Author: Tantra Marg
  • शिवलिंग का अर्थ क्या है ?

    शिवलिंग का अर्थ
    ============
     अन्य धर्म के लोग अथवा नास्तिक अथवा नासमझ लोग शिवलिंग की पूजा की आलोचना करते है.. छोटे छोटे बच्चो को बताते है कि हिन्दू लोग लिंग और योनी की पूजा करते है..इन नासमझों को संस्कृत का ज्ञान नहीं होता है..हिन्दुओ के प्रति नफ़रत पैदा करने अथवा हिन्दुओं में ही अविश्वास और संदेह उत्पन्न करने के लिए इस तरह की बातें उड़ाई जाती हैं |हमारे तथाकथित विद्वान् भी उनकी सोच का खंडन अधिकतर नहीं कर पाते क्योकि उनमे से सब को इसके सही अर्थ का खुद ज्ञान नहीं होता | इसका अर्थ इस प्रकार है..
    पहले भाषा का ज्ञान ले……
    लिंग>>> लिंग का संस्कृत भाषा में चिन्ह ,प्रतीक अर्थ होता है… जबकी जनर्नेद्रीय (मानव अंग ) को संस्कृत भाषा मे (शिशिन) कहा जाता है..
    शिवलिंग >>> शिवलिंग का अर्थ शिव का प्रतीक….
    ” शिवलिंग ” शब्द में ‘ लिंग ‘ शब्द दो शब्दों से बना है, ” लीन + गा (गति) ” अर्थात, शिव में लीन होकर ही मनुष्य को गति प्राप्त होता है;  यानी, शिव के निराकार स्वरूप में ध्यान-मग्न आत्मा सद्गति को प्राप्त होती है, उसे परब्रह्म की प्राप्ति होती है।
    तात्पर्य यह है कि हमारी आत्मा का मिलन परमात्मा के साथ कराने का माध्यम-स्वरूप है, शिवलिंग! 
    शिवलिंग साकार एवं निराकार ईश्वर का ‘प्रतीक’ मात्र है, जो परमात्मा – आत्म-लिंग का द्योतक है। 
    शिवलिंग शाश्वत-आत्मा का स्वरूप है, जो न जल से प्रभावित होता है, न अग्नि से, न पृथ्वी से, न किसी अस्त्र-शस्त्र से… जो अजित है, अजेय है! शिव और शक्ति का पूर्ण स्वरूप है, शिवलिंग।
    >>पुरुषलिंग का अर्थ पुरुष का प्रतीक  इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ स्त्री का प्रतीक और  नपुंसकलिंग का अर्थ है ..नपुंसक का प्रतीक —-
    अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य के जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है..तो वे बताये ”स्त्री लिंग ”’के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना चाहिए… और खुद अपनी औरतो के लिंग को बताये फिर आलोचना करे—-
    ”शिवलिंग”’क्या है >>>>>
    शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। 
    स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है। शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है नाही शुरुवात | जो शाश्वत है |
    ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और प्रदार्थ |  हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है|
    इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है | ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है. वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है. (The universe is a sign of Shiva Lingam.) शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान है
    अब बात करते है योनि शब्द पर —- मनुष्ययोनि ”पशुयोनी”पेड़-पौधों की योनि”’पत्थरयोनि”’ >>>> योनि का संस्कृत में प्रादुर्भाव ,प्रकटीकरण अर्थ होता है.. जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है.. कुछ धर्म में पुर्जन्म की मान्यता नहीं है ..इसीलिए योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते है जबकी हिंदू धर्म मे ८४ लाख योनी यानी ८४ लाख प्रकार के जन्म है अब तो वैज्ञानिको ने भी मान लिया है कि धरती मे ८४ लाख प्रकार के जीव (पेड, कीट,जानवर,मनुष्य आदि) है…. मनुष्य योनी >>>>पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि होता है..अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है।
    शिव लिंग ऊर्जा ब्रह्मांडीय ऊर्जा प्राप्ति का माध्यम
    ——————————————-
    भारत का रेडियोएक्टिविटी मैप उठा लो तो हैरान हो जाओगे। क्योंकि भारत सरकार के नुक्लिएर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगो के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है |यहाँ रेडियेशन नहीं होता किन्तु रेडियेशन चित्र में रेडियेशन दिखता है अर्थात यहाँ ऊर्जा उत्पन्न होती है | शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि एक प्रकार के न्यूक्लिअर रिएक्टर्स ही हैं एक उर्जा स्रोत है ,जिनका सम्बन्ध ब्रह्मांडीय ऊर्जा धाराओं से होता है ,iइन ज्योतिर्लिंगों से ऊर्जा निकलती है जो अभिषेक करने वालों और आसपास आने वालों को प्रभावित करती है ,ज्योर्लिंगों पर अनवरत जल धारा डाली जाती है ,उनपर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे।
    महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे कि बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं | क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है तभी जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता |
    भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिव लिंग की तरह है |शिव लिंग से सम्बन्धित हम जिस रेडियो एक्टिविटी या रिएक्टिव जल की बात कर रहे वह वास्तव में युरेनियम ,थोरियम ,प्लुटोनियम रेडियेशन या एटामिक रिएक्टर्स जैसा रेडियेशन नहीं अपितु प्रबल उर्जा का प्रवाह है जो बिलकुल भिन्न होता है और चढ़ाया जल भी ऊर्जा संतृप्त होता है |शिवलिंग जिस वस्तु का बना होगा ऊर्जा की प्रकृति भिन्न होगी तभी कहा जाता है की कुछ विशेष प्रकार के शिवलिंग पर चढ़ाया प्रसाद ही खाया जा सकता है सभी शिवलिंग पर चढ़ा प्रसाद और जल नहीं ग्रहण किया जा सकता |यहाँ तक की शिवलिंग पर चढ़ी वस्तुएं भी तीव्र प्रभावकारी हो जाती है जैसे फल फूल पत्र आदि |इनसे अच्छे और बुरे दोनों ही प्रकार के प्रयोग तांत्रिक कर डालते हैं |
                        शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिल कर औषधि का रूप ले लेता है | तभी हमारे बुजुर्ग हम लोगों से कहते कि महादेव शिव शंकर अगर नराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी |
    ज़रा गौर करो, हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है  | आज इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारी परम्पराओं को समझने के लिए ,जिस विज्ञान की आवश्यकता है वो हमें पढ़ाया नहीं जाता और विज्ञान के नाम पर जो हमें पढ़ाया जा रहा है उस से हम अपनी परम्पराओं को समझ नहीं सकते | जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है वो सनातन है,, विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें |हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों द्वारा हजारों लाखों वर्ष पूर्व जिस वैज्ञानिक संस्कृति ,पंरम्परा को नियम बनाकर मानवजीवन का एक अभिन्न अंग बना दिया है |उसे देख कर ही आज के वैज्ञानिक दाँतो तले अंगुली दबा लेते है।.सोचिये शिव की पूजा तो आप करते हैं किन्तु शिवलिंग पूरे विश्व में पाए जाते हैं ,क्यों ,दुसरे धर्मों ,सम्प्रदायों में यह कहाँ से आया ,किसी न किसी रूप में अन्य स्थानों पर क्यों इनकी प्रतिष्ठा है |इससे आपको समझ आ जाएगा की शिवलिंग इतना महान क्यों हैं |…………………………………………………………..हर-हर महादेव 

    READ MORE: शिवलिंग का अर्थ क्या है ?
  • शिवलिंग को आप कितना जानते हैं ?

    ::::::::::: क्या है शिवलिंग::::::::::::
    ====================
     समस्त संसार में शिवलिंग पाए जाते हैं ,विभिन्न धर्मों तक में इनकी किसी न किसी रूप में प्रतीकाकृति मिलती हैं |हिन्दू धर्म में यह परम पवित्र शिव के प्रतीक माने जाते हैं और इनकी पूजा की जाती है |यह शिवलिंग है क्या ,कभी इस पर सामान्यतया विचार सामान्य लोग नहीं करते जा इसके बारे में बहुत नहीं जानते |इसलिए जो जैसी परिभाषा इसकी गढ़ कर सुना देता है सामान्य रूप से मान लिया जाता है और कल्पना कर ली जाती है |कुछ महाबुद्धिमान प्राणियों ने परम पवित्र शिवलिंग को जननांग समझ कर पता नही क्या-क्या और कपोल कल्पित अवधारणाएं फैला रखी हैं परन्तु…वास्तव में. शिवलिंग. वातावरण सहित घूमती धरती तथा  सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का प्रतिनिधित्व करता है |इसका अक्ष /धुरी (axis) ही लिंग है।
    दरअसल.इसमें ये गलतफहमी.. भाषा के रूपांतरण और, मलेच्छों द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने  तथा, अंग्रेजों द्वारा इसकी व्याख्या से उत्पन्न हुआ  हो सकता है. |जैसा कि…. हम सभी जानते है कि. एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में. अलग-अलग अर्थ निकलते हैं….! उदाहरण के लिए.- यदि हम हिंदी के एक शब्द “”सूत्र”’ को ही ले लें तो सूत्र मतलब. डोरी/धागा, .गणितीय सूत्र ,.कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है जैसे कि. नारदीय सूत्र ,.ब्रह्म सूत्र इत्यादि | उसी प्रकार “”अर्थ”” शब्द का भावार्थ: सम्पति भी हो सकता है और मतलब (मीनिंग) भी |
    ठीक बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय  चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।
    ध्यान देने योग्य बात है कि””लिंग”” एक संस्कृत का शब्द है जिसके निम्न अर्थ है :
    @ त आकाशे न विधन्ते -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० ५
    अर्थात….. रूप, रस, गंध और स्पर्श ……..ये लक्षण आकाश में नही है ….. किन्तु शब्द ही आकाश का गुण है ।
    @ निष्क्रमणम् प्रवेशनमित्याकशस्य लिंगम् -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० २ ०
    अर्थात….. जिसमे प्रवेश करना व् निकलना होता है ….वह आकाश का लिंग है ……. अर्थात ये आकाश के गुण है ।
    @ अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं क्षिप्रमिति काललिङ्गानि । -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० ६
    अर्थात….. जिसमे अपर, पर, (युगपत) एक वर, (चिरम) विलम्ब, क्षिप्रम शीघ्र इत्यादि प्रयोग होते है, इसे काल कहते है, और ये …. काल के लिंग है ।
    @ इत इदमिति यतस्यद्दिश्यं लिंगम । -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० १ ०
    अर्थात……. जिसमे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर व् नीचे का व्यवहार होता है ….उसी को दिशा कहते है……. मतलब कि….ये सभी दिशा के लिंग है ।
    @ इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिंगमिति -न्याय० अ ० १ । आ ० १ । सू ० १ ०
    अर्थात….. जिसमे (इच्छा) राग, (द्वेष) वैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, सुख, दुःख, (ज्ञान) जानना आदि गुण हो, वो जीवात्मा है…… और, ये सभी जीवात्मा के लिंग अर्थात कर्म व् गुण है ।
    इसीलिए……… शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने के कारन………. इसे लिंग कहा गया है…।
    स्कन्दपुराण में स्पष्ट कहा है कि……. आकाश स्वयं लिंग है…… एवं , धरती उसका पीठ या आधार है …..और , ब्रह्माण्ड का हर चीज ……. अनन्त शून्य से पैदा होकर….. अंततः…. उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है .|यही  कारण है कि इसे कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे कि प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam)  इत्यादि |
    यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि. इस ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और प्रदार्थ | इसमें से हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है जबकि आत्मा एक ऊर्जा है |ठीक इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं | क्योंकि ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है |इसीलिए शास्त्रों में शक्ति की विवेचना में कहा जाता है की जब शक्ति [काली] शिव से निकल जाती है तो शिव भी शव हो जाते हैं ,अर्थात शिव तभी ताल शिव हैं जब तक उनके साथ शक्ति हैं |वैसे ही  पदार्थ में तभी तक जीवन है जबतक उसमे आत्मा है |
    अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की दृष्टि से बोलने की जगह … शुद्ध वैज्ञानिक भाषा में बोला जाए तो. हम कह सकते हैं कि शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि हमारे ब्रह्मांड की आकृति है.,उसकी ऊर्जा संरचना की प्रतिकृति है ,और अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की भाषा में बोला जाए तो शिवलिंग ,भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-अनादि एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक है. | अर्थात शिवलिंग हमें बताता है कि…… इस संसार में न केवल पुरुष का  और न ही केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है बल्कि, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही समान हैं |एक दुसरे की परिकल्पना अथवा पूर्णता एक दुसरे के बिना संभव नहीं है |
    हमें ज्ञात है की ब्रहमांड की प्रत्येक संरचना पदार्थ है जो परमाणुओं से मिलकर बनता है |परमाणु सर्वत्र विद्यमान हैं |जल-आकाश-वायु सर्वत्र |परमाणु की संरचना में नाभिक में प्रोटान और न्यूट्रान होते हैं और इस नाभिक के चारो और इलेक्ट्रान चक्कर लगता रहता है |न्यूट्रान तो उदासीन होता है किन्तु फिर भी नाभिक धनात्मक होता है क्योकि प्रोटान धनात्मक आवेश वाला कण होता है जो पूरे नाभिक को धनात्मक बनाए रखता है ,इस धनात्मक के आकर्षण में बंधकर ऋणात्मक आवेश का कण इलेक्ट्रान उसके चारो और चक्कर लगता रहता है और परमाणु का निर्माण होता है |इलेक्ट्रान का चक्कर लगभग गोलाकार होता है जिसकी तुलना हम शिवलिंग के योनी या अर्ध्य से कर सकते हैं |धनात्मक नाभिक की तुलना लिंग से कर सकते हैं जो स्थिर रहता है |इसमें स्थित न्यूट्रान परम तत्त्व का प्रतीक है जो उदासीन रहता है |इस विज्ञान को हमारा वैदिक ज्ञान जानता था और उसने शिवलिंग की परिकल्पना की |समस्त ब्रह्माण्ड परमाणुओं से बना है ,परमाणु हर कण कण में विद्यमान है |अर्थात ईश्वरीय ऊर्जा हर कण कण में है ,तभी तो हम कहते हैं कण कण में भगवान |इस परमाणु से ही शरीर की कोशिकाएं बनती हैं और शरीर बनता है ,,इससे ही वनस्पतियों की कोशिकाएं और शारीर बनता है |यहा तक की धातु-पत्थर-मिटटी भी इसी से बनते हैं |अर्थात शिवलिंग इस परमाणु का प्रतिनिधित्व करता है |धनात्मक-ऋणात्मक ऊर्जा के साथ निर्विकार शिव का प्रतिनिधित्व करता है |
    अगर पुरुष-स्त्री के परिप्रेक्ष्य में देखें तभी यह शिवलिंग स्थूल रूप से लिंग -योनी का प्रतिनिधित्व करता दीखता है ,परन्तु यह वास्तव में ब्रह्मांडीय ऊर्जा धारा-संरचना का प्रतिनिधित्व करता है | लिंग -योनी में परिभाषित करने का शायद कारण इसके पुरुष और स्त्री अथवा पुरुष और प्रकृति का धनात्मक और ऋणात्मक ऊर्जा रूप है |इस ऊर्जा धरा या संरचना की अनेक परिभाषाएं और विवरण हैं ,पर यह मूल रूप से उर्जा को ,शक्ति को, उसकी क्रियाविधि को व्यक्त करता है |…………………………………………………………….हर-हर महादेव 

    READ MORE: शिवलिंग को आप कितना जानते हैं ?
  • वुडू प्रयोग ,पुतली विद्या और काला जादू [Vudoo spell ,Putli Vidya and Black Magic]

    वुडू प्रयोग ,पुतली विद्या और काला जादू [Vudoo spell ,Putli Vidya and Black Magic]

    वुडू प्रयोग ,पुतली विद्या और काला जादू
    [Vudoo spell ,Putli Vidya and Black Magic]
    ========================== [[ भाग -१ ]]
              वूडू एक ऐसी विद्या है जो एक धर्म का रूप ले चुकी है |यह जादूगरों के धर्म के रूप में जानी जाती है और मूल रूप से इसका नाम अफ्रीका के आदिवासियों से सम्बन्ध रखता है |वुडू नाम ही अफ्रीका से सम्बंधित होता है ,जबकि इस तरह के जादू से समबन्धित प्रायोगिक धर्म दुनिया के हर हिस्से में भिन्न रूप से आदिम जनजातियों में पाए जाते हैं |हर देश और क्षेत्र में इसका नाम और प्रायोगिक तरीका थोड़े बहुत फेरबदल के साथ अलग हो सकता है लेकिन मूलतः यह जादू -टोने ,झाड़ -फूंक ,स्थानीय देवता और स्थानीय परंपरा से सम्बंधित होता है |  
              इसे पूरे अफ्रीका का धर्म माना जा सकता है, लेकिन केरीबी द्वीप समूह में आज भी यह जादू की धार्मिक परंपरा जिंदा है और यहाँ इसे वास्तविक माना जाता है । इसे यहां वूडू कहा जाता है।इसी के नाम पर पुतली विद्या को लोग वुडू के नाम से जानने लगे | हाल-फिलहाल बनीन देश का उइदा गांव वूडू बहुल क्षेत्र है। यहां सबसे बड़ा वूडू मंदिर है, जहां विचित्र देवताओं के साथ रखी है जादू-टोने की वस्तुएं। धन-धान्य, व्यापार और प्रेम में सफलता की कामना लिए अफ्रीका के कोने-कोने से यहां लोग आते हैं। कई गांवों में वूडू को देवता माना जाता है. देवता से मनोकामना पूरी करने की मांग की जाती है. एक वूडू देवता का नाम जपाटा है यानि पृथ्वी का देवता.देवताओं की पूजा के दौरान एल्कोहल, बीयर और सिगरेट भी चढ़ाई जाती है. कुछ जगहों पर मुर्गी या बकरे की बलि भी दी जाती है. लोग मानते हैं कि हर देवता का खुश होने का अपना स्टाइल है.जो लोग भविष्य जानना चाहते हैं, वे फा कहे जाने वाले ओझाओं से मिलते है. कोई भी सवाल नहीं किया जा सकता. अपनी मृत्यु के बारे में सवाल करना वर्जित है..
     वूडू प्रकृति के पंचतत्वों पर विश्वास करते हैं। जैसा की भारत के आदिवासियों में समूह में गाने और नाचने की परंपरा है वैसा ही वूडू नर्तक परंपरागत ढोल-डमरूओं की ताल पर नाच कर देवताओं का आह्वान करते हैं। ये प्रार्थनागत नाच गाना कई घंटों तक चलता है। इस तरह की परंपरा को अंग्रेजी में टेबू कह सकते हैं। यह आज भी दुनिया भर में जिंदा है। नाम कुछ भी हो पर इसे आप आदिम धर्म कह सकते हैं। इसे लगभग 6000 वर्ष से भी ज्यादा पुराना धर्म माना जाता है। ईसाई और इस्लाम धर्म के प्रचार-प्रसार के बाद इसके मानने वालों की संख्या घटती गई और आज यह पश्चिम अफ्रीका के कुछ इलाकों में ही सिमट कर रह गया है। हालांकि वूडू को आप बंजारों, आदिवासियों, जंगल में रहने वालों का काल्पनिक या पिछड़ों का धर्म मानते हैं, लेकिन गहराई से अध्ययन करने पर पता चलता है कि वूडू की परंपरा आज के आधुनिक धर्म में भी न्यू लुक के साथ मौजूद है। भारत में तांत्रिकों और शाक्तों का धर्म कुछ-कुछ ऐसा ही माना जा सकता है। क्या चर्च में भूत भगाने के उपक्रम नहीं किए जाते? मंदिर में भूत -प्रेत का निवारण नहीं होता ,तांत्रिकों में आदिम मन्त्रों का प्रयोग और आदिम पद्धतियों का प्रयोग नहीं होता |यह सब प्राचीन इन्ही परम्पराओं से स्थान विशेष के साथ थोडा थोडा बदलते हुए सूदूर क्षेत्र तक जाकर अलग रूप ले लेता है |      
                  वुडू की मुख्य विशेषता इसमें इस्तेमाल होने वाले जानवरों के शरीर के हिस्से व पुतले हैं | इसमें जानवरों के अंगों से समस्या समाधान का दावा किया जाता है। इस जादू से पूर्वजों की आत्मा किसी शरीर में बुलाकर भी अपना काम करवा सकते हैं। इसके अलावा दूर बैठे इंसान के रोग व परेशानी के इलाज के लिए पुतले का भी उपयोग किया जाता है। वूडू जानने वालों का मानना है कि इस धरती पर मौजूद हर जीव शक्ति से परिपूर्ण है। इसलिए उनकी ऊर्जा का उपयोग करके बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। काला जादू के विशेषज्ञों के अनुसार यह वो ऊर्जा (शक्ति) है जिसका इस्तेमान नहीं होता।भारतीय वैदिक परंपरा और तंत्र शास्त्र दोनों में पुतली निर्माण की अवधारणा रही है और इसका भिन्न रूपों में उपयोग भी वैदिक काल से ही रहा है जबकि वैदिक काल लाखों वर्ष पूर्व का माना जाता है ,यद्यपि प्रक्रिया और पदार्थ भिन्न हो जाते हैं |एशिया की आदिम जनजातियों में यही प्रक्रिया अलग रूप में पाने जाती है और अलग धर्म में अलग रूप में |इसे यहाँ वुडू की तरह धर्म का रूप तो नहीं प्राप्त किन्तु इसका प्रयोग हमेशा से होता आया है |जैसे किसी खोये व्यक्ति के न मिलने पर उसे मृतक मान उसका पुतला बनाकर आह्वान कर उसका शव दाह करना |पूजन में विभिन्न खाद्य वस्तुओं से विभिन्न जंतु अथवा शरीर की आकृति का निर्माण कर विविध उपयोग करना |मिटटी के पुतले आदि का निर्माण कर उसपर विभिन्न क्रियाएं करना ,धातु के पुतलों का उपयोग आदि |यह वैदिक और पुरातन काल से हो रहा अर्थात वुडू से भी प्राचीन विद्या यह हमारे संस्कृति में हैं |
                वुडू को लोग काला जादू मानते हैं ,पुतली विद्या को लोग काला जादू मानते हैं जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है |दोनों में ही मूल अवधारणा लोगों की भलाई ही थी किन्तु जिस प्रकार तंत्र का उपयोग स्वार्थ हेतु करने से वह दुरुपयोग हो गया वैसा ही वुडू के साथ हुआ और हर प्रकार की ऐसी क्रियाओं के साथ हुआ |कारण यह की यह विद्या ऊर्जा उपयोग और ऊर्जा प्रक्षेपण की है जिसको इच्छानुसार प्रयोग किया जाता है |जब यह इच्छा स्वार्थ हो तो दुरुपयोग हो जाती है और जब यह इच्छा लोगो की भलाई की हो तो सदुपयोग हो जाती है |वास्तव में वुडू ,पुतली निर्माण अथवा ऐसी समस्त विद्याएँ तंत्र विज्ञान के अंतर्गत आती हैं जिनका अपना निश्चित विज्ञान होता है जो आज के विज्ञान से भी बहुत आगे हैं |यह एक बहुत ही दुर्लभ प्रक्रिया है जिसे बहुत ही विशेष परिस्थितियों में अंजाम दिया जाता है। इसे करने के लिए उच्च स्तर की विशेषज्ञता की जरूरत होती है।कुछ ही लोग इसे करने में सक्षम होते हैं। इस प्रक्रिया में गुड़िया जैसी मूर्ति का इस्तेमाल होगा है। यह गुड़िया कई तरह की खाने की चीजों जैसे बेसन, उड़द के आटे ,कपडे ,धातु ,लकड़ी ,बाल ,वनस्पति ,पौधे अथवा उनके अवयव आदि से बनाया जाता है ,जैसी क्षेत्र विशेष अथवा समुदाय विशेष की परंपरा हो अथवा जैसी जरुरत हो । इसमें विशेष मंत्रों से जान डाली जाती है। उसके बाद जिस व्यक्ति पर जादू करना होता है उसका नाम लेकर पुतले को जागृत किया जाता है। इस प्रक्रया को सीखने के लिए व्यक्ति को विशेष प्रार्थना और पूजा पाठ करनी पड़ती है। कड़ी तपस्या के बाद ही यह सिद्धि प्राप्त होती है |
                  काला जादू हो या सफ़ेद जादू अथवा कोई भी व्यक्ति विशेष पर आधारित तांत्रिक क्रिया यह और कुछ नहीं बस एक संगृहित ऊर्जा है। जो एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जाता है या कहें एक इंसान के द्वारा दूसरे इंसान पर भेजा जाता है। विज्ञान की भाषा में ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है, न खत्म किया जा सकता है, उसे सिर्फ एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है। यदि ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल है, तो नकारात्मक इस्तेमाल भी है। ऊर्जा सिर्फ ऊर्जा होती है, वह न तो पॉजीटिव होती है, न नेगेटिव। आप उससे कुछ भी कर सकते हैं।वुडू अथवा पुतली विद्या व्यक्ति विशेष अथवा किसी एक मूल व्यक्ति पर ही मूल रूप से आधारित विद्या है जबकि भारतीय मूल तंत्र आदि बहु आयामी प्रयोग पर आधारित हैं |वुडू आदि जैसी विद्याओं में स्थानीय मन्त्रों ,स्थानीय वस्तुओं का उपयोग होता है जैसे हमारे यहाँ मूलतः व्यक्ति आधारित ग्रामीण क्रियाओं में शाबर मन्त्रों का उपयोग होता है |ऐसा ही हर जाती ,जनजाति ,धर्म ,क्षेत्र में होता है और इसमें मुख्य शक्ति भी स्थानीय देवता ही होता है |  पुतले से किसी इंसान को तकलीफ पहुंचाना इस जादू का उद्देश्य नहीं है। इसे भगवान शिव ने अपने भक्तों को दिया था भारिय परंपरा और तंत्र में ,जबकि अन्य जगह इसे वहां का स्थानीय देवता अपने लोगों की भलाई के लिए दिया अथवा बताया होता है । पुराने समय में इस तरह का पुतला बनाकर उस पर प्रयोग सिर्फ कहीं दूर बैठे रोगी के उपचार व परेशानियां दूर करने के लिए किया जाता था। कुछ समय तक ऐसा करने पर तकलीफ खत्म हो जाती थी। मगर समय के साथ-साथ इसका दुरुपयोग होने लगा।वुडू में भी यही परम्परा रही और हर प्रकार के पुतला निर्माण में भी |वैदिक पुतला निर्माण बिलकुल अलग प्रक्रिया थी जिसमे इसे मुक्ति और मोक्ष तक जोड़ा गया है |    
                  कुछ स्वार्थी लोगों ने इस प्राचीन विधा को समाज के सामने गलत रूप में स्थापित किया। तभी से इसे काला जादू नाम दिया जाने लगा। दरअसल, उन्होंने अपनी ऊर्जा का उपयोग समाज को नुकसान पहुंचाने के लिए किया। गौरतलब है जिस तरह जादू की सहायता से सकारात्मक या धनात्मक ऊर्जा पहुंचाकर किसी के रोग व परेशानी को दूर किया जा सकता है। ठीक उसी तरह सुई के माध्यम से किसी तक अपनी नकारात्मक ऊर्जा पहुंचाकर। उसे तकलीफ भी दी जा सकती है। जब यह किसी को कष्ट देती है अथवा हानि पन्हुचाती है तब यह काला जादू कहलाती है ,और जब लाभ पहुचाती है तो सफ़ेद जादू ,यद्यपि यह दोनों ही नाम बस भ्रम हैं ,जादू कोई भी न काला होता है न सफ़ेद |यह तो बस ऊर्जा का उपयोग और उसका एक स्थान से दुसरे स्थान तक स्थानान्तरण और स्वरुप परिवर्तन मात्र है |सदुपयोग -दुरुपयोग दोनों उसी प्रक्रिया से हो सकता है जो करता की इच्छा पर निर्भर करता है |……….[क्रमशः ][[अगला अंक -पुतली विद्या अथवा वुडू कैसे कार्य करता है ]]………………………………………………………हर -हर महादेव

    READ MORE: वुडू प्रयोग ,पुतली विद्या और काला जादू [Vudoo spell ,Putli Vidya and Black Magic]
  • पूजा से नुकसान तो नहीं ?

    क्या अपनी बर्बादी खुद लिख रहे ?
    ===============
    कभी सोचा है ?
    ————
                           आप जिस देवता को पूजते हैं आपका अंतिम पड़ाव उस देवता तक ही अधिकतम हो सकता है ,अर्थात आप अधिक से अधिक उसके लोक तक ही जा सकते हैं ,अगर वह प्रसन्न हो गया अथवा सिद्ध हो गया तो |आप अगर भूत -प्रेत ,पिशाचिनी ,यक्षिणी ,अप्सरा ,पीर ,मजार ,शहीद ,बीर ,सती ,ब्रह्म ,साईं पूजते हैं तो आपका अंतिम पड़ाव यही होंगे आपको देवी-देवताओं का लोक नहीं मिलने वाला इन्हें पूजने से |इतना तो सभी जानते हैं की किस देवता को पूजने से क्या मिलता है ,उसी तरह जिसे आप पूजते हो वह आपको मिलता है और आपको उसका लोक मिलता है |अगर कोई मनुष्य मरा है और ब्रह्म ,पीर ,बीर ,सती ,शहीद ,साईं ,प्रेत ,भूत बना है तो उसकी तो क्षमता ही उसके लोक तक है ,जब वह खुद आत्मा रूप में घूम रहा तो आपको क्या देवताओं तक ले जाएगा |
                            इसी तरह पिशाचिनी ,यक्षिणी ,अप्सरा भी अपने लोक और क्षमता से ऊपर तो आपको नहीं ही पहुचा सकते |क्या आप गारंटी से कह सकते हैं की अमुक शहीद ,ब्रह्म ,बीर ,साईं का मोक्ष हो गया या वह देव लोक तक चले गए |जब खुद नहीं गए तो आपको क्या ले जायेंगे |अगर चले गए तो उनके पूजने पर यहाँ आपका काम कैसे होता है |यहाँ आपका काम होता है इसका मतलब वह इसी भौतिक दुनिया में भटक रहे और आपके पूजा को लेकर अपनी शक्ति बढ़ा रहे और अपना शक्ति बरकरार रख रहे |
                     इनमे एक दोष और होता है यह पूजे जाने पर आपके कुलदेवता की पूजा ले लेते हैं और कुलदेवता साथ छोड़ देते हैं ,आज तो नहीं समझ आएगा पर अगली पीढियां परिणाम गंभीर भुगतेंगी जब कुलदेवता का सुरक्षा चक्र समाप्त हो जाएगा |दूसरी समस्या की कुलदेवता को पूजा न मिलने से ईष्ट तक आपकी पूजा नहीं पहुचेगी |आप तीन घंटे पूजा करो पर लाभ कुछ भी नहीं होगा |ईष्ट तक पूजा पहुच ही नहीं रही |थक कर आप कहोगे की पूजा पाठ ,तंत्र मन्त्र सब बेकार है |
                          तीसरी समस्या यह होगी आपके इन शक्तियों को पूजने से की जब तक आप इन्हें पूजोगे ये आपको सुखी रखेंगी क्योकि इनका स्वार्थ है आपकी पूजा से इन्हें शक्ति मिलेगी |आने वाली पीढ़ियों में जब कोई भूलेगा या पूजा नहीं देगा या आप ही कभी पूजा बंद कर दिए तो यह उनका या आपका विनाश कर देंगी |कुलदेवता और ईष्ट पहले ही गायब हैं आपका या पीढ़ियों का भला कोई नहीं कर पायेगा |इन सब कारणों को आपने सोचा नहीं पूजने लगे आत्मा की प्रतीक शक्तियों को ,जब परिणाम बंद हुआ तो पूजा पाठ सब बेकार बना दिया |पहले नहीं सोचा तो भैया अब सोचो ,अभी आपके पास समय हो सकता है |वर्ना अपना तो बेडा गर्क करोगे ही आने वाली पीढियां भी गाली देंगी की कहाँ फंसा कर चले गए उन्हें आप |दुसरे की देखा -देखि साईं -पीर के भ्रम से बाहर निकलो नहीं तो पछताने पर भी रास्ता नहीं मिलेगा |….[पोस्ट का उद्देश्य किसी की भावना  को  ठेस  पहुचना नहीं है ,अपितु पूजा -पाठ  के आतंरिक रहस्य को समझने का प्रयत्न मात्र है ,जो हम अपने पेज और ब्लॉग के पाठकों से साझा कर रहे ,वैचारिक स्वतंत्रता के अधिकार के आलोक में ]………………………………………………………….हर-हर महादेव 

    READ MORE: पूजा से नुकसान तो नहीं ?
  • नवरात्र में दुर्गा साधना दिव्य गुटिका [चमत्कारी डिब्बी ] पर 

    =============प्रचंडा चामुंडा साधना =============
    जैसा की हमने अपने दिव्य गुटिका अथवा चमत्कारी डिब्बी धारक पेज के पाठकों को सूचित किया था की जो गुटिका उन्होंने कभी भी हमसे किसी भी अन्य उद्देश्य से ली हो वे उस उद्देश्य के साथ -साथ उस दिव्य गुटिका पर अनेक प्रयोग अपनी आवश्यकता अनुसार कर सकते हैं और हम क्रमशः उनकी विधि प्रस्तुत करते रहेंगे |इस क्रम में हम नवरात्र पर विशेष रूप से प्रयोग किये जाने वाले कुछ प्रयोगों के क्रम में दुर्गा साधना की सरलतम विधि प्रस्तुत कर रहे हैं जो नकारात्मक ऊर्जा ,भूत-प्रेत ,वायव्य बाधाएं ,तांत्रिक अभिचार ,अनावश्यक वशीकरण ,उच्चाटन ,विद्वेषण आदि की क्रियाओं को हटाने के साथ ही उन्नति ,सफलता ,विजय ,समृद्धि प्रदान करने वाली है |जिन धारकों को लगता हो की उनके ऊपर अथवा उनके दूकान ,व्यवसाय ,घर-परिवार पर किसी तरह की नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव है ,किसी ने कुछ किया -कराया किया हुआ है या अभिचार किया है ,या व्यवसाय -दूकान बाँध दिया है ,या उन्नति रोक दी है ,या अपने आप किसी वायव्य आत्मा परेशान कर रही है ,किसी बच्चे -स्त्री को कोई पीड़ा पहुंचा रहा हो ,घर-परिवार में अनावश्यक बीमारी -दुर्घटना -कष्ट का वातावरण बन रहा हो तो वह धारक इस प्रयोग को नवरात्र में शुरू कर निश्चित दिनों तक क्रिया प्रयोग कर लाभान्वित हो सकते हैं |इन बाधाओं से तो राहत मिलेगी ही सफलता -समृद्धि -उन्नति -विजय के द्वार खुलेंगे ,रुके कार्य पूर्ण होंगे ,मांगलिक -व्यावसायिक -आर्थिक अवसरों में आ रही बाधाएं समाप्त होंगी |
    सामग्री
    ———- मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुक्त दुर्लभ दिव्य गुटिका [चमत्कारी डिब्बी ],लाल रंग का वस्त्र ,इत्र ,लकड़ी की चौकी या बाजोट ,चांदी की तश्तरी [ न मिले तो पीतल ], असली सिन्दूर ,लौंग ,इलायची ,लाल फूल ,पान बीड़ा ,फल फूल ,प्रसाद चढाने को दूध की लाल मिठाई ,चावल ,सिक्का ,रुई ,देशी घी का दीपक |
    माला
    ——– मंत्र सिद्ध चैतन्य रुद्राक्ष माला
    आसन
    ——– लाल उनी आसन
    वस्त्र
    ——- लाल रंग की धोती
    दिशा
    ——- पूर्व दिशा
    दिन -समय
    ————–  नवरात्र में सुबह का समय
    जप संख्या अवधि
    ———————- प्रतिदिन जप संख्या समान हो और कोशिश हो की नवरात्र भर की अवधि में ५१ हजार जप संख्या पूर्ण हो जाए |इस हेतु कुछ जप सुबह और कुछ रात्री में निश्चित किया जा सकता है |यदि लगता है की ५१ हजार नहीं हो पायेगा तो २१ ,३१ अथवा ४१ हजार अपनी सुविधानुसार निश्चित करके रोज की मालाओं की संख्या निश्चित कर लें |इस अवधि में पूर्ण सात्विकता ,ब्रह्मचर्य पालन आवश्यक |
    मंत्र
    ——- || ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाये बिचै ||
    विधि
    ——– नवरात्र में सुबह जिस समय घट स्थापना का मुहूर्त हो आपके समय के अनुसार उस समय पूजन प्रारम्भ करें |यदि कलश स्थापना करते हों तो और अच्छा है अथवा नवरात्र का पाठ कराते हों तो उस पूजन के पूर्ण होने के बाद बैठें |कुछ न करते हों और कुछ न जानते हों तो केवल दी जा रही प्रक्रिया का पालन करें ,आपको सफलता उतनी ही मिलेगी जितनी नवरात्र पाठ और जप आदि से मिलती है |
     स्नानादि से निवृत्त हो शुद्ध हो लाल धोती धारण कर लाल उनी आसन पर पूर्व की और मुख कर अपने सामने लकड़ी के बाजोट या चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं |उस पर बीचोबीच रोली से अष्टदल कमल बनाएं फिर उस पर चांदी की तश्तरी स्थापित करें और तश्तरी के बीचोबीच रोली से या अष्टगंध से ह्रीं बनाएं |अब  उस पर दिव्यगुटिका स्थापित करें |दिव्य गुटिका के पीछे दुर्गा जी का चित्र स्थापित करें |अब दुर्गा जी का और दिव्य गुटिका का पूजन यथाशक्ति करें और जल ,अक्षत ,लाल फूल ,धुप -दीप ,प्रसाद चढ़ाएं ,असली पिला पारायुक्त सिन्दूर गुटिका के अन्दर चढ़ाएं |पान बीड़ा ,लौंग ,इलायची और एक सिक्का अर्पित करें |अब मंत्र सिद्ध चैतन्य रुद्राक्ष माला से उपरोक्त मंत्र का जप निश्चित संख्या में करें [जो आपने रोज के लिए निर्धारित की है ]|इस प्रकार रोज करते हुए अपनी निश्चित की हुई जप संख्या पूर्ण करें | जप पूर्ण हो जाने पर कम से कम ११माला मन्त्रों से हवन अवश्य करें अंत में स्वाहा जोड़ते हुए |इस प्रकार यह अनुष्ठान पूर्ण होता है |अब चांदी की तश्तरी समेत दिव्य गुटिका अपने पूजा स्थान में स्थापित करें और रुद्राक्ष माला गले में धारण करें |गुटिका के बाहर चढ़ाए गए लौंग ,इलायची को उठाकर सुरक्षित रख ले यह किसी भी अभिचार ,पीड़ा ,बाधा के निवारण में मदद करेगा ,पीड़ित को खिलाने पर अथवा बाजू में बाँध देने पर |अन्य शेष सामग्री को बहते जल या तालाब ,कुएं में प्रवाहित कर दें |इस गुटिका पर सिन्दूर अर्पित करते रहें और प्रतिदिन इसकी पूजा सामान्य रूप से करते रहें |संभव हो तो एक -दो माला भी रोज करें |इस प्रयोग को संपन्न करने पर भूत-प्रेत ,वायव्य बाधा ,अभिचार ,किया कराया दूर होगा ,सब प्रकार उन्नति होगी ,शत्रु पराजित होंगे |घर के अनेक दोष समाप्त होंगे |जहाँ भी रखा जाएगा गुटिका वहां के बंधन समाप्त हो जायेंगे |आगे होने वाले अभिचार काम नहीं करेंगे |गुटिका पर चढ़ाए सिन्दूर का तिलक करने पर आकर्षण शक्ति बढ़ेगी ,लोग प्रभावित होंगे ,सब प्रकार से सुरक्षा प्राप्त होगी |लोग वशीभूत होंगे |……………………………………………………….हर-हर महादेव

    READ MORE: नवरात्र में दुर्गा साधना दिव्य गुटिका [चमत्कारी डिब्बी ] पर 
  • कैसे चमत्कारी है दिव्य गुटिका [डिब्बी]

                                        हमने अपने ३० वर्षों के तंत्र जीवन के अनुभव के आधार पर और विभिन्न प्रकार की समस्याओं से ग्रस्त लोगों के कष्टों को दृष्टिगत रखते हुए एक दिव्य गुटिका का निर्माण किया है ,जो लगभग अधिकतर सामान्य समस्याओं का निवारण करता है |इसका नाम हमने चमत्कारी दिव्य गुटिका रखा है क्योकि यह अनेक समस्याओं ,अनेक कार्यों में काम करता है |इससे अनेक और कठिन उद्देश्य पूर्ण किये जा सकते हैं बस प्रक्रिया और पद्धति बदल कर जबकि गुटिका या डिब्बी वही रहती है |यह गुटिका या डिब्बी लोगों के लगभग सभी वह कार्य पूर्ण करती है जिसके लिए अलग -अलग पूजा -जप -तप करना पड़ता है या -ताबीज -कवच -जड़ी आदि धारण करना पड़ता है |इसमें वैसे तो २१ वस्तुएं हम सम्मिलित करके एक दिव्य प्रभाव उत्पन्न करते हैं किन्तु सभी का नाम नहीं बता सकते ,क्योकि यह हमारा व्यक्तिगत और गोपनीय अनुसंधान है जिसे हम सार्वजनिक नहीं कर सकते ,क्योकि इसका लोग व्यावसायिक उपयोग कर सकते हैं अथवा इसका दुरुपयोग कर सकते हैं ,चुकी यह सभी षट्कर्म मारण ,मोहन ,उच्चाटन ,वशीकरण ,आकर्षण ,शांति कर्म के उद्देश्य पूर्ण करता है |
                                  हमारे द्वारा निर्मित दिव्य गुटिका या डिब्बी कैसे चमत्कार करती है इसको आप इसमें सम्मिलित कुछ वस्तुओं के विशेषता से समझ सकते हैं |जो वस्तुएं पहचानी जा सकती हैं उनकी विशेषता हम बता रहे हैं जो हमारी गोपनीय वस्तुएं हैं उन्हें पहचाना नहीं जा सकता और उनकी विशेषता भी हम नहीं लिख रहे ,क्योकि इनमे कुछ प्रतिबंधित और दुर्लभ वस्तुएं भी हैं |जिन वस्तुओं की विशेषता लिख रहे उन्ही मात्र से अंदाजा हो जाएगा की यह वास्तव में चमत्कारी है ,इनमे अगर हम अन्य वस्तुओं की विशेषता को भी सम्मिलित कर दें जो गोपनीय हैं तो यह महा चमत्कारी हो जाती है |कुछ वस्तुओं की विशेषता निम्न है —
    हत्था -जोड़ी
    —————
    इसमें उपयोग की गयी हत्थाजोड़ी में माता चामुंडा का वास माना जाता है |इस जड़ी का सर्वाधिक प्रभाव इसकी सम्मोहंनशीलता है | साधक [व्यक्ति] इसे लेकर कही भी जाये उसका विरोध नहीं होगा |सम्बंधित मनुष्य उसके अनुकूल आचरण और व्यवहार करेगा |इस जड़ी के इसी गुण [सम्मोहनशीलता ]के कारण ही बहुत से लोग इसका प्रयोग प्रेम सम्बन्धी मामलों में भी करते हैं ,,|पति-पत्नी के मामलों में यह अत्यंत उपयोगी भी है और सदुपयोग भी |सम्मोहन और वशीकरण [आकर्षण ]के अतिरिक्त इसका प्रयोग धन वृद्धि ,सुरक्षा ,सौभाग्य वृद्धि ,व्यापार बाधा हटाने आदि में भी किया जाता है और बेहद प्रभावी भी है | इसकी सम्पूर्ण विधि पूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा इसे अमूल्य बना देती है |धारक या साधक यात्रा ,विवाद ,प्रतियोगिता ,साक्षात्कार ,द्युतक्रीडा ,और युद्धादी में यह साधक की रक्षा करके उसे विजय प्रदान करती है |भूत-प्रेत आदि वायव्य बाधाओं का उसे कोई भय नहीं रहता ,धन-संपत्ति देने में भी यह बहुत चमत्कारी सिद्ध होती है |इस पर विभिन्न प्रकार के वशीकरण-आकर्षण-सम्मोहन के प्रयोग किये जाते हैं ,विदेश यात्रा की रुकावटें दूर करने की क्रियाएं होती हैं ,घर की सुरक्षा की क्रियाएं होती हैं ,धन-संपत्ति-आकस्मिक लाभ सम्बन्धी क्रियाएं होती हैं ,व्यापार वृद्धि प्रयोग होते हैं ,मुकदमे में विजय ,विरोधियों की पराजय की क्रियाएं होती है ,,इसे जेब में रखा जाये तो सम्मान-सम्मोहंशीलता-प्रभाव बढ़ता है ,सामने के व्यक्ति का वाकस्तम्भन होता है ,आकस्मिक आय के स्रोत बनते हैं 
    सियारसिंगी
    ————–
    दूसरी वस्तु सियार्सिंगी शत्रु पराभव ,सामाजिक सम्मान ,शरीर रक्षा ,श्री समृद्धि ,आकर्षण ,वशीकरण ,सम्मोहन ,धन-सम्पदा ,सुख शान्ति के लिए उपयोग की जा सकती है |किसी शुभ तांत्रिक मुहूर्त में प्राण प्रतिष्ठित और अभिमंत्रित सियारसिंगी वाद-विवाद ,युद्ध ,संकट ,आपदा ,से बचानेवाला भी सिद्ध होता है |यह रक्षा कार्यों में अद्भुत सफलतादायक कहा जाता है |इसे धारण करनेवाला व्यक्ति दुर्घटना ,विवाद ,युद्ध अथवा किसी अन्य संकट में पड़ने पर तुरंत ही आप्दामुक्त हो जाता है |इस पर धन-समृद्धि ,वशीकरण ,सम्मोहन ,सुरक्षा से सम्बंधित विभिन्न क्रियाएं भी होती हैं ,जैसी आवश्यकता हो |केवल मंत्र और पद्धति ही बदलती है सियारसिंगी वही रहता है |इसे रखने वाला व्यक्ति जहाँ भी जाता है वहां का वातावरण उसके अनुकूल हो जाता है |
    श्वेतार्क मूल
    ————— श्वेतार्क मूल धन -समृद्धि प्रदायक ,भूत -प्रेत -शाकिनी -डाकिनी ,अभिचार -तंत्र क्रिया ,अल-बला ,नजर दूर करने वाला ,वशिकारक ,राजकीय कृपा ,मान-सम्मान प्रदायक ,रोग-शोक -शत्रु नाशक ,उन्नति और सफलता देने वाला ,विरोधियों को परास्त करने वाला ,इच्छा पूर्ती करने वाला ,
    औदुम्बर मूल
    —————– औदुम्बर की मूल धन -समृद्धि कारक ,उत्तम संतान सुख देने वाला ,यश -सम्मान देने वाला ,सुख -शान्ति -पारिवारिक सौहार्द्र देने वाला ,
    पीली कौड़ी
    ————-  पीली कौड़ी को देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है और धन -समृद्धि के लिए अथवा धन वृद्धि के लिए इसे अधिक कारगर माना जाता है |इससे धन -संपत्ति -समृद्धि शान्ति की वृद्धि होती है |आया वृद्धि और धन संचय के अवसर बढ़ते हैं |धन संचय में आ रही रुकावटें दूर होती हैं |
    गोमती चक्र
    ————– आर्थिक बाधा नाश और स्थायी लक्ष्मी प्राप्त होती है ,स्वास्थय सुरक्षा होती है और स्वास्थ्य -आरोग्य प्राप्त होता है ,शत्रु नाश होता है ,,डूबा -फंसा धन मिलने की संभावना बनती है ,नजर दोष -अभिचार से रक्षा होती है ,विवाद -मुकदमे में विजय प्राप्त होती है ,बुद्धि एकाग्रता में मदद करता है ,भूत -प्रेत -टोन -टोटके का दुष्प्रभाव टोकता है ,भाग्योदय करता है ,नौकरी -कार्य -व्यवसाय में सफलता दिलाता है ,गृह क्लेश का नाश करता है ,संतान बाधा समाप्त करता है , व्यापार -व्यवसाय में वृद्धि होती है |
    श्वेत गूंजा
    ———— श्वेत गुंजा धनदायक होता है |इससे आकस्मिक आय के स्रोत खुलते हैं |लक्ष्मी प्राप्ति होती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है |अभिचार से रक्षा होती है |
    दक्षिणावर्ती शंख
    ——————- दक्षिणावर्ती शंख जहाँ भी रहता है दरिद्रता वहां से पलौँ कर जाती है अर्थात निर्धनता -गरीबी निवारण के लिए यह सर्वश्रेष्ठ वस्तु है |इसके पूजा से धनलाभ ,संपत्ति प्राप्ति होती है |इससे अन्न भण्डार बढ़ता है ,समृद्धि बढती है ,शान्ति परिवार में बढती है ,विद्या -बुद्धि का विकास होता है |दुर्भाग्य ,अभिशाप ,अभिचार ,जादू -टोना ,नजर दोष और दुर्ग्रह प्रभाव समाप्त हो जाते हैं |
    महायोगेश्वरी मूल
    ———————- महायोगेश्वरी की जड़ मंगल पीड़ा को शांत करती है ,बुद्धि का विकास करती है ,नजर दोष -अभिचार दोष को रोकती है ,देवी शक्ति युक्त होने से यह शक्तियाँ व्यक्ति की रक्षा करती है ,धारक को सर्वत्र मान -सम्मान प्राप्त होता है |प्रतियोगिता ,युद्ध ,विवाद ,प्रतिस्पर्धा आदि में विजय प्राप्त होती है |भूत -प्रेत की बाधा समाप्त होती है |धनाभाव -दरिद्रता दूर होता है और सुख -समृद्धि में वृद्धि होती है |अकाल मृत्यु भय से सुरक्षा होती है |वशीकरण प्रभाव बढ़ता है |
    निर्गुन्डी मूल
    ————— निर्गुन्डी मूल लगातार आय उपलब्ध कराने में सहयोगी होती है |आकस्मिक धन प्राप्ति में सहायक होती है ,और इसके होने से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं |यह नकारात्मक ऊर्जा भी दूर करती है और सुख -समृद्धि भी बढाती है |
    अमरबेल मूल
    —————- अमरबेल वाशिकारक प्रभाव रखने वाली वनस्पति है जो वशीकरण की शक्ति उत्पन्न करती है |आर्थिक समस्या से मुक्ति दिलाती है |व्यापारिक समस्या का निदान में सहायक होती है |यह जहाँ होती है वहां टोटकों का प्रभाव नहीं होता |यह गर्भपात रोकने में भी सहायक होती है किन्तु विधि भिन्न होती है |इसमें ऐसी शक्ति होती है की इच्छित लड़के या लड़की से विवाह भी करा सकती है इतनी प्रबल वशीकरण प्रभाव रखती है |लोकहित में इसकी विधि नहीं दी जा सकती |
    हरसिंगार मूल
    —————– हरसिंगार एक बेहद तीव्र प्रभावकारी वनस्पति है जो धन -समृद्धि -शान्ति -सुरक्षा सब देता है |आकस्मिक आय के स्रोत बनाने और बढाने से यह बेहद कारगर है इसलिए शेयर -सट्टा -लाटरी -जुए -कमोडिटी वालों के लिए लाभदायक अधिक होती है |यह सभी के लिए समृद्धिदायक होती है |पति -पत्नी और परिवार के मनमुटाव कम करती है ,भूत -प्रेतों का उपद्रव शांत करती है |शत्रुओं पर विजय दिलाती है |
    रुद्राक्ष
    ——– रुद्राक्ष का प्रभाव जगजाहिर है ,इसपर अलग से बहुत कुछ लिखने की जरुरत नहीं ,पर यह शुभता बढाता है ,धनात्मक और सकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि करता है ,शान्ति लाता है ,अशुभ ग्रहादी प्रभाव को समाप्त करता है |शिव जी की कृपा प्राप्त होती है |भूत -प्रेत -पिशाच -डाकिनी -उपरी हवा -टोन -टोटके -तंत्र मन्त्र के प्रभाव को समाप्त करता है |तेज और ओज में वृद्धि होती है |
    मात्र इन १३ वस्तुओं से अंदाजा लगाया जा सकता है की यह गुटिका क्यों और कैसे चमत्कारी है जबकि इसमें अतिरिक्त ८ वस्तुएं और हैं जो बेहद दुर्लाभ और महत्वपूर्ण हैं ,उनकी अपनी विशेषता और गुण है |इसके अतिरिक्त सभी महत्वपूर्ण मूल और वनस्पतियाँ तंत्र के सबसे महत्वपूर्ण और वर्ष के एक दिन ही उपलब्ध योग रविपुष्य योग में ही निकाली ,प्राण प्रतिष्ठित और अभिमंत्रित होती हैं |अन्य वस्तुएं भी रविपुष्य योग में ही विशेष तांत्रिक पद्धति से प्राण प्रतिष्ठित और अभिमंत्रित होती हैं जिससे इनके गुण कई गुना बढ़ जाते हैं |इसलिए यह गुटिका जहाँ भी राखी जाती है इसकी प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है वहां की नकारात्मक उर्जाओं पर |केवल सामान्य पूजा मात्र भी इसका उत्तम लाभ दिलाती है जबकि यदि ठीक से पूजा और मंत्र जप किया जाए तो लक्षित उद्देश्य की पूर्ती संभव हो जाती है |
    इस गुटिका/डिब्बी के उपयोग से धन वृद्धि ,सम्मोहन ,वशीकरण ,वायव्य बाधाओं से सुरक्षा ,शत्रुओं से सुरक्षा ,अभिचार कर्म से सुरक्षा ,संपत्ति संवर्धन ,यात्रा में सुरक्षा ,विवाद-प्रतियोगिता में सफ़लता ,साक्षात्कार में सफ़लता ,द्युतक्रीडा -शेयर -सट्टा -लाटरी -कमोडिटी के कार्यों में सफलता ,आकस्मिक आय स्रोतों में वृद्धि ,सेल्स -मार्केटिंग के कार्यों में सफलता ,घर -मकान -दूकान के बंधन /तंत्र क्रिया की रोकथाम ,शत्रु से अथवा मुकदमे में विजय ,अधिकारी का अनुकूलन -वशीकरण ,गृह दोष-वास्तु दोष का शमन ,जमीन के नीचे की नकारात्मक ऊर्जा शमन ,मकान -दूकान -व्यावसायिक प्रतिष्ठान की नकारात्मक ऊर्जा या शक्ति का शमन ,गृह कलह का शमन ,ग्रह बाधा-अशुभत की समाप्ति ,प्रियजनों का अनुकूलन-वशीकरण किया जा सकता है |इसके अतिरिक्त भी यह गुटिका के अनेकानेक और विशिष्ट उपयोग हैं ,जिनके लिए विविध प्रकार की क्रियाएं की जा सकती है ,इसकी क्षमता की कोई सीमा नहीं है ,उद्देश्य के अनुसार भिन्न क्रियाएं विभिन्न मनोकामनाएं पूर्ण कर सकती हैं |यह गुटिका हमारे वर्षों के tantra क्षेत्र में शोध का परिणाम है और इसके परिणाम अनुभूत हैं |………………………………………………………हर-हर महादेव

    READ MORE: कैसे चमत्कारी है दिव्य गुटिका [डिब्बी]
  • दिव्य गुटिका /डिब्बी पर आकर्षण प्रयोग

    [किसी को आकर्षित /अनुकूल करने हेतु ]
    ————————————————-
    कभी -कभी कोई अपना रूठ जाता है ,दूर हो जाता है अथवा दूर चला जाता है |अपने व्यवहार ,बात या मनाने का प्रभाव नहीं पड़ता या ऐसी जगह चला जाता है जहाँ उसका पता नहीं चलता या वह नहीं चाहता की वह आपसे संपर्क रखे ,पर आपको उसकी जरुरत है ,आपको उससे लगाव है तो उसे अनुकूल करने अथवा अपनी ओर आकर्षित करने के लिए आकर्षण प्रयोग की आवश्यकता होती है |आकर्षण प्रयोग वहां किया जाता है जहाँ सीधे किसी व्यक्ति से संपर्क न हो |उसे कुछ खिलाया -पिलाया न जा सके |उससे बात चीत संभव न हो |वह मिलना न चाहता हो या उसे कोई सीधा संपर्क न हो |आकर्षण की क्रिया से लक्षित व्यक्ति में बेचैनी होती है ,उसे खिचाव महसूस होता है ,प्रयोग की गंभीरता पर स्वप्न आते हैं |
    सामग्री
    ——— तेल का दीपक ,चीनी या बताशा या सफ़ेद मिठाई ,मंत्र सिद्ध चैतन्य दिव्य गुटिका ,स्फटिक माला ,लाल रंग की धोती ,लाल कपड़ा ,लाल रंग का आसन ,सिन्दूर ,लौंग जोड़ा ,धुप -अगरबत्ती |
    दिन- समय -दिशा और जप संख्या
    —————————————–नवरात्र अथवा शनिवार की रात्री का समय ,पश्चम दिशा ,११ माला प्रतिदिन ११ दिन तक नवरात्र अथवा शनिवार से शुरू करके |
    मंत्र
    ——- ॐ नमो वैतालाय आदि पुरुषाय अमुकं आकर्षणं कुरु कुरु स्वाहा |
    विधि
    ——- किसी भी शनिवार की रात्री में स्नान कर लाल रंग के आसन पर लाल धोती पहन कर पश्चिमाभिमुख बैठें |सामने लकड़ी के चौकी या बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर रोली या कुमकुम से अष्टदल कमल बनाएं |उस पर मंत्र सिद्ध चैतन्य दिव्य गुटिका रखें |गुटिका के पीछे भगवान शिव का चित्र रखें |अब गुटिका की यथासंभव पूजा करें |जल ,अक्षत ,पुष्प आदि बाहर चढ़ाएं और सिन्दूर अन्दर  |धुप दीप करें |चीनी ,बताशा और जोड़ा लौंग चढ़ाएं |इसके बाद स्फटिक माला से जिस व्यक्ति का आकर्षण करना हो उसका नाम अमुक की जगह मंत्र में जोड़कर मंत्र जप करें |प्रतिदिन ११ माला के अनुसार कम से कम ११ दिन तक क्रिया करें |
    उम्मीद रखें की व्यक्ति की सूचना मिलेगी या वह आकर्षित होगा |यदि वह किसी गंभीर तंत्र क्रिया के असर में नहीं है अथवा मजबूर नहीं है अथवा जीवित है तो वह जरूर आकर्षित हो आएगा या सूचना देगा |जो रूठकर दूर हुआ है उसका क्रोध शांत होगा और जप करता से लगाव उत्पन्न होगा वापस मिलने का प्रयत्न करेगा |यदि संभव हो तो उससे मुलाक़ात करनी चाहिए |मुलाक़ात पर दिव्य गुटिका पर चढ़ाई हुई बताशा ,लौंग ,चीनी आदि उसे खिलाने पर वाशिकारक प्रभाव उत्पन्न होता है |
    प्रयोग समाप्ति के बाद भी दिव्य गुटिका को पूजा स्थान अथवा सुरक्षित स्थान पर रख दें तथा प्रतिदिन धुप दीप करते रहें |लाभ होता रहेगा |यह अनेक समस्याओं में कारगर है |
    प्रयोग शुरू करने से पूर्व ११ दिन तक ११ माला रोज के हिसाब से ऊपर दिए मंत्र का जप कर इसे पहले सिद्ध कर लें और इसमें अमुक ही रहने दे |सिद्ध करने के बाद प्रयोग में फिर ११ दिन क्रिया करें और तब अमुक में व्यक्ति का नाम जोड़ दें |जब प्रयोग करें तो दिव्य गुटिका के साथ व्यक्ति का चित्र भी रखें ताकि मन उसपर एकाग्र हो सके |दिव्य गुटिका में प्रबल आकर्षण और वशीकरण प्रभाव पहले से होता है जो साधक की एकाग्रता और इस साधना से और बढ़कर लक्षित व्यक्ति को प्रभावित करता है |…………………………………………………..हर-हर महादेव्

    READ MORE: दिव्य गुटिका /डिब्बी पर आकर्षण प्रयोग
  • कहाँ /कैसे /कब प्रयोग कर सकते हैं दिव्य गुटिका /डिब्बी ?

    दिव्य गुटिका /चमत्कारी डिब्बी के विशिष्ट प्रयोग
    —————————————————-
    दिव्य गुटिका एक चमत्कारी शक्ति युक्त डिब्बी है जिसके अनेकानेक प्रयोग है और इसके लगभग दर्जन भर विशिष्ट प्रयोगों को हम अपने पेजों और वेबसाईट पर दे चुके हैं |यहाँ कुछ सामान्य विभिन्न प्रयोग दे रहे जिसके इसकी शक्ति और प्रयोग की विभिन्नता की जानकारी तथा अंदाजा हो जाए हमारे पाठकों को |यह छोटे प्रयोग विभिन्न कामना पूर्ण करते हैं जबकि गुटिका एक ही रहती है |
    || ॐ ग्लौं गणपतये नमः || इस मन्त्र को कुछ दिन लगातार करने के बाद अथवा दुर्गा ,चामुंडा ,काली के किसी भी मन्त्र को कुछ दिन करने के बाद दिव्य गुटिका पर चढ़ाई जाने वाली सिन्दूर ,अक्षत ,लौंग और इलायची में अद्भुत शक्तियाँ आ जाती हैं |यद्यपि दिव्य गुटिका स्वयं सिद्ध -प्राण प्रतिष्ठित और अभिमंत्रित होती है किन्तु इन मन्त्रों को इसलिए जपते हैं की दिव्य गुटिका की ऊर्जा का सम्बन्ध आपसे हो जाए और वस्तुएं आपकी ऊर्जा के अनुसार इच्छा पूर्ण करें |
    १. दिव्य गुटिका पर मन्त्र जप करके चढ़ाए गए सिन्दूर को जो भी स्त्री लगाएगी तो उसका पति सदैव उसके वश में रहेगा ,भटकेगा नहीं |
    २. चढ़ाई हुई लौंग को जो भी विवाहित स्त्री एक -दो की संख्या में अपने पति को खिलाती रहेगी तो उसका पति ,सदैव उसके वश में रहेगा |
    ३. चढ़ाई गई इलायची में से एक -दो इलायची जो भी विवाहित पुरुष अपनी पत्नी को खिलाता रहेगा तो उसकी पत्नी सदैव उसके वश में रहेगी |
    ४. चढ़ाए गए चावल को अलग कर डिब्बी में भरकर पूजा स्थान अथवा भण्डार गृह में रखने से भण्डार भरा रहेगा और घर में सुख -शान्ति रहेगी |
    ५. अभिमंत्रित दिव्य गुटिका को अन्न भण्डार ,कोष ,गल्ला ,तिजोरी ,आदि धन -संपदा रखने के स्थानों पर रखा जाए तो धन -धान्य की वृद्धि होने लगती है |इस्क्का पूजन वहां रोज अवश्य होना चाहिए यह ध्यान रखना चाहिए |
    ६. प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान आदि करके इसका दर्शन ,अभिवादन ,पूजन आदि करने से साधक को यश -सम्मान ,विविध प्रकार के सुख आदि प्राप्त होते हैं |
    ७. प्रतिदिन पूजन अर्चन से नवग्रहों के दोष दूर होते हैं |
    ८. इस दिव्य गुटिका पर चढ़ाए हुए सिन्दूर का तिलक करने से वशीकरण और आकर्षण प्रभाव उत्पन्न होता है ,लोग वशीभूत और आकर्षित होते हैं |व्यक्ति का व्यक्तित्व सम्मोहक होता है |भूत-प्रेत पीड़ा ,वायव्य दोष समाप्त होते हैं |नजर दोष समाप्त होता है |दैनिक कार्यों की सफलता बढ़ जाती है |
    ९. दिव्य गुटिका जहाँ भी रहती है दरिद्रता वहां से पलायन कर जाती है |निर्धनता -गरीबी का निवारण होता है ,आकस्मिक आय स्रोत बनते हैं |अन्न ,धन ,वस्त्र ,ज्ञान और शान्ति प्राप्त होती है |
    १०. दिव्य गुटिका के प्रभाव से जादू -टोना ,अभिचार ,तांत्रिक क्रिया ,नजर ,अभिशाप ,दुर्भाग्य ,और दुर्ग्रह प्रभाव समाप्त होते हैं |मानसिक कष्ट ,शोक -संताप का निवारण होता है |शत्रु और विरोधी परास्त होते हैं |
    ११. दिव्य गुटिका के प्रतिदिन पूजन से शासन की कृपा ,राजकीय अधिकारी की अनुकूलता ,सम्मान ,उन्नति ,कार्यों में सफलता ,दूसरों से स्नेह -मान ,प्राप्त होता है |
    १२. शेयर -सट्टा -लाटरी -कमोडिटी में हानि न हो और लाभ हो उसके लिए दिव्य गुटिका गल्ले अथवा आफिस अथवा पूजा स्थान पर स्थापित कर कम से कम एक माला काली मन्त्र का और एक माला लक्ष्मी मन्त्र का प्रतिदिन करें |
    १३.गृह दोष ,वास्तु दोष ,स्थान दोष ,जमीन के अन्दर की समस्या लगती हो तो दिव्य गुटिका पर काली ,भैरव ,दुर्गा ,चामुंडा के मंत्र जप करें |इन समस्याओं से राहत मिलेगी |
    १४. पित्र दोष ,कुलदेवता /देवी का दोष ,ब्रह्म दोष ,प्रेत दोष आदि की संभावना पर प्रतिदिन एक माला काली अथवा दुर्गा का और एक माला शिव के मंत्र का करें |इन सभी समस्याओं से राहत मिलेगी |
    १५. उद्देश्य के अनुसार दिव्य गुटिका पर किये गए शाबर मन्त्रों का जप त्वरित प्रभाव देता है |वशीकरण ,शान्ति ,सुरक्षा ,आकर्षण ,विजय ,सफलता ,सिद्धि आदि के निमित्त किये गए मन्त्रों का अपेक्षित परिणाम प्राप्त होता है |किसी भी मंत्र का इस पर ग्रहण ,होली ,दीपावली ,अमावश्य को किया गया मन्त्र जप बेहद प्रभावकारी होता है |
    १६. प्रति दिन सामान्य पूजा से ही घर में सुख शान्ति रहती है किन्तु यदि घर में अधिक अशांति हो और घर के सभी सदस्यों में सदैव मतभेद बना रहता हो तो इसकी नियमित पूजा के साथ २१ दिनों में १० माला संख्या रोज रखते हुए निम्न मंत्र का २१ हजार जप करें –
    ॐ मदने मदने देवी मामालियमसंगे देह देह श्री स्वाहा |
    इससे घर में सुख -शान्ति आती है और मतभेद दूर हो जाते हैं |
    १७. किसी लड़के या लड़की की आयु बढती जा रही  हो लेकिन उसका विवाह नहीं हो पा रहा हो तो लड़का या लड़की दिव्य गुटिका पर निम्न प्रयोग खुद करे |प्रतिदिन दिव्य गुटिका की धुप -दीप ,फल-प्रसाद के साथ पूजन कर २१ दिनों में निम्न मंत्र की ५१ हजार जप करे –
    ॐ क्लीं मम् …………..कार्य सिद्धि ,करि करि जनरंजिनी स्वाहा |
    जहाँ खाली स्थान है मंत्र में वहां लड़का या लड़की अपना नाम जोड़ ले |इस प्रयोग से उसका उत्तम विवाह संभव होता है |
    १८. यदि किसी को भूत -प्रेत बाधा अथवा वायव्य बाधा अथवा नजर दोष या अभिचार आदि की पीड़ा है तो रविवार या मंगलवार कोधुप दीप -पूजन करके दिव्य गुटिका पर ११ माला दुर्गा या काली मंत्र का जप करें तथा गुटिका में चढ़ाई हुई लोंगों में से दो लौंग निकालकर हाथ में ले पुनः ११ बार मन्त्र पढ़कर फूंक मारें ,फिर किसी लाल कपडे में बांधकर या ताबीज की भाँती सिलकर पीड़ित को बाजू में बाँध दें |उसकी पीड़ा से राहत मिल जायेगी |अन्य पहले के लौंग अलग कर लें जो अभिमंत्रित हो चुके हैं उन्हें केवल हथेली पर ११ मन्त्र से अभिमंत्रित कर किसी को धारण कराया जा सकता है |[[ ज्ञातव्य है की गुटिका पर पूजन में रोज दो लौंग चढ़ाए जाते हैं जो शक्तिकृत हो जाते हैं ,इन्हें अभिमंत्रित कर उपरोक्त प्रकार अलग रखा जा सकता है ]]|
    १९. वैसे तो दिव्य गुटिका स्वयं ही धन दायक है किन्तु अधिक धन की चाह हो अथवा आर्थिक स्थिति विषम हो चुकी हो और तत्काल राहत की आवश्यकता हो तो गुटिका पर सिक्का अर्पित कर निम्न मंत्र की कम से कम ५ माला रोज करें |शीघ्र ही परिवर्तन दृष्टिगोचर होगा —
    मन्त्र — ॐ चामुंडायै धनं देहि |
    २०. शत्रु परेशान कर रहे हो और कोई राहत मिलने की उम्मीद न दिखे तो दिव्य गुटिका पर काली अथवा चामुंडा के मंत्र जप करें और शत्रु से रक्षा और उनके पराजय की कामना करें |शीघ्र राहत मिलेगी |
    २१. यदि किसी को अनुकूल कर अपना कार्य करवाना हो ,अथवा कोई अधिकारी -कर्मचारी परेशान कर रहा हो अथवा कोई बुरा सोचने वाला हो अथवा कोई अपना आपसे दूर जा रहा हो ,गलत कर रहा हो या गलत सांगत में हो पर आपकी बात न समझता हो या आपकी उपेक्षा करता हो तो उसके लिए वशीकरण का प्रयोग करें दिव्य गुटिका पर — प्रतिदिन दिव्य गुटिका की पूजा करके धुप जलाकर निम्न मन्त्र की एक माला करें — ॐ चामुंडा देवी ……………….. में वश्यं कुरु कुरु स्वाहा |
    रिक्त स्थान में उस व्यक्ति का नाम जोड़ दें |जप साधना के दिनों में संयम -शुद्धताऔर ब्रह्मचारी का पालन करें |कुछ दिनों में लक्षित व्यक्ति अनुकूल हो जाएगा |
    २२. यदि कोई विशेष कामना हो और वह पूर्ण होने में विलम्ब हो रहा हो अथवा उसके पूर्ण होने की उम्मीद न हो तो इस प्रयोग को किया जा सकता है |प्रतिदिन दिव्य गुटिका की पूजा कर धुप-दीप जलाकर दुर्गा जी के नवार्ण मंत्र का जप करें कम से कम ५ माला और अपनी कामना पूर्ण करने की उनसे प्रार्थना करें |उम्मीद करें की आपकी कामना शीघ्र पूर्ण होगी |
    २३. धन -समृद्धि शान्ति की कामना हो तो दिव्य गुटिका पर कमला अर्थात लक्ष्मी के मंत्र बेहद प्रभावकारी हैं क्योकि इसके अधिकतर अवयव धन -समृद्धि कारक हैं |इस हेतु निम्न मन्त्र अधिक लाभकारी है और इसकी कम से कम एक माला रोज की जानी चाहिए |
    ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः ||
    २४. यदि किसी को लगता हो की उनके ऊपर अथवा उनके दूकान ,व्यवसाय ,घर-परिवार पर किसी तरह की नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव है ,किसी ने कुछ किया -कराया किया हुआ है या अभिचार किया है ,या व्यवसाय -दूकान बाँध दिया है ,या उन्नति रोक दी है ,या अपने आप किसी वायव्य आत्मा परेशान कर रही है ,किसी बच्चे -स्त्री को कोई पीड़ा पहुंचा रहा हो ,घर-परिवार में अनावश्यक बीमारी -दुर्घटना -कष्ट का वातावरण बन रहा हो तो वह दिव्य गुटिका पर दुर्गा जी के नवार्ण मन्त्र का अथवा काली जी के मंत्र का जप करे उसकी समस्या का निदान हो जाएगा |………………………………………………………………हर-हर महादेव

    READ MORE: कहाँ /कैसे /कब प्रयोग कर सकते हैं दिव्य गुटिका /डिब्बी ?
  • कुलदेवता /देवी रुष्ट तो नहीं हैं ?

    कुलदेवता /देवी रुष्ट तो नहीं हैं ?

    कहीं आपके कुलदेवता /कुलदेवी नाराज या निर्लिप्त तो नहीं ?
    =============================
                  हिन्दू पारिवारिक आराध्य व्यवस्था में कुल देवता/कुलदेवी का स्थान सदैव से रहा है ,,प्रत्येक हिन्दू परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज हैं जिनसे उनके गोत्र का पता चलता है ,बाद में कर्मानुसार इनका विभाजन वर्णों में हो गया विभिन्न कर्म करने के लिए ,जो बाद में उनकी विशिष्टता बन गया और जाती कहा जाने लगा ,,पूर्व के हमारे  कुलों अर्थात पूर्वजों के खानदान के वरिष्ठों ने अपने लिए उपयुक्त कुल देवता अथवा कुलदेवी का चुनाव कर उन्हें पूजित करना शुरू किया था ,ताकि एक आध्यात्मिक और पारलौकिक शक्ति कुलों की रक्षा करती रहे जिससे उनकी नकारात्मक शक्तियों/उर्जाओं और वायव्य बाधाओं से रक्षा होती रहे तथा वे निर्विघ्न अपने कर्म पथ पर अग्रसर रह उन्नति करते रहे |
               समय क्रम में परिवारों के एक दुसरे स्थानों पर स्थानांतरित होने ,धर्म परिवर्तन करने ,आक्रान्ताओं के भय से विस्थापित होने ,जानकार व्यक्ति के असमय मृत होने ,संस्कारों के क्षय होने ,विजातीयता पनपने ,इनके पीछे के कारण को न समझ पाने आदि के कारण बहुत से परिवार अपने कुल देवता /देवी को भूल गए अथवा उन्हें मालूम ही नहीं रहा की उनके कुल देवता /देवी  कौन हैं या किस प्रकार उनकी पूजा की जाती है ,इनमे पीढ़ियों से शहरों में रहने वाले परिवार अधिक हैं ,कुछ स्वयंभू  आधुनिक मानने वाले और हर बात में वैज्ञानिकता खोजने वालों ने भी अपने ज्ञान के गर्व में अथवा अपनी वर्त्तमान अच्छी स्थिति के गर्व में इन्हें छोड़ दिया या इनपर ध्यान नहीं दिया |
              कुल देवता /देवी की पूजा छोड़ने के बाद कुछ वर्षों तक तो कोई ख़ास अंतर नहीं समझ में आता ,किन्तु उसके बाद जब सुरक्षा चक्र हटता है तो परिवार में दुर्घटनाओं ,नकारात्मक ऊर्जा ,वायव्य बाधाओं का बेरोक-टोक प्रवेश शुरू हो जाता है ,उन्नति रुकने लगती है ,पीढ़िया अपेक्षित उन्नति नहीं कर पाती ,संस्कारों का क्षय ,नैतिक पतन ,कलह, उपद्रव ,अशांति शुरू हो जाती हैं ,व्यक्ति कारण खोजने का प्रयास करता है कारण जल्दी नहीं पता चलता क्योकि व्यक्ति की ग्रह स्थितियों से इनका बहुत मतलब नहीं होता है ,अतः ज्योतिष आदि से इन्हें पकड़ना मुश्किल होता है ,भाग्य कुछ कहता है और व्यक्ति के साथ कुछ और घटता है ,
               कुल देवता या देवी हमारे वह सुरक्षा आवरण हैं जो किसी भी बाहरी बाधा ,नकारात्मक ऊर्जा के परिवार में अथवा व्यक्ति पर प्रवेश से पहले सर्वप्रथम उससे संघर्ष करते हैं और उसे रोकते हैं ,यह पारिवारिक संस्कारों और नैतिक आचरण के प्रति भी समय समय पर सचेत करते रहते हैं ,यही किसी भी ईष्ट को दी जाने वाली पूजा को ईष्ट तक पहुचाते हैं ,,यदि इन्हें पूजा नहीं मिल रही होती है तो यह नाराज भी हो सकते हैं और निर्लिप्त भी हो सकते हैं ,,ऐसे में आप किसी भी ईष्ट की आराधना करे वह उस ईष्ट तक नहीं पहुँचता ,क्योकि सेतु कार्य करना बंद कर देता है ,,बाहरी बाधाये ,अभिचार आदि ,नकारात्मक ऊर्जा बिना बाधा व्यक्ति तक पहुचने लगती है ,,कभी कभी व्यक्ति या परिवारों द्वारा दी जा रही ईष्ट की पूजा कोई अन्य बाहरी वायव्य शक्ति लेने लगती है ,अर्थात पूजा न ईष्ट तक जाती है न उसका लाभ मिलता है ,,ऐसा कुलदेवता की निर्लिप्तता अथवा उनके कम शशक्त होने से होता है ,,
         कुलदेवता या देवी सम्बंधित व्यक्ति के पारिवारिक संस्कारों के प्रति संवेदनशील होते हैं और पूजा पद्धति ,उलटफेर ,विधर्मीय क्रियाओं अथवा पूजाओं से रुष्ट हो सकते हैं ,सामान्यतया इनकी पूजा वर्ष में एक बार अथवा दो बार निश्चित समय पर होती है ,यह परिवार के अनुसार भिन्न समय होता है और भिन्न विशिष्ट पद्धति होती है ,,शादी-विवाह-संतानोत्पत्ति आदि होने पर इन्हें विशिष्ट पूजाएँ भी दी जाती हैं ,,,यदि यह सब बंद हो जाए तो या तो यह नाराज होते हैं या कोई मतलब न रख मूकदर्शक हो जाते हैं और परिवार बिना किसी सुरक्षा आवरण के पारलौकिक शक्तियों के लिए खुल जाता है ,परिवार में विभिन्न तरह की परेशानियां शुरू हो जाती हैं ,,अतः प्रत्येक व्यक्ति और परिवार को अपने कुल देवता या देवी को जानना चाहिए तथा यथायोग्य उन्हें पूजा प्रदान करनी चाहिए, जिससे परिवार की सुरक्षा -उन्नति होती रहे |………………….हर-हर महादेव  
    READ MORE: कुलदेवता /देवी रुष्ट तो नहीं हैं ?
  • यंत्रों /ताबीजों का आपकी सफलता पर प्रभाव

    यंत्रों /ताबीजों का आपकी सफलता पर प्रभाव

    आपकी सफलता पर यंत्रों -ताबीजों का प्रभाव
    ============================
                     आपकी सफलता -असफलता आपकी योग्यता ,व्यवहार और सोच पर निर्भर करती है ,ऐसा सामान्य स्थिति में होता है |यह भाग्य पर भी काफी कुछ निर्भर करता है जिसके अनुसार आपकी क्षमतासोचव्यक्तित्व का निर्धारण हुआ होता है |अर्थात जब भाग्य पूरा साथ दे तो आपकी नैसर्गिक क्षमता -व्यक्तित्व के अनुसार आपको सफलता मिलती है |किन्तु यह तब होता है जब आप किसी भी तरह की नकारात्मक ऊर्जा से ग्रस्त न हों |आप अगर किसी भी तरह की नकारात्मक ऊर्जा से ग्रस्त हों तो आपके सोच -कर्म व्यवहार -क्षमता बदल जाते है अथवा कम हो जाते हैं |यह नकारात्मक ऊर्जा ग्रह की सामयिक दोष हो सकती है ,वास्तु दोष -स्थान दोष हो सकता है ,किसी द्वारा किया गया अभिचार हो सकता है ,आप द्वारा की गई गलती और श्राप का परिणाम हो सकता है ,पित्र दोष के कारण हो सकता है ,कहीं से आई वायव्य बाधा के कारण हो सकता है ,कुलदेवता/देवी दोष के कारण हो सकता है ,परिवार के मुखिया की विपरीत ग्रह स्थितियों के कारण हो सकता है |ऐसे में जब आप इन किसी भी नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव में आते हैं तो जो नैसर्गिक आपके भाग्य से मिलता है उसमे भी रुकावट उत्पन्न हो जाती है और जो जितना मिलना चाहिए नहीं मिल पाता ,अपितु बुरे प्रभाव की मात्रा बढ़ जाती है |कारण यह होता है की नकारात्मक प्रभाव आपकी सोच ,स्वास्थ्य ,पारिवारिक माहौल ,लोगों का सहयोग ,आपका व्यवहार बदल देता है जिससे जितनी क्षमता और योग्यता से सम्बंधित दिशा में कार्य होना चाहिए नहीं हो पाता और सफलता की मात्रा प्रभावित हो जाती है |
                  ताबीज धारण करने पर चमत्कार कहीं और से नहीं होता ,आप द्वारा ही होता है |ताबीज धारण से अगर चमत्कार होता भी है तो उसके लिए लिए चमत्कारी सिद्ध का मिलना आवश्यक होता है |ऐसा तब तक नहीं होगा जब तक की आप नकारात्मकता से मुक्त न हों और आपका भाग्य साथ न दे रहा हो |भाग्य साथ देने पर ही आपको भाग्यवश चमत्कारी सिद्ध मिल जाता है की उसके दिए ताबीज से चमत्कार होने लगता है |सामान्य स्थिति में ऐसा संभव नहीं होता |सामान्य स्थिति में आप द्वारा ही चमत्कार होता है |जब आपको आपकी आवश्यकतानुसार ऐसी ताबीज धारण करा दी जाती है जो आपकी सम्बंधित क्षेत्र में सफलता बढ़ा दे तो होता यह है की वह ताबीज आपके आसपास और शरीर से सम्बंधित क्षेत्र को प्रभावित कर रही नकारात्मक ऊर्जा हटा देती है ,साथ ही आपकी सोच और कार्यक्षमता और व्यवहार उस क्षेत्र के अनुकूल कर देती है |सम्बंधित देवता और उसके ऊर्जा चक्र को प्रभावित कर देती है ,जहाँ से तरंगों का उत्पादन बढ़ जाता है |फलतः आपकी सफलता बढ़ जाती है |आपके भाग्य का पूरा लाभ सम्बंधित क्षेत्र में मिलने लगता है |यह सब उर्जा का प्रक्षेपण है जो आपके शरीर और वातावरण को प्रभावित करके आपमें और आसपास बदलाव ला देता है |
               कार्य प्रणाली अगर ताबीज की देखें तो टोनेटोटकेताबीज में प्राणी के शारीर और प्रकृति की उर्जा संरचना ही कार्य करती है ,इनका मुख्य आधार मानसिक शक्ति का केंद्रीकरण और भावना होता है ,|,,,प्रकृति में उपस्थित वनस्पतियों और जन्तुओ में एक उर्जा परिपथ कार्य करता है |,मृत्यु के बाद भी इनमे तरंगे कार्य करती है और ऊर्जा भिन्न रूप में बनी रहती है | ,,,,इनमे विभिन्न तरंगे ली जाती है और निष्कासित की जाती रहती है जब तक किसी भी रूप में उसका अस्तित्व है | जब किसी वास्तु या पदार्थ पर मानसिक शक्ति और भावना को केंद्रीकृत करके विशिष्ट क्रिया की जाती है तो उस पदार्थ से तरंगों का उत्सर्जन होने लगता है ,,|यह कुछ वैसा ही होता है जैसे सामने बैठे व्यक्ति को आदेश देना अथवा दृष्टि से वस्तुओं को हिलाना |,,जिस भावना से उनका प्रयोग जिसके लिए किया जाता है ,वह इच्छित स्थान पर वैसा कार्य करने लगता है ,| कोई पदार्थ अच्छी भावना से मानसिक शक्ति केंद्रित करके विशिष्ट क्रिया करके दी जाये तो प्राप्तकर्ता की उर्जा परिपथ पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और उसे लाभ होता है |सभी जगह उर्जा ही कार्य करती है |मानसिक शक्तियों द्वारा उन्हें परिवर्तित अवश्य किया जा सकता है
                          . ताबीज बनाने वाला जब अपने ईष्ट में सचमुच डूबता है तो वह अपने ईष्ट के अनुसार भाव को प्राप्त होता है अर्थात उसका ईष्ट की ऊर्जा से सामंजस्य बैठता है | ,,भाव गहन है तो मानसिक शक्ति एकाग्र होती है ,जिससे वह शक्तिशाली होती है ,यह शक्तिशाली हुई तो उसके उर्जा परिपथ का आंतरिक तंत्र शक्तिशाली होता है और शक्तिशाली तरंगे उत्सर्जित करता है |ये शक्तिशाली तरंगे ईष्ट को आकर्षित कर उसकी ऊर्जा से संतृप्त करने लगती हैं साधक को और यह साधक के मानसिक बल के अनुसार काम करने लगती हैं तथा स्थिर होने लगती हैं ऐसा व्यक्ति यदि किसी विशेष समय,ऋतूमॉस में विशेष तरीके से ,विशेष पदार्थो को लेकर अपनी मानसिक शक्ति और मन्त्र से उसे सिद्ध करता है तो वह ताबीज धारक व्यक्ति को अच्छेबुरे भाव की तरंगों से लिप्त कर देता है |
                       यह समस्त क्रिया शारीर के उर्जा चक्र को प्रभावित करती है और तदनुसार व्यक्ति को उनका प्रभाव दिखाई देता है |इसमें प्रयुक्त पदार्थ की ऊर्जा ,मॉसऋतू की ऊर्जा की विशेषता ,तिथि के अनुसार ग्रहों की विशेषता ,साधक की ऊर्जा ,विशिष्ट मन्त्र और यन्त्र की ऊर्जा एक साथ मिलकर साधक के मानसिक बल से संयुक्त हो जाती हैं और अभिमंत्रित करते ही वह वस्तु विशेष में स्थिर हो जाती हैं |इससे तरंगों का उत्सर्जन होता रहता है जो धारण करने वाले के मष्तिष्क ,वातावरण ,शरीर ,ऊर्जा परिपथ को प्रभावित करता है और कुछ सामय में अनुकूल रासायनिक परिवर्तन भी होने लगता है जिससे व्यक्ति की सोच ,क्रिया कलाप ,सब बदल जाते हैं ,औरा बदल जाती है ,वातावरण में जहाँ वह रहता है तदनुरूप परिवर्तन हो सकते हैं |यह सामान्य क्रिया प्रणाली है |उच्च साधक और सिद्ध के लिए मानसिक बल और इच्छा ही पर्याप्त होती है ,,ऋतूमॉसमुहूर्तपदार्थ तक का महत्त्व नहीं रहा जाता ,,,वह जिस भी वस्तु को अभिमंत्रित कर दे वाही ताबीज और सिद्द हो जाती है |सामान्य रूप में किसी साधक को किसी यन्त्र अथवा ताबीज को सिद्ध करने के लिए सम्बंधित शक्ति या देवता का सिद्ध होना आवश्यक है |ऐसा नहीं की कोई भी किसी भी देवता या शक्ति के यन्त्र को सिद्ध कर सकता है और सभी कामों में उपयोगी यंत्रों को बना सकता है |जिसकी जैसी क्षमता वह वाही काम कर सकता है |इसलिए यह देखना आवश्यक हो जाता है की सम्बंधित साधक के पास वह क्षमता है भी की नहीं ,नहीं तो उपयुक्त लाभ प्राप्त नहीं होंगे |……………………………..………हरहर महादेव
    READ MORE: यंत्रों /ताबीजों का आपकी सफलता पर प्रभाव