहीद ,ब्रह्म ,बीर ,साईं का मोक्ष हो गया या वह देव लोक तक चले गए |जब खुद नहीं गए तो आपको क्या ले जायेंगे |अगर चले गए तो उनके पूजने पर यहाँ आपका काम कैसे होता है |यहाँ आपका काम होता है इसका मतलब वह इसी भौतिक दुनिया में भटक रहे और आपके पूजा को लेकर अपनी शक्ति बढ़ा रहे और अपना शक्ति बरकरार रख रहे |
                     इनमे एक दोष और होता है यह पूजे जाने पर आपके कुलदेवता की पूजा ले लेते हैं और कुलदेवता साथ छोड़ देते हैं ,आज तो नहीं समझ आएगा पर अगली पीढियां परिणाम गंभीर भुगतेंगी जब कुलदेवता का सुरक्षा चक्र समाप्त हो जाएगा |दूसरी समस्या की कुलदेवता को पूजा न मिलने से ईष्ट तक आपकी पूजा नहीं पहुचेगी |आप तीन घंटे पूजा करो पर लाभ कुछ भी नहीं होगा |ईष्ट तक पूजा पहुच ही नहीं रही |थक कर आप कहोगे की पूजा पाठ ,तंत्र मन्त्र सब बेकार है |
                          तीसरी समस्या यह होगी आपके इन शक्तियों को पूजने से की जब तक आप इन्हें पूजोगे ये आपको सुखी रखेंगी क्योकि इनका स्वार्थ है आपकी पूजा से इन्हें शक्ति मिलेगी |आने वाली पीढ़ियों में जब कोई भूलेगा या पूजा नहीं देगा या आप ही कभी पूजा बंद कर दिए तो यह उनका या आपका विनाश कर देंगी |कुलदेवता और ईष्ट पहले ही गायब हैं आपका या पीढ़ियों का भला कोई नहीं कर पायेगा |इन सब कारणों को आपने सोचा नहीं पूजने लगे आत्मा की प्रतीक शक्तियों को ,जब परिणाम बंद हुआ तो पूजा पाठ सब बेकार बना दिया |पहले नहीं सोचा तो भैया अब सोचो ,अभी आपके पास समय हो सकता है |वर्ना अपना तो बेडा गर्क करोगे ही आने वाली पीढियां भी गाली देंगी की कहाँ फंसा कर चले गए उन्हें आप |दुसरे की देखा -देखि साईं -पीर के भ्रम से बाहर निकलो नहीं तो पछताने पर भी रास्ता नहीं मिलेगा |….[पोस्ट का उद्देश्य किसी की भावना  को  ठेस  पहुचना नहीं है ,अपितु पूजा -पाठ  के आतंरिक रहस्य को समझने का प्रयत्न मात्र है ,जो हम अपने पेज और ब्लॉग के पाठकों से साझा कर रहे ,वैचारिक स्वतंत्रता के अधिकार के आलोक में ]………………………………………………………….हर-हर महादेव 

    READ MORE: पूजा से नुकसान तो नहीं ?