Author: Tantra Marg
  • पति -पत्नी -परिवार पर तंत्र क्रिया

    पति -पत्नी -परिवार पर तंत्र क्रिया

    किसी ने आपके पति या पत्नी पर कुछ किया तो नहीं

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                 कुछ लोगों को अपने बच्चे और दुसरे की बीबी अधिक अच्छी लगती है या किसी को अपने बच्चे और दुसरे का पति ज्यादा सक्षम नजर आता है |तुलना और तर्क करके देखिये आपके आसपास भी यह देखने को मिल सकता है |पुरुष दुसरे की पत्नी को प्रशंसा और प्यार की दृष्टि से देखता मिलेगा तो पत्नी बार -बार किसी अन्य से अपने पति की या हो सकता है आपके घर में आपकी तुलना करती मिलेगी |यह हर घर की कहानी है ,हालांकि इसके अपवाद भी होते हैं किन्तु यह सामान्यतया ऐसा देखा ही जाता है |यहाँ तक तो सब सामान्य रहता है क्योकि यह मनुष्य का स्वभाव है |बहुत कम मिलेंगे जो खुद में या खुद से संतुष्ट रहें |समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जब कोई अपनों से पूरी तरह या अधिक असंतुष्ट हो जाता है या अपने स्वभाव की कमियों से मजबूर हो जाता है |कोई किसी दुसरे की तरफ आकर्षित इतना हो जाता है की उसे पाने के लिए कोई भी प्रयास करने लगता है |कोई अपनी समस्या से तंग आकर किसी और को खुद से जोड़ने का प्रयास करता है |कोई अपनी तरक्की का हथियार किसी को बनाने का प्रयास करता है या कोई अपनी अतृप्त वासनाओं की पूर्ती का माध्यम किसी को बनाने का प्रयत्न करता है |

                        कुछ लोगों का स्वभाव भी होता है की उन्हें अपने से अधक दुसरे में रूचि होती है या कुछ लोगों का स्वभाव होता है की वह यहाँ वहां मुंह मारते घूमते रहते हैं |इन्हें जल्दी संतुष्टि नहीं मिलती अथवा इन्हें वास्तविक लगाव किसी से न होकर केवल स्वार्थ की भूख होती है |यह अपने मतलब के लिए तंत्र अभिचारों का सहारा ले सकते हैं जिससे यह इच्छित को पा सकें |कुछ लोग अपनों से असंतुष्ट होकर कभी -कभी दूसरी तरफ देखने लगते हैं तो कुछ लोग दूसरों से अधिक पाने की इच्छा में अपने के अलावा किसी दुसरे से भी जुड़ जाते हैं |कुछ लोग भावनात्मक मूर्ख भी होते हैं जो दुसरे द्वारा भावना उभारकर स्वार्थ सिद्धि का माध्यम बन जाते हैं |कुछ लोग दुसरे से इतना आकर्षित हो जाते हैं की उन्हें अपनों में कमियाँ ही कमियाँ नजर आने लगती हैं |यह स्थिति अधिक दिन रहने पर उनके अन्दर एक गहरा खालीपन उत्पन्न हो जाता है जो उन्हें कहीं भी संतुष्ट नहीं रहने देता और वह यहाँ वहां अथवा उसे पाने का प्रयत्न करते हैं जिसके प्रति आकर्षित हों अथवा जो उन्हें अपनों से अधिक सक्षम लगे |ऐसे लोग भी तंत्र अभिचारों का सहारा लेते हैं उस लक्ष्य को अथवा अपने लक्ष्यों को पाने के लिए |

                           कुछ लोग अपने आसपास के किसी को अथवा अपने सहकर्मी को अथवा अपने रिश्तेदार को अथवा अपने पडोसी को अथवा अपने क्लासमेट को देखकर उसमे इतने इंटरेस्टेड हो जाते हैं की उसे पाने का हर संभव प्रयत्न करते हैं ,यहाँ तक की यहाँ वहां तांत्रिकों के यहाँ दौड़ते रहते हैं |कोई -कोई तो किसी -किसी का कहीं निश्चित रिश्ता तक तुडवाने का प्रयत्न करता है तो कोई किन्ही पत्नी पत्नी के रिश्ते को तोडना चाहता है |कुछ लोग अपने बॉस ,उच्चाधिकारी अथवा उच्च स्तर के महिला /पुरुष को अपनी उन्नति का माध्यम बनाने के प्रयास में उन्हें वशीभूत करने का प्रयत्न करते हैं और तंत्र का सहारा लेते हैं |इससे होता यह है की व्यक्ति उनकी ओर आकर्षित होता है और अपने बीबी अथवा पति से उसका लगाव कम होने लगता है |अधिक प्रभाव होने पर व्यक्ति उस अभिचार करने वाले के बारे में पहले सोचता है और पति या पत्नी के बारे में बाद में |

                     उपरोक्त स्थितियों में ली गयी तांत्रिक प्रणालियों की क्षमता करने वाले पर निर्भर करती हैं की व्यक्ति कितना प्रभावित होता है ,किन्तु यह बिलकुल सत्य है की इनका अच्छा जानकार या अच्छी क्षमता रखने वाला साधक यह क्रियाये करवा सकता है |सभी क्रियाओं का ,यहाँ तक की टोटकों का भी कुछ प्रभाव तो हो ही जाता है ,जबकि मान्त्रिक अनुष्ठानों का प्रभाव अधिक होता है |परिणाम यह होता है की व्यक्ति दुसरे के तरफ आकर्षित हो अपनों से विमुख होने लगता है |वह खर्च भी दुसरे के लिए करता है और अपने बीबी ,बच्चों अथवा घर के दायित्व से मुंह मोड़ने लगता है |उसे अपनी पत्नी अच्छी नहीं लगती ,उसे उसमे कोई आकर्षण नजर नहीं आता |वह पत्नी और प्रेमिका की तुलना करता है और पत्नी को किसी लायक नहीं पाता ,भले पत्नी अधिक सुन्दर ,सक्षम और बुद्धिमान हो ,क्योकि व्यक्ति की बुद्धि पर तो अभिचार का पर्दा पड़ा होता है और वह आसक्ति में इतना डूबा होता है की उसे सही गलत का भान नहीं रहता |वह तर्क भी करता है तो खुद को ही सही मानता है |यदि अभिचार ग्रस्त स्त्री है तो उसे अपने पति में कमियां ही कमियां नजर आने लगती हैं ,वह पति से असंतुष्ट हो जाती है |दूसरा व्यक्ति उसे अधिक आकर्षक ,सक्षम और सुन्दर लगता है |वह उसकी ओर झुकती और अपनों से दूर होने लगती है |कुछ दिन में दूरियां बहुत बढ़ जाती हैं जो कभी कभी अलगाव का भी कारण बन सकती हैं अगर स्त्री सक्षम हुई तो ,अन्यथा कलह तो रोज आम हो जाती हैं |

                  एक समस्या इससे भी अधिक गंभीर देखि जाती है सामान्य जीवन में |लोग दुसरे की उन्नति से अधिक दुखी होते हैं बजाय अपने दुखों के |उन्हें दुसरे की ख़ुशी देखि नहीं जाती भले खुद उनके यहाँ कोई कमी न हो |कुछ लोग अपनी कमियां और कमजोरियां कम करने ,अपनी समस्या दूर करने की बजाय दुसरे को नीचे लाने का प्रयत्न भी करते देखे जाते हैं |यह सोचते हैं की भले हम नहीं उन्नति कर पा रहे किन्तु अगला भी नहीं करना चाहिए |वह कैसे अमसे आगे चला जाएगा |इस हेतु भी कुछ लोग अभिचार का सहारा लेकर दुःख-कष्ट -बीमारी का आक्रमण दूसरों पर करवा देते हैं अथवा कर देते हैं |अक्सर तोनो-टोटकों का सहारा लेते हैं |तांत्रिकों से जाकर कहते हैं की अमुक हमें परेशां कर रहा अथवा हमारे ऊपर टोन -टोटके कर रहा ,हमें भी कुछ ऐसा दे दीजिये या कर दीजिये की उसकी उन्नति रुक जाए या उसका नुक्सान हो |सामान्य तांत्रिक यह नहीं देख पाता की व्यक्ति गलत बोल रहा है या सही ,वह कुछ क्रियाएं कर देता है या बता देता है बिना सोचे की इसका गलत उपयोग हो सकता है |इससे घर में पति-पत्नी और बच्चों पर कष्ट -रोग आ जाते हैं या नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न हो सकता है या वायव्य बाधाएं प्रभावित कर सकती हैं |घर में अशांति और दुःख उत्पन्न हो जाता है |

                         कुछ लोग अपनी बीमारी का भी उतारा करके दुसरे को दे देते हैं |आप माने या न माने किन्तु यह होता है और उतारा जिसको दिया जाता है उसे वह बीमारी हो जाती है |कभी कभी उतारा करके सड़क-चौराहे पर रख दिया जाता है और उसको लांघने वाला उस सम्बंधित कष्ट की चपेट में आ जाता है |कभी कभी तो किसी स्त्री को बच्चे न होने पर उसका उतारा किसी अन्य स्त्री पर कर दिया जाता है |कभी किसी का दाम्पत्य जीवन सुखी न होने पर या किन्ही पत्नी -पति पर कोइ क्रिया होने पर उसका उतारा करके किसी अन्य को भी दे दिया जाता है |उपरोक्त सभी क्रियाये आप पर या आपके पति-पत्नी या बच्चों पर हो सकती हैं |अगर आपके कुलदेवता शशक्त नहीं हैं तो यह क्रियाएं आपको अधिक प्रभावित करती हैं |

                     उपरोक्त समस्याएं अगर पहले से उत्पन्न हो चुकी हैं तब तो उन्हें समाप्त होने में समय लगता है और कभी कभी सक्षम तांत्रिक की मदद लेनी होती है किन्तु इनसे बचने का उपाय पहले से किया जा सकता है |यदि पति अथवा पत्नी अथवा बच्चों को किसी अच्छे साधक द्वारा उच्च और उग्र शक्तियों के यन्त्र बनाकर और उन्हें अच्छे से अभिमंत्रित करके धारण कराया जाए तो इस तरह होने वाली तांत्रिक क्रियाओं से बचाव हो जाता है |यदि समस्या उत्पन्न हो चुकी है और कोई अभिचार किया जा चूका है तो वह धीरे-धीरे कम हो जाता है और पुनः कोई क्रिया प्रभावित नहीं करती |यद्यपि इन कवचों की शक्ति साधक की शक्ति और अभिमंत्रित मन्त्रों की संख्या पर निर्भर करती हैं और गंभीर और विशेष लक्षित तांत्रिक क्रियाओं को रोक ही लें आवश्यक नहीं होता किन्तु सामान्य तांत्रिक क्रियाओं को यह रोक लेती हैं और व्यक्ति को इनसे प्रभावित होने से बचा लेती हैं अथवा धीरे -धीरे पहले की क्रियाओं के प्रभाव को समाप्त कर देती हैं |विशेष व्यक्ति को लक्ष्य कर की गयी गंभीर क्रियाओं की समाप्ति हेतु अच्छे तांत्रिक की मदद लेनी चाहिए |यदि पहले से सुरक्षा रहे तो ऐसी स्थिति बहुत कम ही आती है ,क्योकि ऐसी क्रियाओं के लिए खुद व्यक्ति को क्रियाएं करनी होती हैं |

                      जिन व्यक्तियों के घर परिवार में उपरोक्त समस्या नजर आये वे यह न मानें की यह अपने आप हो रहा है या विचार नहीं मिल रहे या यह व्यक्ति का स्वभाव होता है |अचानक अगर कोई परिवर्तन दिखे अथवा लगे की कोई किसी से जुड़ रहा है अथवा अपनों से विमुख हो रहा है तो इस पर जरुर ध्यान दें |यह अभिचार या वशीकरण-आकर्षण का प्रभाव हो सकता है |कोई आपका अहित चाहकर कोई क्रिया कर अथवा करवा सकता है |आप भले आधुनिकता और अपनी वैज्ञानिक समझ का लोहा मानते हुए इन्हें न मानें पर यह होता है और इनमे भी उसी वैज्ञानिक ऊर्जा की तकनिकी का उपयोग होता है जो रासायनिक और भौतिक क्रियाओं में होता है |यह सारा खेल ऊर्जा प्रक्षेपण और ऊर्जा ग्रहण का है |जिस पर पर जैसी ऊर्जा फेंकी जाती है उस पर वैसा प्रभाव होता है |तेज़ाब या आग या पानी फेंकने पर वह दीखता है पर तरंगों का प्रभाव दिखता नहीं ,होता अवश्य है |जैसे निश्चित ध्वनि आवृत्ति की तरंगे व्यक्ति को मौत भी दे सकती हैं ,जैसे विशेष सूर्य तरंगे व्यक्ति पर विशेष प्रभाव डालती हैं जैसे सौर तरंगें इलेक्ट्रानिक उपकरणों को प्रभावित कर देती हैं और दिखती नहीं उसी तरह यह तरंगे भी प्रभाव डाल देती हैं और दिखती नहीं |

     उपाय

    ———            अगर लगे की कोई समस्या है तब तो अवश्य ध्यान दीजिये ,नहीं दिखे तब भी पहले से सुरक्षा करके रखे |कब कौन क्या सोचे ,क्या करे कोई भरोसा नहीं |हर व्यक्ति खुद के स्वार्थ और दुसरे के सुख से चिंतित है |कोई आपके बारे में नहीं सोचता सब अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं |सुरक्षा कवच धारण करें और अपने प्रिय को धारण कराकर रखें ,कब कौन क्या क्रिया उसपर कर दे |इसके लिए भले खुद को आधुनिक समझते हों और आपको लगता हो की कवच पहनने से लोग आपको पिछड़ा न समझ लें ,भले इसे छिपाकर धारण करें और कराएं |क्योकि आने वाले कष्ट इस सोच से बड़े हो सकते हैं |इस हेतु काली ,बगलामुखी ,भैरव ,नृसिंह आदि शक्तियों के यन्त्र के साथ अभिचार रोकने और नष्ट करने वाली तांत्रिक वस्तुओं का उपयोग किया जाता है जो इस तरह के अभिचार के प्रभाव को क्रमशः कम करते हैं और कोई नया अभिचार होने से रोकते हैं |अगर समस्या उत्पन्न हो चुकी हो और कवच धारण आपका प्रियजन नहीं करता तो उसके तकिये आदि में इसे रखें अथवा उसे यह कहकर धारण कराएं की यह उसकी उन्नति और सुख के लिए है ,लोग आकर्षित और प्रभावित होंगे |इस तरह कहकर उसे धारण कराये |

            गंभीर समस्या उत्पन्न हो चुकी है तो अच्छे तांत्रिक की मदद लें तथा प्रति तांत्रिक क्रिया करें |अन्य उपाय उसके बताये अनुसार करें |तंत्र के नाम से ना घबराएं क्योंकि शिव परिवार और दुर्गा आदि की पूजा भी तंत्र ही है |इनके बल पर सभी क्रियाएं हटाई जा सकती हैं |बेहतर तांत्रिक न मिले तो आप हमसे सम्पर्क कर सकते हैं |अधिक उपाय इसलिए नहीं लिखे जा रहे क्योंकि इसमें विशेषज्ञता की जरूरत होती है |कहाँ कितनी शक्ति की जरूरत है ,किस तरह की शक्ति की जरूरत है ,कौन शक्ति प्रभावित कर रही ,किस तरह की किस उद्देश्य से क्रिया की गयी है जब तक यह न जाना जाए उपाय ठीक से काम नहीं करेंगे |गलत उपाय किसी को छेड़ कर छोड़ देने जैसे हो जायेंगे जिससे वह तब और अधिक घातक हो जायेंगे |…………………………………………………हर-हर महादेव

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  • श्यामा मातंगी महावशीकरण मंत्र /कवच

    श्यामा मातंगी महावशीकरण मंत्र /कवच

    श्यामा मातंगी यन्त्र /कवच और महावशीकरण मन्त्र

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    सभी के लिए उपयोगी

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                  मातंगी महाविद्या ,दस महाविद्या में से एक प्रमुख महाविद्या ,,वैदिक सरस्वती का तांत्रिक रूप हैं और श्री कुल के अंतर्गत पूजित हैं |यह सरस्वती ही हैं और वाणी ,संगीत ,ज्ञान ,विज्ञान ,सम्मोहन ,वशीकरण ,मोहन की अधिष्ठात्री हैं |त्रिपुरा ,काली और मातंगी का स्वरुप लगभग एक सा है |यद्यपि अन्य महाविद्याओं से भी वशीकरण ,मोहन ,आकर्षण के कर्म होते हैं और संभव हैं किन्तु इस क्षेत्र का आधिपत्य मातंगी [सरस्वती] को प्राप्त हैं |यह जितनी समग्रता ,पूर्णता ,निश्चितता से इस कार्य को कर सकती हैं कोई अन्य नहीं क्योकि सभी अन्य की अवधारणा अन्य विशिष्ट गुणों के साथ हुई है |उन्हें वशीकरण ,मोहन के कर्म हेतु अपने मूल गुण के साथ अलग कार्य करना होगा जबकि मातंगी वशीकरण ,मोहन की देवी ही हैं अतः यह आसानी से यह कार्य कर देती हैं |मातंगी के तीन विशिष्ट स्वरुप हैं श्यामा मातंगी ,राज मातंगी और वश्य मातंगी |श्यामा मातंगी स्वरुप मातंगी का उग्र स्वरुप है और वशीकरण ,मोहन, आकर्षण को तीब्रता से करता है |इनका मात्र अति विशिष्ट है ,जिसमे माया [देवी] ,सरस्वती [मातंगी ],लक्ष्मी ,त्रिपुरसुन्दरी[श्री विद्या]और काली के बीज मन्त्रों का विशिष्ट संयोग है जिससे मातंगी की मुख्यता के साथ इन सभी शक्तियों की शक्ति भी सम्मिलित होती है जिससे यह विद्या सब कुछ देने के साथ वशीकरण ,आकर्षण में निश्चित सफलता देती है |

            मातंगी ,या श्यामा मातंगी का मंत्र ,मातंगी साधक ही प्रदान कर सकता है ,अन्य किसी महाविद्या का साधक इनके मंत्र को प्रदान करने का अधिकारी नहीं है |स्वयं मंत्र लेकर जपने से महाविद्याओं के मंत्र सिद्ध नहीं होते ,अतः जब भी मंत्र लिया जाए मातंगी साधक से ही लिया जाए ,यद्यापि मातंगी साधक खोजे नहीं मिलते जबकि अन्य महाविद्या के साधक मिल जाते हैं |हम अपने इस अलौकिक शक्तिया चैनल पर अनेक देवी देवताओं ,शक्तियों के कवच -ताबीज -यन्त्र के बारे में जानकारी प्रकाशित कर रहे हैं की कौन सा यन्त्र किस उद्देश्य के लिए प्रभावी होता है ,वह कैसे कार्य करता है जिससे हमारे अलौकिक शक्तिया चैनल के दर्शक लाभान्वित हो सकें |

               इनके मंत्र और यंत्र का उपयोग अधिकतर प्रवचनकर्ता ,धर्म गुरु ,tantra गुरु ,लेखक ,गायक ,संगीतकार ,कलाकार ,बौद्धिक लोग करते हैं जिन्हें समाज-भीड़-लोगों के समूह का नेतृत्व अथवा सामन करना होता है ,ज्ञान विज्ञानं की जानकारी चाहिए होती है |मातंगि के शक्ति से इनमे सम्मोहन -वशीकरण की शक्ति होती है |मातंगी का यन्त्र इसमें अतिरिक्त ऊर्जा का कार्य करता है जिसे मातंगी साधक निर्मित करता है भोजपत्र पर |मातंगी का यन्त्र बाजार में धातु का मिल जाता है किन्तु श्यामा मातंगी का मिलना मुश्किल होता है |धातु के यन्त्र की प्रभावित भी संदिग्ध होती है जबकि मातंगी साधक द्वारा निर्मित श्यामा मातंगी के यन्त्र में साधक की शक्ति ,मुहूर्त की शक्ति ,भोजपत्र की पवित्रता ,अष्टगंध की विशिष्टता ,मंत्र की शक्ति ,प्राण प्रतिष्ठा की शक्ति सम्मिलित होती है जिससे यह यन्त्र निश्चित प्रभावकारी हो जाता है |धारण करने पर इससे उत्पन्न विशिष्ट तरंगे व्यक्ति और वातावरण को प्रभावित करती हैं जिससे खुद व्यक्ति में भी परिवर्तन आता है और आसपास के लोग भी प्रभावित होते हैं |इसके वाशिकारक प्रभाव में संपर्क में आने वाले लोग बांध जाते हैं |यद्यपि यन्त्र किसी विशिष्ट व्यक्ति के लिए भी बनाया जा सकता है किन्तु व्यक्ति केन्द्रित न रखा जाए तो यह सब पर प्रभाव डालता है |

    श्यामा मातंगी का मंत्र इस प्रकार होता है – ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौ: ऐं ॐ नमो भगवती श्री मातंगीश्वरी सर्वजन मनोहारी सर्वमुखरंजिनी क्लीं ह्रीं श्रीं सर्वराज वशंकरी सर्वस्त्रीपुरुष वशंकरी सर्वदुष्टमृग वशंकरी सर्वसत्व वशंकरी सर्वलोक वशंकरी त्रैलोक्यं में वशमानय स्वाहा |

                   श्यामा मातंगी का मंत्र और यन्त्र प्रकृति की सभी शक्तियों में सर्वाधिक शक्तिशाली वाशिकारक और मोहक प्रभाव रखता है क्योकि यह इसी की शक्ति हैं ही |यद्यपि इनका यन्त्र काफी महंगा पड़ जाता है ,जबकि अन्य वशीकरण के यन्त्र बाजार में बहुत सस्ते मिल जाते हैं ,यह अलग है की अन्य भले असफल हो जाए इनका यन्त्र प्रभाव जरुर देता है |उदाहरण के लिए ,श्यामा मातंगी का मंत्र केवल इनका साधक ही जप सकता है और वाही अभिमंत्रित कर सकता है यन्त्र को जबकि अगर वह दिन में १० घंटे लगातार जप करे तो भी तीन हजार मंत्र से अधिक जप नहीं कर सकता ,कारण मंत्र बड़ा और क्लिष्ट होता है |ऐसे में यन्त्र को २१ हजार अभिमंत्रित करने के लिए कम से कम ७ दिन चाहिए ,पूजा प्राण प्रतिष्ठा और बाद में हवन के लिए दो दिन अतिरिक्त चाहिए अर्थात ९ दिन लगेंगे एक यन्त्र बनाने में, यदि वास्तविक प्रभाव लानी है ,क्योकि बहुत कम अभिमन्त्रण अपेक्षित परिणाम नहीं देगा |इस तरह सबके लिए तो नहीं किन्तु जरूरतमंद के लिए यह यन्त्र लाभदायक होता है |

    श्यामा मातंगी यन्त्र का प्रभाव और उपयोग

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    १. यन्त्र धारण करने से वशीकरण की शक्ति बढती है |व्यक्तित्व का प्रभाव बढ़ता है |

    २. अधिकारी वर्ग को अपने कर्मचारियों पर नियंत्रण और उन्हें वशीभूत रखने में आसानी होती है |

    ३.कर्मचारी को अपने अधिकारियों को अनुकूल रखने में मदद मिलती है |

    ४.पति को पत्नी की और पत्नी को पति की अनुकूलता अपने आप प्राप्त होती है और धारण करने वाले का पति या पत्नी वशीभूत होता है |

    ५.सेल्स ,मार्केटिंग ,पब्लिक रिलेसन का कार्य करने वालों को लोगों का अपेक्षित सहयोग मिलता है |

    ६.व्यवसायी को ग्राहकों की अनुकूलता मिलती है और अपरोक्त उन्नति में सहायत मिलती है |

    ७.रुष्ट परिवार वालों को इससे अनुकूल करने में मदद मिलती है |

    ८.वाद-विवाद ,मुकदमे ,बहस ,समूह वार्तालाप ,आपसी बातचीत में सामने वाले की अनुकूलता प्राप्त होती है |

    ९. चूंकि यह महाविद्या यन्त्र है और काली की शक्ति से संयुक्त है अतः नकारात्मक ऊर्जा दूर करता है |

    १०. किसी पर पहले से कोई वशीकरण की क्रिया है तो यन्त्र भरे हुए चांदी कवच को सुबह शाम कुछ दिन एक गिलास जल में डुबोकर वह जल व्यक्ति को पिलाने से वशीकरण का प्रभाव उतरता है |

    ११.किसी भी तरह के इंटरव्यू में परीक्षक पर सकारात्मक प्रभाव देता है |

    १२. व्यक्ति विशेष के लिए बनाया गया यन्त्र धारण और मंत्र जप निश्चित रूप से सम्बंधित व्यक्ति को वशीभूत करता है |

    १३.दाम्पत्य कलह ,पारिवारिक कलह ,मनमुटाव ,विरोध में लोगों को प्रभावित करता है और व्यक्ति के अनुकूल करता है |

    १४.सामाजिक संपर्क रखने वालों को लोगों की अनुकूलता प्राप्त होती है |

    १५.ज्ञान-विज्ञानं-अन्वेषण-परीक्षा-प्रतियोगिता ,प्रवचन ,भाषण से समबन्धित लोगों को सफल होने में मदद करता है |

                   इस प्रकार ऐसा कोई क्षेत्र लगभग नहीं जहाँ इस यन्त्र से लाभ न मिलता हो क्योकि लोगों की अनुकूलता की जरुरत सबको होती है और लोग या व्यक्ति प्रभावित हो अनुकूल हों ,वशीभूत हों तो व्यक्ति को लाभ अवश्य होता है |अतः श्यामा मातंगी साधक द्वारा बनाया गया श्यामा मातंगी यन्त्र ,अन्य किसी यन्त्र से अधिक लाभकारी होता है |श्यामा मातंगी यन्त्र धारण से सर्वजन आकर्षण और वशीकरण होता जिससे सभी मिलने और संपर्क में आने वालों पर प्रभाव पड़ता है |किसी एक ही व्यक्ति को आकर्षित वशीभूत करने के लिए उस व्यक्ति के नाम से विशेष तौर पर इसे अभिमंत्रित करना होता है तब यह केवल उस व्यक्ति पर ही प्रभाव डालता है |इसके धारण से एक बड़ा लाभ यह है की व्यक्ति को खुद कुछ नहीं करना होता और जो भी प्रभाव होता है वह ताबीज के धारण से होता है |इससे व्यक्ति के स्वभाव ,चाल ढाल ,बातचीत के ढंग में और उसके आभामंडल अर्थात औरा में परिवर्तन आने से वह लोगों को आकर्षित और अनुकूल करने लगता है |………………………………………………………………..हर-हर महादेव

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  • भोजपत्र यन्त्र विशेष क्यों ?

    भोजपत्र यन्त्र विशेष क्यों ?

    क्यों अधिक प्रभावी होता है भोजपत्र निर्मित यन्त्र धारण करना ?

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             विभिन्न धर्मो ,समुदायों में यन्त्र रचना और धारण प्राचीन काल से चला आ रहा है ,यन्त्र विभिन्न आकृतियों अथवा अंको के एक विशिष्ट संयोजन होते है ,जिनसे एक विशिष्ट उर्जा विकिरित होती है अथवा जिनमे एक विशिष्ट उर्जा संग्रहीत होती है ,जो धारक को विशिष्ट रूप से प्रभावित करती है ,यंत्रो को देवी देवताओ का निवास भी माना जाता है ,यह आंकिक भी होते है अथवा न समझ में आने वाली आकृतियों के भी ,फिर भी इनके विशिष्ट अर्थ होते है ,यंत्रो की पूजा भी की जाती है और धारण भी किया जाता है ,अथवा अन्य रूप से भी उपयोग किया जाता है ,

                 यंत्रो का निर्माण वुभिन्न सामग्रियों ,वस्तुओ पर होता है ,कागज़,भोजपत्र ,धातु ,पत्थर ,कपडे आदि पर भी ,,हिन्दू परम्परा के अनुसार भोजपत्र को परम पवित्र माना जाता है ,अन्य माध्यमो की अपेक्षा भोजपत्र पर निर्मित यन्त्र को प्रमुखता दी जाती है क्योकि इसके साथ कई विशिष्टताये जुड़ जाती है ,जो अन्य माध्यमो में कुछ कम पायी जाती है ,

                 भोजपत्र स्वयं एक सकारात्मक उर्जा आकर्षित करने वाला माध्यम होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर करता है ,इस पर यन्त्र निर्माण में प्रयुक्त होने वाले अष्टगंध अथवा पंचगंध  की अपनी अलग विशेषता होती है  ,इनमे गोरोचन आदि प्रयुक्त होने वाले पदार्थ नकारात्मक शक्तियों को दूर कर सकारात्मकता को आकर्षित करते है ,यन्त्र निर्माण के समय साधक की विशिष्टता ,उसकी एकाग्रता ,आत्मबल ,उसके हाथो से निकलने वाली तरंगे ,उसकी अपनी सिद्धिया /शक्तिया यन्त्र को अलग बल प्रदान करती है ,निर्माणोंपरांत यन्त्र की प्राण प्रतिष्ठा और उस पर सम्बंधित इष्ट का जप इसे बहुत विशेष बना देता है,यन्त्र निर्माण हेतु निर्दिष्ट और चयनित मुहूर्तो का अपना अलग प्रभाव होता है  ,इसे विशिष्ट साधक ही बना और प्राण प्रतिष्ठित कर सकता है ,जिसके पास सम्बंधित विषय की क्षमता हो ,,इस प्रकार बना यन्त्र धारक पर  शीघ्र और सकारात्मक प्रभाव डालता है ,यन्त्र से उत्सर्जित होने वाली तरंगे व्यक्ति और आसपास के वातावरण को प्रभावित करती है जिससे परिवर्तन होते है और व्यक्ति लाभान्वित होता है|उपरोक्त कोई भी लाभ धातु के यंत्रों में जो की फैक्टरियों में बनते हैं ,उनसे नहीं मिलते |यही कारण है की अक्सर साधक ,तंत्र जानकार ,इन विद्याओं की समझ रखने वाले भोजपत्र पर बने यंत्रों को ही प्राथमिकता देते हैं जिनसे बनाने वाले साधक की शक्ति भी सीधे जुडी होती है |धातु के यन्त्र पूजन हेतु और भोजपत्र के यन्त्र धारण हेतु तंत्र जानकार उपयोग करते हैं | ……………………………………………………………………हर-हर महादेव 

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  • ताबीज भाग्य बदल सकता है

    ताबीज भाग्य बदल सकता है

    :::::::::::::एक ताबीज आपकी किस्मत पलट सकता है::::::::::::::

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             यन्त्र -मंत्र ,कवच ,ताबीज ,विभिन्न आकृतियाँ ,धार्मिक चिन्ह ,लाकेट ,प्रतीक विश्व के  हर धर्म में किसी न किसी रूप में मान्य हैं और बहुतायत में इनका प्रयोग होता है |इनकी शक्ति से मनुष्य हमेशा से लाभान्वित होता रहा है |भारतीय परंपरा में इनके विलक्ष्ण प्रयोग और लाभ मिलते रहे हैं |यह व्यक्ति के हर समस्या का समाधान करने में सक्षम हैं और इनपर भारतीय मनीषियों ने बहुत शोध किये हैं |व्यक्ति अधिकतम कैसे सुखी हो सकता है ,कैसे उसके कष्ट कम किये जा सकते हैं जिससे वह अधिक से अधिक सुखी रहते हुए अपना लक्ष्य प्राप्त कर सके |इन्ही आधारों में दैवीय यन्त्र और कवच -ताबीज भी हैं |विभिन्न आकृतियों और निश्चित आकारों में निश्चित ऊर्जा होती है और विभिन्न शब्दों में भिन्न शक्तियाँ |इनके प्रयोग से विशिष्ट ऊर्जा उत्पन्न कर उसका प्रयोग विभिन्न लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए करना ही इनका मूल उद्देश्य होता है |इनसे भौतिक ही नहीं आध्यात्मिक लक्ष्य भी प्राप्त किये जाते हैं |यह व्यक्ति को उसके भाग्य प्राप्ति में आ रही रुकावटों को हटाते हैं और नयी उरा प्रदान करते हैं |उच्च स्तर का साधक यदि इन्हें निर्मित कर दे तो वह भाग्य में भी हस्तक्षेप कर देता है |न साधकों -सिद्धों की शक्तियों की कोई सीमा रही है न इन कवच -ताबीजों की | 

                ताबीज आदि के निर्माण में एक वृहद् ऊर्जा वज्ञान काम करता है ,जिसे प्रकृति का विज्ञानं कहा जाता है |यह मूल ब्रह्मांडीय विज्ञान है जिसे हमारे ऋषि मुनि जानते थे और मानव की भलाई के लिए इसे उपयोगी बनाया |एक विशिष्ट क्रिया ,विशिष्ट पद्धति और विशिष्ट समय में विशिष्ट वस्तुओं के संयोग से विशिष्ट व्यक्ति द्वारा निर्मित ताबीज और यंत्र में एक विशिष्ट शक्ति का समावेश हो जाता है ,जो किसी भी सामान्य व्यक्ति को चमत्कारिक रूप से प्रभावित करती है जिससे उसके कर्म ,स्वभाव ,सोच ,व्यवहार ,ग्रहों के प्रति संवेदनशीलता ,प्रारब्ध ,शारीरिक रासायनिक क्रिया सब कुछ प्रभावित होने लगता है ,जिससे उसके आगामी भविष्य पर प्रभाव पड़ता है |

                   ताबीज  में प्राणी के शरीर और प्रकृति की उर्जा संरचना ही कार्य करती है ,,इनका मुख्य आधार मानसिक शक्ति का केंद्रीकरण और भावना के साथ विशिष्ट वस्तुओं-पदार्थों-समय का तालमेल होता है| ,,,,प्रकृति में उपस्थित वनस्पतियों और जन्तुओ में एक उर्जा परिपथ कार्य करता है ,मृत्यु के बाद भी इनमे तरंगे कार्य करती है और निकलती रहती हैं ,,,,इनमे विभिन्न तरंगे स्वीकार की जाती है और निष्कासित की जाती है |जब किसी वस्तु या पदार्थ पर मानसिक शक्ति और भावना को केंद्रीकृत करके विशिष्ट क्रिया की जाती है तो उस पदार्थ से तरंगों का उत्सर्जन होने लगता है ,,,,जिस भावना से उनका प्रयोग जिसके लिए किया जाता है ,वह इच्छित स्थान पर वैसा कार्य करने लगता है ,|

    उदहारण के लिए ,,,किसी व्यक्ति को व्यापार वृद्धि के लिए कुछ बनाना है ,तो इसके लिए इससे सम्बंधित वस्तुएं अथवा यन्त्र विशिष्ट समय में विशिष्ट तरीके से निकालकार अथवा निर्मित करके जब कोई उच्च स्तर का साधक अपने मानसिक शक्ति के द्वारा उच्च शक्तियों के आह्वान के साथ जब प्राण प्रतिष्ठा और अभिमन्त्रण करता है तो वस्तुगत उर्जा -यंत्रागत उर्जा के साथ साधक की मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा का ऐसा अद्भुत संयोग बनता है की निर्मित ताबीज से तीब्र तरंगें निकालने लगती हैं ,इन्हें जब सम्बंधित धारक को धारण कराया जाता है तो यह ताबीज उसके व्यापारिक चक्र [लक्ष्मी या संमृद्धि के लिए उत्तरदाई ] को स्पंदित करने लगता है ,दैवीय प्रकृति की शक्ति आकर्षित हो धारक से जुड़ने लगती है और उसकी सहायता करने लगती है ,अनावश्यक विघ्न बाधाएं हटाने लगती है ,साथ ही मन और मष्तिष्क  भी प्रभावित होने लगता है ,जिससे उसके निर्णय लेने की क्षमता ,शारीरिक कार्यप्रणाली ,दैनिक क्रिया कलाप बदल जाते है ,उसके प्रभा मंडल पर एक विशेष प्रभाव पड़ता है ,जिससे उसकी आकर्षण शक्ति बढ़ जाती है ,बात-चीत का ढंग बदल जाता है ,सोचने की दिशा परिवर्तित हो जाती है ,कर्म बदलते हैं ,,प्रकृति और वातावरण में एक सकारात्मक बदलाव आता है और व्यक्ति को लाभ होने लगता है,, |

    यह एक उदाहरण है ,ऐसा ही हर प्रकार के व्यक्ति के लिए हो सकता है उसकी जरुरत और कार्य के अनुसार ,|यहाँ यह अवश्य ध्यान देने योग्य होता है की यह सब तभी संभव होता है जब वास्तव में साधक उच्च स्तर का हो ,उसके द्वारा निर्मित ताबीज खुद उसके हाथ द्वारा निर्मित हो ,सही समय और सही वस्तुओं से समस्त निर्माण हो ,|ऐसा न होने पर अपेक्षित लाभ नहीं हो पाता| ताबीज और यन्त्र तो बाजार में भी मिलते है और आजकल तो इनकी फैक्टरियां सी लगी हैं ,जो प्रचार के बल पर बेचीं जा रही हैं ,कितना लाभ किसको होता है यह तो धारक ही जानता है |

           ताबीज बनाने वाले साधक की शक्ति बहुत मायने इसलिए रखती है की  जब वह अपने ईष्ट में सचमुच डूबता है तो वह अपने ईष्ट के अनुसार भाव को प्राप्त होता है ,,भाव गहन है तो मानसिक शक्ति एकाग्र होती है ,जिससे वह शक्तिशाली होती है ,यह शक्तिशाली हुई तो उसके उर्जा परिपथ का आंतरिक तंत्र शक्तिशाली होता है और शक्तिशाली तरंगे उत्सर्जित करता है |ऐसा व्यक्ति यदि किसी विशेष समय,ऋतू-मॉस में विशेष तरीके से ,विशेष पदार्थो को लेकर अपनी मानसिक शक्ति और मन्त्र से उसे सिद्ध करता है तो वह ताबीज धारक व्यक्ति को अच्छे-बुरे भाव की तरंगों से लिप्त कर देता है |यह समस्त क्रिया शारीर के उर्जा चक्र को प्रभावित करती है और तदनुसार व्यक्ति को उनका प्रभाव दिखाई देता है| यह ताबीजें इतनी शक्तिशाली होती हैं की व्यक्ति का प्रारब्ध तक प्रभावित होने लगता है |अचानक आश्चर्यजनक परिवर्तन होने लगते हैं |

                आपने अनेक कहानियाँ सुनी होंगी की अमुक चीज अमुक साधू ने दिया और ऐसा हो गया |अथवा यह सुना होगा की अमुक तांत्रिक ने अमुक छीजें कुछ बुदबुदाकर फेंकी व्यक्ति को लाभ हो हया |यह बहुत छोटे उदाहरण हैं |जिस तरह साधना से ईश्वरीय ऊर्जा आती है उसी तरह यह मानसिक एकाग्रता से वस्तु और यन्त्र में स्थापित भी होती है |तभी तो मूर्तियाँ और यन्त्र प्रभावी होते हैं |यही यन्त्र ताबीजों में भरे जाते हैं और प्रभाव देते हैं |यह किसी  यन्त्र विशेष का प्रचार नहीं अपितु वैज्ञानिक विश्लेष्ण का प्रयास है और हमने इसे बहुत सत्य पाया है |यही कारण है की हम अपने सभी अनुष्ठानों में भोजपत्र पर यंत्र अवश्य बनाते हैं और साधना समाप्ति पर उन्हें धारण करते भी हैं और कराते भी हैं |यह धारण मात्र से साधना जैसा प्रभाव देते हैं |यह जानकारी हमारे पेज के पाठकों के लिए |

               आजकल एक चलन फैशन सा हो गया है की ज्योतिषियों -साधकों -तांत्रिकों द्वारा लिखे जा रहे लेखों -पोस्टो पर भद्दे और मूर्खतापूर्ण टिपण्णी आते हैं |कभी कहा जाता है की इनमे इतनी शक्ति है तो अपना भाग्य क्यों नहीं बदल लेते ,कभी कहा जाता है की ज्योतिषी अपना भाग्य क्यों नहीं सुधार लेता |क्यों यह लोग फेसबुक ,इंटरनेट पर लिखते फिर रहे हैं |किसी ताबीज ,यन्त्र ,कवच ,डिब्बी ,गुटिका आदि के लेख को प्रचार से जोड़ा आता है ,भले उसमे वैज्ञानिक सूत्र हों |ऐसे लोगों को हम जबाब देना चाहेंगे कि एक सामान्य व्यक्ति ,सामान्य साधक ,सामान्य ज्योतिषी को उसके भाग्य से अधिक नहीं मिल सकता जबकि सामान्य जीवन में इतनी नकारात्मक उर्जाओं और शक्तियों का प्रभाव होता है की किसी को उसके भाग्यानुसार भी नहीं मिलता |लेख लिखने वाले को उसके भाग्यानुसार मिलता है किन्तु यह उसका कर्म है की वह लोगों को बताता है ,समझाता है |यदि वह यह न करे तो लोगों का भला ही न हो |यदि वह मात्र खुद के लिए सोचे तो करोड़ों इन विद्याओं के लाभ से वंचित रह जायेंगे |अक्सर ज्योतिषी के कथन गलत होते हैं और भाग्य अनुसार परिणाम नहीं आते|ज्योतिषी सही होता है किन्तु नकारात्मक उर्जाओं के प्रभाव से भाग्यावारोध होने से लोगों को उनके भाग्य के अनुरूप नहीं मिलता |यह कवच ,ताबीज ,यन्त्र ,डिब्बी ,गुटिका इसी नकारात्मक उर्जाओं ,शक्तियों को हटाते हैं और सकारात्मक उर्जाओं को बढ़ा देते हैं जिससे भाग्य का पूरा मिलने लगता है और बड़ा परिवर्तन महसूस होता है |………………………………………………………हर-हर महादेव

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  • चमत्कारी डिब्बी /गुटिका

    चमत्कारी डिब्बी /गुटिका

    चमत्कारी- दिव्य गुटिका /डिब्बी  

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    स्वयं अपनी समस्या दूर करने का एक अलौकिक अस्त्र

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                 आज के समय में हर घर -परिवार में किसी न किसी रूप में नकारात्मक शक्तियों /उर्जाओं का प्रभाव है जिसके कारण जो समस्याएं होती हैं वह तो होती ही हैं किन्तु जो भाग्य में होता है वह भी नहीं मिलता |भाग्य का प्रभाव भी नकारात्मक उर्जाओं द्वारा रोक दिया जाता है |बुरे प्रभाव बढ़ जाते हैं जबकि अच्छे परिणाम कम मिलते हैं |नकारात्मक ऊर्जा की प्रकृति कुलदेवता दोष की हो सकती है,पित्र दोष की हो सकती है ,किसी द्वारा किया गया टोना -टोटका -तांत्रिक अभिचार हो सकता है ,जमीन में दबी कोई वस्तु या हड्डी या कंकाल या राख आदि हो सकती है ,कहीं बाहर से आई कोई आत्मा या प्रेत हो सकता है |मकान में वास्तु दोष हो सकता है या राहू -केतु -शनी के दुष्प्रभाव हो सकते हैं |इनका निवारण जानने -उपाय करने के लिए लोग यहाँ वहां भटकते रहते हैं और प्रयास करने पर भी अपेक्षित परिणाम नहीं पाते |हम इन समस्याओं के निवारण का प्रयास तंत्र के माध्यम से अपनी जानकारी के अनुसार करने का प्रयत्न कर रहे हैं |हमने कुछ दुर्लभ वस्तुओं को संगृहीत कर इनकी काट निकाली है |इन वस्तुओं में विभिन्न दैवीय शक्तियाँ ,भिन्न भिन्न उर्जायें होती हैं जो तंत्र में हजारों वर्ष से उपयोग की जाती रही हैं |इन्हें इस प्रकार संयोजित किया गया है की यह एक साथ मिलकर ऐसा प्रभाव उत्पन्न करें की किसी की व्यक्तिगत समस्या से लेकर परिवार की सामूहिक समस्या तक का निवारण हो सके |

               उपरोक्त समस्याओं के अतिरिक्त सामान्यरूप से हर किसी की चाह होती है की लोग उनकी और आकर्षित हों ,देखकर खींचे चले आयें ,जो मिले प्रभावित हो ,जहाँ जाए किसी काम से वहां सफलता मिले ,कहीं किसी समस्या-परेशानी का सामना न करना पड़े |हर इंसान के अन्दर यह कामना होती है की उसका व्यक्तित्व ऐसा आकर्षक हो की लोग चुम्बक की तरह खिचे चले आये ,उसका व्यतित्व सम्मोहक हो |हर व्यक्ति पर उसका प्रभाव पड़े ,कार्य-व्यवसाय के क्षेत्र के लोग अनुकूल हों ,सफलता मिले ,उन्नति हो |यह असंभव नहीं है |यह संभव है तंत्र के माध्यम से |इस हेतु थोड़े से नियम और सावधानी के साथ यदि हमारे द्वारा निर्मित दिव्य गुटिका /डिब्बी का प्रयोग किया जाए |यह गुटिका तंत्र की उन दिव्य चमत्कारी वस्तुओं से परिपूर्ण हैं जो किसी के भी जीवन में चमत्कार कर सकती है |इसकी क्षमता की कोई सीमा नहीं है |इससे वह सबकुछ पाया जा सकता है जो एक सामान्य व्यक्ति की इच्छा होती है ,यद्यपि इसके अनेक अलौकिक प्रयोग भी है ,जो असंभव कार्य भी कर सकते हैं पर उनसके लिए इसपर विशिष्ट क्रियाएं करनी होती हैं |कोई क्रिया न भी की जाए और सामान्य पूजा के साथ पवित्रता राखी जाए तो उपरोक्त लाभ मिलते ही हैं |

                  दिव्य गुटिका या चमत्कारी डिब्बी विशिष्ट वस्तुओं -वनस्पतियों -पदार्थों का एक अद्भुत संग्रह है अर्थात एक डिब्बी में २५ अलौकिक शक्तियां रखने वाली वस्तुएं इकठ्ठा की गयी है |हर वस्तु उसके लिए उपयुक्त विशिष्ट मुहूर्त में तांत्रिक पद्धतियों से निकाली -प्राण प्रतिष्ठित और अभिमंत्रित की गयी होती है ,इसके बाद फिर इसे सम्मिलित रूप से विशिष्ट मुहूर्त में अभिमंत्रित किया जाता है जिससे इसकी अलौकिकता और बढ़ जाती है | इस चमत्कारिक दिव्य गुटिका के मुख्य अवयव रवि पुष्य योग में निष्काषित अथवा अभिमंत्रित -प्राण प्रतिष्ठित हत्थाजोड़ी और सियार्सिंगी होते है ,जिनके साथ श्वेतार्क मूल ,नागदौन मूल ,महायोगेश्वरी मूल ,एरंड मूल ,अमरबेल मूल ,हरसिंगार मूल ,सफ़ेद गुंजा ,अपराजिता मूल ,गोरोचन ,रुद्राक्ष ,पिली कौड़ी ,औदुम्बर मूल ,दक्षिणावर्ती शंख ,गोमती चक्र आदि विभिन्न २५ अद्भुत ,विशिष्ट और चमत्कारिक वनस्पतियाँ और वस्तुएं होती हैं ,जो मिलकर ऐसा अद्भुत प्रभाव उत्पन्न करते हैं की यह चमत्कारिक प्रभाव युक्त हो जाती है |[क्षमा के साथ सम्पूर्ण वस्तुओं का नाम नहीं दे सकते क्योकि यह हमारा व्यक्तिगत शोध है ]|

                यह सभी वस्तुएं विशिष्ट उच्च स्तर के साधक द्वारा विशिष्ट मुहूर्त में प्राण-प्रतिष्ठित और अभिमंत्रित होती हैं ,जबकि उपयोग किये गए सामान भी विशिष्ट मुहूर्त में ही विशिष्ट तांत्रिक पद्धति से निष्कासित और प्राप्त किये हुए होते हैं |उपरोक्त वस्तुओं की उपयुक्त और विशिष्ट मुहूर्त में विशिष्ट तांत्रिक साधक द्वारा की गयी तांत्रिक क्रिया के बल पर यह गुटिका अति शक्तिशाली वशिकारक-आकर्षक -सुरक्षाप्रदायक ,धन-संमृद्धि प्रदायक हो जाती है साथ ही इसमें काली [चामुंडा ]की प्रतिष्ठा होने से यह नकारात्मक ऊर्जा और नकारात्मक शक्तियों पर तीव्र प्रतिक्रिया करती है |इससे निकलने वाली तरंगे साथ रखने वाले धारक के साथ साथ ही आसपास के लोगों को भी प्रभावित करती है, जिससे धारक को उपरोक्त लाभ मिलने लगते हैं |इस गुटिका की एक विशेषता है की यह आपके घर की या आपकी नकारात्मक ऊर्जा को सामने ला देती है |यदि आप किसी नकारात्मक प्रभाव से ग्रस्त हैं तो वह कुछ दिक्कतें उत्पन्न कर सकती हैं ,क्योकि उन्हें यह महसूस होता है की उन्हें निकाला या हटाया जा रहा है ,इसलिए शुरू के कुछ समय वह उत्पात मचा सकते हैं जिससे आप यह सोचें की यह सब इस गुटिका के कारण हो रहा है |यदि कुछ समय धैर्य से निकल गया तो सारी परिस्थितियां नियंत्रण में आ जाती हैं |

            इसमें उपयोग की गयी हत्थाजोड़ी में माता चामुंडा का वास माना जाता है |इस जड़ी का सर्वाधिक प्रभाव इसकी सम्मोहंनशीलता है | साधक [व्यक्ति] इसे लेकर कही भी जाये उसका विरोध नहीं होगा |सम्बंधित मनुष्य उसके अनुकूल आचरण और व्यवहार करेगा |इस जड़ी के इसी गुण [सम्मोहनशीलता ]के कारण ही बहुत से लोग इसका प्रयोग प्रेम सम्बन्धी मामलों में भी करते हैं ,,|पति-पत्नी के मामलों में यह अत्यंत उपयोगी भी है और सदुपयोग भी |सम्मोहन और वशीकरण [आकर्षण ]के अतिरिक्त इसका प्रयोग धन वृद्धि ,सुरक्षा ,सौभाग्य वृद्धि ,व्यापार बाधा हटाने आदि में भी किया जाता है और बेहद प्रभावी भी है | इसकी सम्पूर्ण विधि पूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा इसे अमूल्य बना देती है |धारक या साधक यात्रा ,विवाद ,प्रतियोगिता ,साक्षात्कार ,द्युतक्रीडा ,और युद्धादी में यह साधक की रक्षा करके उसे विजय प्रदान करती है |भूत-प्रेत आदि वायव्य बाधाओं का उसे कोई भय नहीं रहता ,धन-संपत्ति देने में भी यह बहुत चमत्कारी सिद्ध होती है |इस पर विभिन्न प्रकार के वशीकरण-आकर्षण-सम्मोहन के प्रयोग किये जाते हैं ,विदेश यात्रा की रुकावटें दूर करने की क्रियाएं होती हैं ,घर की सुरक्षा की क्रियाएं होती हैं ,धन-संपत्ति-आकस्मिक लाभ सम्बन्धी क्रियाएं होती हैं ,व्यापार वृद्धि प्रयोग होते हैं ,मुकदमे में विजय ,विरोधियों की पराजय की क्रियाएं होती है ,,इसे जेब में रखा जाये तो सम्मान-सम्मोहंशीलता-प्रभाव बढ़ता है ,सामने के व्यक्ति का वाकस्तम्भन होता है ,आकस्मिक आय के स्रोत बनते हैं

                   दूसरी वस्तु सियार्सिंगी शत्रु पराभव ,सामाजिक सम्मान ,शरीर रक्षा ,श्री समृद्धि ,आकर्षण ,वशीकरण ,सम्मोहन ,धन-सम्पदा ,सुख शान्ति के लिए उपयोग की जा सकती है |किसी शुभ तांत्रिक मुहूर्त में प्राण प्रतिष्ठित और अभिमंत्रित सियारसिंगी वाद-विवाद ,युद्ध ,संकट ,आपदा ,से बचानेवाला भी सिद्ध होता है |यह रक्षा कार्यों में अद्भुत सफलतादायक कहा जाता है |इसे धारण करनेवाला व्यक्ति दुर्घटना ,विवाद ,युद्ध अथवा किसी अन्य संकट में पड़ने पर तुरंत ही आप्दामुक्त हो जाता है |इस पर धन-समृद्धि ,वशीकरण ,सम्मोहन ,सुरक्षा से सम्बंधित विभिन्न क्रियाएं भी होती हैं ,जैसी आवश्यकता हो |केवल मंत्र और पद्धति ही बदलती है सियारसिंगी वही रहता है |इसे रखने वाला व्यक्ति जहाँ भी जाता है वहां का वातावरण उसके अनुकूल हो जाता है | इसी प्रकार इस गुटिका में शामिल २५ वस्तुओं में से हर वस्तु का अपना एक अलग और विशिष्ट बहुआयामी प्रभाव है |इनके बारे में लिखने पर कई पोस्ट कम हो जायेंगे |वैसे भी यह हमारे गोपनीय खोज हैं अतः सभी वस्तुओं और उनके प्रभावों के बारे में बता पाना भी संभव नहीं |

                  प्रतिदिन प्रातः काल स्नानादि के बाद ,अपने ईष्ट पूजा के साथ ही इस गुटिका /डिब्बी को भी भगवती स्वरुप मानकर पूजा कर दिया जाता है |धुप-दीप के साथ ,इसके साथ ही इस पर सिन्दूर और लौंग भी चढ़ाया जाता है |फिर इसे बंद करके इसे जेब में रख के कार्य व्यवसाय पर भी जाया जा सकता है और पूजा स्थान पर भी रहने दिया जा सकता है |यदि कार्य व्यवसाय पर साथ ले जाते हैं तो लाभ तो अधिक होता है पर थोड़ी पवित्रता का ध्यान रखना होता है ,अपवित्र हाथों से इसे न छुआ जाए और अशुद्ध और अपवित्र अथवा सूतक वाले स्थानों पर इसे न ले जाएँ |शाम को घर आने पर इसे वापस पूजा स्थान पर रख दें |इस पर यदि “ॐ नमश्चंडिकाये नमः ” मंत्र का जप रोज १०८ बार किया जाए तो इसका पूर्ण प्रभाव मिलता है |

                 इस गुटिका/डिब्बी के उपयोग से धन वृद्धि ,सम्मोहन, वशीकरण ,वायव्य बाधाओं से सुरक्षा ,शत्रुओं से सुरक्षा ,अभिचार कर्म से सुरक्षा ,संपत्ति संवर्धन ,यात्रा में सुरक्षा ,विवाद-प्रतियोगिता में सफ़लता ,साक्षात्कार में सफ़लता ,द्युतक्रीडा -शेयर -सट्टा -लाटरी -कमोडिटी के कार्यों में सफलता ,शत्रु से अथवा मुकदमे में विजय ,अधिकारी का अनुकूलन -वशीकरण ,गृह दोष-वास्तु दोष का शमन ,गृह कलह का शमन ,ग्रह बाधा-अशुभत की समाप्ति ,प्रियजनों का अनुकूलन-वशीकरण ,व्यावसायिक -व्यापारिक बाधा अथवा बंधन निवारण ,व्यापार वृद्धि ,पित्र दोष -कुलदेवता /देवी दोष की शान्ति ,मकान -जमीन के नीचे के दोषों का शमन ,टोने -टोटके -तांत्रिक अभिचार ,किये -कराये का शमन ,घर में भूत -प्रेत का शमन किया जा सकता है |इसके अतिरिक्त भी यह गुटिका के अनेकानेक और विशिष्ट उपयोग हैं ,जिनके लिए विविध प्रकार की क्रियाएं की जा सकती है ,इसकी क्षमता की कोई सीमा नहीं है ,उद्देश्य के अनुसार भिन्न क्रियाएं विभिन्न मनोकामनाएं पूर्ण कर सकती हैं |यह गुटिका हमारे वर्षों के tantra क्षेत्र में शोध का परिणाम है और इसके परिणाम अनुभूत हैं |यह सामान्य पूजा पर अपना प्रभाव दिखाती ही है किन्तु कोई विशिष्ट उद्देश्य होने पर अलग पूजा विधान भी हमने कई उद्देश्यों के लिए बनाकर अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर रखे हैं ताकि डिब्बी के धारक अपने उद्देश्य अनुसार पूजन और साधना कर अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकें |

    विशेष – यह चमत्कारी डिब्बी /गुटिका अनेक समस्याएं समाप्त कर सकती है ,नकारात्मक प्रभाव हटा आपके भाग्य का अधिकतम दिला सकती है किन्तु यह स्वयं आपका भाग्य नहीं बदल सकती |हम कोई झूठा आश्वासन नहीं देना चाहते की यह आपको राजा बना देगी |आपके भाग्य में जो है उसका अधिकतम दिला सकती है किन्तु भाग्य तो केवल आपके प्रयास ही बदल सकते हैं |यह आपकी सहायक हो सकती है किन्तु श्रम और कर्म आपके होंगे |हमने बहुत शोध ,श्रम और संतुलन के साथ इसका निर्माण लोगों की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ती और उनके मार्ग में आ रही बाधाओं को हटाने के लिए किया है और इसके बहुत अच्छे परिणाम मिलें हैं |………………………………………………………………हर-हर महादेव 

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  • महाशंख  

                          महाशंख के विषय में समस्त प्रभावशाली तथ्य केवल कुछ शाक्त ही जानते हैं |इसके अलावा सभी लोग tantra में शंख का प्रयोग इसी महाशंख के कारण करते हैं |लेखक लोग शंख को ही तांत्रिक सामग्री मानकर ग्रन्थ पूर्ण कर देते हैं |में आपसे यह स्पष्ट करना चाहता हूँ की शंख और महाशंख दोनों अलग हैं |यह क्या है और इसके tantra प्रयोग क्या हैं यह हम स्पष्ट करते हैं |शंख को बजाना शुभ होता है |शंख के द्वारा अर्ध्य दिया जाता है |शंख द्वारा देव स्नान कराया जाता है ,कुछ सेवन किया जाता है ,|इसके आलावा शंख के tantra में कोई प्रयोग नहीं होते |दक्षिणावर्ती शंख भी पूजन में ही प्रयुक्त होता है जिसका प्रयोग लक्ष्मी उपासना में किया जाता है ,इसके अतिरिक्त बहुत प्रयोग tantra में शंख के नहीं हैं ,जबकि महत्त्व बहुत दिया जाता है ,इसका कारण यही महाशंख है जिसके बारे में हम आगे बताने जा रहे हैं |वास्तव में शंख और महाशंख में बहुत भेद होता है |
                       व्यक्ति के प्राणांत हो जाने पर उसी शव से यह महाशंख प्राप्त होता है ,जबकि शंख तो समुद्र में जीव का खोल है |इसे हमेशा याद रखना चाहिए |स्त्री और शूद्र से चांडाल की उत्पत्ति होती है तथा “तज्जायश्चेव चांडाल सर्व मंत्र विवर्जितः ” इसी कारण यह लोग मन्त्रों से हीन होते हैं |”मंत्रहीनेतुस्थ्यादिसर्ववर्ण विभुषिताम” जो लोग मन्त्रों से हीन होते हैं उन्ही की अस्थियों में सभी वर्ण रहते हैं |
                         जो साधक महाशंख की माला से जप करता है वह निःसंदेह अणिमा आदि सिद्धियों को प्राप्त करता है |यह माला बनानी तथा प्राप्त करनी तो सरल है क्योकि इसमें धन का कोई व्यय नहीं होता किन्तु खतरनाक अवश्य है |धन के विषय में जितनी सरल है उतनी ही स्वर्ग से भी दुर्लभ है ,क्योकि स्वर्ग तो आपको प्राप्त हो जाएगा परन्तु इस माला की प्राप्ति किसी व्यावसायिक व्यक्ति से नहीं होती |यहाँ तक की आज के तथाकथित बड़े बड़े तांत्रिक और स्वयंभू साधक तक इसके बारे में जानते तक नहीं ,पानी और देखनी तो दूर की बात है |इसे प्राप्त करने के लिए श्मशान में घूमना पड़ता है अथवा यह माला भाग्यवश ही गुरुकृपा से प्राप्त होती है |व्यक्ति इसे बना सकता है अगर खुद भी प्रयास करे तो |इस माला के द्वारा सही मन्त्रों का जप करना चाहिए |मंत्र के सभी दोषों को यह माला समाप्त कर देती है |मंत्र किसी भाँती के दोष से युक्त हो सकता है परन्तु यह माला कभी भी दोषी नहीं होती है |इसी कारण    महाशंख सर्वत्र तेषु योजितम अर्थात महाशंख ही सब प्रकार के मन्त्रों से लाभ प्राप्त करने के लिए सर्वश्रेष्ठ है |
    पूर्वजन्म के शुभ तथा सफल कर्मो के प्रयास से यदि कभी किसी को महाशंख की माला प्राप्त हो जाती है तो वह व्यक्ति तो क्या उसका समस्त परिवार ही समस्त साधनाओं का लाभ प्राप्त कर लेता है |
    क्या है महाशंख
    ——————– महाशंख के विषय में समस्त प्रभावशाली तथ्य केवल कुछ शाक्त ही जानते हैं |इसके अलावा सभी लोग तंत्र में शंख का प्रयोग इसी महाशंख के कारण करते हैं |लेखक लोग शंख को ही तांत्रिक सामग्री मानकर ग्रन्थ पूर्ण कर लेते हैं |इसका कारण यह है की लेखक अच्छे साधक ही मुश्किल से होते हैं उस पर वे उच्च स्तर के शाक्त साधक हों बेहद मुश्किल है |खुद साधना और मूल तंत्र का अनुभव न होने से यहाँ वहां से सुनी हुई बातों और पुराने शास्त्रों को तोड़ मरोड़कर कुछ अपनी कल्पनाएँ घुसेड़कर एक किताब लिख देते हैं और कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं |वास्तविक तंत्र एक तो वैसे भी गोपनीय होता है जो इन लेखकों को पता ही नहीं चलता उस पर खुद साधना ज्ञान न होना कोढ़ में खाज हो जाता है और सतही षट्कर्म की किताब सामने होती है |आज तंत्र की दुर्दशा का यह बहुत बड़ा कारण है और मूल तंत्र के लोप का भी |
    सामान्य शंख को बजाना शुभ होता है |शंख के द्वारा अर्ध्य दिया जाता है |शंख द्वारा कुछ सेवन किया जाता है |शंख द्वारा देव स्नान भी कराते हैं |इसके अलावा तंत्र में शंख के कोई काम नहीं होते जबकि शंख का महत्त्व बहुत अधिक है |तो आखिर वह कौन सा शंख है जो इतना महत्त्व पूर्ण है |तंत्र में दक्षिणावर्ती शंख का प्रयोग लक्ष्मी प्राप्ति हेतु जरुर किया जाता है ,किन्तु यह पूजन होता है |वास्तव में शंख और महाशंख में बहुत बड़ा अंतर होता है |
    व्यक्ति के प्राणांत हो जाने पर उसी शव से यह महाशंख प्राप्त होता है जबकि शंख की प्राप्ति सबको मालूम है |चांडाल लोग मन्त्रों से हीन होते हैं और जो लोग मन्त्रों से हीन होते हैं उन्ही की अस्थियों में सभी वर्ण होते हैं |हिंदी की शब्दमाला को ही वर्ण या वर्णमाला कहते हैं |इन्ही वर्णों पर अं की मात्रा लगाने से यह वर्ण बीज वर्ण बन जाते हैं |अ से लेकर क्ष तक के सभी वर्ण अस्थियों के मध्य सदा विद्यमान रहते हैं |प्रस्तुत चित्र के अनुसार दर्शाए गएँ अंगों पर चिन्ह के स्थानों की अस्थि लेकर माला बनाने पर वह महाशंख की माला कहलाती है |
    इस माला के द्वारा जप करने पर समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं |इन स्थानों की अस्थियाँ लेकर स्थानानुसार ही माला में पिरोया जाता है ||इस माला को सर्प की भाँती बनाया जाता है अर्थात आगे से मोती होती होती पीछे जाकर पतली हो जाए |स्पष्टतः यह समझ लें की माला का मूल मोटा और फिर क्रमशः पतला होता चला जाता है |माला को बनाते समय पहले मोती अस्थि डाली जाती है ,फिर उससे पतली ,फिर और उससे पतली अस्थि पिरोते जाते हैं |जहाँ जहाँ चित्र में चिन्ह लगे हैं वहां वहां की अस्थि ली जाती है |सर से पैर तक की अस्थियाँ क्रम से पिरोई जाती हैं |जब माला बन जाती है तो प्रणव की गाँठ लगाईं जाती है |इसके उपर एक लम्बी अस्थि डालकर पुनः ब्रह्मगाँठ लगाईं जाती है |इसे बनाकर प्राण प्रतिष्ठा की जाती है |प्राण प्रतिष्ठा का विधान अत्यंत गोपनीय होता है |
    इस माला को गोपनीय रखा जाता है और इस पर जप की शुरुआत मोटी तरफ से करके समापन पतली तरफ किया जाता है |पुनः मोती तरफ से शुरुआत होती है |इस भाँती जप करने से निश्चित सिद्धि प्राप्त होती है |
    महाशंख की माला बनाने के लिए स्त्री ,ब्राह्मण तथा मन्त्र दीक्षित व्यक्ति के शव की अस्थियाँ नहीं ली जाती |शव साधना में भी स्त्री का शरीर उपयोग नहीं किया जाना चाहिए |महाशंख की माला हेतु बिना दीक्षित ,जो ब्राह्मण न हो उसके शव की अस्थियाँ उपयुक्त होती हैं इसीलिए शूद्र अथवा चांडाल की अस्थियाँ अधिक उपयुक्त होती हैं |………………………………………………………..हर-हर महादेव 

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  • गृहस्थ कैसे ईश्वरीय शक्ति महसूस करे ?

    गृहस्थ कैसे ईश्वरीय शक्ति महसूस करे       
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            हमने अपने ब्लॉग पर प्रकाशित लेख -“” क्यों अपना कष्ट खुद दूर नहीं करते“” में सामान्य लोगों के जीवन ,कष्टों ,समस्याओं पर लिखा था और सुझाव रखा था की क्यों न हम खुद अपना कष्ट दूर करें ,बजाय यहाँ वहां ,पंडितों ,मौलवियों ,ज्योतिषियों ,तांत्रिकों ,मंदिरों ,मस्जिदों तक दौड़ने के |हमारा उद्देश्य यह है की व्यक्ति खुद इतनी ईश्वरीय ऊर्जा प्राप्त करे की उसके कष्ट दूर हो जाएँ |वह शोषण ,धोखे ,फरेब से बच सके ,साथ ही एक शक्ति ऐसी उसके साथ जुड़े जो हमेशा उसकी सहायक रहे ,अर्थात ईश्वर वास्तविक रूप से व्यक्ति के साथ जुड़े |इस सम्बन्ध में लोगों के पास अक्सर कोई स्पष्ट दृष्टि नहीं होती |तकनिकी ज्ञान नहीं होता ,जबकि लगभग हर आस्तिक व्यक्ति पूजा पाठ करता है ,मंदिरों मस्जिदों में जाता है और चाहता है की ईश्वर उससे जुड़े ,उस पर कृपा करे ,उसके कष्ट दूर करे ,उसे सुखी करे |हर व्यक्ति ईश्वर और ईश्वरीय ऊर्जा महसूस करना चाहता है किन्तु अधिकतर को वर्षों पूजा पाठ करने पर कुछ भी महसूस नहीं होता ,बड़े बड़े कर्मकांड ,अनुष्ठान का कभी कभी कोई परिणाम नहीं दिखता ,इसलिए ही हमें यह लेख लिखने की जरूरत महसूस हुई की कुछ मूलभूत बातें जो हमें ज्ञान हैं यदि उनसे किन्ही लोगों का भला हो जाए और उन्हें ईश्वरीय ऊर्जा महसूस हो तो बताने
    में कोई बुराई नहीं
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            ईश्वरीय ऊर्जा या शक्ति महसूस करना आसान नहीं ,किन्तु यह उतना कठिन भी नहीं जितना लोग सोचते हैं या कहा जाता है |यदि निष्ठा ,चाहत ,लगन ,श्रद्धा ,विश्वास है तोईश्वर जरुर मिलता है “|ईश्वर का साक्षात्कार अक्सर साधकों को होता है ,किन्तु उसकी शक्ति ,उसकी ऊर्जा तो हर कोई महसूस कर सकता है यदि चाह ले तो |हालांकि जो तरीके हम लिखने जा रहे उनसे भी साक्षात्कार हो सकता है यदि
    व्यक्ति एकाग्र हुआ तो
    |ईश्वरीय उर्जा या शक्ति प्राप्त करने ,उसे महसूस करने के लिए सबसे पहले तो खुद को उससे जोड़ना होना ,उसमे डूबना होगा ,उसका चिंतन करना होगा ,उस पर एकाग्र होना होगा ,खुद को उसका और उसको अपना समझना होगा ,इतना जुड़ाव महसूस करना होगा की वह अवचेतन तक जुड़ जाए |यहाँ महत्त्व वस्तुओं ,पदार्थों ,पूजन सामग्रियों ,आडम्बरों ,मंत्र संख्याओं का नहीं होता अपितु महत्त्व भावना ,एकाग्रता और चाहत का होता है |ईश्वरीय ऊर्जा महसूस करने के लिए गुरु की भी कोई बहुत आवश्यकता नहीं ,यद्यपि साक्षात्कार और सिद्धि बिन गुरु के मुश्किल होती है |हमने जो भी पद्धतियाँ सोची हैं अथवा विकसित की हैं इस हेतु उन्हें बिन गुरु के किया जा सकता है ,हाँ सुरक्षा कवच की जरूरत पड़ती है जो सिद्ध साधक से बनवाकर धारण किया जा सकता है |कुछ पद्धतियाँ ईश्वरीय
    ऊर्जा महसूस करने के लिए निम्न हो सकती हैं
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    हमने अपने blogपर तथा अपने फेसबुक पेजों अलौकिक शक्तियाँतथा “tantramarg” पर एक साधना पद्धति प्रकाशित की हुई है जिसका शीर्षक है ,”15 मिनट पर्याप्त हैं ईश्वरीय ऊर्जा प्राप्ति के लिए या “15 मिनट और ईश्वरीय शक्ति प्राप्ति “| इस पद्धति में दीपक पर त्राटक करते हुए गणपति की साधना बताई गयी है जिससे आज्ञा चक्र की सिद्धि ,गणपति की सिद्धि और कृपा प्राप्त होती है |एकाग्रता
    के अनुसार यह पद्धति भूत
    भविष्य वर्तमान देखने तक की शक्ति प्रदान कर सकती है |इससे गणपति की कृपा प्राप्त होती है और विघ्न बाधाएं समाप्त हो खुशहाली प्राप्त होती है |इस साधना हेतु मात्र १० से १५ मिनट का समय पर्याप्त होता है और इसे बिन गुरु के भी किया जा सकता है ,मात्र सुरक्षा कवच धारण करके |
    हमने दूसरी साधना पद्धति भगवती काली से सम्बंधित ,अपने उपरोक्त blogs और फेसबुक पेजों पर प्रकाशित की है जिसमे मात्र काली सहस्त्रनाम के पाठ से काली की शक्ति महसूस करने की पद्धति बताई गयी है |इसका शीर्षक महाकाली साधना “-[जिन्हें गुरु न मिले ] अथवा काली सहस्त्रनाम सौ समस्या
    का एक इलाज
    है |इस पद्धति में मात्र काली जी के एक हजार नामों को एक विशेष समय पद्धति से पढने या पाठ करने के बारे में बताया गया है |इससे भगवती की कृपा मिलती है और उनकी ऊर्जा महसूस भी होती है |यह साधना भी बिन गुरु के मात्र सुरक्षा कवच के साथ की जा सकती है |
    आप सामान्य व्यक्ति हैं ,आपको कोई पूजा पद्धति कर्मकांड नहीं आता ,अपनी समस्या के लिए मंदिरों ,मौलवियों ,पंडितों ,ज्योतिषियों के चक्कर काटने पर मजबूर हैं ,आपको कोई परिणाम नहीं समझ में आता ,नकारात्मक प्रभावों से कष्ट पा रहे तो आप अपने उस ईष्ट देवता का सुन्दर सा चित्र ले आयें जो
    आपको सबसे अधिक प्रिय हों
    |इस चित्र को पूजा स्थान या अपने कमरे में अपने बैठने के स्थान के स्थान पर इस प्रकार लगाएं की चित्र आपके आँखों के सामने पड़े |जो आपको समझ आता तो उतनी पूजा प्रतिदिन करें ,स्नान जरुर करें रोज और भोजन पूर्व ईष्ट को मन की भावना से अथवा उपलब्ध संसाधनों से भोजन जरुर कराएं |स्नान बाद सामान्य पूजन ,नैवेद्य चढ़ाकर आप अपने ईष्ट से अपनी मनोकामना कहें |आप अपने ईष्ट में गुरु ,माता पिता ,भाई बहन ,मित्र की भावना करें |यह जरुर याद रखें की रोज आपकी मनोकामना बदलनी नहीं चाहिए ,कम से कम एक महीने तक एक प्रकार की मनोकामना स्थिर रहनी चाहिए |आप जिस रूप में अपने ईष्ट को एक बार मान लें फिर उसे कभी नहीं बदलें और हमेशा उसी रूप में उसे याद करें |अब आप अपने ईष्ट के चित्र पर एकटक एकाग्र हो जाएँ और कल्पना रखें की वह आपकी ओर देख रहे हैं ,आपको आशीर्वाद दे रहे हैं ,मुस्करा रहे हैं ,बात कर रहे या बात करेंगे |कुछ समय बाद ही चित्र बदलता लगेगा ,ईष्ट की भाव भंगिमा ,स्वरुप बदलेगा ,और कुछ समय बाद आपको लगेगा की चित्र साकार होकर ईष्ट में बदल गया |एकाग्रता अच्छी होने पर यह एक सप्ताह से १५ दिन में संभव है |जिस दिन ईष्ट साकार रूप ले लिया ,या आपकी एकाग्रता इतनी हुई की आप खुद का अस्तित्व मात्र एक मिनट भूल जाएँ और ईष्ट के स्वरुप में खो जाएँ तो ईष्ट की कृपा आपको मिल जायेगी और उसकी ऊर्जा आपसे जुडकर आपकी सोच ,भावना के अनुरूप काम करने लगेगी ,आपकी शारीरिक ,मानसिक और चक्रों की स्थिति में परिवर्तन के साथ साथ आसपास का वातावरण तक उसकी ऊर्जा से संतृप्त होने लगेगा और आपको उसकी शक्ति ,ऊर्जा महसूस होने लगेगी |यहाँ हम यह
    चेतावनी देना चाहेंगे की ईष्ट का चुनाव हमेशा सौम्य शक्ति में से ही करें यदि आपके पास सक्षम गुरु नहीं हैं या आपने सुरक्षा कवच नहीं पहना
    |इस प्रकार के ईष्ट में हनुमान ,भैरव ,काली ,बगला ,दुर्गा ,रूद्र ,दक्षिणावर्ती सूंड के गणेश आदि का चयन न करें ,यदि आप इनमे से या ऐसी उग्र शक्ति का चयन करते
    हैं तो सुरक्षा कवच जरुर पहने या सक्षम गुरु की अनुमति के बाद ही यह करें
    | यदि नकारात्मक ऊर्जा से पीड़ित नहीं हैं तो सौम्य शक्ति से आपकी मनोकामना पूर्ण हो जायेगी |
    ईश्वरीय शक्ति प्राप्ति ,ईश्वर का साक्षात्कार ,ईश्वर से वार्तालाप अवचेतन पर आधारित क्रिया है |चेतन
    की चंचलता के बीच यह मुश्किल होता है
    |जब तक ईष्ट का जुड़ाव अवचेतन स्तर पर नहीं होता उसका साक्षात्कार ,वार्तालाप संभव नहीं होता |एक बार ऐसा होने पर फिर वह चेतन स्तर और स्वरुप पर भी सक्रीय हो जाता है |यद्यपि सभी पद्धतियों में अवचेतन की भूमिका होती ही है किन्तु हमारी इस पद्धति में अवचेतन अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है |आप अपने ईष्ट का एक सौम्य सुंदर का चित्र अपने पूजन स्थान में स्थापित करें |एक क्रिस्टल बाल टेनिस की गेंद के आकार का लें और उसे चित्र के सामने स्थापित करें ,बाल के पीछे ईष्ट के रंग के अनुकूल रंग का एक जीरो वाट का बल्ब इस प्रकार जलाएं की पूरे बाल का रंग उसी रंग से छा जाए |ईष्ट का चित्र और क्रिस्टल बाल इस प्रकार रखें की यह आँखों की सीध में २ फुट की दूरी पर रहें |ईष्ट की सामान्य पूजा प्रतिदिन होनी चाहिए |पूजन बाद अपने ईष्ट को कुछ पल एकटक देखें फिर क्रिस्टल बाल पर ध्यान एकाग्र करें और उसमे ईष्ट के चित्र को उभारने का प्रयत्न करें |शुरू में क्रिस्टल बाल बिलकुल सादा नजर आएगा ,फिर एकाग्रता बढने के साथ भिन्न भिन्न चित्र ,लोगों के आकार ,दृश्य दिखेंगे |यह सब अवचेतन की तस्वीरें होंगी |समय के साथ ईष्ट भी दिखेगा ,फिर स्थिर होगा ,फिर आशीर्वाद दे सकता है ,वार्तालाप हो सकता है ,साक्षात्कार हो सकता है |यह क्रिया प्रतिदिन १० से १५ मिनट करें |यदि आपकी एकाग्रता ,याददास्त ,विश्वास ,श्रद्धा अच्छी है तो इस क्रिया में साक्षात्कार भी मुश्किल नहीं |इस साधना की सफलता ,शक्ति की कोई सीमा नहीं |भूत भविष्य वर्त्तमान के दर्शन संभव हैं |इस साधना में किसी अवचेतन के जानकार से कुछ लाइनें लिखवाकर प्रतिदिन उनका तीन चार बार १० मिनट दोहराव करने से ईष्ट आपके अवचेतन से जुड़ जाता है और उस पर श्रद्धा विश्वास बढ़ता है |ईष्ट के अवचेतन से जुड़ने पर एक अदृश्य ऊर्जा ईष्ट की आपसे जुड़ जाती है |उसके गुण ,आकृति स्थायी होने लगते हैं |इस साधना में सुरक्षा कवच अति आवश्यक होता है जिससे शरीर की सुरक्षा रहे |कभी कभी खुद को भूलने ,ईष्ट में डूबने पर भयात्मक या रोमांचक अनुभूतियाँ होती हैं ,ऐसे में सुरक्षा कवच जरुरी होता है |इस साधना हेतु तब तक उग्र देवी देवता का चयन न करें ,जब तक सक्षम गुरु न हों अन्यथा सौम्य शक्ति का ही चयन करें |
    5. यदि आप साधक हैं और वर्षों साधना करने के बाद भी आपको ईश्वरीय ऊर्जा महसूस नहीं हो पा रही ,अथवा आप दीक्षित तो हैं पर आपको आपके गुरु से पर्याप्त सहायता नहीं मिल पा रही या आपके गुरु आपका लक्ष्य दिलाने में अक्षम लग रहे तो आप अश्रद्धा मत रखिये या भटकिये मत |आप सक्षम व्यक्ति या अपने गुरु से सुरक्षा कवच प्राप्त कीजिये ,उनसे चयनित ईष्ट की साधना की अनुमति प्राप्त कीजिये |आप अपने सुविधानुसार स्थान का चयन कीजिये और मिटटी युक्त जमीन पर ईशान कोण में किसी चौकी या बाजोट पर ईष्ट की मूर्ती स्थापित कर उसके सामने मिटटी में हवन कुंड बनाइये |ईष्ट की पूजा रोज सुबह जरुर कीजिये |यदि सौम्य शक्ति है तो सुबह का समय और उग्र शक्ति है या देवी शक्ति है तो
    रात्री का समय साधना के लिए चयनित कीजिये
    |साधना समय अपने आसन के चारो ओर सिन्दूर कपूर लौंग घी की सहायता से पेस्ट बना घेरा बनाएं |अब अपनी पद्धति अनुसार या कुछ नहीं पता तो सामाय
    पूजन कर धुप दीप जलाकर बिलकुल धीमे स्वरों में
    ,धीरे धीरे लंबा खींचते हुए पूर्ण नाद के साथ ईष्ट के मंत्र की दो माला जप करें |मन्त्र जप में जल्दबाजी न हो ,रटते हुए जप न हो ,समय न देखें इस समय ,घड़ी मोबाइल साथ न हो ,स्थान पर प्रकाश धीमा हो ,जप समय ध्यान मूर्ती पर हो |जप के बाद इष्ट के अनुकूल हवन सामग्री से कुण्ड में हवन करें और अपना जप हवन अपने ईष्ट को समर्पित करें |यह क्रम लगातार कम से कम ५१ दिन चले |इस सामान्य सी लगने वाली साधना से आपके ईष्ट की कृपा आपको प्राप्त हो जायेगी और उसकी ऊर्जा ,शक्ति आपको अपने आसपास और स्वयं में महसूस होने लगेगी |यहाँ तक की आप द्वारा अभिमंत्रित जप ,वस्तु लोगों का भला करने लगेगी |खुद के कल्याण के साथ
    दूसरों का कल्याण भी कुछ हद तक आप करने में सक्षम होंगे
    |यहाँ भी उग्र शक्ति का चयन आप बिना सक्षम गुरु के न करें |यहाँ विस्तृत पद्धति इसलिए नहीं दी जा रही की इस प्रकार की साधना साधक ही कर सकते हैं जिन्हें अपने गुरु से जानकारी लेनी चाहिए या जो पहले से काफी कुछ जानते हैं ,साथ
    ही हामारा लेख सामान्य लोगों को ईश्वरीय ऊर्जा महसूस कराने से सम्बंधित है
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                  उपरोक्त सभी साधनाएं ,बिना गुरु के भी संभव हैं ,और सक्षम साधक द्वारा प्रदत्त सुरक्षा कवच धारण करके की जा सकती हैं |सभी साधनाओं में ईष्ट कृपा ,उसकी ऊर्जा महसूस होना ,यहाँ तक की साक्षात्कार ,वार्तालाप ,तक संभव है ,और सभी के लिए संभव है ,बस जरूरत है श्रद्धा विश्वास
    एकाग्रता निष्ठां आत्मबल की |इन्हें करके खुद की समस्या हल करने के साथ दूसरों की भी समस्याएं हल की जा सकती हैं और हमेशा के लिए पंडित ,मौलवी ,ज्योतिषी ,तांत्रिक के चक्कर से मुक्ति पायी जा सकती है |आज की समस्या तो हल होगी ही भविष्य में कोई समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी ,जो भाग्य में है उसका अधिकतम मिलेगा |साक्षात्कार की स्थिति आते ही भाग्य तक बदल जाएगा |……………………………………………हरहर महादेव 
     
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  • १५ मिनट की साधना से ईश्वर मिल सकता है

    १५ मिनट पर्याप्त हैं ईश्वरीय ऊर्जा प्राप्ति हेतु 
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                                                     ईश्वरीय ऊर्जा की प्राप्ति प्रतिदिन के १५ मिनट के प्रयास में हो सकती है |यदि हम ऐसा कहते हैं तो लोगों को आश्चर्य हो सकता है ,हो सकता है कुछ लोग आलोचनात्मक भी हो जाएँ ,क्योकि बहुतेरे वर्षों साधना करते रहते हैं ,घंटों करते रहते हैं किन्तु परिणाम समझ में नहीं आता ,फिर भी स्वयं को सिद्ध समझे हुए होते हैं |ऐसे में वह लोग आलोचना भी कर सकते है ,अथवा कुछ महाज्ञानी जो लम्बे-चौड़े कर्मकांड को ही सिद्धि और साधना के सूत्र मानते हैं वह भी आलोचना कर सकते हैं |किन्तु हम फिर भी कहना चाहेंगे की ईश्वरीय ऊर्जा केवाल १५ मिनट प्रतिदिन के प्रयास से पायी जा सकती है |हम कोई सिद्ध नहीं हैं ,कोई सन्यासी नहीं हैं ,अज्ञानी और बेहद सामान्य श्रद्धालु  हैं किन्तु फिर भी अनुभव किया है, अपने नजदीकियों को अनुभव कराया है कि यदि हम चाहें तो ईश्वरीय ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं केवल थोड़े से गंभीर प्रयास से |सामान्य ईश्वरीय ऊर्जा, जिससे हमारा भौतिक जीवन सुखमय हो सके ,नकारात्मक ऊर्जा हट सके ,सफलता बढ़ सके आदि के लिए बहुत गंभीर साधना करनी पड़े ,तंत्र की गंभीर क्रियाएं करनी पड़े आवश्यक नहीं है | सामान्य ईश्वरीय ऊर्जा कोई भी, कभी भी, कहीं भी प्राप्त कर सकता है ,केवल कुछ सूत्रों ,कुछ नियमों ,कुछ निर्देशों को गंभीरता से पालन करने की जरुरत है |
                                  हम अपने इस पोस्ट में एक ऐसी महत्वपूर्ण, अति तीब्र प्रभावकारी किन्तु बेहद सरल साधना को प्रस्तुत कर रहे हैं ,जिससे किसी को भी ईश्वरीय ऊर्जा की अलौकिकता का आभास हो सकता है |किसी का भी जीवन बदल सकता है |कोई भी ईश्वरीय ऊर्जा प्राप्त कर सकता है ,केवल १५ मिनट के प्रयास से |हमने बहुतों को यह बताया है ,कुछ सफल हुए ,कुछ घबराकर हट गए ,कुछ नियमित न रह पाने से अथवा अत्यंत सरल पद्धति होने से मजाक समझ अविश्वास में छोड़ बैठे |कुछ इसे करके अत्यंत सफल हो गए और खुद को सिद्ध ही मानने लगे |यह है तो बहुत ही छोटा और सरल प्रयोग पर इसकी शक्ति अद्वितीय है |इससे ईश्वरीय ऊर्जा तो निश्चित रूप से प्राप्त होती ही है ,अगर एकाग्रता और लगन बना रहा तो ईश्वर साक्षात्कार अथवा प्रत्यक्षीकरण भी हो जाता है |भूत-भविष्य-वर्तमान के ज्ञान की शक्ति प्राप्त हो सकती है |किसी भी शक्ति की प्राप्ति हो सकती है ,केवल मार्गदर्शन और तकनिकी ज्ञान मिलता रहे |इस प्रयोग में किसी कर्मकांड की ,लम्बे चौड़े पद्धति की ,विशिष्ट पूजा-पद्धति की भी आवश्यकता नहीं है |कोई भी कर सकता है |
    साधना विधि ::–
                     इस साधना को आप किसी भी गणेश चतुर्थी अथवा शुक्लपक्ष के बुधवार से प्रारम्भ कर  ======= सकते हैं | आप नित्यकर्म और स्नान आदि से स्वच्छ हो ,ऊनि लाल अथवा रंगीन आसन पर स्थान ग्रहण करें |भगवान गणेश का एक सुन्दर सा चित्र लें जिसमे उनकी सूंड उनके दाहिने हाथ की और मुड़ी हो [चित्र पहले से लाकर रखे रहें ] |इस चित्र को अपने पूजा स्थान पर स्थापित करें | फिर उनकी स्थापना करें |आप हाथ जोड़कर अपने ध्यान में गणेश जी को लायें और फिर आँखें खोलकर कल्पना द्वारा उस काल्पनिक गणेश जी को धीरे-धीरे लाकर चित्र में स्थापित कर दें और कल्पना करें की गणेश जी ने आकर उस चित्र में अपने को समाहित कर लिया है |अब उनकी विधिवत पूजा कर दें |पूजा आपको रोज सुबह करनी है किन्तु चित्र स्थापना और गणपति की मानसिक प्रतिष्ठा चित्र में एक बार ही करनी है |पूजा में सिन्दूर, लाल फूल और लौंग यथासंभव प्रतिदिन चढ़ाएं |पूजा करने के बाद आप उठ सकते हैं |इस समय इस स्थान पर अगर श्वेतार्क गणपति की भी स्थापना की जाए तो सफलता और बढ़ जायेगी |
                                        अब आपको दिन में किसी भी समय का एक निश्चित समय निश्चित करना है जप आप रोज नियमित उन्हें १५ मिनट का समय दे सकें |यह समय बिलकुल एकांत का होना चाहिए ,कोई आवाज अथवा विघ्न नहीं होनी चाहिए |इसके लिए स्थान आपका शयन कक्ष भी हो सकता है अथवा पूजा स्थान अथवा कोई भी एकांत स्थान |यदि ब्रह्म मुहूर्त में इसे कर सकें तो अति उत्तम है ,अन्यथा आप इसे रात्रीं में सोने के पूर्व भी कर सकते हैं |जब आप समय निश्चित कर लें की अमुक समय आप रोज साधना कर सकते हैं तो फिर उस समय और स्थान में परिवर्तन न हो |इसीलिए आपको जहाँ और जब सुविधा हो एक बार में ही चुनाव कर लें |यदि सुबह कर रहे है पूजा के समय ही तो फिर स्नान की दोबारा आवश्यकता नहीं है अन्यथा रात्री आदि में साधना करने के पूर्व स्नान आदि करके स्वच्छ हो एक ऊनि लाल अथवा रंगीन ऊनि कम्बल अपनी सुविधानुसार स्थान पर बिछाएं |सामने दो फुट की दूरी पर एक स्टूल अथवा आँखों के बराबर ऊँची कोई ऐसी वस्तु रखे जिसपर दीपक रखा जा सके |अब एक घी का दीपक और अगर बत्ती जलाएं |इन्हें गणेश जी को दिखा -समर्पित कर प्रणाम करें और ध्यान से उनके चित्र को देखें |अब उस दीपक को उठाकर अपने साधना स्थल पर लाकर स्टूल पर रखें ,दो अगर बत्ती जलाकर वहां लगायें |अब आसन पर आराम से सुखासन में बैठ जाएँ |आसन के चारो और पहले से सुरक्षा घेरा बनाकर रखें |इसके लिए सिन्दूर-कपूर और लौंग को चूर्णकर घी में मिला गणपति के मंत्र पढ़ते हुए आसन के चारो और घेरा बना दें और भगवान गणेश से प्रार्थना करें की वह आपकी सब प्रकार से सुरक्षा करें |
                                         अब आसन पर बैठ कर अपनी अपलक दृष्टि आपको दीपक की लौ पर जमानी है |दीपक की लौ में नीचे नीले फ्लेम के ठीक ऊपर मध्य भाग पर ध्यान और दृष्टि केन्द्रित करें |मन में सदैव एक ही कल्पना रहे की इस दीपक में भगवान गणेश मुझे दिखेंगे और आशीर्वाद देंगे |मन में प्रबल विशवास रखें की वह जरुर दिखेंगे और मुझे उनकी कृपा प्राप्त होगी |इस अवधि में उपांशु जप चलता है गणपति के मंत्र का |मंत्र का चुनाव आप खुद भी कर सकते हैं किन्तु किसी सिद्ध साधक से मंत्र प्राप्त करने पर मंत्र पहले से उर्जिकृत रहता है और सफलता/सिद्धि जल्दी प्राप्त होती है | सदैव अपने ध्यान को गणेश पर ही केन्द्रित करने का प्रयास होना चाहिए |यद्यपि मन बहुत भटकता है पर कुछ दिन में एकाग्रता आने लगती है और दीपक में आकृतियाँ उभरने लगती हैं ,जिससे रोमांच भी होता है |कभी क्षणों के लिए गणपति भी दिख सकते हैं और भिन्न भिन्न लोग भिन्न भिन्न आकृतियाँ |यह सब अवचेतन के चित्र होते हैं जिन्हें देखकर आप भी हतप्रभ होते रहते हैं ,किन्तु हमेश दिमाग में एक ही निश्चय रखें की हमें गणेश जी स्पष्ट दिखेंगे और आशीर्वाद देंगे |कुछ दिन बाद गणपति की आकृति उभरने लगती है ,क्षणों-क्षणों के लिए ,कभी कुछ कभी कुछ |फिर धीरे धीरे अनवरत प्रयास से गणपति की आकृति स्थायी होने लगती है |यदि जब कभी आपकी एकाग्रता एक मिनट के लिए भी स्थायी हो जाती है अथवा एक मिनट भी गणपति स्थायी होकर रुकते हैं अथवा स्पष्ट दीखते हुए आशीर्वाद मुद्रा में आशीर्वाद देने लगते हैं आपकी साधना सफल होने लगती है |आपको अनेक परिवर्तन स्वतः नजर आने लगते हैं |एक मिनट की आत्म विस्मृति [खुद की सुध भूल जाना ] प्राप्त होते ही आप सिद्धि की शक्ति से साक्षात्कार करने लगते हैं |
                                           गणपति के चित्र का दीपक में स्थायी होना और आशीर्वाद देने का मतलब आप द्वारा उनकी ऊर्जा को वातावरण से बुलाने पर वह आ रही है और उसका सम्बन्ध आपके मष्तिष्क और अवचेतन से बन गया है |आपमें इसके साथ ही आतंरिक रासायनिक परिवर्तन भी होने लगते हैं और वाह्य भौतिक परिवर्तन भी होने लगते हैं ,क्योकि आपके आज्ञा चक्र की तरंगों की प्रकृति बदल जाती है ,उसकी क्रिया तीब्र हो जाती है |आज्ञा चक्र के ईष्ट देव आप पर प्रसन्न होने लगते हैं ,अतः सब और उनके गुणों के अनुसार मंगल ही मंगल होने लगता है |आपकी सोची इच्छाएं पूर्ण होने लगती हैं क्योकि आपकी मानसिक तरंगों में इतनी शक्ति आ जाती है की वह लक्ष्य पर पहुचकर उसे आंदोलित और आपके पक्ष में करने लगती हैं |
                                       जब गणपति की आकृति रोज स्थायी होने लगे तो उसे अधिकतम देर तक स्थायी रखने का प्रयास करें |कुछ दिनों के प्रयास में यह संभव हो सकता है |फिर उन्हें आप अपने मानसिक बल और मन के भावों से घुमाने का प्रयास करें ,अथवा कभी यह हाथ कभी वह हाथ उठायें ,कभी उन्हें घुमाने का प्रयास करें |एकाग्रता, लगन और निष्ठां से यह भी संभव हो जाएगा |,उनके घुमते ही आपके आसपास का माहौल भी आपकी मानसिक ईच्छाओं के साथ प्रभावित होने लगता है |यह साधना की उच्च स्थिति है |यह स्थिति आने पर समाधि की भी स्थिति संभव है अथवा भाव में डूबने पर साक्षात गणपति आपके सामने आकर खड़े हो सकते हैं |इस प्रकार इस साधना की शक्ति की कोई सीमा नहीं है |इस साधना से आप दुनिया में कुछ भी पा सकते हैं |त्रिकाल दर्शिता की क्षमता भी |
                                            इस साधना की शुरुआत केवल  ५ मिनट से करें ,क्योकि आँखों पर बहुत जोर पड़ता है |लगातार दीपक देखते हुए जब आँखों में जलन हो या अत्यधिक पानी आये तो कुछ सेकण्ड के लिए आँखें बंद कर लें किन्तु ध्यान गणपति पर ही एकाग्र रखें |फिर आँखें खोलकर दीपक की लौ में उन्हें देखने का प्रयास करें |इसे प्रति सप्ताह एक मिनट बढ़ते जाएँ और अंततः १५ मिनट तक जाए |इससे अधिक नहीं |यह पूरी प्रक्रिया ३ महीने की सामान्य रूप से है |तीन महीने में हर हाल में दर्शन/साक्षात्कार हो जाने चाहिए [हो जाते हैं ],यदि तीन महीने में आप सफल नहीं होते हैं तो मान लीजिये की आपके पूर्व कर्म बहुत अच्छे नहीं रहे और आपको ईश्वरीय ऊर्जा या दर्शन या आपकी मुक्ति मुश्किल है |आप में भारी कमियां हैं |आप बहुत ही गंभीर नकारात्मकता से ग्रस्त हैं |फिर तो आपका कल्याण केवल गुरु के हाथों ही संभव हो सकता है |हमारे कुछ शिष्यों को इस प्रक्रिया में केवल दो तीन दिनों में भी सफलता मिली है ,कुछ को महीनो लगे हैं |पर अनुभव सबको अवश्य हुआ है ,परिवर्तन सबके अन्दर आता ही है |आप इसे करके देखें ,और नीचे लिखी सावधानी और चेतावनी पर ध्यान देते हुए साधना मार्ग पर अग्रसर हों ,हमें पूरा विश्वास है आपका जीवन बदल जाएगा ,आपको ईश्वरीय ऊर्जा का साक्षात्कार होगा ,भले आपने कभी कोई साधना न की हो ,भले आप साधक न हों ,पर इससे आप साधक बन जायेंगे और गंभीर प्रयास से सिद्ध भी एक विशेष शक्ति के |इस शक्ति के प्राप्त होने पर इसके अनेकानेक प्रयोग हैं जिससे आप अपने परिवार का ,मित्रों का ,लोगों का भला कर सकते हैं ,उनके दुःख दूर कर सकते हैं जबकि आपका भला तो खुद ब खुद होता है |
    विशेष जानकारी और चेतावनी
    =============–यह साधना कोई भी कर सकता है ,किन्तु यह तांत्रिक साधना ही है |मूल तांत्रिक पद्धति क्लिष्ट और गुरुगम्य होती है किन्तु इसे कोई भी थोड़ी सावधानी से कर सकता है | साधना में साधित की जा रही शक्ति शिव परिवार की और सौम्य हैं ,इनसे किसी प्रकार की हानि नहीं होती ,किन्तु परम सात्विक और उच्चतम सकारात्मक शक्ति होने से इनकी साधना से जब सकारात्मकता का संचार बढ़ता है तो ,आसपास और व्यक्ति में उपस्थित अथवा उससे जुडी नकारात्मक शक्तियों को कष्ट और तकलीफ होती है ,उनकी ऊर्जा का क्षरण होता है ,फलतः वह तीब्र प्रतिक्रया करती है और साधक को विचलित करने के लिए उसे डराने अथवा बाधा उत्पन्न करने का प्रयास करती हैं |इस साधना को करते समय आपको कभी विचित्र अनुभव भी हो सकते हैं ,कभी लग सकता है की कोई आगे से चला गया ,कोई पीछे से चला गया ,कोई पीछे है ,या कमरे में है या कोई और भी आसपास है ,कभी अनापेक्षित घटनाएं भी संभव हैं |
                                              सबका उद्देश्य आपको विचलित करना होता है |यह सब गणेश नहीं करते ,अपितु आपके आपस पास की नकारात्मक शक्तियां करती हैं जिससे आप साधना छोड़ दें |,कभी कभी पूजा से भी दूसरी नकारात्मक शक्ति आकर्षित हो सकती हैं |व्यक्ति के काम को बिगाड़ने और दिनचर्या प्रभावित करने का प्रयस भी यह नकारात्मक उर्जायें कर सकती हैं ,इसलिए यह अति आवश्यक होता है की साधना की अवधि में साधक किसी उच्च सिद्ध साधक द्वारा बनाया हुआ शक्तिशाली यन्त्र-ताबीज अवश्य धारण करे ,जिससे वह सुरक्षित रहे और साधना निर्विघ्न संपन्न करे |तीब्र प्रभावकारी साधना होने से प्रतिक्रिया भी तीब्र हो सकती है अतः सुरक्षा भी तगड़ी होनी चाहिए |यह गंभीरता से ध्यान दें की आप जो यन्त्र-ताबीज धारण कर रहे हैं वह वास्तव में उच्च शक्ति को सिद्ध किया हुआ साधक ही अपने हाथों से बनाए और अभिमंत्रित किये हुए हो ,अन्यथा बाद में सामने खतरे या समस्या  आने पर मुश्किल हो सकती है |सिद्ध अथवा साधक के यहाँ की भीड़ ,अथवा प्रचार से उनका चुनाव आपको गंभीर मुसीबत में डाल सकता है |साधना पूर्ण है ,किन्तु इसमें किसी भी प्रकार की त्रुटी होने अथवा समस्या-मुसीबत आने पर हम जिम्मेदार नहीं होंगे |गुरु का मार्गदर्शन और समुचित सुरक्षा करना साधक की जिम्मेदारी होगी |हमारा उद्देश्य सरल ,सात्विक ,तंत्रोक्त साधना की जानकारी देना मात्र है |………………………………………………हर-हर महादेव

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  • नवरात्र में देवी की शक्ति कैसे पायें ?

    दिव्य गुटिका धारकों के लिए
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                                 नवरात्र को भगवती दुर्गा की पूजा /आराधना  का समय माना जाता है ,यद्यपि वास्तव में यह शक्ति साधना का समय होता है ,फिर वह शक्ति चाहे दस महाविद्या हो ,दुर्गा हो अथवा कोई भी शक्ति |साधकों की और कर्मकांडियों की अपनी तकनीक और अपनी पद्धति होती है जिस पर वह चलते हुए शक्ति साधना करते हैं और अपनी क्षमता -पद्धति अनुसार शक्ति प्राप्त करते हैं ,किन्तु जन सामान्य को नवरात्र बड़े धूमधाम से मनाने ,व्रत -उपवास रखने ,कलश स्थापना आदि करने ,सप्तशती पाठ करवाने आदि के बाद भी बहुत लाभ होता महसूस नहीं होता |बहुत से लोग कहते मिलते हैं नवरात्र में कलश रखते हैं ,सप्तशती करते हैं अथवा पंडित से करवाते हैं ,व्रत रहते हैं ,पूर्ण परहेज बरतते हैं |जब इनके सामान्य समस्या का आकलन किया जाता है तो इनमे से अधिकतर अनेक समस्याओं से ग्रस्त ही मिलते हैं जबकि बहुत सी समस्याएं नवरात्र के पाठ आदि से समाप्त हो जानी चाहिए |दुर्गा सर्वशक्तिशाली शक्ति हैं फिर भी इन लोगों की वह समस्याएं भी हल नहीं होती जो सामान्य सी पूजा से हो जानी चाहिए |नकारात्मक ऊर्जा ,छोटी -मोटी भूत -प्रेत बाधा ,अमंगल ,अकारण रोग -दुर्घटना आदि समाप्त हो जानी चाहिए ,किन्तु बहुत से मामलों में ऐसा नहीं होता |उसके बाद यह लोग किस्मत की बात मान कर खुद को संतोष देते हैं की किस्मत ही खराब हो तो दुर्गा क्या करेंगी |
                                    जब हम इन बातों पर गंभीरता से सोचते हैं तो पाते हैं की वास्तव में दुर्गा की शक्ति तो आपको मिल ही नहीं रही ,जो ऊर्जा आनी चाहिए आई ही नहीं इसलिए आपकी समस्याएं यथावत हैं ,जो बाधाएं आपके लिए रुकावट हैं वह ही नहीं हट पा रही तो पूरा भाग्य का भी नहीं मिल पा रहा इसलिए कोई सुधार नहीं हुआ |शक्ति साधना ,मात्र भावना का पर्व या अवसर नहीं होता ,इसकी अपनी विशिष्टता अपनी तकनीक होती है |इस समय मात्र व्रत ,उपवास ,कलश रखने ,पाठ करवाने से बहुत कुछ होने वाला नहीं ,महत्त्व यह होता है की आप कितना खुद प्रयास कर रहे ,आपने कितना खुद में शक्ति लाने की कोशिश की |दुर्गा देवी या ऊर्जा या शक्ति है ,स्त्री नहीं ,स्त्री रूप तो कल्पना है ,उन्हें मनुष्य या स्त्री मान मात्र पूजन से बहुत कुछ नहीं होना ,उन्हें ब्रह्माण्ड में फैली विशेष ऊर्जा मान खुद में लाने का प्रयास होता है तभी वास्तविक शक्ति प्राप्त होती है और लाभ महसूस होता है |
                                आपने व्रत रखा ,शरीर शुद्ध हुआ ,आपने कलश रखा ,परहेज किया ,भावना शुद्ध हुआ ,आपने मांस -मदिरा ,तामसिक का परित्याग किया ,सात्विकता का संचार हुआ किन्तु मात्र इतना करने से दुर्गा की शक्ति आपमें तो नहीं आ गयी |सप्तशती पंडित से कराई ,अगर उन्होंने शुद्ध भी किया तो अधिकतर ऊर्जा अंश उन्हें मिली और कुछ अंश आपके पूजा स्थान पर व्याप्त हुई |अगर थोड़ी गलती या अशुद्धि हुई तो नुक्सान आपका |आपने सप्तशती पढ़ी और शुद्ध पढ़ी तो आपको अच्छी ऊर्जा मिली पर अगर कहीं प्रिंटिंग में अशुद्धि हुई अथवा आपको पढने नहीं आया तो उच्चारण -नाद दोष के कारण ऊर्जा विकृत हुई और आपको उलटे परिणाम मिलने निश्चित |भूल जाइए की माँ है और माँ सब क्षमा करती है |यही गलती सोचते तो आपके कष्ट कम नहीं हो रहे |माँ एक शक्ति है और एक सर्वत्र व्याप्त ऊर्जा है वह तभी अनुकूल होगी जब उसके अनुकूल प्रयास होगा |आपकी गलती उसको गाली देकर बुलाने सा हो जाएगा और वह रुष्ट होगी खुश नहीं ,फिर आप कितना भी पाठ के बाद गलती की क्षमा मांगे ,विकृत ऊर्जा नहीं सुधरने वाली |यह कुछ वैसा ही हो जाता है जैसे आप किसी को गाली देकर बुलाते हैं ,बार बार बुलाते हैं फिर क्षमा मांगते हैं ,क्या वह इससे खुश होगा या आपको थप्पड़ मारेगा |यही कारण है शक्ति उपासना में थोड़ी भी गलती के परिणाम कई गुना अधिक कष्टकारक हो जाते हैं |इसलिए अगर ज़रा भी अपने पाठ की शुद्धता पर संदेह हो या लगे की पंडित जी जल्दबाजी कर रहे खाना पूर्ती कर रहे तो आप बचिए |पद्धति ठीक से पता न हो तो मत अपनाइए मात्र भावना से हाथ जोड़ काम चला लीजिये कम से कम नुक्सान तो नहीं होगा |
                               जो सामान्य लोग हैं अगर वास्तव में कल्याण चाहते हैं ,नवरात्र में शक्ति अनुभव करना चाहते हैं तो रात्री में अधिक देर जागरण करें ,भगवती का चिंतन करें और रात्री में मंत्र जप करें ,अगर शुद्ध पाठ कर सकते तो खुद से पाठ -स्तोत्र करें |मंत्र जप करें |सुबह सामान्य पूजा करें |महत्त्व संख्या को न दें ,महत्त्व शुद्धता ,सही उच्चारण और एकाग्रता को दें |आपको अधिक आभ होगा |जो हमारे दिव्य गुटिका /डिब्बी के धारक हैं उनके लिए हम एक सामान्य सी उपासना पद्धति बता रहे हैं जो किसी भी साधना से अधिक प्रभावकारी साबित होगी और उन्हें वास्तव में नवरात्र में शक्ति अनुभव होगा |उनके बहुत से कष्ट -समस्याएं समाप्त हो जायेगी |किसी कर्मकांड की जरूरत नहीं ,किसी व्रत की जरूरत नहीं ,किसी विशेष पद्धति की जरूरत नहीं ,किसी विशेष कलश स्थापना की जरूरत नहीं ,[[यदि कलश रखते हैं तो भी कोई दिक्कत नहीं ,अगर पाठ आपके यहाँ चलता है तो उसे चलने दे ]]दैनिक कार्य करते हुए आप इसे कर सकते हैं और आपको ऊर्जा /शक्ति उतनी ही मिलेगी जितनी किसी सामान्य साधक को मिलती है |
                                      आप नवरात्र में सुबह अपने पूजा स्थान में दुर्गा जी की चित्र लगाएं |सामने अपनी दिव्य गुटिका /डिब्बी स्थापित करें |यह प्राण प्रतिष्ठित है ,प्राण प्रतिष्ठा आदि की जरूरत नहीं |हाथ में जल अक्षत पुष्प और एक सिक्का लेकर संकल्प करें ,संस्कृत नहीं आती तो शुद्ध हिंदी में कि-  मैं [अपना नाम ] पुत्र [पिता का नाम ] स्थान [अपना पता ] आज सम्बत [२०७४ ] में चैत्र मॉस के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि अर्थात नवरात्र के पहले दिन ,दिन [बुधवार ] को यह संकल्प लेता हु की में आज से पूरे नवरात्र में प्रतिदिन ११ माला भगवती दुर्गा का मंत्र जप करूँगा |भगवती मेरे परिवार की सुरक्षा करें ,मेरा कल्याण करे ,मेरे समस्त कष्टों दुखों का नाश करें ,मेरे अथवा मेरे परिवार में व्याप्त बाधाओं का शमन करें ,मेरे सर्वविध उन्नति में सहायता करें | अब जल अक्षत पुष्प आदि उनके सामने छोड़ दें |अब गुटिका और भगवती की सामान्य पूजा करें ,अगर षोडशोपचार पूजा आता है तो वह करें अन्यथा जितना आता है मात्र उतना करें |कोई आडम्बर नहीं ,कोई भ्रम न पालें और खुद का दिमाग न उलझाएँ |पूजन बाद आप आरती कर उठ जाए |अब आपका जप रात में होगा |
                              रात के समय १० बजे के बाद आप पुनः स्नान करें और शुद्ध वस्त्र पहन दुर्गा जी और गुटिका के सामने धुप अगर बत्ती लगाकर ,घी का दीपक जलाएं और सामने उनी कम्बल बिछाकर बैठ जाएँ |हाथ में जल लेकर भावना करें की भगवती आपको शुद्ध पवित्र करें और जल आप खुद पर और आसपास छिडक लें |अब एक रुद्राक्ष की माला लेकर [[ रुद्राक्ष की माला या लाल चन्दन की माला की व्यवस्था पहले से रखें ,साथ ही माला करना भी सीख लें ,अंगूठे -मध्यमा -अनामिका इन्ही अँगुलियों के माध्यम से माला फेरें ,तर्जनी और कनिष्ठिका का स्पर्श न हो ]], पहले एक माला महामृत्युंजय मंत्र का जप करें |इसके बाद आप ११ माला दूर्गा जी के नवार्ण मंत्र का जप करें |आपका ध्यान पूरी तरह दुर्गा जी पर एकाग्र हो | रोज ११ माला करें ,एक माला पूर्व में महामृत्युंजय का जरूर रोज करें |पहले दिन अधिक श्रम जरुर लगेगा किन्तु अगले दिन से आदत हो जायेगी |नावें दिन जप के बाद अथवा १० वें दिन आम की लकड़ी पर हवन सामग्री से हवन करें |रोज जप के बाद अपने जप को भगवती के बाएं हाथ में समर्पित करें |समर्पित करने के बाद क्षमा मांग आरती करें और उठ जाएँ |रोज इतना ही करना है |
                              हवन के बाद हवन की राख अपने घर में चारो कोनों में गमलों में डाल सकते हैं अथवा उन्हें प्रवाहित कर दें अन्य पूजन सामग्रियों के साथ |किसी सात्विक -सदाचारी ब्राह्मण को दक्षिणा प्रदान करें |दिव्य गुटिका और दुर्गा जी का चित्र पूजन स्थान पर ही लगा रहने दें और रोज पूजन मात्र करते रहें |या जो अन्य प्रयोग हैं वह आप दिव्य गुटिका पर करने को स्वतंत्र हैं |मात्र इतने जप और हवन से आप खुद में और अपने घर में एक अलौकिक ऊर्जा का अनुभव करेंगे जो आपको बहुत से कर्मकांड करने के बाद भी महसूस होना मुश्किल है |………………………………………………हर-हर महादेव 


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  • वर्षों की साधना का परिणाम भी नगण्य क्यूँ ?

    मंत्र जप सवा लाख ,मिला कुछ नहीं [ समय -श्रम दोनों बर्बाद ]
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              आज के समय में साधकों की बाढ़ आई हुई है ,ज्योतिषियों की बाढ़ आई हुई है |ज्योतिषी सलाह देता है ,अमुक मंत्र इतना संख्या में जपो ,अमुक पूजा करो ,आपकी समस्या हल हो जायेगी |उसके बारे में बताया कुछ नहीं की कैसे करें ,पद्धति-तरीका क्या हो ,बस जप लो |आधे को तो खुद पता नहीं होता ,कुछ को पता होता है तो समय बचाने के लिए बस मंत्र बता कर छुट्टी कर लेते हैं |मंत्र जपने वाल दुगुना जप लेता है पर उसे कोई परिणाम समझ नहीं आता ,तो वह सोचता है की ज्योतिषी सही नहीं ,पूजा -मंत्र जप से कुछ नहीं होता |उसकी गलती भी नहीं होती |उसे जितना पता होता है वह करता तो है ही |
               ऐसा ही नवागंतुक साधकों के साथ होता है ,तंत्र अथवा मंत्र -यन्त्र के क्षेत्र में अधिकतर आते हैं शक्ति पाने ,चमत्कार करने के लालच में ,कुछ अपनी समस्या दूर करने चक्कर में और कुछ वास्तव में मुक्ति की इच्छा से ,पर ९९ प्रतिशत को अपेक्षित सफलता नहीं मिलती |कारण सही पद्धति -सही ज्ञान -सही तरीका नहीं पता |या तो किताब से कुछ करने का प्रयास करते हैं या अधकचरे ज्ञान वाले गुरुओं के चक्कर में पड़ जाते हैं जिन्हें या तो खुद कुछ आता नहीं या एकाध मंत्र अपने गुरु से पाकर कुछ सिद्धियाँ करके गुरु बन बैठते हैं |साधक बेचारे क्या करेंगे जब गुरु ही उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं दे पाता |गुरु जी को मंत्र का विज्ञान पता ही नहीं है |कैसे काम करता है ,कहाँ किस मंत्र का क्या प्रभाव होता है |कैसे इसकी ऊर्जा साधक तक आती है ,कहाँ से आती है |कैसे इस ऊर्जा को प्राप्त किया जाए |कैसे मंत्र को जपा जाए |कैसे उसका उच्चारण हो |कहाँ आरोह अवरोह हो |कहाँ नाद हो |किस मंत्र को करने में कितना समय लें |आदि आदि [[व्यक्तिगत विचार अलौकिक शक्तियां पेज के पाठकों के लिए ]]
               अधिकतर व्यक्ति या साधक मंत्र जप करते समय जप की संख्या पर ध्यान देते हैं |अधिकतर का ध्यान होता है की इतनी संख्या करनी है या इतनी संख्या करेंगे तो इतने दिन में इतना हो जाएगा और साधना या अनुष्ठान या संकल्प पूरा हो जाएगा |रेट रटाये ढंग से जल्दबाजी में मंत्र जप करते हैं ,करते रोज हैं और निश्चित संख्या के दिनों तक भी करते हैं पर जब कर चुकते हैं और जितनी जानकारी है उस हिसाब से हवन आदि भी कर लेते हैं तो परिणाम की प्रतीक्षा करते हैं पर समझ में कुछ नहीं आता |अब उनमे अविश्वास जन्म लेता है की किया तो इतना दिन ,इतनी तपस्या की कुछ नहीं हुआ ,मंत्र जप पूजा आदि से कुछ नहीं होता जो भाग्य में लिखा है वाही होता है |आदि आदि |
    लोग यह ध्यान नहीं देते की वह जिस मंत्र का जप कर रहे हैं वह सही है की नहीं ,शुद्ध है की नहीं ,सही लक्ष्य के लिए सही मंत्र है की नहीं |मंत्र का उच्चारण क्या होना चाहिए ,मंत्र कितने समय में होना चाहिए या कितना लम्बा या किस स्वर  में होना चाहिए |इसका समय क्या होना चाहिए |आदि |अधिकतर का ध्यान मंत्र जप के समय कहीं और घूमता रहता है |अधिकतर जल्दबाजी में होते हैं की कब जप पूरा हो और अमुक कार्य किया जाए |जैसे साधना -पूजा न कर रहे हों एक जिम्मेदारी पूरी कर रहे हों |जैसे पहाडा रत रहे हों देवता को नहीं सूना रहे होते या बुला रहे होते वह तो कर्त्तव्य की आईटीआई श्री कर रहे होते हैं |देवता या ईष्ट की ओर ध्यान एकाग्र होता ही नहीं |भावहीनता में होते हैं ,एकमात्र अपना लक्ष्य दिखाई देता है |देवता से मानसिक जुड़ाव हुआ ही नहीं होता |परिणाम होता है की प्रकृति की सम्बंधित ऊर्जा मंत्र के द्वारा व्यक्ति से जुड़ पाती ही नहीं |देवता को मंत्र सुनाई देता ही नहीं |मंत्र जप मात्र रटने से ,बिना नाद के जपने से उसमे कोई ऊर्जा उत्पन्न नहीं होती ,वह आपके ही चक्रों को आंदोलित नहीं करता तो प्रकृति की ऊर्जा से क्या जुड़ पायेगा और उन्हें आकर्षित कर पायेगा |यहाँ तक की शाबर मन्त्र जिनमे न अर्थ होते हैं न नाद वह भी बिना भाव के काम नहीं करते |बिना भाव और आत्मबल के आप शाबर मंत्र भी रटेंगे तो आपको परिणाम मुश्किल है मिलना |
             ध्यान दीजिये हर मंत्र की एक विशिष्ट नाद होती है ,विशिष्ट उच्चारण होता है ,विशिष्ट देवता होते हैं |विशिष्ट मंत्र का विशिष्ट चक्र से सम्बन्ध होता है |विशिष्ट मंत्र प्रकृति के विशिष्ट प्रकार की ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है और उसे आकर्षित करता है ,साधक या मंत्र जपने वाले से जोड़ता है |अतः उसका पाठ उसी तरह के भाव ,नाद ,उच्चारण के साथ होना चाहिए |आपका मानसिक तारतम्य सम्बंधित शक्ति और मंत्र की ऊर्जा से बना होना चाहिए |नहीं तो वह अगर आकर्षित हो भी गई तो आपसे जुड़ नहीं पाएगी और वातावरण में पुनः बिखर जायेगी |महत्त्व मंत्र की संख्या जपने का नहीं होता ,सही उच्चारण ,सही नाद का होता है |सही भाव का होता है ,सही भावना का होता है |सही तरीके और पद्धति का होता है |सही समय का होता है .एकाग्रता का होता है |अगर यह सब नहीं है तो आप कई लाख भी जप कर लीजिये आपको परिणाम मिलना मुश्किल है |मंत्र असंदिग्ध रूप से काम करते हैं बशर्ते आप सही ढंग से उन्हें जप सकें |अगर रटंत जप करेंगे तो कुछ नहीं मिलेगा ,इससे तो अच्छा होगा की आप कोई जप न करो और केवल सम्बंधित देवता के रूप -गुण -भाव में ही डूबिये आपको जरुर लाभ मिलेगा |अगर मंत्र कर रहे हैं तो ढंग से कीजिये |
              सवा लाख ,लाखों लाख या निश्चित संख्या में जप करना कोई मायने नहीं रखता |आप कुछ हजार ही जप कर लीजिये और सही ढंग से कर लीजिये तो आपको लाखों लाख से अधिक लाभ हो जाएगा |उदाहरण के लिए ॐ का जप कुछ लोग करते हैं ,अधिकतर ॐ को मंत्र के आगे लगाते हैं |पर बहुत कम को पता है की अगर ॐ का सही ढंग से जप कर दिया जाए तो दीवार टूट जाती है ,यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो चूका है |हम क्या करते हैं ॐ को लगाया या ॐ ॐ करते चले गए ,न नाद न समयांतराल न उच्चारण न गूँज किसी पर ध्यान नहीं दिया |ऊर्जा उत्पन्न हुई ही नहीं ,आपके चक्र को आन्दोलित की ही नहीं |प्रकृति की ऊर्जा से जुडी ही नहीं तो लाभ क्या होगा |ॐ का जप जब भी हो एक गूँज पैदा होनी चाहिए ,जो आपको और वातावरण को गुंजित करें |इसकी गूँज ह्रदय में गुंजित होनी चाहिए |तभी यह आंदोलित करेगा आपके सम्बंधित चक्र को और वहां से तरंग उत्पादन बढ़ेगा और वातावरण की ऊर्जा को आकर्षित करेगा |ऐसा ही सभी मन्त्रों में है |अगर ऐसा न होता तो अलग बीज और बिन्दुओं का प्रयोग क्यों होता |हर बीज का हर मंत्र का अपना उच्चारण ,नाद है उसे उसी ढंग से किया जाना चाहिए |सही ढंग से कर दीजिये कुछ हजार में आपको लाभ मिल जाएगा |रोज हजारों जप मत कीजिये कुछ सौ कीजिये पर आराम से धीरे धीरे पूरी एकाग्रता ,ध्यान ,भाव ,नाद ,उच्चारण से कीजिये देवता प्रसन्न हो जाएगा |[[व्यक्तिगत विचार ब्लॉग पाठकों के लिए ]]…………………………………………………………….हर -हर महादेव 

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