Author: Tantra Marg
  • जुआ /सट्टा /लाटरी /शेयर/कमोडिटी में सफलता हेतु कवच


    शेयर/कमोडिटी में सफलता हेतु कवच

    यह सत्य है की आज के समय में अधिकतर लोगों को उनके भाग्य में लिखे अवसर ,भाग्य के सुख ,सफलता नहीं मिलती |ज्योतिषी बताते हैं की इस समय यह होगा किन्तु वह अधिकतर मामलों में लाभ वाली स्थितियों के लिए गलत हो जाता है जबकि हानि वाली स्थितियों में सही होता है |ऐसा क्यों |क्योंकि गलत ज्योतिषी नहीं होता ,वह बिलकुल सही बताता है किन्तु आपके यहाँ अवरोधक होते हैं जो उस भाग्य को आपको मिलने नहीं देते ,यह नकारात्मक उर्जाओं का प्रभाव होता है जो उन लाभदायक अवसरों में न्यूनता ला देते हैं जबकि हानि कारक अवसरों में कमी नहीं लाते क्योकि हानि खुद नकारात्मकता से ही होती है |फलतः अधिकतर को उनके भाग्य के भी लाभदायक अवसर नहीं मिलते और अंततः वह ज्योतिष और भगवान् को ही कोसते हैं |यह ध्यान देना चाहिए की वर्षों से खानदान-परिवार-खुद के कर्मों से उत्पन्न नकारात्मकता अथवा किसी के द्वारा किये गए नकारात्मक प्रक्षेपण से आपके कर्म और सोच प्रभावित हो जाते हैं जिससे आपमें खुद ऐसी कमियां उत्पन्न हो जाती हैं जो आपके भाग्य में अवरोध उत्पन्न कर देते हैं |यह हमारे २५ सालों के अनुभव का निष्कर्ष है |
    यही हाल होता है जब आपकी कुंडली कहती है की आपको आकस्मिक लाभ के अवसर मिलने चाहिए ,आपको शेयर/ सट्टा /लाटरी /कमोडिटी आदि में लाभ मिलना चाहिए |आप उस आधार पर कभी कोशिश भी करते हैं किन्तु आपको लाभ नहीं मिलता |आपके भाग्य में लिखा होने पर भी आपको हानि होती है |यह नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव से होता है |इसको दृष्टिगत रखते हुए हमने समस्या विशेष के लिए tantra ग्रंथों के अन्वेषण से इनके काट निकाले हैं और कवच निर्मित किये हैं |यह आपके भाग्य को नहीं बदलेंगे यह भी सत्य है ,क्योकि कुछ हजार रु. के कवच से वर्षों /सदियों के कर्म नहीं बदले जा सकते फलतः भाग्य भी नहीं बदले जा सकते |हाँ आप और आसपास उपस्थित नकारात्मक ऊर्जा को हटाकर इनसे आपके भाग्य में लिखा पूरा दिलाया जा सकता है |अगर आपके भाग्य में आकस्मिक लाभ के अवसर हैं तो इनसे उनके प्राप्ति की संभावना निश्चित बढ़ जाती है |

    मनुष्य को अपने जीवन में सभी आवश्यक कर्मो को संपादित करने के अतिरिक्त आत्मिक सुख प्राप्ति के लिए अपने निजी शौक भी पूरे करने ही पड़ते हैं |इनमे से भी मुख्यतः ” द्यूत अथवा जुआ ” एक ऐसा शौक है जो की परम्परागत रूप से युगों -युगों से चला आ रहा है |आधुनिक युग में जुआ ,रेस ,सट्टा ,लाटरी ,मटका ,कैसिनो के रूप में प्रचलित है |कुछ लोग शेयर -कमोडिटी में भी जुड़े होते हैं यह भी भाग्यवादी आकस्मिक लाभ कर्म ही है |इन सब में विजय के लिए सभी मनुष्य प्रयासरत रहते हैं किन्तु भाग्यशाली लोग ही इनमे विजयी अथवा सफल होते हैं ,अधिकतर तो इनसे नुकसान ही उठाते हैं |ऐसे में जुआ ,सट्टा ,लाटरी ,मटका ,रेस ,शेयर ,कमोडिटी में सफलता और विजय प्राप्ति के लिए भी पूर्व से ही लोगों ने तांत्रिकों की शरण ली थी और tantra में इसके लिए भी खोज हुए |विशेष तांत्रिक विशियों से शुभ लग्न में निर्मित विजय कवच को धारण करने से उपरोक मामलों में अभूतपूर्व रूप से परिणाम में अंतर आता है और सफलता बढती है |क्योकि पूर्व के तांत्रिकों और ऋषियों को भी इन नकारात्मक प्रभावों की जानकारी थी और उन्होंने गहन शोध किये इन पर |अतः यह यन्त्र और कवच सम्बंधित क्षेत्र में लाभ देते हैं |……………………………………………………………….हर-हर महादेव 
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  • भूत बाधा /अभिचार नाशक कवच [स्त्रियों के लिए ]

    भूत बाधा /अभिचार नाशक कवच [स्त्रियों के लिए ]

    भूत बाधा /अभिचार नाशक कवच [केवल स्त्रियों के लिए ]
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            म  सामान्य रूप से भूत-प्रेत ,आत्माएं ,वायव्य बाधाएं ,तांत्रिक टोटके और अभिचार स्त्रियों को अधिक और शीघ्र प्रभावित करते हैं |इसका कारण स्त्रियों की शारीरिक और मानसिक बनावट भी होती है और स्त्रियों के प्रति कामुक पुरुष आत्माओं का आकर्षण भी होता है |स्त्रियों का खून अक्सर पतला होता है और भूत- प्रेत पतले खून वालों को शीघ्र प्रभावित करते हैं ,पतले खून वाले और ठंडी प्रकृति वाले पुरुष भी इसी कारण शीघ्र इनकी चपेट में आ जाते हैं |स्त्रियाँ कोमल भावनाओं और ह्रदय वाली होती हैं ,मानसिक बल और कठोरता कम होने से आत्माओं को कम प्रतिरोध मिलता है और वह शीघ्र प्रभावी हो जाते हैं |अक्सर दुर्घटनाओं अथवा आकस्मिक रूप में मरे ही भूत-प्रेत बनते हैं और असंतुष्ट होते हैं ,अपनी तृप्ति के लिए इन्हें स्त्रियाँ आसन शिकार मिलती हैं और उनसे यह अपनी इच्छा पूर्ती करते हैं |
                 कभी -कभी असावधानीवश ,दुर्घटनावश ,अपवित्र स्थिति में अथवा अन्य किसी कारणवश अक्सर किसी अविवाहित अथवा कुँवारी कन्या ,लड़की या किसी भी महिला पर यकायक भूत /जिन्न /प्रेत /आसेब इत्यादि का साया हो जाता है जो की उस स्त्री का जीवन नरक सामान बना देता है |ऐसी परिस्थितियों में यदि उसे अभिमत्रित ” भूत बाधा नाशक कवच ” गले में धारण करा दिया जाए तो चमत्कारिक रूप से लाभ दिखाई देने लग जाते हैं |यह कवच महाविद्या काली की शक्ति से संपन्न होता है और नकारात्मक ऊर्जा का तीब्र प्रतिरोधक होता है ,चाहे वह कोई भी नकारात्मक या वायव्य ऊर्जा या शक्ति हो |इससे स्त्री सुरक्षित रहती है और कहीं भी उसे इन बाधाओं का भय नहीं होता |बच्चे के जन्म काल और बाद में भी स्त्री को इन आत्माओं से सर्वाधिक भय होता है ,|इस काल में भगवती का यह यन्त्र कवच उनकी पूर्ण सुरक्षा करता है |अगर पहले से किसी बाधा से प्रभावित कोई स्त्री इन्हें धारण करती है तो क्रमशः शरीर की शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा वृद्धि के साथ उस शक्ति का प्रभाव कम हो जाता है और अंततः वह छोड़ देती है |कवच की शक्ति से किसी तांत्रिक द्वारा किये गए अभिचार से भी बचाव होता है और अगर पहले से कोई अभिचार है तो उसका प्रभाव क्रमशः नष्ट होता है |अतः स्त्रियों को सुरक्षा हेतु भगवती का कवच धारण करना चाहिए |……………………………………………………………..हर-हर महादेव
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  • तंत्र /अभिचार रक्षा कवच [ताबीज ]

    तंत्र / अभिचार रक्षा कवच
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    मनुष्य के स्वभाव के कुछ गुण दूसरों को कष्ट देते हैं ,जैसे ईर्ष्या ,द्वेष ,दुश्मनी ,टांग खीचने की आदत आदि मनुष्यगत दुर्गुण हैं |यह गुण या दुर्गुण बहुतों में पाए जाते हैं |लोग अपनी क्षमता से आगे बढने की बजाय दूसरों की टांग खींचते हैं जिससे उसकी वृद्धि रोक सकें ,कारण लोग लोग खुद के दुखों से कम दुखी और दुसरे के सुखों से अधिक दुखी होते हैं |भले वह बेचारा परेशान ही खुद क्यों न हो |दुश्मनी में तो लोग दुसरे का नुकसान करते ही हैं ,ईर्ष्या ,जलन ,द्वेष में अधिक नुक्सान करते हैं |खुद सामने आने से बचने के लिए ऐसे लोग अक्सर tantra और टोटकों का भी सहारा लिया करते हैं और अभिचार और टोटके करते रहते हैं |ऐसे में बहुत से लोग जिन्होंने किसी का कुछ बिगाड़ा भी नहीं और खुद की मेहनत से जीवन यापन कर रहे हैं इनसे पीड़ित हो जाते हैं |कभी -कभी, कोई -कोई लोग तांत्रिक क्रियाओं के चपेट में बेवजह भी आ जाते हैं ,जैसे मार्ग में की हुई क्रिया पर ध्यान नहीं दिया और वह साथ लग गई |अँधेरे ,सुनसान ,दोपहर आदि में कोई क्रिया साथ हो ली आदि आदि |इन क्रियाओं /अभिचारों के कारण व्यक्ति की मानसिक /आर्थिक / पारिवारिक स्थितियों में कष्ट आ जाते हैं और वह समझ भी नहीं पाता|गृह कुछ कहते हैं और उसके साथ होता कुछ है |इन्हें tantra द्वारा ही हटाया जा सकता है |सामान्य उपायों का इन पर कोई प्रभाव नहीं होता |


     अक्सर हमारे यहाँ इस तरह की शिकायतें आती हैं और विश्लेषण पर हम उपरोक्त समस्या पाते हैं |इन्ही कारणों से हमने इनसे बचने के तरीके के रूप में सुरक्षा कवच निर्मित किये |यदि आप किसी भी प्रकार की भूत -प्रेतादि , उपरी बाधा के शिकार हैं अथवा किसी शत्रु ने दुर्भावनावश आपके ऊपर तांत्रिक अभिचार कर्म अथवा तंत्र प्रयोग या टोना -टोटका करवा दिया है और आप लाख प्रयत्नों के बाद भी उन तांत्रिक दुष्कर्मों से छुटकारा नहीं पा सके हों तो आप हमारे केंद्र के तंत्र विशेषज्ञों द्वारा वर्षों की साधना और दिव्य शक्तियों के संयोग से सिद्धिकाल में विशेष रूप से निर्मित ” तंत्र रक्षा कवच “को मंगवाकर सदैव के लिए अपने गले में धारण करके वांछित लाभ प्राप्त कर सकते हैं |इस दिव्य कवच पर किसी भी प्रकार का जादू -टोना असर नहीं डाल सकता है |ऐसा देखा गया है क्योंकि यह कवच महाविद्याओं की शक्तियों से संपन्न होते हैं जो इस ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च शक्तियां हैं |जीवन में समस्त उपरी बाधाओं से रक्षा हेतु सदैव के लिए इस प्रचंड शक्तिशाली कवच को अपने गले में धारण अवश्य ही करना चाहिए |इससे आप अभिचार /टोन- टोटके /tantra /वायव्य बाधा से सुरक्षित रहेंगे और नकारात्मक ऊर्जा से आपका बचाव होगा |…………………………………………………………….हर-हर महादेव 
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  • विदेश यात्रा कवच

    :::::::::::::विदेश यात्रा कवच ::::::::::::::
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    आज के समय में पाश्चात्य देशों का आकर्षण युवाओं में बहुत अधिक बढ़ा है ,यद्यपि यह पहले से है और इसके कारण भी हैं |पाश्चात्य देश भौतिकता की दृष्टि से अधिक विकसित हैं और आज का युवा भौतिकता ही चाहता है ,उसे अपने कल्पना की दुनिया पाश्चात्य देशों में दिखती है |उच्च शिक्षा प्राप्ति ,उन्नत तकनिकी ज्ञान वहां अधिक हैं भी ,धन भी वहां अधिक है अतः उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु ,नौकरी करने अथवा रोजगार प्राप्ति हेतु ,उद्योग धंधों एवं व्यवसाय वृद्धि हेतु ,उन्नत तकनिकी जानकारी हेतु अथवा अपनी उच्च महत्वाकान्क्षाओं की पूर्ती और अधिक धन कमाने हेतु भारत से कहीं ज्यादा अवसर पाश्चात्य देशों में मिलते हैं |यही कारण है की आज का युवा शिक्षा के दौरान ही विदेश जाने का सपना देखने लगता है |महत्वाकांक्षी युवा वर्ग विदेश जाने हेतु लालायित एवं निरंतर प्रयासरत रहता है |किन्तु भाग्य में सबको विदेश यात्रा तो लिखी नहीं होती |
    जन्मपत्री में सभी मनुष्यों के लिए विदेश यात्रा योग बन पाना संभव नहीं होता |विदेश यात्रा योग होने पर भी अधिकतर विदेश नहीं जा पाते |इसका कारण होता है अनेकानेक बाधाएं ,जैसे पारिवारिक बाधाएं ,पित्र दोष ,कुल देवता-देवी दोष ,अभिचार कर्म ,ग्रह दोष ,नकारात्मक उर्जाओं का प्रभाव आदि आदि |यह विदेश योग होने पर भी ऐसी स्थितियां उत्पन्न करते हैं की वीजा ही नहीं बन पाता या पासपोर्ट ही नहीं बन पाता या घर में समस्या उत्पन्न हो जाती है या आर्थिक समस्या आ जाती है या अन्य कोई समस्या आती रहती है जिससे प्रयास असफल हो जाते हैं |जिनके योग बहुत प्रबल हों और समय पर बाधाएं प्रभावित न कर पायें या इतने प्रबल योग हों की हर बाधा का शमन हो जाए वाही जा पाता है अपने लक्ष्य के अनुसार |
    भारतीय प्राचीन तंत्र विज्ञान अत्यधिक विकसित और वैज्ञानिक रहा है |इसमें हर प्रकार की समस्याओं का समाधान है |इसमें प्रकृति की शक्तियों से बाधाओं का निराकरण कर लक्ष्य प्राप्ति में सहायता कराई जाती है |उपरोक्त समस्या के लिए भी तंत्र में अनेक गोपनीय ,शीघ्र और तीब्र प्रभावी उपाय हैं [यद्यपि यह मूल रूप से भिन्न उद्देश्यों के लिए बनाये गए थे ,किन्तु आधुनिक काल में इनका प्रयोग करके इस बाधा का निराकरण किया जाता है ]|उन्ही गोपनीय सूत्रों के आधार पर सिद्धिकाल के शुभ मुहूर्त में विशिष्ट तांत्रिक विधियों से विदेश यात्रा कवच का निर्माण किया जाता है |इस दिव्या कवच को अपने गले में धारण करके विदेश यात्रा योग को प्रबल किया जा सकता है |विदेश यात्रा में आ रही रुकावटें कम की जा सकती हैं |………………………………………………………….हर-हर महादेव

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  • भूत -प्रेत ,नकारात्मक ऊर्जा हटाने का प्रयोग दिव्य गुटिका पर

    भूत -प्रेत ,नकारात्मक ऊर्जा हटाने का प्रयोग दिव्य गुटिका पर

    भूत -प्रेत ,नकारात्मक ऊर्जा हटाने का प्रयोग दिव्य गुटिका पर
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    ==प्रचंडा चामुंडा साधना ==
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                   जैसा की हमने अपने दिव्य गुटिका अथवा चमत्कारी डिब्बी धारक पेज के पाठकों को सूचित किया था की जो गुटिका उन्होंने कभी भी हमसे किसी भी अन्य उद्देश्य से ली हो वे उस उद्देश्य के साथ -साथ उस दिव्य गुटिका पर अनेक प्रयोग अपनी आवश्यकता अनुसार कर सकते हैं और हम क्रमशः उनकी विधि प्रस्तुत करते रहेंगे |हम विशेष रूप से प्रयोग किये जाने वाले कुछ प्रयोगों के क्रम में नकारात्मक ऊर्जा ,भूत-प्रेत ,वायव्य बाधाएं ,तांत्रिक अभिचार ,अनावश्यक वशीकरण ,उच्चाटन ,विद्वेषण आदि की क्रियाओं को हटाने का प्रयोग प्रदान कर रहे हैं |जिन धारकों को लगता हो की उनके ऊपर अथवा उनके दूकान ,व्यवसाय ,घर-परिवार पर किसी तरह की नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव है ,किसी ने कुछ किया -कराया किया हुआ है या अभिचार किया है ,या व्यवसाय -दूकान बाँध दिया है ,या उन्नति रोक दी है ,या अपने आप किसी वायव्य आत्मा परेशान कर रही है ,किसी बच्चे -स्त्री को कोई पीड़ा पहुंचा रहा हो ,घर-परिवार में अनावश्यक बीमारी -दुर्घटना -कष्ट का वातावरण बन रहा हो तो वह धारक इस प्रयोग को किसी शनिवार अथवा कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात्री शुरू कर निश्चित दिनों तक क्रिया प्रयोग कर लाभान्वित हो सकते हैं |
    सामग्री
    ———- मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुक्त दुर्लभ दिव्य गुटिका [चमत्कारी डिब्बी ],लाल रंग का वस्त्र ,इत्र ,लकड़ी की चौकी या बाजोट ,चांदी की तश्तरी [ न मिले तो पीतल ], असली सिन्दूर ,लौंग ,इलायची ,लाल फूल ,पान बीड़ा ,फल फूल ,प्रसाद चढाने को दूध की लाल मिठाई ,चावल ,सिक्का ,रुई ,देशी घी का दीपक |
    माला
    ——– मंत्र सिद्ध चैतन्य रुद्राक्ष माला
    आसन
    ——– लाल उनी आसन
    वस्त्र
    ——- लाल रंग की धोती
    दिशा
    ——- पूर्व दिशा
    दिन
    —— होली की रात्री अथवा शुभ मुहुर्तयुक्त मंगलवार अथवा नवरात्र अथवा शनिवार अथवा कृष्ण चतुर्दशी |
    समय
    ——- रात्री दस बजे
    जप संख्या अवधि
    ———————- १२५००० [सवा लाख ]अपनी सुविधानुसार रोज की जप संख्या निश्चित कर दिन की अवधि निश्चित कर लें |प्रतिदिन जप संख्या समान हो और सवा लाख जप २१ ,३१ ,४१ अथवा ५१ दिनों में संपन्न हो |इस अवधि में पूर्ण सात्विकता ,ब्रह्मचर्य पालन आवश्यक |
    मंत्र
    ——- || ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाये बिचै ||
    विधि
    ——– नवरात्र में अथवा शुभ मुहुर्त्युक्त मंगलवार को अथवा होली की रात्री अथवा कृष्ण चतुर्दशी अथवा किसी शनिवार को स्नानादि से निवृत्त हो शुद्ध हो लाल धोती धारण कर लाल उनी आसन पर पूर्व की और मुख कर अपने सामने लकड़ी के बाजोट या चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं |उस पर बीचोबीच रोली से अष्टदल कमल बनाएं फिर उस पर चांदी की तश्तरी स्थापित करें और तश्तरी के बीचोबीच रोली से या अष्टगंध से ह्रीं बनाएं |अब  उस पर दिव्यगुटिका स्थापित करें |दिव्य गुटिका के पीछे दुर्गा जी का चित्र स्थापित करें |अब दुर्गा जी का और दिव्य गुटिका का पूजन यथाशक्ति करें और जल ,अक्षत ,लाल फूल ,धुप -दीप ,प्रसाद चढ़ाएं ,असली पिला पारायुक्त सिन्दूर गुटिका के अन्दर चढ़ाएं |पान बीड़ा ,लौंग ,इलायची और एक सिक्का अर्पित करें |अब मंत्र सिद्ध चैतन्य रुद्राक्ष माला से उपरोक्त मंत्र का जप निश्चित संख्या में करें [जो आपने रोज के लिए निर्धारित की है ]|इस प्रकार रोज करते हुए सवा लाख जप पूर्ण हो जाने पर कम से कम २५०० हवन अवश्य करें |इस प्रकार यह अनुष्ठान पूर्ण होता है |अब चांदी की तश्तरी समेत दिव्य गुटिका अपने पूजा स्थान में स्थापित करें और रुद्राक्ष माला गले में धारण करें |गुटिका के बाहर चढ़ाए गए लौंग ,इलायची को उठाकर सुरक्षित रख ले यह किसी भी अभिचार ,पीड़ा ,बाधा के निवारण में मदद करेगा ,पीड़ित को खिलाने पर अथवा बाजू में बाँध देने पर |अन्य शेष सामग्री को बहते जल या तालाब ,कुएं में प्रवाहित कर दें |इस गुटिका पर सिन्दूर अर्पित करते रहें और प्रतिदिन इसकी पूजा सामान्य रूप से करते रहें |संभव हो तो एक -दो माला भी रोज करें |इस प्रयोग को संपन्न करने पर भूत-प्रेत ,वायव्य बाधा ,अभिचार ,किया कराया दूर होगा ,सब प्रकार उन्नति होगी ,शत्रु पराजित होंगे |घर के अनेक दोष समाप्त होंगे |जहाँ भी रखा जाएगा गुटिका वहां के बंधन समाप्त हो जायेंगे |आगे होने वाले अभिचार काम नहीं करेंगे |गुटिका पर चढ़ाए सिन्दूर का तिलक करने पर आकर्षण शक्ति बढ़ेगी ,लोग प्रभावित होंगे ,सब प्रकार से सुरक्षा प्राप्त होगी |लोग वशीभूत होंगे |……………………………………………………….हर-हर महादेव 
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  • चमत्कारी- दिव्य गुटिका /डिब्बी

    चमत्कारी- दिव्य गुटिका /डिब्बी

    चमत्कारी- दिव्य गुटिका /डिब्बी
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    रविपुष्य योग में निर्मित ,प्राण प्रतिष्ठित ,अभिमंत्रित दिव्य गुटिका
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                   सामान्यरूप से हर किसी की चाह होती है की लोग उनकी और आकर्षित हों ,देखकर खींचे चले आयें ,जो मिले प्रभावित हो ,जहाँ जाए किसी काम से वहां सफलता मिले ,कहीं किसी समस्या-परेशानी का सामना न करना पड़े |हर इंसान के अन्दर यह कामना होती है की उसका व्यक्तित्व ऐसा आकर्षक हो की लोग चुम्बक की तरह खिचे चले आये ,उसका व्यतित्व सम्मोहक हो |हर व्यक्ति पर उसका प्रभाव पड़े ,कार्य-व्यवसाय के क्षेत्र के लोग अनुकूल हों ,सफलता मिले ,उन्नति हो |यह असंभव नहीं है |यह संभव है तंत्र के माध्यम से |इस हेतु थोड़े से नियम और सावधानी के साथ यदि हमारे द्वारा निर्मित दिव्य गुटिका /डिब्बी का प्रयोग किया जाए |यह गुटिका तंत्र की उन दिव्य चमत्कारी वस्तुओं से परिपूर्ण हैं जो किसी के भी जीवन में चमत्कार कर सकती है |इसकी क्षमता की कोई सीमा नहीं है |इससे वह सबकुछ पाया जा सकता है जो एक सामान्य व्यक्ति की इच्छा होती है ,यद्यपि इसके अनेक अलौकिक प्रयोग भी है ,जो असंभव कार्य भी कर सकते हैं पर उनसके लिए इसपर विशिष्ट क्रियाएं करनी होती हैं |कोई क्रिया न भी की जाए और सामान्य पूजा के साथ पवित्रता राखी जाए तो उपरोक्त लाभ मिलते ही हैं |
                 दिव्य गुटिका या चमत्कारी डिब्बी विशिष्ट वस्तुओं -वनस्पतियों -पदार्थों का एक अद्भुत संग्रह है अर्थात एक डिब्बी में २१ अलौकिक शक्तियां रखने वाली वस्तुएं इकठ्ठा की गयी है |हर वस्तु उसके लिए उपयुक्त विशिष्ट मुहूर्त में तांत्रिक पद्धतियों से निकाली -प्राण प्रतिष्ठित और अभिमंत्रित की गयी होती है ,इसके बाद फिर इसे सम्मिलित रूप से विशिष्ट मुहूर्त में अभिमंत्रित किया जाता है जिससे इसकी अलौकिकता और बढ़ जाती है | इस चमत्कारिक दिव्य गुटिका के मुख्य अवयव रवि पुष्य योग में निष्काषित अथवा अभिमंत्रित -प्राण प्रतिष्ठित हत्थाजोड़ी और सियार्सिंगी होते है ,जिनके साथ श्वेतार्क ,नागदौन ,महायेगेश्वरी ,एरंड ,अमरबेल ,हरसिंगार ,हाथी दांत ,गोरोचन ,पिली कौड़ी ,गोमती चक्र आदि विभिन्न २१ अद्भुत ,विशिष्ट और चमत्कारिक वनस्पतियाँ और वस्तुएं होती हैं ,जो मिलकर ऐसा अद्भुत प्रभाव उत्पन्न करते हैं की यह चमत्कारिक प्रभाव युक्त हो जाती है |[क्षमा के साथ सम्पूर्ण वस्तुओं का नाम नहीं दे सकते क्योकि यह हमारा व्यक्तिगत शोध है ]|
                     यह सभी वस्तुएं विशिष्ट उच्च स्तर के साधक द्वारा विशिष्ट मुहूर्त में प्राण-प्रतिष्ठित और अभिमंत्रित होती हैं ,जबकि उपयोग किये गए सामान भी विशिष्ट मुहूर्त में ही विशिष्ट तांत्रिक पद्धति से निष्कासित और प्राप्त किये हुए होते हैं |उपरोक्त वस्तुओं की उपयुक्त और विशिष्ट मुहूर्त में विशिष्ट तांत्रिक साधक द्वारा की गयी तांत्रिक क्रिया के बल पर यह गुटिका अति शक्तिशाली वशिकारक-आकर्षक -सुरक्षाप्रदायक ,धन-संमृद्धि प्रदायक हो जाती है |इससे निकलने वाली तरंगे साथ रखने वाले धारक के साथ साथ ही आसपास के लोगों को भी प्रभावित करती है, जिससे धारक को उपरोक्त लाभ मिलने लगते हैं |इस गुटिका की एक विशेषता है की यह आपके घर की या आपकी नकारात्मक ऊर्जा को सामने ला देती है |यदि आप किसी नकारात्मक प्रभाव से ग्रस्त हैं तो वह कुछ दिक्कतें उत्पन्न कर सकती हैं ,क्योकि उन्हें यह महसूस होता है की उन्हें निकाला या हटाया जा रहा है ,इसलिए शुरू के कुछ समय वह उत्पात मचा सकते हैं जिससे आप यह सोचें की यह सब इस गुटिका के कारण हो रहा है |यदि कुछ समय धैर्य से निकल गया तो सारी परिस्थितियां नियंत्रण में आ जाती हैं |
                      इसमें उपयोग की गयी हत्थाजोड़ी में माता चामुंडा का वास माना जाता है |इस जड़ी का सर्वाधिक प्रभाव इसकी सम्मोहंनशीलता है | साधक [व्यक्ति] इसे लेकर कही भी जाये उसका विरोध नहीं होगा |सम्बंधित मनुष्य उसके अनुकूल आचरण और व्यवहार करेगा |इस जड़ी के इसी गुण [सम्मोहनशीलता ]के कारण ही बहुत से लोग इसका प्रयोग प्रेम सम्बन्धी मामलों में भी करते हैं ,,|पति-पत्नी के मामलों में यह अत्यंत उपयोगी भी है और सदुपयोग भी |सम्मोहन और वशीकरण [आकर्षण ]के अतिरिक्त इसका प्रयोग धन वृद्धि ,सुरक्षा ,सौभाग्य वृद्धि ,व्यापार बाधा हटाने आदि में भी किया जाता है और बेहद प्रभावी भी है | इसकी सम्पूर्ण विधि पूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा इसे अमूल्य बना देती है |धारक या साधक यात्रा ,विवाद ,प्रतियोगिता ,साक्षात्कार ,द्युतक्रीडा ,और युद्धादी में यह साधक की रक्षा करके उसे विजय प्रदान करती है |भूत-प्रेत आदि वायव्य बाधाओं का उसे कोई भय नहीं रहता ,धन-संपत्ति देने में भी यह बहुत चमत्कारी सिद्ध होती है |इस पर विभिन्न प्रकार के वशीकरण-आकर्षण-सम्मोहन के प्रयोग किये जाते हैं ,विदेश यात्रा की रुकावटें दूर करने की क्रियाएं होती हैं ,घर की सुरक्षा की क्रियाएं होती हैं ,धन-संपत्ति-आकस्मिक लाभ सम्बन्धी क्रियाएं होती हैं ,व्यापार वृद्धि प्रयोग होते हैं ,मुकदमे में विजय ,विरोधियों की पराजय की क्रियाएं होती है ,,इसे जेब में रखा जाये तो सम्मान-सम्मोहंशीलता-प्रभाव बढ़ता है ,सामने के व्यक्ति का वाकस्तम्भन होता है ,आकस्मिक आय के स्रोत बनते हैं
                        दूसरी वस्तु सियार्सिंगी शत्रु पराभव ,सामाजिक सम्मान ,शरीर रक्षा ,श्री समृद्धि ,आकर्षण ,वशीकरण ,सम्मोहन ,धन-सम्पदा ,सुख शान्ति के लिए उपयोग की जा सकती है |किसी शुभ तांत्रिक मुहूर्त में प्राण प्रतिष्ठित और अभिमंत्रित सियारसिंगी वाद-विवाद ,युद्ध ,संकट ,आपदा ,से बचानेवाला भी सिद्ध होता है |यह रक्षा कार्यों में अद्भुत सफलतादायक कहा जाता है |इसे धारण करनेवाला व्यक्ति दुर्घटना ,विवाद ,युद्ध अथवा किसी अन्य संकट में पड़ने पर तुरंत ही आप्दामुक्त हो जाता है |इस पर धन-समृद्धि ,वशीकरण ,सम्मोहन ,सुरक्षा से सम्बंधित विभिन्न क्रियाएं भी होती हैं ,जैसी आवश्यकता हो |केवल मंत्र और पद्धति ही बदलती है सियारसिंगी वही रहता है |इसे रखने वाला व्यक्ति जहाँ भी जाता है वहां का वातावरण उसके अनुकूल हो जाता है | इसी प्रकार इस गुटिका में शामिल २१ वस्तुओं में से हर वस्तु का अपना एक अलग और विशिष्ट बहुआयामी प्रभाव है |इनके बारे में लिखने पर कई पोस्ट कम हो जायेंगे |वैसे भी यह हमारे गोपनीय खोज हैं अतः सभी वस्तुओं और उनके प्रभावों के बारे में बता पाना भी संभव नहीं |
                     प्रतिदिन प्रातः काल स्नानादि के बाद ,अपने ईष्ट पूजा के साथ ही इस गुटिका /डिब्बी को भी भगवती स्वरुप मानकर पूजा कर दिया जाता है |धुप-दीप के साथ ,इसके साथ ही इस पर सिन्दूर और लौंग भी चढ़ाया जाता है |फिर इसे बंद करके इसे जेब में रख के कार्य व्यवसाय पर भी जाया जा सकता है और पूजा स्थान पर भी रहने दिया जा सकता है |यदि कार्य व्यवसाय पर साथ ले जाते हैं तो लाभ तो अधिक होता है पर थोड़ी पवित्रता का ध्यान रखना होता है ,अपवित्र हाथों से इसे न छुआ जाए और अशुद्ध और अपवित्र अथवा सूतक वाले स्थानों पर इसे न ले जाएँ |शाम को घर आने पर इसे वापस पूजा स्थान पर रख दें |इस पर यदि “ॐ नमश्चंडिकाये नमः ” मंत्र का जप रोज १०८ बार किया जाए तो इसका पूर्ण प्रभाव मिलता है |
                          इस गुटिका/डिब्बी के उपयोग से धन वृद्धि ,सम्मोहन ,वशीकरण ,वायव्य बाधाओं से सुरक्षा ,शत्रुओं से सुरक्षा ,अभिचार कर्म से सुरक्षा ,संपत्ति संवर्धन ,यात्रा में सुरक्षा ,विवाद-प्रतियोगिता में सफ़लता ,साक्षात्कार में सफ़लता ,द्युतक्रीडा -शेयर -सट्टा -लाटरी -कमोडिटी के कार्यों में सफलता ,शत्रु से अथवा मुकदमे में विजय ,अधिकारी का अनुकूलन -वशीकरण ,गृह दोष-वास्तु दोष का शमन ,गृह कलह का शमन ,ग्रह बाधा-अशुभत की समाप्ति ,प्रियजनों का अनुकूलन-वशीकरण किया जा सकता है |इसके अतिरिक्त भी यह गुटिका के अनेकानेक और विशिष्ट उपयोग हैं ,जिनके लिए विविध प्रकार की क्रियाएं की जा सकती है ,इसकी क्षमता की कोई सीमा नहीं है ,उद्देश्य के अनुसार भिन्न क्रियाएं विभिन्न मनोकामनाएं पूर्ण कर सकती हैं |यह गुटिका हमारे वर्षों के tantra क्षेत्र में शोध का परिणाम है और इसके परिणाम अनुभूत हैं |………………….हर-हर महादेव 
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  • ताबीज भाग्य बदल सकता है .

    :::::::::::::एक ताबीज आपकी किस्मत पलट सकता है::::::::::::::
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              ताबीज आदि के निर्माण में एक वृहद् उर्जा विज्ञानं काम करता है ,जिसे प्रकृति का विज्ञान कहा जाता है | एक विशिष्ट प्रक्रिया ,विशिष्ट पद्धति और विशिष्ट वस्तुओं के विश्सिष्ट समय में संयोग से विशिष्ट व्यक्ति द्वारा निर्मित ताबीज और यन्त्र में एक विशिष्ट शक्ति का समावेश हो जाता है ,जो किसी भी सामान्य व्यक्ति को चमत्कारिक रूप से प्रभावित करती है जिससे उसके कर्म-स्वभाव-सोच-व्यवहार-प्रारब्ध सब कुछ प्रभावित होने लगता है |
              -ताबीज में प्राणी के शरीर और प्रकृति की उर्जा संरचना ही कार्य करती है ,,इनका मुख्य आधार मानसिक शक्ति का केंद्रीकरण और भावना के साथ विशिष्ट वस्तुओं-पदार्थों-समय का तालमेल होता है| ,,,,प्रकृति में उपस्थित वनस्पतियों और जन्तुओ में एक उर्जा परिपथ कार्य करता है ,मृत्यु के बाद भी इनमे तरंगे कार्य करती है और निकलती रहती हैं ,,,,इनमे विभिन्न तरंगे स्वीकार की जाती है और निष्कासित की जाती है |जब किसी वस्तु या पदार्थ पर मानसिक शक्ति और भावना को केंद्रीकृत करके विशिष्ट क्रिया की जाती है तो उस पदार्थ से तरंगों का उत्सर्जन होने लगता है ,,,,जिस भावना से उनका प्रयोग जिसके लिए किया जाता है ,वह इच्छित स्थान पर वैसा कार्य करने लगता है ,|उदहारण के लिए ,,,किसी व्यक्ति को व्यापार वृद्धि के लिए कुछ बनाना है ,तो इसके लिए इससे सम्बंधित वस्तुएं अथवा यन्त्र विशिष्ट समय में विशिष्ट तरीके से निकालकार अथवा निर्मित करके जब कोई उच्च स्तर का साधक अपने मानसिक शक्ति के द्वारा उच्च शक्तियों के आह्वान के साथ जब प्राण प्रतिष्ठा और अभिमन्त्रण करता है तो वस्तुगत उर्जा -यंत्रागत उर्जा के साथ साधक की मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा का ऐसा अद्भुत संयोग बनता है की निर्मित ताबीज से तीब्र तरंगें निकालने लगती हैं ,इन्हें जब सम्बंधित धारक को धारण कराया जाता है तो यह ताबीज उसके व्यापारिक चक्र [लक्ष्मी या संमृद्धि के लिए उत्तरदाई ] को स्पंदित करने लगता है ,दैवीय प्रकृति की शक्ति आकर्षित हो धारक से जुड़ने लगती है और उसकी सहायता करने लगती है ,अनावश्यक विघ्न बाधाएं हटाने लगती है ,साथ ही मन और मष्तिष्क  भी प्रभावित होने लगता है ,जिससे उसके निर्णय लेने की क्षमता ,शारीरिक कार्यप्रणाली ,दैनिक क्रिया कलाप बदल जाते है ,उसके प्रभा मंडल पर एक विशेष प्रभाव पड़ता है ,जिससे उसकी आकर्षण शक्ति बढ़ जाती है ,बात-चीत का ढंग बदल जाता है ,सोचने की दिशा परिवर्तित हो जाती है ,कर्म बदलते हैं ,,प्रकृति और वातावरण में एक सकारात्मक बदलाव आता है और व्यक्ति को लाभ होने लगता है,, |यह एक उदाहरण है ,ऐसा ही हर प्रकार के व्यक्ति के लिए हो सकता है उसकी जरुरत और कार्य के अनुसार ,|यहाँ यह अवश्य ध्यान देने योग्य होता है की यह सब तभी संभव होता है जब वास्तव में साधक उच्च स्तर का हो ,उसके द्वारा निर्मित ताबीज खुद उसके हाथ द्वारा निर्मित हो ,सही समय और सही वस्तुओं से समस्त निर्माण हो ,|ऐसा न होने पर अपेक्षित लाभ नहीं हो पाता| ताबीज और यन्त्र तो बाजार में भी मिलते है और आजकल तो इनकी फैक्टरियां सी लगी हैं ,जो प्रचार के बल पर बेचीं जा रही हैं ,कितना लाभ किसको होता है यह तो धारक ही जानता है |


           ताबीज बनाने वाले साधक की शक्ति बहुत मायने इसलिए रखती है की  जब वह अपने ईष्ट में सचमुच डूबता है तो वह अपने ईष्ट के अनुसार भाव को प्राप्त होता है ,,भाव गहन है तो मानसिक शक्ति एकाग्र होती है ,जिससे वह शक्तिशाली होती है ,यह शक्तिशाली हुई तो उसके उर्जा परिपथ का आंतरिक तंत्र शक्तिशाली होता है और शक्तिशाली तरंगे उत्सर्जित करता है |ऐसा व्यक्ति यदि किसी विशेष समय,ऋतू-मॉस में विशेष तरीके से ,विशेष पदार्थो को लेकर अपनी मानसिक शक्ति और मन्त्र से उसे सिद्ध करता है तो वह ताबीज धारक व्यक्ति को अच्छे-बुरे भाव की तरंगों से लिप्त कर देता है |यह समस्त क्रिया शारीर के उर्जा चक्र को प्रभावित करती है और तदनुसार व्यक्ति को उनका प्रभाव दिखाई देता है| यह ताबीजें इतनी शक्तिशाली होती हैं की व्यक्ति का प्रारब्ध तक प्रभावित होने लगता है |अचानक आश्चर्यजनक परिवर्तन होने लगते हैं |आपने अनेक कहानियाँ सुनी होंगी की अमुक चीज अमुक साधू ने दिया और ऐसा हो गया |अथवा यह सुना होगा की अमुक तांत्रिक ने अमुक छीजें कुछ बुदबुदाकर फेंकी व्यक्ति को लाभ हो हया |यह बहुत छोटे उदाहरण हैं |जिस तरह साधना से ईश्वरीय ऊर्जा आती है उसी तरह यह मानसिक एकाग्रता से वस्तु और यन्त्र में स्थापित भी होती है |तभी तो मूर्तियाँ और यन्त्र प्रभावी होते हैं |यही यन्त्र ताबीजों में भरे जाते हैं और प्रभाव देते हैं |यह किसी  यन्त्र विशेष का प्रचार नहीं अपितु वैज्ञानिक विश्लेष्ण का प्रयास है और हमने इसे बहुत सत्य पाया है |यही कारण है की हम अपने सभी अनुष्ठानों में भोजपत्र पर यंत्र अवश्य बनाते हैं और साधना समाप्ति पर उन्हें धारण करते भी हैं और कराते भी हैं |यह धारण मात्र से साधना जैसा प्रभाव देते हैं |………………………………………………………हर-हर महादेव 
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  • बगलामुखी यन्त्र / प्रभाव

    बगलामुखी यन्त्र / प्रभाव

    बगलामुखी यन्त्र से रोके/हटाये भूतप्रेत ,वायव्य बाधा ,नकारात्मक ऊर्जा
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                   भगवती बगलामुखी एक अद्वितुय शक्तिशाली महाविद्या अर्थात ब्रह्माण्ड की उच्चतर शक्ति हैं जिन्हें ब्रह्मास्त्र विद्या भी कहा जाता है |इनकी आराधना विष्णु जी द्वारा भी की गयी थी एक विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ती हेतु |यह परम तेजोमय शक्ति है जिनकी शक्ति का मूल सूत्र ,प्राण सूत्र है |प्राण सूत्र प्रत्येक प्राणी में सुप्त अवस्था में होता है जो इनकी साधना से चैतन्य होता है ,इसकी चैतन्यता से समस्त षट्कर्म भी सिद्ध हो सकते है ,,बगलामुखी को सिद्ध विद्या भी कहा जाता है ,मूलतः यह स्तम्भन की देवी है पर समस्त षट्कर्म इनके द्वारा सिद्ध होते है और अंततः यह मोक्ष प्रदान करने में सक्षम है 
                       बगलामुखी यन्त्र माता बगलामुखी का निवास माना जाता है जिसमे वह अपने अंग विद्याओ ,शक्तियों ,देवों के साथ निवास करती है ,अतः यन्त्र के साथ इन सबका जुड़ाव और सानिध्य प्राप्त होता है ,,यन्त्र के अनेक उपयोग है ,यह धातु अथवा भोजपत्र पर बना हो सकता है ,पूजन में धातु के यन्त्र का ही अधिकतर उपयोग होता है ,पर सिद्ध व्यक्ति से प्राप्त भोजपत्र पर निर्मित यन्त्र बेहद प्रभावकारी होता है ,,धारण हेतु भोजपत्र के यन्त्र को धातु के खोल में बंदकर उपयोग करते है ,,जब व्यक्ति स्वयं साधना करने में सक्षम  हो तो यन्त्र धारण मात्र से उसे समस्त लाभ प्राप्त हो सकते है ,..
                 बगलामुखी की कृपा से व्यक्ति की सार्वभौम उन्नति होती है ,शत्रु पराजित होते है ,सर्वत्र विजय मिलती है ,मुकदमो में विजय मिलती है ,अधिकारी वर्ग की अनुकूलता प्राप्त होती है ,विरोधी की वाणी ,गति का स्तम्भन होता है ,शत्रु की बुद्धि भ्रस्त हो जाती है ,उसका विनाश होने लगता है ,,ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ,व्यक्ति के आभामंडल में परिवर्तन होने से लोग आकर्षित होते है ,प्रभावशालिता बढ़ जाती है ,वायव्य बाधाओं से सुरक्षा होती है ,तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव समाप्त हो जाते है ,सम्मान प्राप्त होता है ,वादविवाद में सफलता मिलती है ,प्रतियोगिता आदि में सफलता बढ़ जाती है ,भूतप्रेतवायव्य बाधा की शक्ति क्षीण होती है क्योकि इसमें से निकलने वाली सकारात्मक तरंगे उनके नकारात्मक ऊर्जा का ह्रास करते हैं और उन्हें कष्ट होता है ,मांगलिक और उग्र देवी होने से नकारात्मक शक्तियां इनसे दूर भागती हैं ,यह समस्त प्रभाव यन्त्र धारण से भी प्राप्त होते है और साधना से भी ,साधना से व्यक्ति में स्वयं यह शक्ति उत्पन्न होती है ,यन्त्र धारण से यन्त्र के कारण यह उत्पन्न होता है ,यन्त्र में साधक का मानसिक बल ,उसकी शक्ति से अवतरित और प्रतिष्ठित भगवती की पारलौकिक शक्ति होती है जो वह सम्पूर्ण प्रभाव प्रदान करती है जो साधना में प्राप्त होती है ,अतः आज के समय में यह साधना अथवा यन्त्र धारण बेहद उपयोगी है |     ताबीज आदि में एक बृहद उर्जा विज्ञानं काम करता है ,जो ब्रह्मांडीय उर्जा संरचना ,क्रिया ,तरंगों ,उनसे निर्मित भौतिक इकाइयों की उर्जा संरचना का विज्ञानं है ,,,इस उर्जा संरचना को ही तंत्र कहा जाता है |इसकी तकनीक प्रकृति की स्वाभाविक तकनीक है ,,,यही तकनीक तंत्र ,योग ,सिद्धि ,साधना में प्रयुक्त की जाती है ,-ताबीज में प्राणी के शारीर और प्रकृति की उर्जा संरचना ही कार्य करती है ,,इनका मुख्या आधार मानसिक शक्ति का केंद्रीकरण और भावना होता है ,,,,प्रकृति में उपस्थित वनस्पतियों और जन्तुओ में एक उर्जा परिपथ कार्य करता है ,मृत्यु के बाद भी इनमे तरंगे कार्य करती है ,,,,इनमे विभिन्न तरंगे स्वीकार की जाती है और निष्कासित की जाती है |जब किसी वास्तु या पदार्थ पर मानसिक शक्ति और भावना को केंद्रीकृत करके विशिष्ट क्रिया की जाती है तो उस पदार्थ से तरंगों का उत्सर्जन होने लगता है ,,,,जिस भावना से उनका प्रयोग जिसके लिए किया जाता है ,वह इच्छित स्थान पर वैसा कार्य करने लगता है,,ताबीज बनाने वाला जब अपने ईष्ट में सचमुच डूबता है तो वह अपने ईष्ट के अनुसार भाव को प्राप्त होता है ,,भाव गहन है तो मानसिक शक्ति एकाग्र होती है ,जिससे वह शक्तिशाली होती है ,यह शक्तिशाली हुई तो उसके उर्जा परिपथ का आंतरिक तंत्र शक्तिशाली होता है और शक्तिशाली तरंगे उत्सर्जित करता है |ऐसा व्यक्ति यदि किसी विशेष समय,ऋतूमॉस में विशेष तरीके से ,विशेष पदार्थो को लेकर अपनी मानसिक शक्ति और मन्त्र से उसे सिद्ध करता है तो वह ताबीज धारक व्यक्ति को उस  भाव की तरंगों से लिप्त कर देता है |यह समस्त क्रिया शारीर के उर्जा चक्र को प्रभावित करती है और तदनुसार व्यक्ति को उनका प्रभाव दिखाई देता है ,साथ ही इनका प्रभाव आस पास के वातावरण पर भी पड़ता है क्योकि तरंगों का उत्सर्जन आसपास भी प्रभावित करता है ………..…………….हरहर महादेव 
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  • आपके शरीर की बौद्धिक आयु क्या है ,क्या आप जानते हैं ?

    किस स्तर के
    शरीर में आपकी आत्मा रहती है ,क्या आप जानते हैं ?
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             हर व्यक्ति जन्म लेने के कुछ दिनों बाद
    एक निश्चित मानसिक विकास से गुजरता है किन्तु कुछ लोगों का मानसिक विकास तीव्र
    होता है कुछ लोगों का मानसिक विकास धीमा होता है और कुछ लोगों का मानसिक विकास
    अत्यधिक मंद होता है की वह २५ वर्ष की उम्र में भी
    56 वर्ष के बच्चे की तरह
    की बुद्धि के होते हैं ,भले इन सबको एक सामान ही माहौल क्यों न मिले |कभी कभी एक
    ही समय पर जन्मे बच्चों यहाँ तक की जुड़वाँ बच्चों के भी मानसिक स्तर और रुचियों
    में बड़ी भिन्नता पायी जाती है |क्या आपने कभी सोचा है की यह सब क्यों होता है |विज्ञान
    अनेक सिद्धांत दे सकता है किन्तु ऐसा न हो इसका कोई उपाय उसके पास नहीं है क्योंकि
    वास्तव में विज्ञान यह रहस्य जानता ही नहीं की ऐसा क्यों होता है |ज्योतिषी इसके
    सम्बन्ध में ग्रहों ,नक्षत्रों की स्थिति स्थान अनुसार भिन्न बताकर ,या जन्म समय
    में सेकेण्ड का अंतर कहकर या देश -काल परिस्थिति की बात कहकर इसे परिभाषित करने की
    कोशिश करता है किन्तु यहाँ भी संतोषजनक उत्तर नहीं है |हम आपको इसका रहस्य बताते
    हैं अपने इस विडिओ में और अपने इस चैनल अलौकिक शक्तियां पर |इसका सम्बन्ध आपके
    अवचेतन और आपके शरीर से जुड़े सात ऊर्जा शरीरों से होता है |यह सातो शरीर सभी में
    होते हैं किन्तु हर व्यक्ति एक निश्चित शरीर की अवस्था में जन्म लेता है और उसके
    नीचे के शरीरों के गुणों के साथ उस शरीर के गुण उसमें १४ -१५ वर्ष की उम्र तक
    विकसित होते हैं |ध्यान से पूरा लेख और विडिओ देखिये ,आप उस रहस्य को जानने जा रहे
    जो दुनियां के बहुत कम लोग जानते हैं ,इसलिए ध्यान से पूरा लेख और विडिओ अंत तक
    समझें |
              मानव शरीर एक कम्प्यूटर के समान ही
    रहस्यपूर्ण यन्त्र है ,इसे ठीक से समझने के लिए मानव के विभिन्न आयामों को समझना
    आवश्यक है |बाहरी रूप से जो शरीर हमें दिखाई देता है वास्तव में वह शरीर का केवल
    दस प्रतिशत भाग होता है |विद्वानों ने शरीर के सात स्तरों की बात की है –
    स्थूल शरीर [फिजिकल बाडी] २ आकाश शरीर [ईथरिक बाडी] सूक्ष्म शरीर [एस्ट्रल
    बाडी
    ] मनस शरीर [ मेंटल बाडी] ५-
    आत्म शरीर [स्पिरिचुअल बाडी
    ] ब्रह्म शरीर [कास्मिक बाडी] और ७- निर्वाण शरीर [बाडिलेस बाडी] |अब आप देखिये हमारे सौर मंडल में सात ही ग्रह
    भी मुख्य होते हैं ज्योतिष के अनुसार ,जबकि दो अदृश्य ग्रह माने जाते हैं |हमारे
    शरीर में सात ही चक्र मुख्य माने जाते हैं ,दो चक्र को और स्थान दिया जाता है इनके
    बीच अर्थात सात मुख्य ग्रह ,सात मुख्य चक्र और सात शरीर मानव के |कुछ तो सम्बन्ध
    है इनका |कुंडलिनी जागरण के क्रम में क्रमशः सातो चक्रों के जागरण से इन सात शरीर
    की अवस्था में व्यक्ति पहुँचता है और सातो ग्रहों के प्रभाव भी प्रभावित होते हैं
    |जन्मकालिक मुख्य ग्रह के अनुसार एक विशेष चक्र भी जन्म से ही क्रियाशील होता है
    और व्यक्ति के सप्त शरीर में से एक शरीर विशेष के गुण के अनुसार भी व्यक्ति का
    व्यक्तित्व और मानसिक स्थिति होती है |
           सनातन सिद्धांत और सोच के अनुसार मनस
    शास्त्रियों का कहना है की व्यक्तियों के जीवन में मानव शरीर के यह सातों स्तर
    उत्तरोत्तर विकसित होते हैं, अर्थात क्रमशः उम्र और समय के अनुसार इनका विकास होता
    है |सामान्य जन इसे नहीं समझ पाते ,यहाँ तक की साधक और कुंडलिनी के जानकार भी इसे
    व्यावहारिक स्तर पर न देखते हुए मात्र साधना से ही इनकी प्राप्ति और समझने की बात
    करते हैं |व्यावहारिक दृष्टिकोण की बात करें तो मनस शास्त्रियों के अनुसार सामान्य
    योग व्यवहार में रहते हुए एक शरीर का विकास लगभग सात वर्ष में पूरा हो जाना चाहिए
    और लगभग ५० वर्ष की आयु होने तक व्यक्ति सातवें शरीर का विकास करके विदेह [बाडीलेस
    ]अवस्था में पहुँच जाना चाहिए |अर्थात जन्म से ७ वर्ष तक स्थूल शरीर ,७ से १४ वर्ष
    तक आकाश शरीर ,१४ से २१ वर्ष तक सूक्ष्म शरीर ,२१ से २८ वर्ष तक मनस शरीर ,२८ से
    ३५ वर्ष तक आत्म शरीर ,३५ से ४२ वर्ष तक ब्रह्म शरीर और ४२ से ४९ -५० वर्ष तक
    निर्वाण शरीर की अवस्था में व्यक्ति को होना चाहिए |ध्यान दीजिये यहाँ शरीर यथावत
    रहता है मात्र मानसिक अवस्था इन शरीर के अनुसार पहुंचनी चाहिए |यह सनातन नियमों के
    अनुसार व्यक्ति की नियमित दिनचर्या के अनुसार निर्धारित किया गया है |
              राजा जनक को विदेह और जानकी को वैदेही
    भी कहते हैं ,इसका अर्थ यह होता है की राजा जनक विदेह अवस्था को प्राप्त थे |इस
    विदेह अथवा बाडिलेस अवस्था का अर्थ यह नहीं की व्यक्ति का भौतिक शरीर नहीं रहेगा
    अथवा व्यक्ति कोई भौतिक कर्म नहीं करेगा |इसका अर्थ केवल इतना है की वह सारे कार्य
    इस ढंग से करना सीख लेगा की उसकी आत्मा पर कोई कर्म का बंधन न लग पाए ,अर्थात
    आत्मा निर्लेष रहे |आत्मा प्रायः उस अवस्था में निर्लेष रहती है जब वह शरीर रहित
    होती है |यह एक मेटाफिजिकल सिद्धांत है |यह सूत्र हमारे सनातन दर्शन में जीवन के
    लिए बनाए गए थे और वैदिक काल में इसका पालन होता था |जीवन का ढंग ऐसा था की इसके
    अनुसार जीवन चले |
               इस सूत्र के अनुसार ,जीवन के प्रथम
    सात वर्ष में बच्चे का स्थूल शरीर पूरा होता है जैसे पशु का शरीर विकास को प्राप्त
    होता है |इस अवस्था में व्यक्ति में अनुकरण तथा नकल करने की प्रवृत्ति रहती है
    |प्रायः यह प्रवृत्ति पशुओं की भी होती है |कुछ ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जिनकी
    बुद्धि इस भाव से उपर नहीं उठ पाती और पशुवत जीवन जीते रह जाते हैं |इसे हम योग की
    भाषा में कहते हैं की व्यक्ति प्रथम शरीर से उपर नहीं उठा |यह स्तर व्यक्ति के
    भौतिक शरीर का होता है और इस स्तर का व्यक्ति केवल भोजन -शयन में रूचि रखने वाला
    ,शारीरिक सुख चाहने वाला ,दूसरों के अनुसार चलने वाला होता है |
             द्वितीय शरीर अर्थात आकाश शरीर में
    भावनाओं का उदय होता है अतः इसे भाव शरीर भी कहते हैं |प्रेम और आत्मीयता वाली समझ
    विकसित होने से व्यक्ति सांसारिक सम्बन्धों को समझने लगता है |इस आत्मीयता के कारण
    ही व्यक्ति में पशु प्रवृत्ति कम होकर मनुष्य प्रवृत्ति का विकास होता है |चौदह
    वर्ष का होते होते वह सेक्स के भाव को भी समझने लग जाता है |बहुत से लोगों के चक्र
    यहीं तक विकसित हो पाते हैं और वे पूरे जीवन भर घोर संसारी बने रहते हैं |आकाश
    शरीर की स्थिति वाले लोग सदैव भौतिकता की ओर भागते हुए इसी में लिप्त रहते हैं
    |इनके लिए भोग विलाश ,भोजन ,शयन सुख ,भावना में बहने वाले ,कल्पना में जीने वाले
    ,अक्सर गलतियाँ करने वाले ,कम आत्मविश्वास वाले होते हैं | [पंडित जितेन्द्र मिश्र
    ]
              तृतीय शरीर सूक्ष्म शरीर कहलाता है
    |सामान्यतः इसकी विकास की अवधि २१ वर्ष तक है |इस अवधि में बुद्धि में विचार और
    तर्क की क्षमता का विकास हो जाने के कारण व्यक्ति बौद्धिक रूप से सक्षम हो जाता है
    और व्यक्ति में सांस्कृतिक गुण विकसित हो जाते हैं |सभ्यता भी आ जाती है और शिक्षा
    के आधार पर समझ भी बढ़ जाती है |इस स्तर के लोग जीवन और जन्म -मृत्यु को ही सब कुछ
    समझते हैं |भौतिक रूप से सभी सुखों की चाह भी होती है और मृत्यु की वास्तविकता को
    भी समझते हैं |जीवन सुखी बनाने की सामर्थ्य और बुद्धि भी होती है |इस स्तर पर
    आध्यात्मिक विकास न्यून होता है और कष्ट पर व्यक्ति दूसरों की ओर देखता है |अक्सर
    इस स्तर पर या तो व्यक्ति नास्तिक होता है या भाग्यवादी |नास्तिक कर्म को प्रमुखता
    देते हैं और भाग्यवादी भाग्य को ही सबकुछ मानते हैं |
                 चतुर्थ शरीर अगले सात वर्ष तक
    विकसित हो जाना चाहिए |अर्थात २८ या ३० वर्ष तक इस शरीर का विकास हो जाना चाहिए
    |इसे मनस शरीर कहते हैं |इस स्तर पर मन प्रधान होता है ,अतः व्यक्ति ललित कलाओं
    ,संगीत ,साहित्य ,चित्र कारिता काव्य आदि में रूचि लेने लगता है |टेलीपैथी
    ,सम्मोहन यहाँ तक की कुंडलिनी भी इसी स्तर तक विकसित हुए व्यक्ति को रास आती है
    ,चूंकि यह स्तर व्यक्ति को कल्पना करने की ऐसी शक्ति देता है की वह पशुओं से
    श्रेष्ठ बन जाता है |स्वर्ग नर्क की कल्पना भी इसी स्तर में आती है |व्यक्ति
    आध्यात्मिक जगत को समझने लगता है और ब्रह्मांडीय सूत्रों में रूचि जाग्रत होती है
    |वह अधिकतम ज्ञान पाना चाहता है |हर क्रिया को समझने की कोशिस करता है |गहन साधना
    में रूचि इस शरीर की स्थिति में जाग्रत होती है और व्यक्ति यहाँ कुंडलिनी जाग्रत
    कर सकता है |
                पांचवां शरीर आध्यात्मिक होता है |इस
    स्तर पर पहुंचे व्यक्ति को आत्मा का अनुभव हो पाता है |यदि चौथे स्तर पर कुंडलिनी
    जाग्रत हो जाए तो इस शरीर का अनुभव हो पाता है |यदि नियम संयम से व्यक्ति का विकास
    होता रहे तो लगभग
    35 वर्ष की आयु तक
    व्यक्ति इस स्तर पर पहुँच जाता है |यद्यपि आज के आधुनिक जीवन शैली में सामान्य जन
    के लिए यह बेहद कठिन है |मोक्ष का अनुभव इस स्तर पर हो सकता है ,मुक्ति का अनुभव
    हो जाता है |
            छठवां है ब्रह्म शरीर |इस स्तर पर
    व्यक्ति अहम ब्रह्मास्मि का अनुभव कर पाता है |ऐसी कास्मिक बाडी सामान्यतः अगले
    सात वर्ष में विकसित हो जानी चाहिए |सातवाँ शरीर निर्वाण शरीर कहलाता है जो की
    विदेह अवस्था है |भगवान् बुद्ध ने इस स्थिति को ही निर्वाण कहा है |यहाँ अहं और
    ब्रह्म दोनों ही मिट जाते हैं |मैं और तू दोनों के ही न रहने से यह स्थिति परम
    शून्य की बन जाती है |
    इन सातों
    शरीरों का क्रमिक विकास बहुत से लोगों में जन्म जन्म चलता रहता है |कोई प्रथम शरीर
    के साथ जन्म लेता है तो कोई चौथे स्तर के साथ |करोड़ों में कोई एक छठवें स्तर के
    साथ जन्म लेता है जो जन्म से ही विरक्त हो जाता है |जैसे बाबा कीनाराम ,तेलग
    स्वामी ,स्वामी स्वरूपानंद ,विवेकानंद जी |जैसे स्तर के साथ व्यक्ति का जन्म होता
    है वह चौदह वर्ष का होते होते व्यक्ति में प्रकट होने लगता है |उसकी सोच ,संसार को
    देखने का दृष्टिकोण ,व्यवहार ,समझ आदि में सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा अंतर देखने
    को मिलता है |
                   इसको हम आपको
    थोडा और विस्तार से समझाते हैं |सभी की शुरुआत तो स्थूल शरीर से ही हुई है किन्तु
    कोई मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति कर निर्वाण शरीर तक पहुच जाता है और कोई स्थूल
    शरीर की मानसिक अवस्था में ही रह जाता है जीवन भर |यदि मान लीजिये किसी व्यक्ति ने
    अपने जीवन में सूक्ष्म शरीर की स्थिति पाई है और उसके ऊपर बड़े कर्म बंधन नहीं बनते
    ,किसी का श्राप आदि उसके जन्म को प्रभावित नहीं करते तथा वह अपनी आयु पूर्ण कर
    मृत्यु को प्राप्त होता है तो वह दोबारा जन्म लेता है और १४ वर्ष की आयु होते होते
    उसकी मानसिक अवस्था सूक्ष्म शरीर की मानसिक अवस्था जैसी हो जायेगी ,जैसे वह
    बौद्धिक होगा ,समझदार हो जाएगा ,तार्किक और सांस्कृतिक गुण वाला होगा अर्थात पूर्ण
    विकसित मानव होगा |अब वह यदि यहाँ से अपना विकास करता है तो उसके लिए निर्वाण शरीर
    तक की यात्रा स्थूल शरीर और आकाश शरीर वाले से आसान होगी |वह जहाँ तक की यात्रा
    करेगा और कर्म बंधन को नियत्रित रखेगा तो वह अगले जन्म में आज पहुंची हुई आवस्था
    में जन्म लेगा और १४ वर्ष की आयु तक उसमे वह गुण विकसित हो जायेंगे |यह क्रमिक
    विकास है |यदि कोई अपने कर्म से सूक्ष्म शरीर की अवस्था में जन्म लेकर भी पशुवत
    स्थूल शरीर के भोग सुख में ही झूलता रह जाता है तो वह नीचे जाकर स्थूल शरीर की
    अवस्था भी प्राप्त कर सकता है |यह आध्यात्मिक विज्ञान है जिसे अच्छे अच्छे साधक
    ,ज्ञानी ,कुंडलिनी साधक तक नहीं जानते ,नहीं समझते |इसलिए व्यक्ति को अपने कर्मों
    को नियंत्रित रखना चाहिए |धन्यवाद
    ………………………………………हर हर महादेव

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  • महाकाली दीक्षा के आवश्यक तत्व

    महाविद्या
    महाकाली दीक्षा
    ============     
                दीक्षा एक संस्कार है, जिसके माध्यम से
    कुसंस्कारों
    का क्षय होता है,| अज्ञान, पाप और दारिद्र्य का नाश होता है,| ज्ञान शक्ति व् सिद्धि प्राप्त होती है और मन में उमंग व् प्रसन्नता पाती है। दीक्षा के द्वारा साधक की पशुवृत्तियों का शमन होता है और जब उसके चित्त में शुद्धता जाती है, उसके बाद ही इन दीक्षाओं के गुण प्रकट होने लगते हैं और साधक अपने अन्दर सिद्धियों का दर्शन
    कर आश्चर्य चकित रह जाता है। जब कोई श्रद्धा भाव से दीक्षा प्राप्त करता है, तो गुरु को भी प्रसनता होती है,
    कि मैंने
    बीज को उपजाऊ भूमि में ही रोपा है। वास्तव में ही वे सौभाग्यशाली कहे जाते है, जिन्हें जीवन में योग्य गुरु द्वारा ऐसी दुर्लभ दीक्षाएं प्राप्त होती हैं, ऐसे साधकों से तो देवता भी इर्ष्या करते हैं।
               साधनाओं की बात आते ही दस महाविद्या का नाम सबसे ऊपर आता है। प्रत्येक महाविद्या का अपने आप में अलग ही महत्त्व है। लाखों में कोई एक ही ऐसा होता है जिसे सदगुरू से महाविद्या दीक्षा प्राप्त हो पाती है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद सिद्धियों के द्वार एक के बाद एक कर साधक के लिए खुलते चले जाते है। प्रत्येक महाविद्या दीक्षा अपने आप में ही अद्वितीय है,| साधक अपने पूर्व
    जन्म के संस्कारों से प्रेरित होकर या गुरुदेव से निर्देश प्राप्त कर इनमें से कोई भी दीक्षा प्राप्त कर सकते हैं। मात्र एक महाविद्या साधना सफल हो जाने पर ही साधक के लिए सिद्धियों का मार्ग खुल जाता है, और एकएक करके सभी साधनों में सफल होता हुआ वह पूर्णता की ओर अग्रसर हो जाता है। यहां यह बात भी ध्यान देने योग्य है, कि दीक्षा कोई जादू नहीं है,
    कोई मदारी
    का खेल नहीं है, कि बटन दबाया
    और उधर कठपुतली का नाच शुरू हो गया।
    महाकाली
    महाविद्या दीक्षा
    ===================
              यह तीव्र प्रतिस्पर्धा का युग है। आप चाहे या चाहे विघटनकारी तत्व आपके जीवन की शांति, सौहार्द भंग करते ही रहते हैं। एक दृष्ट
    प्रवृत्ति वाले व्यक्ति की अपेक्षा एक सरल और शांत प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के लिए अपमान, तिरस्कार के द्वार खुले ही रहते हैं। आज ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है,
    जिसका कोई शत्रु हो और शत्रु का तात्पर्य मानव जीवन की शत्रुता से ही नहीं, वरन रोग, शोक, व्याधि, पीडा भी मनुष्य के शत्रु
    ही कहे जाते हैं, जिनसे व्यक्ति हर क्षण त्रस्त रहता है और उनसे छुटकारा पाने के लिए टोने टोटके
    आदि के चक्कर में फंसकर
    अपने समय और धन दोनों
    का ही व्यय करता है,
    परन्तु फिर भी शत्रुओं से छुटकारा नहीं मिल पाता।
               महाकाली दीक्षा के माध्यम से व्यक्ति शत्रुओं को निस्तेज एवं परास्त करने में सक्षम हो जाता है, चाहे वह शत्रु आभ्यांतरिक हों या बाहरी, इस दीक्षा के द्वारा उन पर विजय प्राप्त कर लेता है, क्योंकि महाकाली ही मात्र वे शक्ति
    स्वरूपा हैं, जो शत्रुओं का संहार
    कर अपने भक्तों को रक्षा
    कवच प्रदान करती हैं। जीवन में शत्रु
    बाधा एवं कलह से पूर्ण
    मुक्ति तथा निर्भीक होकर विजय प्राप्त करने के लिए यह दीक्षा अद्वितीय है। देवी काली के दर्शन भी इस दीक्षा के बाद ही सम्भव होते है, गुरु द्वारा यह दीक्षा प्राप्त होने के बाद ही कालिदास में ज्ञान
    का स्रोत
    फूटा था,
    जिससे उन्होंने मेघदूत’ , ‘ऋतुसंहार’ जैसे अतुलनीय काव्यों की रचना की, इस दीक्षा से व्यक्ति की शक्ति
    भी कई गुना बढ़ जाती है।
              काली दीक्षा काली के उच्च कोटि के साधक द्वारा ही दी जा सकती है |हर कोई इस दीक्षा को
    नहीं दे सकता |वैसे भी महाविद्याओं में से किसी की भी दीक्षा केवल सम्बंधित
    महाविद्या की तंत्रोक्त साधना करने वाला साधक ही दे सकता है |अतः इस दीक्षा के
    पहले सुनिश्चित होना चाहिए की गुरु वास्तव में काली का सिद्ध साधक है |ऐसा इसलिए
    कहना पड़ रहा है की आजकल सोसल मीडिया आदि पर प्रचार करके दीक्षाएं रेवड़ियों की तरह
    बांटी जा रही हैं ,कैम्प लगाकर दीक्षा दिया जा रहा है ,सार्वजनिक मंचों से बोलकर
    दीक्षाएं दी जा रही हैं ,जो की पूर्णतया गलत है |ऐसे गुरु दीक्षा दे रहे हैं जो
    सम्बंधित महाविद्या की तो बात ही क्या किसी भी महाविद्या के साधक या सिद्ध नहीं है
    |वैदिक कर्मकांडी और प्रवचनकर्ता भी महाविद्या की दीक्षाएं दे रहे हैं |व्यवसायी
    तांत्रिक अथवा भौतिकता में लिप्त गुरु दीक्षा दे रहे हैं |जिससे अक्सर असफलता मिल
    रही है शिष्यों को और वे फिर किसी और का मुंह देखने को विवश हो रहे हैं अथवा उनका
    मोहभंग हो रहा है |इन गुरुओं को तंत्र की अथवा सम्बन्धित महाविद्या साधना की
    तकनिकी जानकारी नहीं होती ,मात्र मंत्र देकर पैसे -दक्षिणा -उपहार लेकर कर्त्तव्य
    की इतिश्री कर लेते हैं |अक्सर अन्य लोगों से दीक्षा प्राप्त साधक हमने मार्गदर्शन
    के लिए सम्पर्क करते हैं जो की गलत है |यह उन्हें पहले ही सोचना चाहिए |अक्सर शाबर
    मंत्र साधक से दीक्षा प्राप्त साधक तंत्रोक्त मंत्र करना चाहते हैं जो की मुश्किल
    हो जाता है |काली दीक्षा प्राप्त साधक अगर श्रद्धा के साथ साधना करे तो उसके समान
    शक्तिशाली कोई नहीं |वह चारो पुरुषार्थों को प्राप्त कर सकता है |देवता उसके
    इच्छाओं को पूर्ण करने को बाध्य होते हैं |उसकी सर्वत्र विजय होती है और उसे कोई
    बाधा प्रभावित नहीं कर सकती |
             
    दस
    महाविद्या में काली प्रथम रूप है। माता का यह रूप साक्षात और जाग्रत है। काली के रूप में माता का किसी भी प्रकार से अपमान करना अर्थात खुद के जीवन को संकट में डालने के समान है। महा दैत्यों का वध करने के लिए माता ने ये रूप धरा था। सिद्धि प्राप्त करने के लिए माता की वीरभाव में पूजा की जाती है। काली माता तत्काल प्रसन्न होने वाली और तत्काल ही रूठने वाली देवी है। अत: इनकी साधना या इनका भक्त बनने के पूर्व एकनिष्ठ और कर्मों से पवित्र होना जरूरी होता है। यह कज्जल पर्वत के समान शव पर आरूढ़ मुंडमाला धारण किए हुए एक हाथ में खड्ग दूसरे हाथ में त्रिशूल और तीसरे हाथ में कटे हुए सिर को लेकर भक्तों के समक्ष प्रकट होने वाली काली माता को नमस्कार। यह काली एक प्रबल शत्रुहन्ता महिषासुर मर्दिनी और रक्तबीज का वध करने वाली शिव प्रिया चामुंडा का साक्षात स्वरूप है, जिसने देवदानव युद्ध में देवताओं को विजय दिलवाई थी। इनका क्रोध तभी शांत हुआ था जब शिव इनके चरणों में लेट गए थे।
               महाकाली दीक्षा में
    अत्यंत आवश्यक तत्व है गुरु का तकनिकी रूप से सक्षम होना और खुद की साधना में
    अत्यंत उच्च स्थान होना ,क्योंकि महाकाली ही वह शक्ति हैं जो कुंडलिनी जाग्रत कर
    सकती हैं साथ ही समस्त उग्र शक्तियाँ एक साथ प्रदान कर सकती हैं |इनकी साधना की
    तकनीकी गलती साधक का वर्त्तमान और भविष्य दोनों नष्ट कर देती है |श्रद्धा और भावना
    से की गयी आराधना एक अलग विषय है जहाँ यह माँ स्वरुप में हानि नहीं करती किन्तु
    साधना की स्थिति आते ही यह कोई गलती क्षमा नहीं करती |जो गुरु तकनीकी दक्ष होगा और
    अपनी साधना में रम कर उच्चावस्था प्राप्त कर रहा होगा वह सामान्यतया दीक्षा में
    रूचि नहीं लेगा क्योंकि उसे सदैव योग्य शिष्य ही चाहिए जो वास्तविक साधना का
    इच्छुक और भौतिकता से अलग मुक्ति की कामना रखता हो |ऐसा शिष्य मिलना मुश्किल है
    ,अतः गुरु बहुत कम लोगों को दीक्षा देता है वह भी कठिन परीक्षा लेकर |
                 बाजार में तो लाखों
    गुरु भरे पड़े हैं किन्तु शिष्य का सौभाग्य होता है सच्चा गुरु पा लेना |सच्चा गुरु
    कभी पैसे नहीं मांगता और उसका कोई शुल्क नहीं होता किन्तु जब वास्तविक गुरु मिल
    जाए तो दीक्षा समय शिष्य को चाहिए की वह गुरु को उतना पूर्ण वस्त्र समर्पित करे
    जितना वह धारण करते हों |कम से २७ दिन के उनके भोजन योग्य सामग्री अथवा मूल्य और
    एक दिन के उनके परिवार के लिए भोजन सामग्री अथवा मूल्य समर्पित करे |दीक्षा समय
    थोड़े फल -फूल और दक्षिणा उनके चरणों में अर्पित करे |२७ दिन का तात्पर्य २७
    नक्षत्र से है जिनमे शिष्य का भोजन करते हुए गुरु का आशीर्वाद प्राप्त हो |बहुत से
    शिष्य पूरे सौर वर्ष अर्थात १२ राशियों के भ्रमण काल के बराबर श्रद्धा अर्पित करते
    हैं जिससे गुरु का आशीर्वाद पूरे सूर्य के सभी ग्रह नक्षत्रों में भ्रमण करने तक
    मिल सके |कम से कम २७ नक्षत्र तो आवश्यक होता है |पहले के समय में शिष्य भिक्षा
    मांगकर लाकर गुरुकुल चलाते थे किन्तु आज भिक्षा का समय तो नहीं पर गुरु आज भी वैसा
    ही है |वास्तविक गुरु जब व्यावसायिक नहीं होता तो उसका जीवन यापन भी शिष्य की
    जिम्मेदारी होता है ,अतः दीक्षा पूरे सामर्थ्य से लेनी चाहिए |
               महाकाली की दीक्षा
    एकाएक नहीं हो सकती |पहले आपको जानना चाहिए की आपकी क्षमताएं क्या हैं ,उद्देश्य
    क्या है ,जरूरते क्या हैं और आपके संस्कार क्या हैं |महाकाली के अनेक रूप और अनेक
    मंत्र हैं |महाकाली की साधना मतलब तकनिकी तंत्र साधना |यहाँ हर कदम गुरु की जरूरत
    है और हर कदम पर ब्रह्मांडीय उर्जा संरचना के वैज्ञानिक तकनिकी सूत्रों का प्रयोग
    है |आपको महाकाली के अपने अनुकूल रूप को जानना समझना चाहिए |श्मशान काली की साधना
    घर में नहीं हो सकती ,कामकला काली की साधना सात्विक भाव से मुश्किल है और दक्षिण
    काली की साधना भावुकता -कोमलता से रोते हुए नहीं हो सकती |इन अंतरों को समझना
    आवश्यक है |काली की साधना में वीर भाव आवश्यक है अतः यह डरपोक ,कायर लोगों के लिए
    नहीं है |इनके हर स्वरुप के गुण भिन्न हैं और तदनुरूप मंत्र हैं |मूलाधार की
    अधिष्ठात्री यह हैं और इनकी सिद्धि से मूलाधार की शक्तियाँ जाग जाती हैं |इनका
    साक्षात्कार होने का मतलब स्वयमेव कुंडलिनी जागरण |इनकी दीक्षा सामान्यतया
    तांत्रिक पद्धतियों से ही होती हैं किन्तु यदि साधक अत्यधिक सात्विक भाव वाला है
    तो गुरु सात्विक पद्धति से भी दीक्षा दे सकता है |इनकी दीक्षा प्राप्ति के लिए
    शिष्य में प्रबल आत्मबल ,साहस ,आत्मविश्वास ,धैर्य तथा गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण
    होना चाहिए |कोशिश यह होनी चाहिए की काली सिद्ध गुरु से दीक्षा प्राप्ति के बाद आप
    किसी भी अन्य गुरु से दीक्षा न लें और उन्ही को आध्यात्मिक भौतिक सभी गुरु बनाएं
    |यदि आपके पहले से गुरु हैं तो बिना गुरु की अनुमति के आप काली की किसी अन्य से
    दीक्षा न लें |इन स्थितियों में व्यतिक्रम उत्पन्न होता है जो समस्याएं दे सकता है
    |
       काली के
    मुख्य शस्त्र त्रिशूल और विशेष तलवार हैं जिसे खड्ग कहा जाता है |दीक्षा हेतु अथवा
    साधना हेतु सर्वोत्तम दिन शुक्रवार ,शनिवार ,कृष्ण चतुर्दशी ,अमावस्या आदि होता है
    | कालिका पुराण ,महाकाल
    संहिता आदि ग्रंथों में इनका विशेष
    उल्लेख मिलता है |काली का मूल बीज क्रीं और क्लीं है जिनके साथ विभिन्न बीजों का संयोजन
    इनके ऊर्जा की भिन्न प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है |
    इनका एक मंत्र : ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा है किन्तु इनके किसी भी मंत्र की साधना बिना गुरु के नहीं की जानी चाहिए |कालीका के प्रमुख तीन स्थान है:- कोलकाता में कालीघाट पर जो एक शक्तिपीठ भी है। मध्यप्रदेश के उज्जैन में भैरवगढ़ में गढ़कालिका मंदिर इसे भी शक्तिपीठ में शामिल किया गया है और गुजरात में पावागढ़ की पहाड़ी पर स्थित महाकाली का जाग्रत मंदिर चमत्कारिक रूप से मनोकामना पूर्ण करने वाला है।
     महाकाली शाबर मन्त्र
    ———————-
    निरंजन निराकार अवगत पुरुष तत सार, तत सार मध्ये ज्योत, ज्योत मध्ये परम ज्योत, परम ज्योत मध्ये उत्पन्न भई माता शम्भु शिवानी काली काली काली महाकाली, कृष्ण वर्णी, शव वाहनी, रुद्र की पोषणी, हाथ खप्पर खडग धारी, गले मुण्डमाला हंस मुखी जिह्वा ज्वाला दन्त काली मद्यमांस कारी श्मशान की राणी मांस खाये रक्तपीपीवे भस्मन्ति माई जहाँ पर पाई तहाँ लगाई सत की नाती धर्म की बेटी इन्द्र की साली काल की काली जोग की जोगीन, नागों की नागीन मन माने तो संग रमाई नहीं तो श्मशान फिरे अकेली चार वीर अष्ट भैरों, घोर काली अघोर काली अजर बजर अमर काली भख जून निर्भय काली बला भख, दुष्ट को भख, काल भख पापी पाखण्डी को भख जती सती को रख, काली तुम बाला ना वृद्धा, देव ना दानव, नर ना नारी देवीजी तुम तो हो परब्रह्मा काली
    काली का मूल मंत्र है – ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं
    क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।

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