Month: April 2020
  • १५ मिनट की साधना से ईश्वर मिल सकता है

    १५ मिनट पर्याप्त हैं ईश्वरीय ऊर्जा प्राप्ति हेतु 
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                                                     ईश्वरीय ऊर्जा की प्राप्ति प्रतिदिन के १५ मिनट के प्रयास में हो सकती है |यदि हम ऐसा कहते हैं तो लोगों को आश्चर्य हो सकता है ,हो सकता है कुछ लोग आलोचनात्मक भी हो जाएँ ,क्योकि बहुतेरे वर्षों साधना करते रहते हैं ,घंटों करते रहते हैं किन्तु परिणाम समझ में नहीं आता ,फिर भी स्वयं को सिद्ध समझे हुए होते हैं |ऐसे में वह लोग आलोचना भी कर सकते है ,अथवा कुछ महाज्ञानी जो लम्बे-चौड़े कर्मकांड को ही सिद्धि और साधना के सूत्र मानते हैं वह भी आलोचना कर सकते हैं |किन्तु हम फिर भी कहना चाहेंगे की ईश्वरीय ऊर्जा केवाल १५ मिनट प्रतिदिन के प्रयास से पायी जा सकती है |हम कोई सिद्ध नहीं हैं ,कोई सन्यासी नहीं हैं ,अज्ञानी और बेहद सामान्य श्रद्धालु  हैं किन्तु फिर भी अनुभव किया है, अपने नजदीकियों को अनुभव कराया है कि यदि हम चाहें तो ईश्वरीय ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं केवल थोड़े से गंभीर प्रयास से |सामान्य ईश्वरीय ऊर्जा, जिससे हमारा भौतिक जीवन सुखमय हो सके ,नकारात्मक ऊर्जा हट सके ,सफलता बढ़ सके आदि के लिए बहुत गंभीर साधना करनी पड़े ,तंत्र की गंभीर क्रियाएं करनी पड़े आवश्यक नहीं है | सामान्य ईश्वरीय ऊर्जा कोई भी, कभी भी, कहीं भी प्राप्त कर सकता है ,केवल कुछ सूत्रों ,कुछ नियमों ,कुछ निर्देशों को गंभीरता से पालन करने की जरुरत है |
                                  हम अपने इस पोस्ट में एक ऐसी महत्वपूर्ण, अति तीब्र प्रभावकारी किन्तु बेहद सरल साधना को प्रस्तुत कर रहे हैं ,जिससे किसी को भी ईश्वरीय ऊर्जा की अलौकिकता का आभास हो सकता है |किसी का भी जीवन बदल सकता है |कोई भी ईश्वरीय ऊर्जा प्राप्त कर सकता है ,केवल १५ मिनट के प्रयास से |हमने बहुतों को यह बताया है ,कुछ सफल हुए ,कुछ घबराकर हट गए ,कुछ नियमित न रह पाने से अथवा अत्यंत सरल पद्धति होने से मजाक समझ अविश्वास में छोड़ बैठे |कुछ इसे करके अत्यंत सफल हो गए और खुद को सिद्ध ही मानने लगे |यह है तो बहुत ही छोटा और सरल प्रयोग पर इसकी शक्ति अद्वितीय है |इससे ईश्वरीय ऊर्जा तो निश्चित रूप से प्राप्त होती ही है ,अगर एकाग्रता और लगन बना रहा तो ईश्वर साक्षात्कार अथवा प्रत्यक्षीकरण भी हो जाता है |भूत-भविष्य-वर्तमान के ज्ञान की शक्ति प्राप्त हो सकती है |किसी भी शक्ति की प्राप्ति हो सकती है ,केवल मार्गदर्शन और तकनिकी ज्ञान मिलता रहे |इस प्रयोग में किसी कर्मकांड की ,लम्बे चौड़े पद्धति की ,विशिष्ट पूजा-पद्धति की भी आवश्यकता नहीं है |कोई भी कर सकता है |
    साधना विधि ::–
                     इस साधना को आप किसी भी गणेश चतुर्थी अथवा शुक्लपक्ष के बुधवार से प्रारम्भ कर  ======= सकते हैं | आप नित्यकर्म और स्नान आदि से स्वच्छ हो ,ऊनि लाल अथवा रंगीन आसन पर स्थान ग्रहण करें |भगवान गणेश का एक सुन्दर सा चित्र लें जिसमे उनकी सूंड उनके दाहिने हाथ की और मुड़ी हो [चित्र पहले से लाकर रखे रहें ] |इस चित्र को अपने पूजा स्थान पर स्थापित करें | फिर उनकी स्थापना करें |आप हाथ जोड़कर अपने ध्यान में गणेश जी को लायें और फिर आँखें खोलकर कल्पना द्वारा उस काल्पनिक गणेश जी को धीरे-धीरे लाकर चित्र में स्थापित कर दें और कल्पना करें की गणेश जी ने आकर उस चित्र में अपने को समाहित कर लिया है |अब उनकी विधिवत पूजा कर दें |पूजा आपको रोज सुबह करनी है किन्तु चित्र स्थापना और गणपति की मानसिक प्रतिष्ठा चित्र में एक बार ही करनी है |पूजा में सिन्दूर, लाल फूल और लौंग यथासंभव प्रतिदिन चढ़ाएं |पूजा करने के बाद आप उठ सकते हैं |इस समय इस स्थान पर अगर श्वेतार्क गणपति की भी स्थापना की जाए तो सफलता और बढ़ जायेगी |
                                        अब आपको दिन में किसी भी समय का एक निश्चित समय निश्चित करना है जप आप रोज नियमित उन्हें १५ मिनट का समय दे सकें |यह समय बिलकुल एकांत का होना चाहिए ,कोई आवाज अथवा विघ्न नहीं होनी चाहिए |इसके लिए स्थान आपका शयन कक्ष भी हो सकता है अथवा पूजा स्थान अथवा कोई भी एकांत स्थान |यदि ब्रह्म मुहूर्त में इसे कर सकें तो अति उत्तम है ,अन्यथा आप इसे रात्रीं में सोने के पूर्व भी कर सकते हैं |जब आप समय निश्चित कर लें की अमुक समय आप रोज साधना कर सकते हैं तो फिर उस समय और स्थान में परिवर्तन न हो |इसीलिए आपको जहाँ और जब सुविधा हो एक बार में ही चुनाव कर लें |यदि सुबह कर रहे है पूजा के समय ही तो फिर स्नान की दोबारा आवश्यकता नहीं है अन्यथा रात्री आदि में साधना करने के पूर्व स्नान आदि करके स्वच्छ हो एक ऊनि लाल अथवा रंगीन ऊनि कम्बल अपनी सुविधानुसार स्थान पर बिछाएं |सामने दो फुट की दूरी पर एक स्टूल अथवा आँखों के बराबर ऊँची कोई ऐसी वस्तु रखे जिसपर दीपक रखा जा सके |अब एक घी का दीपक और अगर बत्ती जलाएं |इन्हें गणेश जी को दिखा -समर्पित कर प्रणाम करें और ध्यान से उनके चित्र को देखें |अब उस दीपक को उठाकर अपने साधना स्थल पर लाकर स्टूल पर रखें ,दो अगर बत्ती जलाकर वहां लगायें |अब आसन पर आराम से सुखासन में बैठ जाएँ |आसन के चारो और पहले से सुरक्षा घेरा बनाकर रखें |इसके लिए सिन्दूर-कपूर और लौंग को चूर्णकर घी में मिला गणपति के मंत्र पढ़ते हुए आसन के चारो और घेरा बना दें और भगवान गणेश से प्रार्थना करें की वह आपकी सब प्रकार से सुरक्षा करें |
                                         अब आसन पर बैठ कर अपनी अपलक दृष्टि आपको दीपक की लौ पर जमानी है |दीपक की लौ में नीचे नीले फ्लेम के ठीक ऊपर मध्य भाग पर ध्यान और दृष्टि केन्द्रित करें |मन में सदैव एक ही कल्पना रहे की इस दीपक में भगवान गणेश मुझे दिखेंगे और आशीर्वाद देंगे |मन में प्रबल विशवास रखें की वह जरुर दिखेंगे और मुझे उनकी कृपा प्राप्त होगी |इस अवधि में उपांशु जप चलता है गणपति के मंत्र का |मंत्र का चुनाव आप खुद भी कर सकते हैं किन्तु किसी सिद्ध साधक से मंत्र प्राप्त करने पर मंत्र पहले से उर्जिकृत रहता है और सफलता/सिद्धि जल्दी प्राप्त होती है | सदैव अपने ध्यान को गणेश पर ही केन्द्रित करने का प्रयास होना चाहिए |यद्यपि मन बहुत भटकता है पर कुछ दिन में एकाग्रता आने लगती है और दीपक में आकृतियाँ उभरने लगती हैं ,जिससे रोमांच भी होता है |कभी क्षणों के लिए गणपति भी दिख सकते हैं और भिन्न भिन्न लोग भिन्न भिन्न आकृतियाँ |यह सब अवचेतन के चित्र होते हैं जिन्हें देखकर आप भी हतप्रभ होते रहते हैं ,किन्तु हमेश दिमाग में एक ही निश्चय रखें की हमें गणेश जी स्पष्ट दिखेंगे और आशीर्वाद देंगे |कुछ दिन बाद गणपति की आकृति उभरने लगती है ,क्षणों-क्षणों के लिए ,कभी कुछ कभी कुछ |फिर धीरे धीरे अनवरत प्रयास से गणपति की आकृति स्थायी होने लगती है |यदि जब कभी आपकी एकाग्रता एक मिनट के लिए भी स्थायी हो जाती है अथवा एक मिनट भी गणपति स्थायी होकर रुकते हैं अथवा स्पष्ट दीखते हुए आशीर्वाद मुद्रा में आशीर्वाद देने लगते हैं आपकी साधना सफल होने लगती है |आपको अनेक परिवर्तन स्वतः नजर आने लगते हैं |एक मिनट की आत्म विस्मृति [खुद की सुध भूल जाना ] प्राप्त होते ही आप सिद्धि की शक्ति से साक्षात्कार करने लगते हैं |
                                           गणपति के चित्र का दीपक में स्थायी होना और आशीर्वाद देने का मतलब आप द्वारा उनकी ऊर्जा को वातावरण से बुलाने पर वह आ रही है और उसका सम्बन्ध आपके मष्तिष्क और अवचेतन से बन गया है |आपमें इसके साथ ही आतंरिक रासायनिक परिवर्तन भी होने लगते हैं और वाह्य भौतिक परिवर्तन भी होने लगते हैं ,क्योकि आपके आज्ञा चक्र की तरंगों की प्रकृति बदल जाती है ,उसकी क्रिया तीब्र हो जाती है |आज्ञा चक्र के ईष्ट देव आप पर प्रसन्न होने लगते हैं ,अतः सब और उनके गुणों के अनुसार मंगल ही मंगल होने लगता है |आपकी सोची इच्छाएं पूर्ण होने लगती हैं क्योकि आपकी मानसिक तरंगों में इतनी शक्ति आ जाती है की वह लक्ष्य पर पहुचकर उसे आंदोलित और आपके पक्ष में करने लगती हैं |
                                       जब गणपति की आकृति रोज स्थायी होने लगे तो उसे अधिकतम देर तक स्थायी रखने का प्रयास करें |कुछ दिनों के प्रयास में यह संभव हो सकता है |फिर उन्हें आप अपने मानसिक बल और मन के भावों से घुमाने का प्रयास करें ,अथवा कभी यह हाथ कभी वह हाथ उठायें ,कभी उन्हें घुमाने का प्रयास करें |एकाग्रता, लगन और निष्ठां से यह भी संभव हो जाएगा |,उनके घुमते ही आपके आसपास का माहौल भी आपकी मानसिक ईच्छाओं के साथ प्रभावित होने लगता है |यह साधना की उच्च स्थिति है |यह स्थिति आने पर समाधि की भी स्थिति संभव है अथवा भाव में डूबने पर साक्षात गणपति आपके सामने आकर खड़े हो सकते हैं |इस प्रकार इस साधना की शक्ति की कोई सीमा नहीं है |इस साधना से आप दुनिया में कुछ भी पा सकते हैं |त्रिकाल दर्शिता की क्षमता भी |
                                            इस साधना की शुरुआत केवल  ५ मिनट से करें ,क्योकि आँखों पर बहुत जोर पड़ता है |लगातार दीपक देखते हुए जब आँखों में जलन हो या अत्यधिक पानी आये तो कुछ सेकण्ड के लिए आँखें बंद कर लें किन्तु ध्यान गणपति पर ही एकाग्र रखें |फिर आँखें खोलकर दीपक की लौ में उन्हें देखने का प्रयास करें |इसे प्रति सप्ताह एक मिनट बढ़ते जाएँ और अंततः १५ मिनट तक जाए |इससे अधिक नहीं |यह पूरी प्रक्रिया ३ महीने की सामान्य रूप से है |तीन महीने में हर हाल में दर्शन/साक्षात्कार हो जाने चाहिए [हो जाते हैं ],यदि तीन महीने में आप सफल नहीं होते हैं तो मान लीजिये की आपके पूर्व कर्म बहुत अच्छे नहीं रहे और आपको ईश्वरीय ऊर्जा या दर्शन या आपकी मुक्ति मुश्किल है |आप में भारी कमियां हैं |आप बहुत ही गंभीर नकारात्मकता से ग्रस्त हैं |फिर तो आपका कल्याण केवल गुरु के हाथों ही संभव हो सकता है |हमारे कुछ शिष्यों को इस प्रक्रिया में केवल दो तीन दिनों में भी सफलता मिली है ,कुछ को महीनो लगे हैं |पर अनुभव सबको अवश्य हुआ है ,परिवर्तन सबके अन्दर आता ही है |आप इसे करके देखें ,और नीचे लिखी सावधानी और चेतावनी पर ध्यान देते हुए साधना मार्ग पर अग्रसर हों ,हमें पूरा विश्वास है आपका जीवन बदल जाएगा ,आपको ईश्वरीय ऊर्जा का साक्षात्कार होगा ,भले आपने कभी कोई साधना न की हो ,भले आप साधक न हों ,पर इससे आप साधक बन जायेंगे और गंभीर प्रयास से सिद्ध भी एक विशेष शक्ति के |इस शक्ति के प्राप्त होने पर इसके अनेकानेक प्रयोग हैं जिससे आप अपने परिवार का ,मित्रों का ,लोगों का भला कर सकते हैं ,उनके दुःख दूर कर सकते हैं जबकि आपका भला तो खुद ब खुद होता है |
    विशेष जानकारी और चेतावनी
    =============–यह साधना कोई भी कर सकता है ,किन्तु यह तांत्रिक साधना ही है |मूल तांत्रिक पद्धति क्लिष्ट और गुरुगम्य होती है किन्तु इसे कोई भी थोड़ी सावधानी से कर सकता है | साधना में साधित की जा रही शक्ति शिव परिवार की और सौम्य हैं ,इनसे किसी प्रकार की हानि नहीं होती ,किन्तु परम सात्विक और उच्चतम सकारात्मक शक्ति होने से इनकी साधना से जब सकारात्मकता का संचार बढ़ता है तो ,आसपास और व्यक्ति में उपस्थित अथवा उससे जुडी नकारात्मक शक्तियों को कष्ट और तकलीफ होती है ,उनकी ऊर्जा का क्षरण होता है ,फलतः वह तीब्र प्रतिक्रया करती है और साधक को विचलित करने के लिए उसे डराने अथवा बाधा उत्पन्न करने का प्रयास करती हैं |इस साधना को करते समय आपको कभी विचित्र अनुभव भी हो सकते हैं ,कभी लग सकता है की कोई आगे से चला गया ,कोई पीछे से चला गया ,कोई पीछे है ,या कमरे में है या कोई और भी आसपास है ,कभी अनापेक्षित घटनाएं भी संभव हैं |
                                              सबका उद्देश्य आपको विचलित करना होता है |यह सब गणेश नहीं करते ,अपितु आपके आपस पास की नकारात्मक शक्तियां करती हैं जिससे आप साधना छोड़ दें |,कभी कभी पूजा से भी दूसरी नकारात्मक शक्ति आकर्षित हो सकती हैं |व्यक्ति के काम को बिगाड़ने और दिनचर्या प्रभावित करने का प्रयस भी यह नकारात्मक उर्जायें कर सकती हैं ,इसलिए यह अति आवश्यक होता है की साधना की अवधि में साधक किसी उच्च सिद्ध साधक द्वारा बनाया हुआ शक्तिशाली यन्त्र-ताबीज अवश्य धारण करे ,जिससे वह सुरक्षित रहे और साधना निर्विघ्न संपन्न करे |तीब्र प्रभावकारी साधना होने से प्रतिक्रिया भी तीब्र हो सकती है अतः सुरक्षा भी तगड़ी होनी चाहिए |यह गंभीरता से ध्यान दें की आप जो यन्त्र-ताबीज धारण कर रहे हैं वह वास्तव में उच्च शक्ति को सिद्ध किया हुआ साधक ही अपने हाथों से बनाए और अभिमंत्रित किये हुए हो ,अन्यथा बाद में सामने खतरे या समस्या  आने पर मुश्किल हो सकती है |सिद्ध अथवा साधक के यहाँ की भीड़ ,अथवा प्रचार से उनका चुनाव आपको गंभीर मुसीबत में डाल सकता है |साधना पूर्ण है ,किन्तु इसमें किसी भी प्रकार की त्रुटी होने अथवा समस्या-मुसीबत आने पर हम जिम्मेदार नहीं होंगे |गुरु का मार्गदर्शन और समुचित सुरक्षा करना साधक की जिम्मेदारी होगी |हमारा उद्देश्य सरल ,सात्विक ,तंत्रोक्त साधना की जानकारी देना मात्र है |………………………………………………हर-हर महादेव

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  • नवरात्र में देवी की शक्ति कैसे पायें ?

    दिव्य गुटिका धारकों के लिए
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                                 नवरात्र को भगवती दुर्गा की पूजा /आराधना  का समय माना जाता है ,यद्यपि वास्तव में यह शक्ति साधना का समय होता है ,फिर वह शक्ति चाहे दस महाविद्या हो ,दुर्गा हो अथवा कोई भी शक्ति |साधकों की और कर्मकांडियों की अपनी तकनीक और अपनी पद्धति होती है जिस पर वह चलते हुए शक्ति साधना करते हैं और अपनी क्षमता -पद्धति अनुसार शक्ति प्राप्त करते हैं ,किन्तु जन सामान्य को नवरात्र बड़े धूमधाम से मनाने ,व्रत -उपवास रखने ,कलश स्थापना आदि करने ,सप्तशती पाठ करवाने आदि के बाद भी बहुत लाभ होता महसूस नहीं होता |बहुत से लोग कहते मिलते हैं नवरात्र में कलश रखते हैं ,सप्तशती करते हैं अथवा पंडित से करवाते हैं ,व्रत रहते हैं ,पूर्ण परहेज बरतते हैं |जब इनके सामान्य समस्या का आकलन किया जाता है तो इनमे से अधिकतर अनेक समस्याओं से ग्रस्त ही मिलते हैं जबकि बहुत सी समस्याएं नवरात्र के पाठ आदि से समाप्त हो जानी चाहिए |दुर्गा सर्वशक्तिशाली शक्ति हैं फिर भी इन लोगों की वह समस्याएं भी हल नहीं होती जो सामान्य सी पूजा से हो जानी चाहिए |नकारात्मक ऊर्जा ,छोटी -मोटी भूत -प्रेत बाधा ,अमंगल ,अकारण रोग -दुर्घटना आदि समाप्त हो जानी चाहिए ,किन्तु बहुत से मामलों में ऐसा नहीं होता |उसके बाद यह लोग किस्मत की बात मान कर खुद को संतोष देते हैं की किस्मत ही खराब हो तो दुर्गा क्या करेंगी |
                                    जब हम इन बातों पर गंभीरता से सोचते हैं तो पाते हैं की वास्तव में दुर्गा की शक्ति तो आपको मिल ही नहीं रही ,जो ऊर्जा आनी चाहिए आई ही नहीं इसलिए आपकी समस्याएं यथावत हैं ,जो बाधाएं आपके लिए रुकावट हैं वह ही नहीं हट पा रही तो पूरा भाग्य का भी नहीं मिल पा रहा इसलिए कोई सुधार नहीं हुआ |शक्ति साधना ,मात्र भावना का पर्व या अवसर नहीं होता ,इसकी अपनी विशिष्टता अपनी तकनीक होती है |इस समय मात्र व्रत ,उपवास ,कलश रखने ,पाठ करवाने से बहुत कुछ होने वाला नहीं ,महत्त्व यह होता है की आप कितना खुद प्रयास कर रहे ,आपने कितना खुद में शक्ति लाने की कोशिश की |दुर्गा देवी या ऊर्जा या शक्ति है ,स्त्री नहीं ,स्त्री रूप तो कल्पना है ,उन्हें मनुष्य या स्त्री मान मात्र पूजन से बहुत कुछ नहीं होना ,उन्हें ब्रह्माण्ड में फैली विशेष ऊर्जा मान खुद में लाने का प्रयास होता है तभी वास्तविक शक्ति प्राप्त होती है और लाभ महसूस होता है |
                                आपने व्रत रखा ,शरीर शुद्ध हुआ ,आपने कलश रखा ,परहेज किया ,भावना शुद्ध हुआ ,आपने मांस -मदिरा ,तामसिक का परित्याग किया ,सात्विकता का संचार हुआ किन्तु मात्र इतना करने से दुर्गा की शक्ति आपमें तो नहीं आ गयी |सप्तशती पंडित से कराई ,अगर उन्होंने शुद्ध भी किया तो अधिकतर ऊर्जा अंश उन्हें मिली और कुछ अंश आपके पूजा स्थान पर व्याप्त हुई |अगर थोड़ी गलती या अशुद्धि हुई तो नुक्सान आपका |आपने सप्तशती पढ़ी और शुद्ध पढ़ी तो आपको अच्छी ऊर्जा मिली पर अगर कहीं प्रिंटिंग में अशुद्धि हुई अथवा आपको पढने नहीं आया तो उच्चारण -नाद दोष के कारण ऊर्जा विकृत हुई और आपको उलटे परिणाम मिलने निश्चित |भूल जाइए की माँ है और माँ सब क्षमा करती है |यही गलती सोचते तो आपके कष्ट कम नहीं हो रहे |माँ एक शक्ति है और एक सर्वत्र व्याप्त ऊर्जा है वह तभी अनुकूल होगी जब उसके अनुकूल प्रयास होगा |आपकी गलती उसको गाली देकर बुलाने सा हो जाएगा और वह रुष्ट होगी खुश नहीं ,फिर आप कितना भी पाठ के बाद गलती की क्षमा मांगे ,विकृत ऊर्जा नहीं सुधरने वाली |यह कुछ वैसा ही हो जाता है जैसे आप किसी को गाली देकर बुलाते हैं ,बार बार बुलाते हैं फिर क्षमा मांगते हैं ,क्या वह इससे खुश होगा या आपको थप्पड़ मारेगा |यही कारण है शक्ति उपासना में थोड़ी भी गलती के परिणाम कई गुना अधिक कष्टकारक हो जाते हैं |इसलिए अगर ज़रा भी अपने पाठ की शुद्धता पर संदेह हो या लगे की पंडित जी जल्दबाजी कर रहे खाना पूर्ती कर रहे तो आप बचिए |पद्धति ठीक से पता न हो तो मत अपनाइए मात्र भावना से हाथ जोड़ काम चला लीजिये कम से कम नुक्सान तो नहीं होगा |
                               जो सामान्य लोग हैं अगर वास्तव में कल्याण चाहते हैं ,नवरात्र में शक्ति अनुभव करना चाहते हैं तो रात्री में अधिक देर जागरण करें ,भगवती का चिंतन करें और रात्री में मंत्र जप करें ,अगर शुद्ध पाठ कर सकते तो खुद से पाठ -स्तोत्र करें |मंत्र जप करें |सुबह सामान्य पूजा करें |महत्त्व संख्या को न दें ,महत्त्व शुद्धता ,सही उच्चारण और एकाग्रता को दें |आपको अधिक आभ होगा |जो हमारे दिव्य गुटिका /डिब्बी के धारक हैं उनके लिए हम एक सामान्य सी उपासना पद्धति बता रहे हैं जो किसी भी साधना से अधिक प्रभावकारी साबित होगी और उन्हें वास्तव में नवरात्र में शक्ति अनुभव होगा |उनके बहुत से कष्ट -समस्याएं समाप्त हो जायेगी |किसी कर्मकांड की जरूरत नहीं ,किसी व्रत की जरूरत नहीं ,किसी विशेष पद्धति की जरूरत नहीं ,किसी विशेष कलश स्थापना की जरूरत नहीं ,[[यदि कलश रखते हैं तो भी कोई दिक्कत नहीं ,अगर पाठ आपके यहाँ चलता है तो उसे चलने दे ]]दैनिक कार्य करते हुए आप इसे कर सकते हैं और आपको ऊर्जा /शक्ति उतनी ही मिलेगी जितनी किसी सामान्य साधक को मिलती है |
                                      आप नवरात्र में सुबह अपने पूजा स्थान में दुर्गा जी की चित्र लगाएं |सामने अपनी दिव्य गुटिका /डिब्बी स्थापित करें |यह प्राण प्रतिष्ठित है ,प्राण प्रतिष्ठा आदि की जरूरत नहीं |हाथ में जल अक्षत पुष्प और एक सिक्का लेकर संकल्प करें ,संस्कृत नहीं आती तो शुद्ध हिंदी में कि-  मैं [अपना नाम ] पुत्र [पिता का नाम ] स्थान [अपना पता ] आज सम्बत [२०७४ ] में चैत्र मॉस के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि अर्थात नवरात्र के पहले दिन ,दिन [बुधवार ] को यह संकल्प लेता हु की में आज से पूरे नवरात्र में प्रतिदिन ११ माला भगवती दुर्गा का मंत्र जप करूँगा |भगवती मेरे परिवार की सुरक्षा करें ,मेरा कल्याण करे ,मेरे समस्त कष्टों दुखों का नाश करें ,मेरे अथवा मेरे परिवार में व्याप्त बाधाओं का शमन करें ,मेरे सर्वविध उन्नति में सहायता करें | अब जल अक्षत पुष्प आदि उनके सामने छोड़ दें |अब गुटिका और भगवती की सामान्य पूजा करें ,अगर षोडशोपचार पूजा आता है तो वह करें अन्यथा जितना आता है मात्र उतना करें |कोई आडम्बर नहीं ,कोई भ्रम न पालें और खुद का दिमाग न उलझाएँ |पूजन बाद आप आरती कर उठ जाए |अब आपका जप रात में होगा |
                              रात के समय १० बजे के बाद आप पुनः स्नान करें और शुद्ध वस्त्र पहन दुर्गा जी और गुटिका के सामने धुप अगर बत्ती लगाकर ,घी का दीपक जलाएं और सामने उनी कम्बल बिछाकर बैठ जाएँ |हाथ में जल लेकर भावना करें की भगवती आपको शुद्ध पवित्र करें और जल आप खुद पर और आसपास छिडक लें |अब एक रुद्राक्ष की माला लेकर [[ रुद्राक्ष की माला या लाल चन्दन की माला की व्यवस्था पहले से रखें ,साथ ही माला करना भी सीख लें ,अंगूठे -मध्यमा -अनामिका इन्ही अँगुलियों के माध्यम से माला फेरें ,तर्जनी और कनिष्ठिका का स्पर्श न हो ]], पहले एक माला महामृत्युंजय मंत्र का जप करें |इसके बाद आप ११ माला दूर्गा जी के नवार्ण मंत्र का जप करें |आपका ध्यान पूरी तरह दुर्गा जी पर एकाग्र हो | रोज ११ माला करें ,एक माला पूर्व में महामृत्युंजय का जरूर रोज करें |पहले दिन अधिक श्रम जरुर लगेगा किन्तु अगले दिन से आदत हो जायेगी |नावें दिन जप के बाद अथवा १० वें दिन आम की लकड़ी पर हवन सामग्री से हवन करें |रोज जप के बाद अपने जप को भगवती के बाएं हाथ में समर्पित करें |समर्पित करने के बाद क्षमा मांग आरती करें और उठ जाएँ |रोज इतना ही करना है |
                              हवन के बाद हवन की राख अपने घर में चारो कोनों में गमलों में डाल सकते हैं अथवा उन्हें प्रवाहित कर दें अन्य पूजन सामग्रियों के साथ |किसी सात्विक -सदाचारी ब्राह्मण को दक्षिणा प्रदान करें |दिव्य गुटिका और दुर्गा जी का चित्र पूजन स्थान पर ही लगा रहने दें और रोज पूजन मात्र करते रहें |या जो अन्य प्रयोग हैं वह आप दिव्य गुटिका पर करने को स्वतंत्र हैं |मात्र इतने जप और हवन से आप खुद में और अपने घर में एक अलौकिक ऊर्जा का अनुभव करेंगे जो आपको बहुत से कर्मकांड करने के बाद भी महसूस होना मुश्किल है |………………………………………………हर-हर महादेव 


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  • वर्षों की साधना का परिणाम भी नगण्य क्यूँ ?

    मंत्र जप सवा लाख ,मिला कुछ नहीं [ समय -श्रम दोनों बर्बाद ]
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              आज के समय में साधकों की बाढ़ आई हुई है ,ज्योतिषियों की बाढ़ आई हुई है |ज्योतिषी सलाह देता है ,अमुक मंत्र इतना संख्या में जपो ,अमुक पूजा करो ,आपकी समस्या हल हो जायेगी |उसके बारे में बताया कुछ नहीं की कैसे करें ,पद्धति-तरीका क्या हो ,बस जप लो |आधे को तो खुद पता नहीं होता ,कुछ को पता होता है तो समय बचाने के लिए बस मंत्र बता कर छुट्टी कर लेते हैं |मंत्र जपने वाल दुगुना जप लेता है पर उसे कोई परिणाम समझ नहीं आता ,तो वह सोचता है की ज्योतिषी सही नहीं ,पूजा -मंत्र जप से कुछ नहीं होता |उसकी गलती भी नहीं होती |उसे जितना पता होता है वह करता तो है ही |
               ऐसा ही नवागंतुक साधकों के साथ होता है ,तंत्र अथवा मंत्र -यन्त्र के क्षेत्र में अधिकतर आते हैं शक्ति पाने ,चमत्कार करने के लालच में ,कुछ अपनी समस्या दूर करने चक्कर में और कुछ वास्तव में मुक्ति की इच्छा से ,पर ९९ प्रतिशत को अपेक्षित सफलता नहीं मिलती |कारण सही पद्धति -सही ज्ञान -सही तरीका नहीं पता |या तो किताब से कुछ करने का प्रयास करते हैं या अधकचरे ज्ञान वाले गुरुओं के चक्कर में पड़ जाते हैं जिन्हें या तो खुद कुछ आता नहीं या एकाध मंत्र अपने गुरु से पाकर कुछ सिद्धियाँ करके गुरु बन बैठते हैं |साधक बेचारे क्या करेंगे जब गुरु ही उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं दे पाता |गुरु जी को मंत्र का विज्ञान पता ही नहीं है |कैसे काम करता है ,कहाँ किस मंत्र का क्या प्रभाव होता है |कैसे इसकी ऊर्जा साधक तक आती है ,कहाँ से आती है |कैसे इस ऊर्जा को प्राप्त किया जाए |कैसे मंत्र को जपा जाए |कैसे उसका उच्चारण हो |कहाँ आरोह अवरोह हो |कहाँ नाद हो |किस मंत्र को करने में कितना समय लें |आदि आदि [[व्यक्तिगत विचार अलौकिक शक्तियां पेज के पाठकों के लिए ]]
               अधिकतर व्यक्ति या साधक मंत्र जप करते समय जप की संख्या पर ध्यान देते हैं |अधिकतर का ध्यान होता है की इतनी संख्या करनी है या इतनी संख्या करेंगे तो इतने दिन में इतना हो जाएगा और साधना या अनुष्ठान या संकल्प पूरा हो जाएगा |रेट रटाये ढंग से जल्दबाजी में मंत्र जप करते हैं ,करते रोज हैं और निश्चित संख्या के दिनों तक भी करते हैं पर जब कर चुकते हैं और जितनी जानकारी है उस हिसाब से हवन आदि भी कर लेते हैं तो परिणाम की प्रतीक्षा करते हैं पर समझ में कुछ नहीं आता |अब उनमे अविश्वास जन्म लेता है की किया तो इतना दिन ,इतनी तपस्या की कुछ नहीं हुआ ,मंत्र जप पूजा आदि से कुछ नहीं होता जो भाग्य में लिखा है वाही होता है |आदि आदि |
    लोग यह ध्यान नहीं देते की वह जिस मंत्र का जप कर रहे हैं वह सही है की नहीं ,शुद्ध है की नहीं ,सही लक्ष्य के लिए सही मंत्र है की नहीं |मंत्र का उच्चारण क्या होना चाहिए ,मंत्र कितने समय में होना चाहिए या कितना लम्बा या किस स्वर  में होना चाहिए |इसका समय क्या होना चाहिए |आदि |अधिकतर का ध्यान मंत्र जप के समय कहीं और घूमता रहता है |अधिकतर जल्दबाजी में होते हैं की कब जप पूरा हो और अमुक कार्य किया जाए |जैसे साधना -पूजा न कर रहे हों एक जिम्मेदारी पूरी कर रहे हों |जैसे पहाडा रत रहे हों देवता को नहीं सूना रहे होते या बुला रहे होते वह तो कर्त्तव्य की आईटीआई श्री कर रहे होते हैं |देवता या ईष्ट की ओर ध्यान एकाग्र होता ही नहीं |भावहीनता में होते हैं ,एकमात्र अपना लक्ष्य दिखाई देता है |देवता से मानसिक जुड़ाव हुआ ही नहीं होता |परिणाम होता है की प्रकृति की सम्बंधित ऊर्जा मंत्र के द्वारा व्यक्ति से जुड़ पाती ही नहीं |देवता को मंत्र सुनाई देता ही नहीं |मंत्र जप मात्र रटने से ,बिना नाद के जपने से उसमे कोई ऊर्जा उत्पन्न नहीं होती ,वह आपके ही चक्रों को आंदोलित नहीं करता तो प्रकृति की ऊर्जा से क्या जुड़ पायेगा और उन्हें आकर्षित कर पायेगा |यहाँ तक की शाबर मन्त्र जिनमे न अर्थ होते हैं न नाद वह भी बिना भाव के काम नहीं करते |बिना भाव और आत्मबल के आप शाबर मंत्र भी रटेंगे तो आपको परिणाम मुश्किल है मिलना |
             ध्यान दीजिये हर मंत्र की एक विशिष्ट नाद होती है ,विशिष्ट उच्चारण होता है ,विशिष्ट देवता होते हैं |विशिष्ट मंत्र का विशिष्ट चक्र से सम्बन्ध होता है |विशिष्ट मंत्र प्रकृति के विशिष्ट प्रकार की ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है और उसे आकर्षित करता है ,साधक या मंत्र जपने वाले से जोड़ता है |अतः उसका पाठ उसी तरह के भाव ,नाद ,उच्चारण के साथ होना चाहिए |आपका मानसिक तारतम्य सम्बंधित शक्ति और मंत्र की ऊर्जा से बना होना चाहिए |नहीं तो वह अगर आकर्षित हो भी गई तो आपसे जुड़ नहीं पाएगी और वातावरण में पुनः बिखर जायेगी |महत्त्व मंत्र की संख्या जपने का नहीं होता ,सही उच्चारण ,सही नाद का होता है |सही भाव का होता है ,सही भावना का होता है |सही तरीके और पद्धति का होता है |सही समय का होता है .एकाग्रता का होता है |अगर यह सब नहीं है तो आप कई लाख भी जप कर लीजिये आपको परिणाम मिलना मुश्किल है |मंत्र असंदिग्ध रूप से काम करते हैं बशर्ते आप सही ढंग से उन्हें जप सकें |अगर रटंत जप करेंगे तो कुछ नहीं मिलेगा ,इससे तो अच्छा होगा की आप कोई जप न करो और केवल सम्बंधित देवता के रूप -गुण -भाव में ही डूबिये आपको जरुर लाभ मिलेगा |अगर मंत्र कर रहे हैं तो ढंग से कीजिये |
              सवा लाख ,लाखों लाख या निश्चित संख्या में जप करना कोई मायने नहीं रखता |आप कुछ हजार ही जप कर लीजिये और सही ढंग से कर लीजिये तो आपको लाखों लाख से अधिक लाभ हो जाएगा |उदाहरण के लिए ॐ का जप कुछ लोग करते हैं ,अधिकतर ॐ को मंत्र के आगे लगाते हैं |पर बहुत कम को पता है की अगर ॐ का सही ढंग से जप कर दिया जाए तो दीवार टूट जाती है ,यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो चूका है |हम क्या करते हैं ॐ को लगाया या ॐ ॐ करते चले गए ,न नाद न समयांतराल न उच्चारण न गूँज किसी पर ध्यान नहीं दिया |ऊर्जा उत्पन्न हुई ही नहीं ,आपके चक्र को आन्दोलित की ही नहीं |प्रकृति की ऊर्जा से जुडी ही नहीं तो लाभ क्या होगा |ॐ का जप जब भी हो एक गूँज पैदा होनी चाहिए ,जो आपको और वातावरण को गुंजित करें |इसकी गूँज ह्रदय में गुंजित होनी चाहिए |तभी यह आंदोलित करेगा आपके सम्बंधित चक्र को और वहां से तरंग उत्पादन बढ़ेगा और वातावरण की ऊर्जा को आकर्षित करेगा |ऐसा ही सभी मन्त्रों में है |अगर ऐसा न होता तो अलग बीज और बिन्दुओं का प्रयोग क्यों होता |हर बीज का हर मंत्र का अपना उच्चारण ,नाद है उसे उसी ढंग से किया जाना चाहिए |सही ढंग से कर दीजिये कुछ हजार में आपको लाभ मिल जाएगा |रोज हजारों जप मत कीजिये कुछ सौ कीजिये पर आराम से धीरे धीरे पूरी एकाग्रता ,ध्यान ,भाव ,नाद ,उच्चारण से कीजिये देवता प्रसन्न हो जाएगा |[[व्यक्तिगत विचार ब्लॉग पाठकों के लिए ]]…………………………………………………………….हर -हर महादेव 

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