Author: Tantra Marg
  • कौन हैं आपके कुलदेवी /देवता ?क्या पूजा पद्धति है आपके कुलदेवता /देवी की ?

    कैसे
    जाने अपने कुलदेवता को ?कैसे उनकी पूजा
    पद्धति बने ?
    =============================
    कुलदेवता और
    कुलदेवी पर हमने बीसियों वर्षों से ध्यान दिया है ,अध्ययन किया है ,समझा है और
    पाया है की लोगों की अधिकतर समस्याओं के पीछे कहीं न कहीं कुलदेवी या देवता की
    भूमिका होती है ,यद्यपि यह स्वयं कोई समस्या नहीं उत्पन्न करते किन्तु इनकी
    निर्लिप्तता से ,इनके रुष्ट होने से या कमजोर होने से पित्र दोष और बाहरी बाधाएं
    ऐसी ऐसी समस्या उत्पन्न करते हैं की व्यक्ति अनेकानेक उलझनों ,दिक्कतों में घिरता
    जाता है |हमने कुलदेवता और देवी से सम्बन्धित लगभग दो दर्जन पोस्ट लिखे हैं
    जिन्हें हमने अपने ब्लॉग और फेसबुक पेजों पर कई वर्ष पहले से प्रकाशित कर रखा है
    |हमारे पेजों और ब्लॉग से हमारे पोस्टों को कापी करते हुए अनेक लोगों ने उस पर
    विडिओ बना यू ट्यूब पर डाला है किन्तु उन्होंने कुलदेवता या कुलदेवी के नाम वाले
    ही पोस्ट उठाये हैं ,अन्य तकनीकियों ,पूजा पद्धति ,सूत्र और सिद्धांत के लेख वह
    नहीं उठा पायें हैं और न ही यह विषय उनके खुद के खोज का है अतः वह समग्र और तकनिकी
    जानकारी नहीं दे पायें हैं |किसी का पोस्ट उठाकर पढ़ते हुए विडिओ बना देना आसान है
    किन्तु तकनीक जानना और वास्तविक भला करना तो केवल खुद के ज्ञान से ही सम्भव है
    |हमारे इसी लेख को की कुलदेवता या देवी का पता कैसे लगाएं ,लोगों ने कापी भी किया
    होगा और हो सकता है विडिओ भी बनाए हों किन्तु जो गंभीर इससे जुडी बातें हम बताने
    जा रहे हैं वह कोई नहीं बता सकता |इस विषय पर एक लेख तो हम भी पहले ही प्रकाशित कर
    चुके हैं किन्तु आज वह बात कहने जा रहे जो आपका वास्तविक भला करेगा और इसे न कोई
    कापी करने वाला बता सकता है न कोई तांत्रिक ,ज्योतिषी ,पंडित या ओझा -गुनिया |
    कुलदेवता या
    देवी को जानना मुश्किल नहीं ,यह तो आसान है इस छोटी सी विधि से भी ,पर असली समस्या
    उसके बाद ही है क्योंकि आप अपने कुलदेवी या देवता को जानकर भी उन्हें खुश नहीं कर
    सकते ,उन्हें नियमतः पूजा नहीं दे सकते जब तक की आपको यह जानकारी न हो जो कुलदेवता
    का पता लगाने की विधि के बाद बताई जायेगी |इसलिए यदि आप अपना वास्तविक भला चाहते
    हैं और सचमुच कुलदेवी /देवता की स्थापना पूजा करना चाहते हैं तो ध्यान से पढ़ें |
    आज के समय में बहुतायत में पाया जा रहा है की लोगों को अपने कुलदेवता/देवी का पता ही नहीं है |वर्षों
    से कुलदेवता
    /देवी को पूजा नहीं मिल रही है |घरपरिवार का सुरक्षात्मक आवरण समाप्त हो जाने से अनेकानेक समस्याएं अनायास
    घेर रही हैं |नकारात्मक उर्जाओं की आवाजाही बेरिक टोक हो रही है |वर्षीं से स्थान
    परिवर्तन के कारण पता ही नहीं है की हमारे कुलदेवता
    /देवी कौन है
    |कैसे उनकी पूजा होती है |कब उनकी पूजा होती है |आदि आदि |इस हेतु एक प्रभावी
    प्रयोग है जिससे यह जाना जा सकता है की आपके कुलदेवता कौन है | यह एक साधारण
    किन्तु प्रभावी प्रयोग है जिससे आप अपने कुलदेवता अथवा देवी को जान सकते हैं |
     प्रयोग को मंगलवार से शुरू करें
    और ११ मंगलवार तक करते रहें
    |मंगलवार
    को सुबह स्नान आदि से स्वच्छ पवित्र हो अपने देवी देवता की पूजा करें |फिर एक
    साबुत सुपारी लेकर उसे अपना कुलदेवता
    /देवी मानकर स्नान
    आदि करवाकर ,उस पर मौली लपेटकर किसी पात्र में स्थापित करें |इसके बाद आप अपनी
    भाषा में उनसे अनुरोध करें की “हे कुल देवता में आपको  जानना चाहता हूँ ,मेरे परिवार से आपका विस्मरण
    हो गया है ,हमारी गलतियों को क्षमा करते हुए हमें अपनी जानकारी दें ,इस हेतु में
    आपका यहाँ आह्वान करता हूँ ,आप यहाँ स्थान ग्रहण करें और मेरी पूजा ग्रहण करते हुए
    अपने बारे में हमें बताएं |इसके बाद उस सुपारी का पंचोपचार पूजन करें |अब रोज रात
    को उस सुपारी से प्रार्थना करें की हे कुल्द्वता
    /देवी में
    आपको जानना चाहता हूँ ,कृपा कर स्वप्न में मार्गदर्शन दीजिये |फिर सुपारी को तकिये
    के नीचे रखकर सो जाइए |सुबह उठाकर पुनः उसे पूजा स्थान पर स्थापित कर पंचोपचार
    पूजन करें |यह क्रम प्रथम मंगलवार से ११ मंगलवार तक जारी रखें |हर मंगलवार को व्रत
    रखें |इस अवधि के दौरान शुद्धता का विशेष ध्यान रखें ,यहाँ तक की बिस्तर और सोने
    का स्थान तक शुद्ध और पवित्र रखें |ब्रह्मचर्य का पालन करें और मांस
    मदिरा से पूर्ण परहेज रखें |  इस प्रयोग की अवधि के अन्दर आपको
    स्वप्न में आपके कुलदेवता
    /देवी की जानकारी मिल जायेगी |अगर खुद न समझ सकें तो योग्य जानकार से
    स्वप्न विश्लेषण करवाकर जान सकते हैं |इस तरह वर्षों से भूली हुई कुलदेवता की
    समस्या हल हो जाएगी और पूजा देने पर आपके परिवार की बहुत सी समस्याएं समाप्त हो
    जायेंगी |
    यह तो हुई कुलदेवता या देवी का पता लगाने की विधि
    किन्तु आप पता लगाकर क्या करेंगे और आज के अनुसार पूजा करके भी क्या करेंगे जब तक
    की आपको अपने वंश -परंपरा के अनुसार होने
    वाली पूजा पद्धति का पता न हों |उस तिथि का पता न हो जिस तिथि पर आपके पूर्वज पूजा
    करते आये थे |आपको कुलदेवता या देवी का नाम पता लग जाए तो भी आपका वास्तविक भला
    नहीं हो सकता जब तक की आपको अपने कुल परंपरा के अनुसार पूजा पद्धति न पता हो | कुलदेवता
    /देवी के बारे में नाम आदि कुछ सिद्ध बता सकते हैं किन्तु आपकी कुलानुसार पूजा
    पद्धति कोई नहीं बता सकता |
    ध्यान दीजिये आप सभी किसी न किसी ऋषि के ही वंशज
    हैं और आपके पूर्वज ऋषि ने अपने अनुकूल ,अपने
    कर्म के अनुकूल ,अपने संस्कारों के अनुकूल कुल देवता या कुलदेवी की स्थापना की थी
    और अपनी संस्कृति और संस्कार के अनुसार पूजा पद्धति बनाई थी जिससे उस कुलदेवता या
    देवी की कृपा उन्ह प्राप्त होती रहे |उदाहरण के लिए हम गौतम ऋषि के वंशजों को लेते
    हैं |गौतम ऋषि जहाँ रहते थे वहां स्थानिक रूप से उपलब्ध सामग्रियों में से
    उन्होंने अपने कुलदेवता के अनुकूल वस्तुओं का चयन कर एक पूजा पद्धति बनाई और पूजा
    शुरू की |फिर अपने से सम्बन्धित सम्बन्धियों के कर्मानुसार चारो कर्म के अनुकूल
    विशेष पूजा पद्धतियाँ बना दी जो उस कुलदेवता या देवी की चार विशिष्ट प्रकार की
    पूजा हो गयी |यह चार प्रकार के कर्म करने वाले ही बाद में जातियों में बदल गए ,किन्तु
    उनके पूजा पद्धति इन्ही चार प्रकारों में से रहे |ध्यान दीजिये गौतम ऋषि सहित सभी
    ऋषियों के गोत्र अन्य जातियों में भी मिलते हैं |ऊँची ,नीची जाती का कोई विशेष अलग
    गोत्र नहीं होता और सभी ऋषियों की ही संतानें हैं |तो अब उस स्थान विशेष पर
    कर्मानुसार एक देवता की चार प्रकार की पूजा हो गयी |कालान्तर में उस स्थान से कुछ
    लोग निकलकर देश -विदेश के अलग स्थानों पर बसे किन्तु उनकी पूजा पद्धति एक ही रही |
    मूल स्थान से दूरी अधिक होने पर और मूल पूजन सामग्री की उपलब्धता न होने पर
    उन्होंने अपने गुरुओं ,श्रेष्ठों से सलाह -मशवरा करके विकल्प के साथ स्थायी पूजा
    पद्धति उस स्थान पर बना ली |अब उस कुल -गोत्र की वह पूजा पद्धति स्थायी हो गयी और
    वह कुलदेवता /देवी के अनुकूल थी |ऐसा ही सभी ऋषियों के वंशजों और कर्म विशेष वाली
    जातियों के साथ हुआ |अब किसी दूर देश में अलग अलग ऋषियों के वंशजों की पूजा
    पद्धतियों में तो भिन्नता हुई ही उनके कुलदेवता या देवी भी अलग अलग हो गए ,इसके
    बाद इनमे से उत्पन्न जातियों के पूजा पद्धति और अलग हो गए जो अपने मूल ऋषि की पूजा
    पद्धति से तो मिलते जुलते थे किन्तु जाति अनुसार आपस में भी और भिन्न ऋषियों के
    वंशजों से भी बिलकुल भिन्न हो गए |इस प्रकार हर कुल -वंश के लिए अलग पूजा पद्धति
    विकसित हो गयी |विशेष पूजा पद्धति के अनुसार कई हजार वर्ष पूजा होते रहने से उनके
    कुलदेवता और देवी उस पूजा पद्धति के अनुकूल रहे |इस पूजा पद्धति में बाद में बदलाव
    नहीं किया जा सकता क्योंकि ऊर्जा प्रकृति बिगड़ने की सम्भावना रहती है |क्या पता
    किसी कुलदेवता कोई कोई चीज नापसंद हो |
             यह भी ध्यान दीजिये कि उस समय सभी वस्तुएं सभी जगहों पर न पैदा होती थी न ही
    उपलब्ध होती थी अतः स्थान विशेष की पूजा पद्धति विशेष होती थी |आज वह स्थिति नहीं
    है ,हर वस्तु हर स्थान पर उपलब्ध हो जा रही है और यह भी आप नहीं कह सकते की कोई
    वस्तु नहीं मिल रही |आपके कुलदेवता सब देख रहे हैं की आप कितने गंभीर हैं और बहाना
    तो नहीं बना रहे |आप सोचिये स्थान स्थान पर अलग अलग ऋषि वंशजों और जातियों की जब
    अलग अलग पूजा पद्धति हो गयी तो एक ही पूजा पद्धति किसी कुलदेवता या देवी के लिए
    कैसे अनुकूल होगी |कोई ज्ञानी ,जानकार ,पंडित आपके कुलदेवता या देवी के बारे में
    तो बता देगा या आप उपर बताई हमारी ही पद्धति से उनके बारे में जान तो जायेंगे पर
    आप पूजा पद्धति कहाँ से लायेंगे ,यह कौन बतायेगा ,क्या क्या उस देवता के अनुकूल है
    आपके वंश परंपरा के अनुसार आप कैसे जानेंगे ,क्या क्या चढ़ाया जाएगा या चढ़ाया जाता
    रहा है यह आप कैसे जानेंगे ,कौन सी तिथि उनकी पूजा के लिए उपयुक्त रही है और आपके
    पूर्वज किस तिथि को उन्हें पूजते रहे हैं आप कैसे जानेंगे |यह सब कोई सिद्ध ,तांत्रिक
    ,पंडित ,पुरोहित ,ज्योतिषी नहीं बता सकता |न ही कोई विधि इसके बारे में बता सकती
    है |कोई जानकार हर कुल -वंश और उनकी परंपरा के बारे नहीं बता सकता अतः मूल पद्धति
    का ,वस्तुओं का पता लगाना कुलदेवता /देवी को जानने से अधिक जरुरी है क्योंकि एक ही
    देवता की वंश -कुल के अनुसार कई तरह की पूजा पद्धतियाँ हो सकती हैं |
    यह कुलदेवता हजारों वर्षों तक विशेष प्रकार की पूजा पाते पाते
    उसके आदी हो चुके होते हैं और यह उनके अनुकूल भी होता है अतः इसमें परिवर्तन नहीं
    किया जा सकता |छोटा सा परिवरतन इन्हें रुष्ट कर देता है |उस समय के ऋषि ज्ञानी थे
    जो कहीं कहीं उन्होंने विकल्प खोज कर स्थान विशेष की पद्धति बना ली किन्तु आज उस
    स्तर का कोई ज्ञानी नहीं मिलता अतः परिवर्तन नहीं किया जा सकता |मूल पूजा पद्धति
    का कोई विकल्प नहीं |हमने खुद इतने वर्षों की खोज के बाद एक पूजा पद्धति विकसित की
    है किन्तु उसे हमने नवरात्र से जोड़ा है क्योंकि हम जानते हैं की मूल पद्धति का कोई
    विकल्प नहीं |जो भी विकल्प बनाए जायेंगे वह उतना लाभ नहीं दे पायेंगे |हमारे बनाए
    पूजा पद्धति को भी कुछ महागुरु लोग हमारे ब्लॉग से और फेसबुक पेज से कापी करके
    फेसबुक या यू ट्यूब पर डाल चुके हैं किन्तु यह लोग हमारे ज्ञान और विशेष तकनीकी
    पद्धति को कहाँ से लायेंगे जो हम अपने विडिओ में प्रकाशित करेंगे या लिखेंगे |कुलदेवता
    या देवी की पूजा पद्धति हम पहले ही इस ब्लॉग पर और फेसबुक पेजों पर प्रकाशित कर
    चुके हैं किन्तु फिर से नए लेख में विस्तार से वह तकनीकियाँ हम शामिल कर रहे जिससे
    लोगों को अधिकतम लाभ मिल सके |धन्यवाद
    ..………………………………………………………………..हरहर महादेव

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  • महामंगलकारी ,सर्वकष्ट निवारक डिब्बी

    सर्वसौख्य प्रदायक ,सर्वदुष्प्रभाव नाशक डिब्बी
    =========================
    ज्योतिष में ,वैदिक पूजन में ,कर्मकांड में और विशेषकर तंत्र में वनस्पतियों और उनकी जड़ों का प्रयोग
    वैदिक काल से होता रहा है ,क्योंकि भिन्न वनस्पति भिन्न ग्रहों
    की रश्मियों /उर्जाओं ,भिन्न अलौकिक शक्तियों ,भिन्न पारलौकिक उर्जाओं को अवशोषित करती है ,उनके गुण रखती है ,उन्हें
    संगृहीत रखती हैं ,उनसे संतृप्त होती है |इसलिए इनका प्रयोग
    ग्रह शान्ति
    ,देवता प्रसन्नता ,दैवीय शक्ति /ऊर्जा प्राप्त करने ,नकारात्मक शक्तियों को हटाने ,अलग अलग शक्तियों को जोड़ने प्राप्त करने ,शारीरिक ऊर्जा आभामंडल को सुधारने और विकसित
    करने ,शारीरिक क्षमता
    प्राप्त करने में हमेशा से होता रहा है |इनके महत्त्व ,इनके विशेषताओं के कारण ही यह हमारे रूचि का केंद्र रहे हैं |तंत्र और ज्योतिष के वर्षों के शोध और अनुभव के बाद हमने कुछ विशेष जड़ी बूटियों और वनस्पतियों को एकसाथ जोडकर अर्थात इकठ्ठा
    रखकर ,उनका पूजन प्राण प्रतिष्ठा अभिमन्त्रण कर प्रभाव का आकलन किया और पाया की यह वनस्पतियाँ और जड़ें अद्भुत चमत्कारी सिद्ध हुईं |इन्हें इनके लिए शास्त्रों में निर्दिष्ट मुहूर्त नक्षत्र में आमंत्रित ,निष्काषित ,प्राण प्रतिष्ठित और अभिमंत्रित किया गया जिससे इनके मौलिक गुण और ग्रह अथवा शक्ति विशेष के लिए सक्रियता बनी रहे और प्रभावी रहें |इनको क्रमशः इनके लिए निर्दिष्ट नियमों के अंतर्गत एकत्र करते हुए पूरे वर्ष भर में इकठ्ठा
    कर ,साथ में रख पुनः महाविद्या के मन्त्रों से अभिमंत्रित किया गया |इसके बाद इनके प्रभाव
    का कलां करने पर पाया गया की यह सभी कष्टों ,बाधाओं ,नकारात्मक शक्तियों को हटाने में ,सभी ग्रहों को शांत करने में ,सब प्रकार से मंगल करने में ,सर्वसौख्य प्रदान
    करने में सक्षम है |
    इस डिब्बी के निर्माण की प्रक्रिया में रविवार
    को आकडे की लकड़ी और जड़ ,बेलपत्र का निचला मोटा भाग [पत्र मूल ],,,सोमवार को पलाश के फूल ,खिरनी की जड़ ,पलाश की लकड़ी ,,,मंगलवार को अनंत मूल की जड़ ,लाल चन्दन का टुकड़ा ,खैर की जड़ ,खैर की लकड़ी ,,,बुधवार को अपामार्ग का पत्ता ,जड़ और लकड़ी ,विधारा की जड़ ,सफ़ेद चन्दन की जड़ या लकड़ी ,दूब ,,,गुरूवार को पीपल की लकड़ी ,पिला चन्दन की जड़ या लकड़ी ,केले की जड़ ,असगंध की जड़ ,कुश की लकड़ी ,,,शुक्रवार को गूलर की जड़ गूलर की लकड़ी ,सरपंखा की जड़ ,सफ़ेद पलाश के फूल ,,,शनिवार को शमी की जड़ ,शमी की लकड़ी ,बिछुआ पौधे की जड़ ,को लाकर उसी दिन में विधिवत
    प्राण प्रतिष्ठित किया जाता है और उस ग्रह के मन्त्रों से प्रतिदिन अभिमंत्रित करके इकठ्ठा करते हुए एक डिब्बी में रखते जाया जाता है ,इसके बाद इनमे मृगशिरा नक्षत्र में निष्कासित महुआ की जड़ ,पुष्य नक्षत्र में निष्कासित नागरबेल की जड़ ,अनुराधा नक्षत्र में निष्कासित चमेली की जड़ ,भरणी नक्षत्र में निष्कासित शंखाहुली की जड़ ,हस्त नक्षत्र में निष्कासित चम्पा की जड़ ,मूल नक्षत्र में पुनः निष्कासित गूलर की जड़ ,माघ नक्षत्र में पुनः निष्कासित पीपल की जड़ ,चित्रा नक्षत्र में निष्कासित गुलाब की जड़ और आर्द्रा नक्षत्र में पुनः निष्कासित अर्क की जड़ को इकठ्ठा रखा दिया जाता है |
    उपरोक्त वनस्पति योग में रवि पुष्य योग में निष्काषित प्राण प्रतिष्ठित महायोगेश्वरी की जड़ ,सफ़ेद आक की जड़ ,धतूरा की जड़ ,दूब की जड़ ,पीपल की जड़ ,आम की जड़ ,बरगद की जड़ ,निर्गुन्डी की जड़ ,सहदेई की जड़ ,बेल का जड़ ,गूलर के पत्ते और जड़ ,नागदौन की जड़ ,हरसिंगार की जड़ ,अपराजिता की जड़ ,हत्था जोड़ी [एक जड़ ],लघु नारियल
    को भी प्राण प्रतिष्ठित कर रखा जाता है ,फिर गुरु पुष्य योग आने पर इसमें उस दिन निष्कासित तथा प्राण प्रतिष्ठित अभिमंत्रित  कुष की जड़ ,केले की जड़ ,पीला चन्दन का जड़ या लकड़ी को भी प्राण प्रतिष्ठित अभिमंत्रित कर इनके साथ मिला दिया जाता है |इस प्रकार इस योग की निर्माण प्रक्रिया पूर्ण होती है |फिर सभी वनस्पतियों और जड़ों से युक्त इस डिब्बी पर बगला ,काली या श्री विद्या
    के मन्त्रों से २१ दिन अभिमन्त्रण कर हवन करके इसे उसमे ढूपित किया जाता है |इस प्रकार
    सभी वानस्पतिक जड़ और पत्रादि युक्त यह योग अद्भुत ,चमत्कारी प्रभाव
    देने वाला हो जाता है |इन्हें
    एकसाथ संयुक्त इकठ्ठा करके इसमें पीला पारायुक्त सिन्दूर डाल दिया जाता है और ऐसी व्यवस्था रखनी होती है की इसमें जल जाए ताकि यह वनस्पतियाँ और जड़ें खराब हों |
    उपरोक्त वनस्पतियों का योग सभी ग्रहों
    का वैदिक रूप से भी और तंत्रोक्त रूप से भी प्रतिनिधित्व करता है |देवताओं देवियों में गणपति ,विष्णु
    ,शिव ,हनुमान ,दत्तात्रेय ,काली ,चामुंडा ,लक्ष्मी ,दुर्गा ,सरस्वती का भी प्रतिनिधित्व करता है |इनके अतिरिक्त अनेक स्थानीय शक्तियों ,यक्षिणीयों का भी प्रतिनिधित्व करता है |इस पर सभी प्रकार के पूजा और मंत्र जप किये जा सकते हैं |इसकी सामान्य पूजा भी किसी भी अन्य पूजा से अधिक लाभप्रद होती है |यह व्यक्ति के साथ ही सम्पूर्ण परिवार को सुखी रखता है |सबके ग्रह पीड़ा ,ग्रह दोष शांत होते हैं |घर की नकारात्मक ऊर्जा का क्षय होता है ,नकारात्मक शक्तियां ,भूत प्रेत घर से पलायन कर जाते हैं |आर्थिक समृद्धि के मार्ग प्रशस्त होते हैं और आय के नए स्रोत उत्पन्न होते हैं |देवताओं की कृपा प्राप्त होती है |प्रतिदिन पूजन में सभी सामग्रियां बाहर ही अर्पित होती हैं मात्र पीला पारायुक्त सिन्दूर ही अन्दर डिब्बी में डाला जाता है |यह सिन्दूर चमत्कारी हो जाता है और इसका तिलक विजयदायी और सम्मोहक होता है |इस डिब्बी पर चामुंडा ,दुर्गा ,काली ,विष्णु ,हनुमान आदि के मंत्र तीव्र प्रभाव
    दिखाते हैं |इस डिब्बी के प्रभाव
    से जीवन के सभी पक्षों
    में उन्नति
    होती है |
    यह योग हमारे वर्षों के खोज का परिणाम है जिसमे पूरे वर्ष सतत दृष्टि वनस्पतियों की खोज और नक्षत्रों योग पर रखनी होती है ||सम्पूर्ण प्रक्रिया पूर्ण होने पर यह डिब्बी
    इतनी प्रभावकारी हो जाती है की जहाँ भी इसे रखा जाता है वहां से सभी प्रकार
    की नकारात्मक ऊर्जा ,नकारात्मक शक्ति ,भूत प्रेत ,टोने टोटके अभिचार
    का प्रभाव
    समाप्त होने लगता है |यदि किसी बुरी शक्ति या ऊर्जा को वचन बद्ध या मंत्र बद्ध करके भेजा गया तो वह ही मजबूरी में वहां टिक पाती है अन्यथा सभी बुरी शक्तियाँ वहां से पलायन कर जाती है |इससे वास्तु
    दोष का शमन होता है ,ग्रह शांत होते हैं ,दैवीय प्रसन्नता होती है ,पित्र दोष का प्रभाव
    कम होने लगता है ,काल सर्प दोष ,मांगलिक दोष जैसे बुरे ग्रह योग का प्रभाव कम होने लगता है |व्यक्ति के आभामंडल की नकारात्मकता कम होने लगती है |मांगलिक कार्यों में रही बाधाएं समाप्त
    होती हैं |पूजा करने वाले में आकर्षण शक्ति का विकास होता है जबकि पूरे घर परिवार
    में सभी को अपने आप लाभ होता है तथा घर परिवार में सुख शांति समृद्धि का विकास होने लगता है ,सबकी उन्नति होने लगती है |
    हमारे यहं निर्मित होने वाली चमत्कारी दिव्य गुटिका से यह डिब्बी इस मामले में अलग है की ,इसका मूल प्रभाव शान्ति कारक है और यह सभी ग्रहों ,वातावरणीय ,अभिचारात्मक प्रभावों को शांत कर उन्हें दूर करती है, जबकि दिव्य गुटिका तीव्र प्रतिक्रया करती है तथा व्यक्ति में परिवर्तन लाती है |दिव्य गुटिका में वानस्पतिक जड़ी बूटियों के साथ जंतु उत्पाद भी होते हैं जबकि यह डिब्बी शुद्ध वनस्पतियों और जड़ों पर आधारित है |इसमें नवग्रहों की बाधा और बुरे योग ,भाग्य अवरोध ,वास्तु दोष ,पित्र दोष को ध्यान में रखते हुए जड़ी बूटियाँ सम्मिलित की गयी हैं जिससे व्यक्ति के साथ समस्त घर और परिवार को समस्या से मुक्ति मिले |चमत्कारी दिव्य गुटिका का निर्माण नकारात्मक शक्तियों को हटाने और व्यावसायिक अथवा व्यक्तिगत उन्नति को दृष्टिगत रखते हुए किया गया है जबकि इस डिब्बी का निर्माण पारिवारिक समृद्धि /सुख ,ग्रह बाधा के साह ही समस्त विघ्नों के नाश को दृष्टिगत रखते हुए किया गया है |इससे सभी प्रकार से सुख मिले ,इसलिए ही इसका नाम हमने सर्वसौख्य प्रदायक डिब्बी रखा है |सभी प्रकार का मंगल हो इसलिए इसका नाम हमने महामंगल दायक डिब्बी रखा है |सभी प्रकार के कष्ट और दुष्प्रभावों का नाश हो इसलिए इसे हम सर्व दुष्प्रभाव नाशक ,सर्व कष्ट निवारक डिब्बी से भी संबोधित कर रहे |यह हमारा व्यक्तिगत शोध है ,जिसपर अनेक पोस्ट हमारे पेजों ,ब्लागों पर आते रहेंगे |किसी अन्य द्वारा इसे अपने नाम से प्रकाशित करना उसके द्वारा पाठकों को धोखा देना होगा |
    इस डिब्बी और योग के पूजन मात्र से घर में
    चोरी की सम्भावना कम हो जाती है
    ,किसी द्वारा पैसे
    हडपे जाने की संभावना कम होती है
    ,रात्रि में बुरे
    सपने नहीं आते
    ,दुष्ट व्यक्ति से भय कम हो जाता है और शत्रु
    भी मित्र बनने लगते हैं
    ,बुरा व्यक्ति भी प्यार करने लगता है ,उच्च लोग वशीभूत होते हैं ,स्त्री पुरुष वश में होते है ,भूत प्रेत बाधा दूर होती है ,दूसरों द्वारा धन
    प्राप्ति की संभावना बढती है
    ,विवाद मुकदमे परीक्षा प्रतियोगिता में विजय मिलती है ,व्यक्ति की समय के साथ अतीन्द्रिय शक्ति का विकास होने लगता है और अचानक
    निकली बातें सच होने लगती हैं
    ,शारीरिक कष्ट में
    कमी आती है
    |सूर्य की अशुभता शांत होती है और पित्र शांत
    होते हैं
    ,व्यक्ति का तेज बढने लगता है ,बल पौरुष की वृद्धि होती है |चन्द्रमा के दुष्प्रभाव शांत होते हैं और शरीर की कान्ति बढती है |मंगल के दोष मांगलिक आदि प्रभाव से हो रही परेशानी कम होने
    लगती है
    ,मांगलिक कार्यों विवाह आदि में आ रही अडचनें दूर होती हैं |बुध की
    अशुभता का प्रभाव कम होता है और उससे उत्पन्न समस्याओं का क्षरण होता है
    |वृहस्पति शांत होता है ,पित्र और विष्णु
    प्रसन्न होते हैं
    |शुक्र के दुस्प्राभावों में कमी आती है और शनि
    जनित समस्या में कमी आने लगती है
    |कालसर्प दोष के
    प्रभाव कम होने लगते हैं
    ,गंभीर और लम्बी बीमारियों से राहत की संभावना
    बढ़ जाती है
    |आकस्मिक दुर्घटनाओं ,अकाल मृत्यु की संभावना कम हो जाती है और इनसे होने वाली परेशानी में कमी
    आ जाती है
    |व्यक्ति का व्यक्तित्व आकर्षक होता है ,आस पास सम्पर्क में आने वाले लोग प्रभावित और
    वशीभूत होते हैं
    |वाणी की ओज बढ़ जाती है |तुतलाहट ,घबराहट ,हीन भावना ,चिंता ,शारीरिक मानसिक
    अवरोध में कमी आने लगती है
    |सुख समृद्धि क्रमशः बढती जाती है |आय के नए स्रोत बनते हैं ,सही समय सही निर्णय
    क्षमता का विकास होता है
    | यह हमारा व्यक्तिगत शोध है जिसे हमने अपने blog ,पर सर्वप्रथम प्रकाशित किया है |……………………………………………………….हर हर महादेव 

    READ MORE: महामंगलकारी ,सर्वकष्ट निवारक डिब्बी
  • सभी तरह के उपाय असफल हों तब प्रयोग करें दिव्य गुटिका /डिब्बी

    जब सब उपाय करके थक जाएँ तब आजमायें दिव्य डिब्बी /गुटिका
    ——————————————————————-
                       समस्या कोई भी हो ,ग्रह बाधा हो ,भाग्यावरोध हो ,वास्तु दोष हो ,स्थान दोष हो ,किये कराये की समस्या हो ,भूत प्रेत की समस्या हो ,नकारात्मक ऊर्जा या शक्ति की समस्या
    हो ,कुलदेवता देवी का पता हो ,कुलदेवता /देवी रुष्ट /क्रोधित हों ,पित्र असंतुष्ट हों ,पित्र शान्ति
    के अनेक उपाय करने /करवाने पर भी कोई अंतर समझ रहा हो ,कालसर्प अथवा मांगलिक दोष आदि ज्योतिषीय दोषों के सभी उपाय करने पर भी कोई विशेष अंतर समझ रह हो और दोषों से सम्बन्धित कष्ट सामने रहे हों |अकाल मृत्यु प्राप्त आत्माओं की समस्या हो ,पारिवारिक समस्या
    हो ,पारिवारिक विघटन हो ,पत्नी पत्नी अथवा परिवार
    के लोगों के बीच लगातार
    कलह ,अनबन का माहौल रहता हो ,आर्थिक
    समस्या हो ,आय व्यय असंतुलन हो ,किसी बाधा के कारण उन्नति
    नहीं हो रही हो ,कार्यों में रुकावट रही हो ,बीमार हों पर रोग का पता चल रहा हो ,गंभीर असाध्य रोग से पीड़ित हों ,बार बार दुर्घटनाओं ,हानि आदि से परेशान हो ,अशांति
    तनाव चिंता हो ,भविष्य असुरक्षित लग रहा हो ,हीन भावना से ग्रस्त हों ,पूजा पाठ असफल हो रहे हों ,उपाय पर उपाय करने पर भी परिणाम
    मिल रहे हों ,उपायों से विश्वास उठ गया हो ,उपाय पर उपाय करके इतना व्यतिक्रम उत्पन्न कर लिया हो की ज्योतिषी की भविष्यवाणी सही उतर रही हो ,नकारात्मक शक्तियों का ऐसा प्रभाव हो की जो भाग्य कुंडली बता रही हो वह मिल रहा हो ,सब तरफ से निराश हो कष्ट दुःख को ही अपनी नियति मान लिए हों जबकि कुंडली में ऐसा हो ,तब ………..जबकि आप बिलकुल
    हताश हो जाएँ तब आजमायें चमत्कारी दिव्य गुटिका /डिब्बी |
                      यह कोई विशेष या एक प्रयोग
    नहीं अपितु अनेकानेक प्रयोगों का आधार है |यहाँ सबकुछ आपको ही करना होगा |किसी पंडित ,ज्योतिषी ,तांत्रिक ,कर्मकांडी की जरूरत है आपको उनकी सहायता से कुछ करना /करवाना है |सबकुछ खुद ही करना होगा और आधार होगा दिव्य डिब्बी ,जिसपर आपको अपनी समस्या के अनुसार प्रयोग /उपाय /पूजा करना होगा |एक समस्या हल हुई आप दुसरे के लिए इसी पर प्रयोग शुरू करेंगे |आधार एक ही रहेगा प्रयोग बदलते रहेंगे उपरोक्त कोई भी समस्या हो |सबकुछ आप करेंगे और परिणाम आपको दिखेगा
    /मिलेगा |इसका प्रयोग तब करेंगे जब और कोई भी उपाय कर रहे हों और सबसे निराश हों |यह एक ऊर्जा पुंज है जिसे आपको दिशा देनी है अपनी समस्या की ओर |दिव्य डिब्बी में चामुंडा /काली /दुर्गा /लक्ष्मी /गणेश आदि तांत्रिक शक्तियों की स्थापना की गयी होती है और यह शुद्ध तांत्रिक दुर्लभ वस्तुओं का संग्रह
    है |इसके निर्माण का उद्देश्य सभी तरह की समस्याओं से मुक्ति पाना ,दैवीय शक्ति को घर में और खुद में प्राप्त करना ,बिन किसी का सहारा लिए अपनी समस्या दैवीय कृपा से हल करना है |यह उन सभी समान्य लोगों के लिए है जो भिन्न भिन्न समस्याओं से पीड़ित हैं तथा जिनको किसी दुसरे द्वारा
    किये उपायों
    से लाभ नहीं मिल पा रहा |यह हमारा व्यक्तिगत शोध है जो ३५ वर्ष के तंत्र जीवन के अनुभव पर हमने निर्मित किया है |इसमें हमने ऐसे दुर्लभ तांत्रिक वस्तुओं और वनस्पतियों ,जड़ी बूटियों को एक साथ सम्मिलित किया है जो लगभग उपरोक्त सभी समस्याएं हल कर सकें और ऐसी ऊर्जा उत्पन्न करें की हर बाधा से मुक्त हो व्यक्ति को उसके भाग्य का पूरा मिल सके |
                        इस चमत्कारी डिब्बी
    में जो वस्तुएं, जड़ी बूटियां ,पदार्थ हमने सम्मिलित की हैं वह विभिन्न महाशक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं तथा जिनके विशेषता के बारे में तंत्र शास्त्र ,ज्योतिष शास्त्र हजारों
    वर्षों से कहता आया है ,मान्यता देता आया है ,जिनका प्रयोग हजारों
    वर्षों से विभिन्न लाभों के लिए ,भिन्न समस्याओं निदान के लिए करता आया है |इन वस्तुओं में दक्षिणावर्ती शंख ,गोमती चक्र ,पीली कौड़ी ,स्फटिक ,हत्था जोड़ी ,सियारसिंगी ,रुद्राक्ष ,अपराजिता मूल ,नागदौन
    मूल ,श्वेतार्क मूल ,गुडमार
    मूल ,हरसिंगार मूल ,औदुम्बर मूल ,महायोगेश्वरी मूल ,निर्गुन्डी मूल ,श्वेत गूंजा ,अमरबेल
    मूल ,एरंड मूल के साथ सात अन्य विशिष्ट वस्तुएं होती हैं |सभी के नाम हम नहीं लिख पा रहे क्योंकि इससे हमारी व्यक्तिगत खोज और गोपनीय अनुसंधान के सार्वजनिक होने पर हमें आर्थिक नुकसान
    भी होगा और हमारा विशेषाधिकार भी प्रभावित होगा |इसका लोग व्यावसायिक उपयोग कर सकते हैं अथवा इसका दुरुपयोग कर सकते हैं ,चुकी यह सभी षट्कर्म मारण ,मोहन ,उच्चाटन ,वशीकरण ,आकर्षण ,शांति कर्म के उद्देश्य पूर्ण करता है | शुरू में हमने इस दिव्य गुटिका
    /डिब्बी में २१ वस्तुओं का संग्रह
    रखा था जिनमे अब अन्य वस्तुएं मिलाकर
    २५ कर दिया गया है |इनसे इसकी उपयोगिता और शक्ति और भी अधिक बढ़ गयी है |यहाँ हम इस डिब्बी की समग्र विशिष्टता लिख रहे ,वस्तुओं की अलग से विशिष्टता जानने के लिए हमारा पूर्व का लेख कैसे चमत्कारी है दिव्य गुटिका /डिब्बी देखें |इस लेख में हम इसका कोई प्रयोग
    भी नहीं दे पा रहे चूंकि लेख बहुत लंबा हो जाएगा |इसके कहाँ कहाँ ,कैसे प्रयोग हो सकते हैं यह जानने के लिए हमारा पूर्व का लेख कहाँ ,कैसे ,कब प्रयोग कर सकते हैं दिव्य गुटिका /डिब्बी देखें |
                         इस गुटिका/डिब्बी
    के उपयोग से धन वृद्धि ,सम्मोहन ,वशीकरण ,वायव्य बाधाओं से सुरक्षा ,शत्रुओं से सुरक्षा ,अभिचार कर्म से सुरक्षा ,संपत्ति संवर्धन ,यात्रा में सुरक्षा ,विवादप्रतियोगिता में सफ़लता ,साक्षात्कार में सफ़लता ,द्युतक्रीडा –शेयर –सट्टा –लाटरी –कमोडिटी के कार्यों में सफलता ,आकस्मिक आय स्रोतों में वृद्धि ,सेल्स मार्केटिंग के कार्यों में सफलता ,घर मकान दूकान के बंधन /तंत्र क्रिया की रोकथाम ,शत्रु से अथवा मुकदमे में विजय ,अधिकारी का अनुकूलन –वशीकरण ,गृह दोषवास्तु दोष का शमन ,जमीन के नीचे की नकारात्मक ऊर्जा शमन ,मकान दूकान व्यावसायिक प्रतिष्ठान की नकारात्मक ऊर्जा या शक्ति का शमन ,गृह कलह का शमन ,ग्रह बाधाअशुभत की समाप्ति ,प्रियजनों का अनुकूलनवशीकरण ,कुलदेवता /देवी की संतुष्टि /प्रसन्नता ,पित्र दोष की शान्ति ,अकाल मृत आत्मा के कष्ट से बचाव ,तांत्रिक अभिचार
    से बचाव ,किये कराये से बचाव ,कालसर्प मांगलिक दोष आदि ग्रह दोषों के दुष्प्रभाव से बचाव ,उन्नति अथवा भाग्य में रही बाधा का शमन किया जा सकता है |किन्ही कारणों
    से पूजा पाठ के परिणाम मिल रहे हों ,घर परिवार में किसी अदृश्य शक्ति का वास हो जो दिक्कत बाधाएं खड़ा कर रहा हो तो उनका भी शमन होता है |नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव से घर परिवार में बीमारियाँ ,दुर्घटनाएं ,अकाल मौतें हो रही हों तो उनकी भी रोकथाम होती है |इसके अतिरिक्त भी यह गुटिका के अनेकानेक और विशिष्ट उपयोग हैं ,जिनके लिए विविध प्रकार की क्रियाएं की जा सकती है ,इसकी क्षमता की कोई सीमा नहीं है ,उद्देश्य के अनुसार भिन्न क्रियाएं विभिन्न मनोकामनाएं पूर्ण कर सकती हैं |यह नैसर्गिक रूप से सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों पर प्रतिक्रया करती है ,चूंकि यह दैवीय शक्ति से सम्पन्न होती है |इससे नकारात्मक उर्जाओं को कष्ट होता है |बहुत तीव्र शक्ति की किसी नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव होने पर इस पर विशेष क्रिया और प्रयोग
    करने हो जाते हैं अन्यथा
    यह सामान्य नकारात्मक प्रभाव
    अपने आप हटाने लगती है |
                  दिव्य गुटिका /डिब्बी पर हम दर्जनों लेख लिख चुके हैं और इस पर किये जाने वाले लगभग २५ तरह के प्रयोग भी हम प्रकाशित कर चुके हैं अपने ब्लागों पर |अलग अलग समस्याओं के लिए अलग अलग प्रयोग ,पद्धति और मंत्र हमने लिखे हैं जिन्हें करके विभिन्न समस्याओं में लाभान्वित हुआ जा सकता है |इतना अवश्य है जो दूसरों
    के सहारे सुखी होना चाहते हों ,जो दूसरों की सहायता से अपना कष्ट हटाना चाहते हों ,जो खुद कुछ करना चाहें ,जो खुद में ईश्वरीय शक्ति की चाहत रखते हों ,जो स्थायी समाधान
    के इच्छुक
    हों उनके लिए यह डिब्बी
    नहीं है ,क्योंकि इस पर पूजा पाठ प्रयोग अनुष्ठान खुद ही करने होंगे |जो लाभ मिलेंगे खुद को मिलेंगे और जो होगा स्थायी होगा |इतनी आपकी क्षमता उतना आप पा सकते हैं |यह तांत्रिक डिब्बी
    है जिसमे स्थापित शक्तियाँ बहुत तीव्र और उच्च स्तर की हैं किन्तु इनके प्रयोग
    सामान्य जन के अनुकूल रखे गए हैं ताकि सभी इसका लाभ उठा सकें |
               तो यदि आप सचमुच परेशान हैं और हर तरह के उपाय से ,पूजा पाठ से ,अनुष्ठान शान्ति आदि से निराश हो चुके हैं तो एक बार इस दिव्य डिब्बी का उपयोग अवश्य करें |एक बार आपका खर्च तो जरुर होगा चूंकि यह एक मूल्यवान संग्रह है और इसमें संगृहीत वस्तुएं दुर्लभ
    मूल्यवान तो होती ही हैं साथ ही इसके निर्माण पर भी बहुत श्रम ,समय ,मूल्य आता है ,,किन्तु यह आपको बार बार विभिन्न समस्याओं /उपायों पर होने वाले खर्च से भी बचाएगा ,आपको लाभ भी खुद को देगा और साथ ही आपकी शक्ति बढाते हुए आपको ही सक्षम बना देगा जिससे आपमें ईश्वरीय ऊर्जा सके |………………………………………………….हर हर महादेव

    READ MORE: सभी तरह के उपाय असफल हों तब प्रयोग करें दिव्य गुटिका /डिब्बी
  • जीवन के सभी समस्याओं में उपयोगी है दिव्य गुटिका /डिब्बी

    जीवन की सभी समस्याओं का निदान है दिव्य डिब्बी
    /गुटिका में
    =================================
          वर्षों वर्ष लोगों की समस्याएं देखते हुए ,उनका पारंपरिक ज्योतिषीय और तांत्रिक निदान बताते हुए हमेशा से हमारे दिमाग में एक बात उभरती रही की ऐसा कुछ हो जो लोगों की सभी समस्याओं का निदान कर सके |भिन्न भिन्न समस्याओं के लिए लोगों को अलग अलग देवी देवता पूजने पड़ें ,अलग अलग उपचार और उपाय समय समय पर करने पड़ें ,किसी समया के लिए बार बार तांत्रिक ,पंडित को खोजना पड़े |कुछ ऐसा हो जो प्रबल शक्तिशाली हो जो तीब्र शक्ति उत्पन्न करे और जो कहीं भी कभी भी ले आया ले जाया जा सके |जो साथ में भी रखा जा सके और जिसे मन्दिर में भी स्थापित किया जा सके |कुछ ऐसा मिले जिससे उत्पन्न ऊर्जा महाशक्तियों का प्रतिनिधित्व करे |जो जीवन की ग्रहों से उत्पन्न समस्याओं से लेकर भूत प्रेत अभिचार तक की मानवीय समस्याओं तक का निदान करने में सक्षम हो |इस हेतु हम लगातार कई वर्षों तक खोज करते रहे और तंत्र की दुर्लभ
    वस्तुओं के एकल और सामूहिक प्रयोग करते रहे ,उनके परिणाम देखते रहे |कई वर्ष के खोज पर हमने विभिन्न तांत्रिक विशिष्ट वस्तुओं ,दुर्लभ तांत्रिक वनस्पतियों ,जड़ी बूटियों को क्रमशः समय समय पर उनके लिए निर्दिष्ट विशिष्ट समय नक्षत्र मुहूर्त में निष्कासित ,प्राण प्रतिष्ठित किया |इसके बाद इन्हें एक साथ मिलाकर एक डिब्बी में एकत्रकर महाविद्या काली के मन्त्रों से अभिमंत्रित किया |निर्मित डिब्बी/गुटिका को हमने चमत्कारी दिव्य गुटिका /डिब्बी नाम दिया ,क्योंकि इससे उत्पन्न ऊर्जा दिव्य ,शक्तिशाली ,चमत्कार करने वाली और जीवन में प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित करने वाली हुई |
              हमारे पास आने वाले अधिकतर लोगों की समस्याएं घर परिवार
    व्यक्ति को प्रभावित कर रही विभिन्न प्रकार की नकारात्मक शक्तियों से सम्बन्धित होती हैं ,जिनमे ग्रहों से उत्पन्न नकारात्मक प्रभाव
    ,वायव्य अथवा भूत प्रेत के प्रभाव ,स्थान दोष ,जमीन मकान के नीचे दबे नकारात्मक शक्ति के प्रभाव ,ब्रहम सती जिन्न खबीस आदि उत्पन्न पीड़ा ,कुलदेवता /देवी की रुष्टता अथवा अनुपस्थिति से उत्पन्न नकारात्मक प्रभाव
    ,ईष्ट अथवा किसी देवता की रुष्टता आदि के होते हैं |अतः सबसे अधिक प्रयास हमारा रहा की हमारी डिब्बी की अवयवों
    में वह वस्तु अधिक हो जो इन नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव को कम कर सके ,इनकी पीड़ा कम कर सके ,देवी देवता की रुष्टता कम कर उन्हें संतुष्टि दे तथा ऐसे ऊर्जा उत्पन्न करे जिससे नकारात्मक शक्तिया ,उर्जाये घर परिवार
    व्यक्ति से दूर हों |हमसे सम्पर्क करने वाले लोगों में दुसरे सबसे अधिक लोगों की संख्या
    पारिवारिक विवाद ,कलह ,दाम्पत्य बाधा ,संतति बाधा ,संतति दोष आदि की रही है |इनके बाद आर्थिक समस्याओं को लेकर लोग अधिक मिलते हैं |इन सभी मूल समस्याओं को लेकर एक साथ संतुलित करने के प्रयास में हमने यह डिब्बी निर्मित की है जिसके हर क्षेत्र में उत्तम परिणाम प्राप्त हुए हैं |यह डिब्बी प्राण प्रतिष्ठित होती है और इसमें देवी शक्ति को स्थापित किया गया होता है जिससे इसी पूजा रोज हर हाल में चाहिए होती है किसी प्राण प्रतिष्ठित मूर्ती की तरह |इसके बाद अगर कोई विशेष उद्देश्य नहीं है तो मात्र सामान्य पूजा से यह जीवन के हर क्षेत्र में क्रिया करता और लाभ देता है |विशेष उद्देश्य होने पर उस उद्देश्य के अनुसार मंत्र और पद्धति के साथ पूजन करने से वह उद्देश्य विशेष रूप से पूर्ण होता है ,साथ ही अन्य क्षेत्र के लाभ तो मिलते ही हैं |उदेश्य विशेष के अनेक विषयों
    पर प्रयोग
    और पद्धति
    हमने अपने blog पर पोस्ट किये हैं जिससे इन्हें कहीं खोजना हो धारक को |
        इस चमत्कारी डिब्बी
    में जो वस्तुएं, जड़ी बूटियां ,पदार्थ हमने सम्मिलित की हैं वह विभिन्न महाशक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं तथा जिनके विशेषता के बारे में तंत्र शास्त्र ,ज्योतिष शास्त्र हजारों
    वर्षों से कहता आया है ,मान्यता देता आया है ,जिनका प्रयोग हजारों
    वर्षों से विभिन्न लाभों के लिए ,भिन्न समस्याओं निदान के लिए करता आया है |इन वस्तुओं में दक्षिणावर्ती शंख ,गोमती चक्र ,पीली कौड़ी ,स्फटिक ,हत्था जोड़ी ,सियारसिंगी ,रुद्राक्ष ,अपराजिता मूल ,नागदौन
    मूल ,श्वेतार्क मूल ,गुडमार
    मूल ,हरसिंगार मूल ,औदुम्बर मूल ,महायोगेश्वरी मूल ,निर्गुन्डी मूल ,श्वेत गूंजा ,अमरबेल
    मूल ,एरंड मूल के साथ सात अन्य विशिष्ट वस्तुएं होती हैं |सभी के नाम हम नहीं लिख पा रहे क्योंकि इससे हमारी व्यक्तिगत खोज और गोपनीय अनुसंधान के सार्वजनिक होने पर हमें आर्थिक नुकसान
    भी होगा और हमारा विशेषाधिकार भी प्रभावित होगा |इसका लोग व्यावसायिक उपयोग कर सकते हैं अथवा इसका दुरुपयोग कर सकते हैं ,चुकी यह सभी षट्कर्म मारण ,मोहन ,उच्चाटन ,वशीकरण ,आकर्षण ,शांति कर्म के उद्देश्य पूर्ण करता है | शुरू में हमने इस दिव्य गुटिका
    /डिब्बी में २१ वस्तुओं का संग्रह
    रखा था जिनमे अब अन्य वस्तुएं मिलाकर
    २५ कर दिया गया है |इनसे इसकी उपयोगिता और शक्ति और भी अधिक बढ़ गयी है |यहाँ हम इस डिब्बी की समग्र विशिष्टता लिख रहे ,वस्तुओं की अलग से विशिष्टता जानने के लिए हमारा पूर्व का लेख कैसे चमत्कारी है दिव्य गुटिका /डिब्बी देखें |इस लेख में हम इसका कोई प्रयोग
    भी नहीं दे पा रहे चूंकि लेख बहुत लंबा हो जाएगा |इसके कहाँ कहाँ ,कैसे प्रयोग हो सकते हैं यह जानने के लिए हमारा पूर्व का लेख कहाँ ,कैसे ,कब प्रयोग कर सकते हैं दिव्य गुटिका /डिब्बी देखें |
              इस डिब्बी पर हमने विभिन्न समस्याओं पर लगभग २५ साधना और प्रयोग अपने डिब्बी
    /गुटिका धारकों के लिए लिखे हैं ,जो हमारे blog पर प्रकाशित हैं ताकि डिब्बी /धारक को कहीं भटकना पड़े और उन्हें जब ,जैसी समस्या आये वह अपने घर में राखी डिब्बी पर ही समस्या से सम्बन्धित प्रयोग कर अपनी समस्या से मुक्त हो सकें |हमने इस पर जीवन बदलने और संघर्ष
    के दिन समाप्त करने के लिए प्रयोग प्रकाशित किया है |,महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए होली का अलग और दीपावली का अलग प्रयोग प्रकाशित किया है |पति वशीकरण ,सर्वजन वशीकरण ,पत्नी प्रेमिका वशीकरण
    ,सर्व जन आकर्षण
    ,त्रैलोक्य मोहन ,विशिष्ट व्यक्ति आकर्षण ,शेयर सट्टा– लाटरी कमोडिटी सफलता ,नकारात्मक ऊर्जा /शक्ति हटाने ,भूत प्रेत अभिचार हटाने जैसे विषयों पर अनेक प्रयोग हमने पोस्ट किये हैं |यह गुटिका
    जीवन के हर क्षेत्र की समस्या से मुक्ति
    दिलाने में सक्षम है |इससे अनेक और कठिन उद्देश्य पूर्ण किये जा सकते हैं बस प्रक्रिया और पद्धति बदल कर जबकि गुटिका या डिब्बी वही रहती है |यह गुटिका या डिब्बी लोगों के लगभग सभी वह कार्य पूर्ण करती है जिसके लिए अलग अलग पूजा जप तप करना पड़ता है या ताबीज कवच जड़ी आदि धारण करना पड़ता है |इसमें सम्मिलित सभी महत्वपूर्ण मूल और वनस्पतियाँ तंत्र के सबसे महत्वपूर्ण और वर्ष के एक दिन ही उपलब्ध
    योग रविपुष्य योग में ही निकाली ,प्राण प्रतिष्ठित और अभिमंत्रित होती हैं |अन्य वस्तुएं भी रविपुष्य योग में ही विशेष तांत्रिक पद्धति से प्राण प्रतिष्ठित और अभिमंत्रित होती हैं जिससे इनके गुण कई गुना बढ़ जाते हैं |इसलिए यह गुटिका जहाँ भी रखी जाती है इसकी प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है वहां की नकारात्मक उर्जाओं पर |केवल सामान्य पूजा मात्र भी इसका उत्तम लाभ दिलाती है जबकि यदि ठीक से पूजा और मंत्र जप किया जाए तो लक्षित
    उद्देश्य की पूर्ती संभव हो जाती है |
           इस गुटिका/डिब्बी
    के उपयोग से धन वृद्धि ,सम्मोहन ,वशीकरण ,वायव्य बाधाओं से सुरक्षा ,शत्रुओं से सुरक्षा ,अभिचार कर्म से सुरक्षा ,संपत्ति संवर्धन ,यात्रा में सुरक्षा ,विवादप्रतियोगिता में सफ़लता ,साक्षात्कार में सफ़लता ,द्युतक्रीडा –शेयर –सट्टा –लाटरी –कमोडिटी के कार्यों में सफलता ,आकस्मिक आय स्रोतों में वृद्धि ,सेल्स मार्केटिंग के कार्यों में सफलता ,घर मकान दूकान के बंधन /तंत्र क्रिया की रोकथाम ,शत्रु से अथवा मुकदमे में विजय ,अधिकारी का अनुकूलन –वशीकरण ,गृह दोषवास्तु दोष का शमन ,जमीन के नीचे की नकारात्मक ऊर्जा शमन ,मकान दूकान व्यावसायिक प्रतिष्ठान की नकारात्मक ऊर्जा या शक्ति का शमन ,गृह कलह का शमन ,ग्रह बाधाअशुभत की समाप्ति ,प्रियजनों का अनुकूलनवशीकरण किया जा सकता है |इसके अतिरिक्त भी यह गुटिका के अनेकानेक और विशिष्ट उपयोग हैं ,जिनके लिए विविध प्रकार की क्रियाएं की जा सकती है ,इसकी क्षमता की कोई सीमा नहीं है ,उद्देश्य के अनुसार भिन्न क्रियाएं विभिन्न मनोकामनाएं पूर्ण कर सकती हैं |यह नैसर्गिक रूप से सभी प्रकार
    की नकारात्मक शक्तियों पर प्रतिक्रया करती है ,चूंकि यह दैवीय शक्ति से सम्पन्न होती है |इससे नकारात्मक उर्जाओं को कष्ट होता है |बहुत तीव्र शक्ति की किसी नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव होने पर इस पर विशेष क्रिया और प्रयोग
    करने हो जाते हैं अन्यथा
    यह सामान्य नकारात्मक प्रभाव
    अपने आप हटाने लगती है |यह भाग्यावरोध दूर कर ,ग्रहों
    के दुष्प्रभाव रोककर व्यक्ति के भाग्य अनुसार परिणाम दिलाने
    में सहायक होती है |
         इस डिब्बी में सम्मिलित वस्तुएं दुकानों में बहुत मूल्यवान नहीं अगर मिल जाएँ तो ,किन्तु
    दुर्लभ होने से शुद्ध ,सही मिलती नहीं जिससे यह बहुमूल्य हो जाती हैं |इसके बाद इनका इनके लिए वर्ष में निश्चित विशेष मुहूर्त में तंत्रोक्त विधि से निष्कासन और प्राण प्रतिष्ठा इसे अमूल्य
    बना देती है ,क्योंकि अगर दुकानों में कोई वस्तु मिल भी जाती है तो वह तांत्रिक प्रयोग
    के लिए कोई महत्त्व नहीं रखती जब तक की उसका निश्चित मुहूर्त में ,निश्चित तंत्रोक्त विधि से निष्कासन और प्राण प्रतिष्ठा हो |प्राण प्रतिष्ठा के बाद इन्हें सम्मिलित रूप में देवी काली के मंत्र से २१ दिनों तक अभिमन्त्रण इसे ऐसा बना देती है जिसको कोई मूल्य नहीं दिया जा सकता |यह सब क्रियाएं विशेष तांत्रिक दक्षता के साथ श्रम और समय की मांग करती हैं जिसके लिए पूर वर्ष प्रयास करना होता है की किस मुहूर्त में कौन सी वस्तु को निकालना है अथवा लाना है ,उसकी क्या पद्धति है |कौन वनस्पति वस्तु कहाँ उपलब्ध
    है खोज कर रखना होता है |इसके बाद निश्चित दिन लेकर तांत्रिक विधि से विशेष समय में प्राण प्रतिष्ठा
    करके सुरक्ष्तित करते हुए जाना होता है
    |प्राण प्रतिष्ठा के बाद वस्तुओं की नियमित
    पूजा सुनिश्चित करनी होती है |इन्हें फिर आवश्यकतानुसार सम्मिलित रूप में अभिमंत्रित किया जाता है |इस प्रकार
    यह बहुत श्रम और दक्षता
    के बाद तैयार होती है |जब इसे घर दूकान अथवा प्रतिष्ठान में स्थापित कर पूजन शुरू होता है तो यह त्वरित
    रूप से सबसे पहले नकारात्मक ऊर्जाओं को प्रभावित करती है |इसके बाद क्रमशः अन्य सभी क्षेत्रों में इसके प्रभाव शुरू होते हैं तथा जीवन के हर क्षेत्र में यह व्यक्ति के भाग्य में नियत परिणाम
    दिलाने में सहायक होती है |………………………………………………………..हर हर महादेव

    READ MORE: जीवन के सभी समस्याओं में उपयोगी है दिव्य गुटिका /डिब्बी
  • महाकाली महाविजय ताबीज [ कवच ]

    महाकाली महाविजय कवच /ताबीज
    ======================
               भगवती महाकाली दस महाविद्याओ में से एक प्रमुख महाविद्या शक्ति और काली कुल की अधिष्ठात्री है ,जिन्हें सृष्टि की मूल शक्ति कहा जाता है और इन्ही से समस्त महाविद्याओं की उत्पत्ति हुई है |समस्त महाविद्यायें ,समस्त शक्तियां इन्ही का विस्तार और स्वरुप हैं |यह वह मूल विद्या हैं जो इस ब्रह्माण्ड में सबकुछ दे सकने में समर्थ हैं |केवल यही वह महाविद्या हैं हैं जिनको शांत करने के लिए शिव को भी पैरों के नीचे आना पड़ता है |यही वह शक्ति हैं जिनके निकलने पर शिव भी शव हो जाते हैं |इनके बिना किसी शक्ति की उत्पत्ति ही संभव नहीं |जब सारे रास्ते बंद हो जाएँ तब यह एकमात्र शक्ति हैं जो सारे रास्ते खोल सकती हैं |जहाँ सभी महाविद्याओं का किसी कार्य विशेष में प्रभाव कम पड़ता है तब उनके साथ काली को ही संयुक्त करना पड़ता है |इन्ही से सृष्टि उत्पन्न होती है और इन्ही में विलीन हो जाती है |सभी महाविद्याओं का कार्यक्षेत्र सृष्टि उत्पत्ति से पालन और विभिन्न समस्याओं का निवारण तक है किन्तु भगवती काली ही वह हैं जो पुनः उत्पन्न कर सकती हैं ,कर्मानुसार स्थान दे सकती हैं यहाँ तक की केवल यही इस भवसागर से मुक्त भी कर सकती हैं अर्थात केवल यही मोक्ष दे सकती हैं |यही मूलाधार की अधिष्ठात्री हैं जिसके बिना न जीवन उत्पन्न हो सकता है न सृष्टि हो सकती है |इन्ही सब कारणों से तांत्रिक समुदाय में मूल उपास्या यही होती हैं और चाहे वैदिक ग्रन्थ हो ,शास्त्र हों ,तांत्रिक हों ,बौद्ध हों ,जैन हो अथवा कोई भी साधना हो ,पद्धति हो ,शास्त्र हों काली हर जगह उपस्थित होती हैं ,स्वरुप और नाम अलग हो सकता है |
             यह पौराणिक ग्रन्थ मार्कंडेय पुराण के सप्तशती में दुर्गा के स्वरूपों में भी हैं जिन्हें वैष्णव , वैदिक और तांत्रिक सभी मानते हैं ,यह ब्रह्म पुराण के दस महाविद्या में भी हैं जो तंत्र का मूल ग्रन्थ में से एक है ,यह सभी आगमों में भी उपस्थित हैं तो इनके बिना निगम भी अधूरे हैं |इनकी उपस्थिति वेदों में भी है तो ज्योतिष में भी है और तंत्र में तो आवश्यक रूप से हैं ही |अन्य महाविद्यायें अथवा दुर्गा के अन्य स्वरुप एक दुसरे के मूल ग्रंथों में कम मिलते हैं पर काली हर जगह अनिवार्य रूप से होती हैं |इसी से इनके प्रभाव को समझा जा सकता है |इने बिना कुंडलिनी जाग्रत नहीं हो सकती क्योकि कुंडलिनी इन्ही के अधीन और इन्ही के क्षेत्र में होती है |इनकी सक्रियता के बिना न कुंडलिनी सक्रीय हो सकती है न तो जीव ही कार्यरत रह सकता है और न ही वह कोई सृष्टि अर्थात संतान ही उत्पन्न कर सकता है |यही श्यामा रूप में पूजित होती हैं ,यही कामाख्या रूप में पूजित होती हैं ,यही दुर्गा रूप में पूजित होती हैं और यही श्री विद्या रूप में भी पूजित होती हैं |यह श्री विद्या के साथ संयुक्त होने पर श्यामा सुंदरी हो जाती हैं ,और रूद्र के साथ जुडकर रुद्रकाली हो जाती हैं |
               महाकाली यन्त्र माता काली का निवास माना जाता है जिसमे वह अपने अंग विद्याओ ,शक्तियों ,देवों के साथ निवास करती है ,अतः यन्त्र के साथ इन सबका जुड़ाव और सानिध्य प्राप्त होता है ,|त्रिकोण इन्ही का यंत्र है जिसके बिना किसी महाविद्या का यन्त्र नहीं बनता अर्थात यह सभी में आवश्यक रूप से उपस्थित होती हैं | कोई भी त्रिकोण स्वतंत्र रूप से इन्ही को व्यक्त करता है जबकि यही त्रिकोण आपस में संयुक्त होकर अन्य महाविद्याओं को प्रकट करने लगता है |काली यन्त्र के अनेक उपयोग है ,यह धातु अथवा भोजपत्र पर बना हो सकता है ,पूजन में धातु के यन्त्र का ही अधिकतर उपयोग होता है ,पर सिद्ध व्यक्ति से प्राप्त भोजपत्र पर निर्मित यन्त्र बेहद प्रभावकारी होता है ,,धारण हेतु भोजपत्र के यन्त्र को धातु के खोल में बंदकर उपयोग करते है ,,जब व्यक्ति स्वयं साधना करने में सक्षम न हो तो यन्त्र धारण मात्र से उसे समस्त लाभ प्राप्त हो सकते है ,..
              भगवती काली की कृपा से व्यक्ति की सार्वभौम उन्नति होती है ,शत्रु पराजित होते है ,सर्वत्र विजय मिलती है ,मुकदमो में विजय मिलती है ,अधिकारी वर्ग की अनुकूलता प्राप्त होती है ,शत्रु का विनाश होने लगता है ,,ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ,व्यक्ति के आभामंडल में परिवर्तन होने से लोग आकर्षित होते है ,प्रभावशालिता बढ़ जाती है ,वायव्य बाधाओं से सुरक्षा होती है ,तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव समाप्त हो जाते है ,सम्मान प्राप्त होता है ,वाद-विवाद में सफलता मिलती है ,प्रतियोगिता आदि में सफलता बढ़ जाती है |किसी भी अभिचार का प्रभाव कम हो जाता है |छोटे मोटे टोटके -नजर प्रभावित नहीं कर पाती |आकर्षण -वशीकरण का प्रभाव बढ़ता है |किसी भी साधना -उपासना में होने वाली त्रुटी का दुष्प्रभाव रुकता है |वायव्य आत्माओं और बाधाओं का शरीर पर प्रभाव कम हो जाता है अथवा समाप्त हो जाता है ,,यह समस्त प्रभाव यन्त्र धारण से भी प्राप्त होते है और साधना से भी ,साधना से व्यक्ति में स्वयं यह शक्ति उत्पन्न होती है ,यन्त्र धारण से यन्त्र के कारण यह उत्पन्न होता है ,अतः आज के समय में यह साधना अथवा यन्त्र धारण बेहद उपयोगी है |
               … जो लोग शत्रु-विरोधी से परेशान है ,अधिकारी वर्ग से परेशान है ,वायवीय बाधाओं से परेशान हो ,नवग्रह पीड़ा से पीड़ित हो ,,जिनके कार्य क्षेत्र में खतरे की संभावना हो ,दुर्घटना की संभावना अधिक हो |स्थायित्व का अभाव हो ,बार बार स्थानान्तरण से परेशान हों ,थक से कार्य न कर पाते हों ,ऊर्जा -उत्साह -शक्ति की कमी हो ,जिन्हें बहुत लोगों को नियंत्रित करना हो उनके लिए यह बहुत उपयोगी है |जो लोग बार-बार रोगादि से परेशान हो ,असाध्य और लंबी बीमारी से पीड़ित हो अथवा बीमारी हो किन्तु स्पष्ट कारण न पता हो |कोई अंग ठीक से कार्य न करता हो |स्वास्थ्य कमजोर हो |नपुंसकता हो अथवा स्त्रियों में स्त्री जन्य समस्या हो ,डिम्भ बन्ने में समस्या हो ,कमर -जाँघों -हड्डियों की समस्या हो ,मोटापे से परेशान हों ,आलस्य हो ,कहीं मन न लगता हो ,चिंता ,तनाव ,डिप्रेसन हो ,पूर्णिमा -अमावस्या को डिप्रेसन अथवा मन का विचलन होता हो उन्हें काली यन्त्र धारण करना चाहिए |
               जिन्हें हमेशा बुरा होने की आशंका बनी रहती हो ,खुद अथवा परिवार के अनिष्ट की सम्भावना लगती हो ,अकेले में भय लगता हो अथवा बुरे स्वप्न आते हों ,कभी महसूस हो की कमरे में अथवा साथ में उनके अलावा भी कोई और है किन्तु कोई नजर न आये |कभी लगे कोई छू रहा है अथवा पीड़ित कर रहा है ,कभी कोई आभासी व्यक्ति दिखे अथवा आत्मा परेशान करे |कभी अर्ध स्वप्न में कोई छाती पर बैठ जाए ,लगे कोई गला दबा रहा है |किसी के साथ कोई शारीरिक सम्बन्ध बनाये किन्तु वह दिखाई न दे अथवा स्वप्न या निद्रा में ऐसा हो |बार -बार स्वप्न में कोई स्त्री -पुरुष दिखे जिससे दिक्कत महसूस हो |आय के स्रोतों में उतार-चढ़ाव से परेशान हो ,ऐसा लगता हो की किसी ने कोई अभिचार किया हो सकता है या लगे की कोई अपना या बाहरी अनिष्ट चाहता है तो ऐसे व्यक्तियों को भगवती काली की साधना -आराधना-पूजा करनी चाहिए साथ ही सिद्ध साधक से बनवाकर काली यंत्र चांदी के ताबीज में धारण करना चाहिए |यदि साधना उपासना न कर सकें तो भी कवच अवश्य पहनना चाहिए |
                यन्त्र निर्माण काली साधक द्वारा ही हो सकता है और इसकी शक्ति साधक की शक्ति पर निर्भर करती है |यन्त्र निर्माण के बाद इसकी तंत्रोक्त प्राण प्रतिष्ठा आवश्यक होती है क्योंकि काली तंत्र की शक्ति हैं |इसके बाद इसका अभिमन्त्रण काली के मूल मंत्र से होता है |अभिमन्त्रण बाद हवन आवश्यक होता है |हवन के बाद इसी हवन के धुएं में चांदी के कवच में यन्त्र को भरकर धूपित भी किया जाता है| यहाँ साधक विशेष की जानकारी के अनुसार कवच में काली की ऊर्जा से सम्बन्धित वस्तुएं भी भरी जाती हैं -जैसे हम विशिष्ट जड़ी -बूटियाँ जो हमारे काली अनुष्ठान के समय अभिमंत्रित होती हैं इनमे यन्त्र के साथ रखते हैं ,हवन भष्म इसमें रखते हैं आदि |यह यन्त्र यदि पूर्ण अभिमंत्रित है तो बेहद शक्तिशाली हो जाता है |इसका परीक्षण उच्च स्तर का साधक कर सकता है अथवा जिन्हें भूत -प्रेत जैसी कोई समस्या हो उसके हाथ में रखते ही इसका प्रभाव मालूम होने लगता है | 
    यन्त्र /कवच धारण से लाभ
    ———————————.
    १. महाकाली की कृपा से व्यक्ति की सार्वभौम उन्नति होती है |स्थायी सम्पत्ति में विशेष वृद्धि होती है और स्थावर सम्पत्ति विषयक मामलों में विशेष सफलता मिलती है |.
    २. शत्रु पराजित होते है ,शत्रु की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है ,उसका स्वयं विनाश होने लगता है |
    ३. ,मुकदमो में विजय मिलती है ,वाद विवाद में सफलता मिलती है |सर्वत्र विजय का मार्ग प्रशस्त होता है |
    ४. कर्मचारी वर्ग की अनुकूलता प्राप्त होती है ,व्यक्तित्व का प्रभाव बढ़ता है |सम्मान प्राप्त होता है ,| आभामंडल की नकारात्मकता समाप्त होती हैं |शरीर का तेज बढ़ता है |
    ५. मानसिक चिंता ,विचलन ,डिप्रेसन से बचाव होता है और राहत मिलती है |,पूर्णिमा -अमावस्या के मानसिक विचलन में कमी आती है |
    ६.किसी अभिचार /तंत्र क्रिया द्वारा अथवा किसी आत्मा आदि द्वारा शरीर को कष्ट मिलने से बचाव होता है |
    ७. पारिवारिक सुख ,दाम्पत्य सुख बढ़ जाता है |पौरुष अथवा काम क्षमता में वृद्धि होती है ,दाम्पत्य जीवन की संतुष्टि बढ़ जाती है |
    ८. नौकरी ,व्यवसाय ,कार्य में स्थायित्व प्राप्त होता है | व्यक्ति के आभामंडल में परिवर्तन होने से लोग आकर्षित होते है ,प्रभावशालिता बढ़ जाती है |
    ९.,वायव्य बाधाओं से सुरक्षा होती है ,पहले से कोई प्रभाव हो तो क्रमशः धीरे धीरे समाप्त हो जाती है |,
    १०. तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव समाप्त हो जाते है ,भविष्य की किसी संभावित क्रिया से सुरक्षा मिलती है |किये -कराये -टोने -टोटके की शक्ति क्रमशः क्षीण होते हुए समाप्त होती है |
    ११. ,परीक्षा ,प्रतियोगिता आदि में सफलता बढ़ जाती है |हीन भावना में कमी आती है ,खुद पर विश्वास बढ़ता है |एकाग्रता बढती है तथा उत्साह ,ऊर्जा में वृद्धि होती है |
    १२. भूत-प्रेत-वायव्य बाधा की शक्ति क्षीण होती है ,क्योकि इसमें से निकलने वाली सकारात्मक तरंगे उनके नकारात्मक ऊर्जा का ह्रास करते हैं और उन्हें कष्ट होता है |,
    १३. उग्र देवी होने से नकारात्मक शक्तियां इनसे दूर भागती हैं और धारक के पास आने से कतराती हैं |किसी वायव्य बाधा का प्रभाव शरीर पर कम हो जाता है |
    १४. मांगलिक ,पारिवारिक कार्यों में आ रही रुकावट दूर होती है |ग्रह बाधाओं का प्रभाव कम होता है |शनि -राहू -केतु के दुष्प्रभाव की शक्ति क्षीण होती है |
    १५. नपुंसकता ,स्त्रियोचित समस्या ,काम उत्साह में कमी ,कार्यक्षमता में कमी दूर होती है |यदि बंधन आदि के कारण संतानहीनता है तो बंधन समाप्त होता है |
    १६. शरीर में सकारात्मक ऊर्जा प्रवाह बढने से आत्मबल और कार्यशीलता में वृद्धि होती है |कोशिका क्षय की दर कम होती है |
    १७. आलस्य ,प्रमाद का ह्रास होता है |व्यक्ति की सोच में परिवतन आता है ,उत्साह में वृद्धि होती है |नया जोश उत्पन्न होता है |
    १८. किसी भी व्यक्ति के सामने जाने पर सामने वाला प्रभावित हो बात मानता है और उसका विरोध क्षीण होता है |,पारिवारिक कलह ,विवाद कम हो जाता है तथा लोगों पर आकर्षक शक्तियुक्त प्रभाव पड़ता है |
    १९. घर -परिवार में स्थित नकारात्मक ऊर्जा की शक्ति क्षीण होती है जिससे उसका प्रभाव कम होने लगता है |पारिवारिक सौमनस्य में वृद्धि होती है |
    २०. जाँघों -कमर के दर्द ,नसों अथवा हड्डियों की समस्या ,लकवा अथवा किसी अंग की कम क्रियाशीलता में सुधार होता है |मोटापे की समस्या ,प्रमाद -आलस्य -उत्साह में कमी -साहस की कमी में राहत मिलती है |
    २१. स्थान दोष ,मकान दोष ,पित्र दोष ,वास्तु दोष का प्रभाव व्यक्ति पर से कम हो जाता है क्योकि अतिरिक्त ऊर्जा का संचार होने लगता है उसमे |
    यह समस्त प्रभाव यन्त्र धारण से भी प्राप्त होते है और साधना से भी |,यन्त्र में उसे बनाने वाले साधक का मानसिक बल ,उसकी शक्ति से अवतरित और प्रतिष्ठित भगवती की पारलौकिक शक्ति होती है जो वह सम्पूर्ण प्रभाव प्रदान करती है जो साधना में प्राप्त होती है |,अतः आज के समय में काली की साधना अथवा यन्त्र धारण बेहद उपयोगी है किन्तु धारणीय यन्त्र का यदि उपयुक्त लाभ प्राप्त करना हो तो ,कम से कम २१ हजार मूल मन्त्रों से अभिमन्त्रण और उपयुक्त मुहूर्त में विधिवत तांत्रिक विधि से प्राण प्रतिष्ठा होना आवश्यक है, अन्यथा मात्र रेखाएं खींचने से कुछ नहीं होने वाला ,जबतक की उन रेखाओं में भगवती को प्रतिष्ठित न किया जाए और उपयुक्त शक्ति न प्रदान की जाए |२१ हजार मन्त्रों से अभिमन्त्रण में खर्च अधिक आता है अतः सामर्थ्य अनुसार 1100 अथवा 11000 मन्त्रों से अभिमंत्रित भी इन्हें कराया जा सकता है ,बस ऊर्जा कुछ कम हो जायेगी इन ताबीज /कवच की |……………………………………………………..हर-हर महादेव

    READ MORE: महाकाली महाविजय ताबीज [ कवच ]
  • कठिन से कठिन कामनाएं पूर्ण करती है दिव्य डिब्बी /गुटिका

    असंभव को सम्भव बनाती है चमत्कारी दिव्य गुटिका
    /डिब्बी 
    =================================
              
    आज के समय में शेयर ,लाटरी ,कमोडिटी ,सट्टा ,कमीशन के कार्य आकस्मिक आय के स्रोत के रूप में विकसित हो चुके हैं |लोग इनके द्वारा आकस्मिक और अधिक आय प्राप्त कर धन प्राप्ति की कामना से इनमे इन्वेस्ट करते रहते हैं अथवा इनका उपयोग करते हैं |किन्तु
    केवल कुछ प्रतिशत ही इसमें सफल हो पाते हैं अन्य के लिए यह स्वप्न
    देखते हुए मृग मरीचिका साबित होता है |कुछ तो इनमे अपनी जमा पूँजी तक गँवा बैठते हैं और कंगाल हो जाते हैं अथवा कर्ज में डूब जाते हैं |कुछ लोग रियल एस्टेट आदि विजनेस
    में इन्वेस्ट करके भी फंस जाते हैं |अधिकतर
    ऐसे लोगों को लगता है की उन्हें आकस्मिक आय होगी ,ज्योतिषी भी उन्हें
    बताता है की उन्हें आकस्मिक आय के योग हैं किन्तु
    फिर भी वह सफल नहीं होते हैं अथवा जितना मिलना चाहिए नहीं मिल पाता है |इसका कारण होता है भाग्य के बाधा कारक कारण ,भाग्य को रोकने वाली विभन्न प्रकार की शक्तियाँ जिनका ग्रहों
    से कोई सम्बन्ध नहीं होता किन्तु वह ग्रह प्रभाव को रोकते और प्रभावित करते हैं |दूसरा कारण होता है की इन कार्यों में लगे लोगों द्वारा समय पर सही निर्णय
    ले पाना ,अथवा उनके व्यक्तित्व की कमियां जिससे वह लोगों को प्रभावित नहीं कर पाते या समय पर उचित ,उपयुक्त कार्य ,निर्णय
    नहीं कर पाते और लाभ नहीं उठा पाते |इनमे भी कुछ हद तक नकारात्मक उर्जाओं का प्रभाव
    होता है |
            
    सामान्यरूप से हर किसी की चाह होती है की लोग उनकी और आकर्षित हों ,देखकर खींचे चले आयें ,जो मिले प्रभावित हो ,जहाँ जाए किसी काम से वहां सफलता मिले ,कहीं किसी समस्यापरेशानी का सामना करना पड़े |हर इंसान के अन्दर यह कामना होती है की उसका व्यक्तित्व ऐसा आकर्षक हो की लोग चुम्बक की तरह खिचे चले आये ,उसका व्यतित्व सम्मोहक हो |हर व्यक्ति पर उसका प्रभाव पड़े ,कार्यव्यवसाय के क्षेत्र के लोग अनुकूल हों ,सफलता मिले ,उन्नति हो |आकस्मिक आय के स्रोत मिलें जिससे अतिरिक्त आय हो और उनका जीवन स्तर उठ सके |यह असंभव नहीं है |यह संभव है तंत्र के माध्यम से |इस हेतु थोड़े से नियम और सावधानी के साथ यदि हमारे द्वारा निर्मित दिव्य गुटिका /डिब्बी का प्रयोग किया जाए |यह गुटिका तंत्र की उन दिव्य चमत्कारी वस्तुओं से परिपूर्ण हैं जो किसी के भी जीवन में चमत्कार कर सकती है |इसकी क्षमता की कोई सीमा नहीं है |इससे वह सबकुछ पाया जा सकता है जो एक सामान्य व्यक्ति की इच्छा होती है ,यद्यपि इसके अनेक अलौकिक प्रयोग भी है ,जो असंभव कार्य भी कर सकते हैं पर उसके लिए इसपर विशिष्ट क्रियाएं करनी होती हैं |कोई क्रिया  भी की जाए और सामान्य पूजा के साथ पवित्रता रखी जाए तो उपरोक्त लाभ मिलते ही हैं |तंत्र जिन वस्तुओं ,पदार्थों को इन सभी कार्यों में उपयोगी
    मानता है उन्हें हमने उनके निश्चित मुहूर्त ,समय ,दिन के अनुसार निष्कासित ,प्राण प्रतिष्ठित ,अभिमंत्रित किया है जिससे तंत्र द्वारा
    बताये गए लाभ प्राप्त किये जा सकें |यह हमारे वर्षों के तंत्र शोध पर आधारित
    है जिसके बहुत ही अच्छे परिणाम मिले हैं |
            
    इस चमत्कारिक दिव्य गुटिका
    के मुख्य अवयव हत्थाजोड़ी और सियार्सिंगी होते है ,जिनके साथ श्वेतार्क ,नागदौन ,महायेगेश्वरी ,एरंड ,अमरबेल ,अपराजिता ,हरसिंगार ,रुद्राक्ष ,गुडमार
    ,दक्षिणावर्ती शंख ,पीली कौड़ी ,गोमती चक्र ,स्फटिक ,आदि विभिन्न २३ अन्य अद्भुत ,विशिष्ट और चमत्कारिक वनस्पतियाँ और वस्तुएं होती हैं ,जो विभिन्न धनात्मक और सकारात्मक शक्तियों जैसे –चामुंडा ,काली ,शिव ,दुर्गा ,गणेश ,लक्ष्मी ,शनि ,वृहस्पति ,विष्णु आदि का प्रतिनिधित्व करते हैं और मिलकर ऐसा अद्भुत
    प्रभाव उत्पन्न करते हैं की यह चमत्कारिक प्रभाव युक्त हो जाती है |यह सभी वस्तुएं विशिष्ट उच्च स्तर के साधक द्वारा विशिष्ट मुहूर्त में प्राणप्रतिष्ठित और अभिमंत्रित होती हैं ,जबकि उपयोग किये गए सामान भी विशिष्ट मुहूर्त में ही विशिष्ट तांत्रिक पद्धति से निष्कासित और प्राप्त किये हुए होते हैं |उपरोक्त वस्तुओं की उपयुक्त और विशिष्ट मुहूर्त में विशिष्ट तांत्रिक साधक द्वारा की गयी तांत्रिक क्रिया के बल पर यह गुटिका अति शक्तिशाली वशिकारकआकर्षक –सुरक्षाप्रदायक ,धनसंमृद्धि प्रदायक हो जाती है |इससे निकलने वाली तरंगे साथ रखने वाले धारक के साथ साथ ही आसपास के लोगों को भी प्रभावित करती हैजिससे धारक को उपरोक्त लाभ मिलने लगते हैं |
            
    इस डिब्बी
    के उद्देश्य विशेष के साथ ,प्रयोग भी विशिष्ट हो जाते हैं |लक्ष्मी प्राप्ति हेतु इस पर लक्ष्मी या कमला के मंत्र जप किये जा सकते है |यह शेयर ,सट्टा ,लाटरी ,कमोडिटी ,मार्केटिंग ,सेल्स से जुड़े लोगों को स्वाभाविक लाभ देती है क्योकि इसमें आकस्मिक आय प्रदान
    करने में सहयोगी tantra वस्तुएं है जो आकर्षण शक्ति बढ़ाने के साथ आय बढाती हैं |नकारात्मक ऊर्जा हटाने के लिए इसपर काली ,चामुंडा ,दुर्गा के मंत्र विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न करते हैं |यह अभिचार हटाने और उसका प्रभाव कम करने का काम करती है |भूतप्रेत ,वायव्य
    बाधाओं को इससे कष्ट होता है और काली ,दुर्गा
    के मंत्र से उनकी शक्ति कम होती है |गणपति मंत्र करने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है |आकर्षण ,वशीकरण मंत्र का जप करने से आकर्षण प्रभाव उत्पन्न होता है |ग्रहण में मंत्र इस पर जपने से इसका प्रभाव और मंत्र का प्रभाव
    दोनों बढ़ते हैं |किसी भी मंत्र की सिद्धि इसके माध्यम से आसान हो जाती है |इस डिब्बी पर किये जा सकने वाले लगभग २५ तरह के विशिष्ट प्रयोग
    हमने अपने blog पर प्रकाशित किये हैं ताकि डिब्बी धारक को कहीं से प्रयोग खोजना पड़े और जब वह चाहें अपने अलग अलग उद्देश्य के अनुसार
    अलग अलग प्रयोग कर सकें |इन प्रयोगों में पत्नी अथवा पति वशीकरण
    प्रयोग ,आकर्षण प्रयोग
    ,होली और दीपावली पर किये जाने वाले महालक्ष्मी प्रयोग ,भूत प्रेत अभिचार नकारात्मक ऊर्जा हटाने के प्रयोग
    ,चामुंडा प्रयोग ,सर्वजन वशीकरण
    प्रयोग आदि मुख्य हैं |
            
    विशेष प्रयोग
    भी हों मात्र सामान्य पूजन होता रहे और नमश्चडिकाये नमः का भी जप थोडा सा होता रहे तो सभी क्षेत्रों में लाभ प्रदान करती है |यदि कुलदेवता /देवी रुष्ट हैं अथवा उन्हें
    पूजा नहीं मिल रही या वह भूल गए हैं तो नवरात्र में इस गुटिका में एक सिक्के को कुलदेवता मानकर और एक सामान्य सुपारी
    अथवा चाँदी की सुपारी पर मौली लपेटकर कुलदेवी मानकर इसमें स्थापित करके रोज सामान्य पूजा होने लगे तो कुलदेवी /देवता की समस्या
    समाप्त हो जाती है |जिन परिवारों में अथवा घरों में किसी भी कारण वश किसी बाहरी शक्ति का प्रवेश हो गया हो और वह कुलदेवता /देवी की अथवा घर की पूजा ले रहा हो जिससे ईष्ट तक पूजाएँ पहुँच रही हों अथवा सभी प्रकार
    के पूजा पाठ व्यर्थ जा रहे हों तो इस डिब्बी /गुटिका पर दुर्गा अथवा काली के मन्त्रों का जप क्रमशः उस बाहरी नकारात्मक शक्ति के प्रभाव को क्षीण करता है और कुछ समय बाद कुलदेवता /देवी को पूजा मिलने लगती है |सभी पूजा पाठ ,उपाय काम करने लगते हैं |किसी ने कहीं से कोई अभिचार किया हो अथवा किसी शक्ति को किसी पर भेजा हो तब इस डिब्बी
    पर दुर्गा
    अथवा काली का नियमित जप करते हुए इसमें चढ़ाए जाने वाले सिन्दूर का तिलक करने से अभिचार
    समाप्त होता है और भेजी गयी शक्ति की ऊर्जा क्षीण होती है |समय क्रम में डिब्बी की शक्ति बढने और परिवार
    से ऊर्जा अधिक जुड़ने पर बाहरी शक्ति का प्रभाव ख़त्म होने लगता है |इसमें चढ़ाये जाने वाले सिन्दूर का तिलक वशीकरण का कार्य करता है और लोग आकर्षित होते हैं |लोगों पर वाशिकारक प्रभाव पड़ता है जिससे वहां भी काम बनते हैं जहाँ उम्मीद
    हो |
            
    इस प्रकार
    यह गुटिका
    /डिब्बी अनेक लाभ देने के साथ घर और व्यक्ति पर से नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है जिससे उसके भाग्य का निर्धारित लाभ मिलता है |विभिन्न नकारात्मक उर्जायं और शक्तियाँ व्यक्ति को समयानुसार उपयुक्त और उचित कार्य करने में बाधा डालती हैं ,परिवार में बीमारी
    ,असंतोष ,लड़ाई झगडे उत्पन्न कर व्यक्ति की उन्नति
    रोकती हैं ,अनावश्यक रोग बीमारी
    आलस्य उत्पन्न कर व्यक्ति को आगे बढने नहीं देती ,व्यक्ति में व्यसन ,दोष आदि उत्पन्न कर उसको  भ्रष्ट कर लक्ष्य से भटका देती हैं |कभी कभी कुछ विरोधी भी नकारात्मक शक्तियों ,उर्जाओं का प्रयोग कर समस्या
    उत्पन्न कर देते हैं |इन सबसे व्यक्ति अपने ही भाग्य का फल नहीं प्राप्त कर पाता है |यह गुटिका
    /डिब्बी इन सभी समस्याओं का समाधान
    करती है और नकारात्मक प्रभावों को हटाती ,है |व्यक्ति की औरा ,प्रभाव
    में परिवर्तन ला उसका व्यक्तित्व आकर्षक बनाती है जिससे उसके लाभ बढ़ जाते हैं |आकस्मिक आय के स्रोत जो मिलने होते हैं वह मिलते हैं ,कोई बाधा उसके भाग्य प्राप्ति में रुकावट नहीं बन पाती |इस प्रकार यह शेयर ,सट्टा ,लाटरी ,कमोडिटी ,दलाली ,रियल एस्टेट ,सेल्स ,मार्केटिंग वालों के लिए बेहद उपयोगी बनती है |यह उनके लिए भी बहुत उपयोगी है जिन्हें लगता है की उनके दूकान ,व्यवसाय को बाँध दिया गया है अथवा किसी तंत्र का प्रयोग किया गया है अथवा कुदृष्टि है |जो लोग नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव से उन्नति
    नहीं कर पा रहे ,घर परिवार में किसी बाधा का प्रकोप है जिससे उनकी उन्नति रुक गयी है उनके लिए यह बहुत अच्छा कार्य करती है |,…………………………………………………….हरहर महादेव

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  • तांत्रिक अभिचार रोकता है बगलामुखी कवच

    तांत्रिक अभिचार रोकता है बगलामुखी कवच

    बगलामुखी यन्त्र से रोके/हटाये भूतप्रेत ,वायव्य बाधा ,नकारात्मक ऊर्जा
    =================================
            भगवती बगलामुखी दस महाविद्याओ में से एक प्रमुख महाविद्या और शक्ति है ,जिन्हें ब्रह्मास्त्र विद्या या शक्ति भी कहा जाता है ,यह परम तेजोमय शक्ति है जिनकी शक्ति का मूलसूत्र ,प्राण सूत्र है ,,प्राण सूत्र ्रत्येक प्राणी में सुप्त अवस्था में होता है जो इनकी साधना से चैतन्य होता है ,इसकी चैतन्यता से समस्त षट्कर्म भी सिद्ध हो सकते है ,,बगलामुखी को सिद्ध विद्या भी कहा जाता है ,मूलतः यह स्तम्भन की देवी है पर समस्त षट्कर्म इनके द्वारा सिद्ध होते है और अंततः यह मोक्ष प्रदान करने में सक्षम है
              बगलामुखी यन्त्र माता बगलामुखी का निवास माना जाता है जिसमे वह अपने अंग विद्याओ ,शक्तियों ,देवों के साथ निवास करती है ,अतः यन्त्र के साथ इन सबका जुड़ाव और सानिध्य प्राप्त होता है ,,यन्त्र के अनेक उपयोग है ,यह धातु अथवा भोजपत्र पर बना हो सकता है ,पूजन में धातु के यन्त्र का ही अधिकतर उपयोग होता है ,पर सिद्ध व्यक्ति से प्राप्त भोजपत्र पर निर्मित यन्त्र बेहद प्रभावकारी होता है ,,धारण हेतु भोजपत्र के यन्त्र को धातु के खोल में बंदकर उपयोग करते है ,,जब व्यक्ति स्वयं साधना करने में सक्षम हो तो यन्त्र धारण मात्र से उसे समस्त लाभ प्राप्त हो सकते है ,..
              बगलामुखी की कृपा से व्यक्ति की सार्वभौम उन्नति होती है ,शत्रु पराजित होते है ,सर्वत्र विजय मिलती है ,मुकदमो में विजय मिलती है ,अधिकारी वर्ग की अनुकूलता प्राप्त होती है ,विरोधी की वाणी ,गति का स्तम्भन होता है ,शत्रु की बुद्धि भ्रस्त हो जाती है ,उसका विनाश होने लगता है ,,ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ,व्यक्ति के आभामंडल में परिवर्तन होने से लोग आकर्षित होते है ,प्रभावशालिता बढ़ जाती है ,वायव्य बाधाओं से सुरक्षा होती है ,तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव समाप्त हो जाते है ,सम्मान प्राप्त होता है ,वादविवाद में सफलता मिलती है ,प्रतियोगिता आदि में सफलता बढ़ जाती है ,भूतप्रेतवायव्य बाधा की शक्ति क्षीण होती है क्योकि इसमें से निकलने वाली सकारात्मक तरंगे उनके नकारात्मक ऊर्जा का ह्रास करते हैं और उन्हें कष्ट होता है ,मांगलिक और उग्र देवी होने से नकारात्मक शक्तियां इनसे दूर भागती हैं ,यह समस्त प्रभाव यन्त्र धारण से भी प्राप्त होते है और साधना से भी ,साधना से व्यक्ति में स्वयं यह शक्ति उत्पन्न होती है ,यन्त्र धारण से यन्त्र के कारण यह उत्पन्न होता है ,यन्त्र में साधक का मानसिक बल ,उसकी शक्ति से अवतरित और प्रतिष्ठित भगवती की पारलौकिक शक्ति होती है जो वह सम्पूर्ण प्रभाव प्रदान करती है जो साधना में प्राप्त होती है ,अतः आज के समय में यह साधना अथवा यन्त्र धारण बेहद उपयोगी है |
                   ताबीज आदि में एक बृहद उर्जा विज्ञानं काम करता है ,जो ब्रह्मांडीय उर्जा संरचना ,क्रिया ,तरंगों ,उनसे निर्मित भौतिक इकाइयों की उर्जा संरचना का विज्ञानं है ,,,इस उर्जा संरचना को ही तंत्र कहा जाता है |इसकी तकनीक प्रकृति की स्वाभाविक तकनीक है ,,,यही तकनीक तंत्र ,योग ,सिद्धि ,साधना में प्रयुक्त की जाती है ,-ताबीज में प्राणी के शारीर और प्रकृति की उर्जा संरचना ही कार्य करती है ,,इनका मुख्या आधार मानसिक शक्ति का केंद्रीकरण और भावना होता है ,,,,प्रकृति में उपस्थित वनस्पतियों और जन्तुओ में एक उर्जा परिपथ कार्य करता है ,मृत्यु के बाद भी इनमे तरंगे कार्य करती है ,,,,इनमे विभिन्न तरंगे स्वीकार की जाती है और निष्कासित की जाती है |जब किसी वास्तु या पदार्थ पर मानसिक शक्ति और भावना को केंद्रीकृत करके विशिष्ट क्रिया की जाती है तो उस पदार्थ से तरंगों का उत्सर्जन होने लगता है ,,,,जिस भावना से उनका प्रयोग जिसके लिए किया जाता है ,वह इच्छित स्थान पर वैसा कार्य करने लगता है,,ताबीज बनाने वाला जब अपने ईष्ट में सचमुच डूबता है तो वह अपने ईष्ट के अनुसार भाव को प्राप्त होता है ,,भाव गहन है तो मानसिक शक्ति एकाग्र होती है ,जिससे वह शक्तिशाली होती है ,यह शक्तिशाली हुई तो उसके उर्जा परिपथ का आंतरिक तंत्र शक्तिशाली होता है और शक्तिशाली तरंगे उत्सर्जित करता है |ऐसा व्यक्ति यदि किसी विशेष समय,ऋतूमॉस में विशेष तरीके से ,विशेष पदार्थो को लेकर अपनी मानसिक शक्ति और मन्त्र से उसे सिद्ध करता है तो वह ताबीज धारक व्यक्ति को उस  भाव की तरंगों से लिप्त कर देता है |यह समस्त क्रिया शारीर के उर्जा चक्र को प्रभावित करती है और तदनुसार व्यक्ति को उनका प्रभाव दिखाई देता है ,साथ ही इनका प्रभाव आस पास के वातावरण पर भी पड़ता है क्योकि तरंगों का उत्सर्जन आसपास भी प्रभावित करता है ……………………..हरहर महादेव
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  • कुंडलिनी तंत्र साधना में प्रवेश कैसे हो ?

    कुंडलिनी तंत्र साधना में प्रवेश
    ====================
    अक्सर हमारे पास युवकों ,युवतियों ,साधकों ,साधिकाओं के फोन ,मेसेज आदि
    आते रहते हैं जिनमें अधिकतर भैरवी साधना के इच्छुक होते हैं ,किन्तु कठिनतम साधना
    पद्धति होने से अधिकतर इसके लिए अयोग्य होते हैं अथवा आसान या भौतिक सुख की
    उपलब्धी के लालच में ही अधिकतर सम्पर्क किये जाते हैं |यद्यपि यह साधना प्रत्येक
    गृहस्थ के योग्य बनाया गया था किन्तु आज के समय में योग्यता और पात्रता इस मार्ग
    में इतनी कठिन और दुर्लभ है की लाखों में कोई एक इस साधना के योग्य होता है |पहले
    के समय में गुरु श्रद्धा और समर्पण पूरी तरह था अतः तब सबके अनुकूल था ,आज श्रद्धा
    ,समर्पण के अभाव से यह साधना कठिनतम की श्रेणी में आ गयी है |
    आज के समय में कुंडलिनी तंत्र साधना सीखना और जानना तो बहुत लोग चाहते हैं
    किन्तु वास्तविक योग्यता और पात्रता अधिकतर के पास नहीं होती साथ ही वास्तविक गुरु
    मिलना तो आज भूसे के ढेर में सुई ढूँढने जैसा है |कोई भी वास्तविक साधक और गुरु
    खुद को कभी व्यक्त नहीं करता और समाज में सामान्य जीवन जीते हुए भी किसी को पता
    नहीं लगने देता की वह कुंडलिनी तंत्र का साधक है |खुद को व्यक्त करने वाले अथवा
    खुद को इस विद्या का गुरु बताने वाले अथवा कैम्प ,शिविर चलाने वाले अधिकतर की चाह
    भौतिक होती है जबकि वास्तविक कुंडलिनी साधक भौतिकता से दूर अपने उद्देश्य पर
    एकाग्र होता है ऐसे में आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं की समाज में दिखावा करने
    वाले गुरु कैसे होंगे और इनका उद्देश्य क्या होगा |इस विद्या को सीखने के इच्छुक
    लोग भी वास्तव में इसमें भौतिकता ,सिद्धि अथवा शक्ति की इच्छा से ही आते हैं जबकि
    यह मोक्ष का मार्ग है और केवल एक प्रतिशत लोग ही इस उद्देश्य से इस क्षेत्र में
    आते हैं ,इसीलिए अधिकतर वास्तविक साधक और गुरु यही कहते रहते हैं की वह इस विद्या
    को नहीं सिखाए या नहीं जानते |यह परीक्षण में नहीं पड़ना चाहते और अपना समय व्यर्थ
    नहीं गंवाना चाहते शिष्यों आदि के चक्कर में |बहुत योग्य शिष्य मिलने पर ही यह उसे
    कुछ बताने को तैयार होते हैं जबकि आज के शिष्यों में धैर्य और समर्पण की नितांत
    कमी देखी जाती है |पहले के समय में इस विद्या के आश्रम और साधना स्थल गुप्त
    स्थानों और जंगलों में होते थे और आज भी कुछेक हैं किन्तु वहां सामान्य लोगों का
    प्रवेश सम्भव नहीं केवल साधना को ही जीवन बना चुके लोगों के लिए वहां स्वीकार्यता
    है |चूंकि मूलतः यह विद्या गृहस्थ के अनुकूल रही अतः इसके साधक आज अधिकतर समाज में
    ही मिलते हैं किन्तु वह इसे गोपनीय रखते हैं क्योंकि समाज इस विद्या के रहस्य को
    समझ नहीं पाता तथा इसे भोग मानता है |धारा के विपरीत चलने वाली साधना को धार्मिक
    वर्ग भी अपने लिए खतरा मानता रहा है अतः इसके सम्बन्ध में भ्रांतियां भी बहुत
    फैलाई गयी हैं तथा इसे ध्रिनास्पद प्रचारित किया गया है |वास्तविकता यह है की यह
    मोक्ष मार्गीय साधना है जो गृहस्थ अपने पारिवारिक दायित्व पूर्ण करते हुए भी अपने
    साथी के साथ साधनारत रहते हुए वह सबकुछ पा सकता है जो एक योगी और सन्यासी पा सकता
    है |
          इस क्षेत्र में प्रवेश भी
    अति कठिन है और साधना तो अत्यंत कठिन है ही |यहाँ हर कार्य धारा के विपरीत है और
    हर क्रिया में आत्मबल की आवश्यकता है |प्रत्येक जीव की प्रवृत्ति इस पृथ्वी पर
    अधोगामी है जिसमें वह जन्म लेकर पृथ्वी पर गिरता है ,जीवन भर पृथ्वी पर गिरता
    -पड़ता रहता है ,पृथ्वी पर ही और पृथ्वी से उत्पन्न तत्वों पर ही अपनी ऊर्जा फेंकता
    रहता है तथा अंततः पृथ्वी पर ही बिखर जाता है |मनुष्य की ऊर्जा की प्रवृत्ति भी
    अधोगामी होती है और इसे भी अपनी ऊर्जा को अधोगामी रखने में ही सुख महसूस होता है
    क्योंकि यह सामान्य प्रकृति है |बलात्कार ,बलात संग ,छेड़छाड़ ,गलत दृष्टि ,विपरीत
    लिंगी के प्रति आकर्षण ,असंतुष्टि आदि सभी के पीछे मनुष्य की यही अधोगामी
    प्रवृत्ति है जिससे वह हमेशा पतित होना चाहता है ,उसे ऊर्जा फेंकने में सुख महसूस
    होता है ,उसकी उर्जा गिरना चाहती है |यह सृष्टि रचना अर्थात नए मनुष्य की उत्पत्ति
    अर्थात संतानोत्पत्ति तक तो ठीक है ,यही इसका उद्देश्य भी होता है किन्तु मनुष्य
    इससे भी अलग इसका दुरुपयोग करता है या इसे यहाँ वहां फेंकता फिरता है ,इसमें उसे
    सुख मिलता है |इस सामान्य प्रवृत्ति के विपरीत जाकर इसे नीचे गिरने से रोक देना हर
    धर्म -सम्प्रदाय में सिद्धि और शक्ति प्राप्ति का स्रोत माना गया है |इसे ही
    ब्रह्मचर्य कहा गया है |सामान्यतया ब्रह्मचर्य का अर्थ संसर्ग विहीन होना माना
    जाता है अर्थात अपनी ऊर्जा को रोक लेना |इससे उर्जा संचित हो शक्ति देती है |हर
    साधना -उपासना में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने को कहा जाता है क्योंकि इससे
    शक्ति प्राप्त होती है जो सिद्धि में सहायक होती है |यही ऊर्जा जब अधोमुखी न होकर
    उर्ध्वमुखी हो जाती है तो कुंडलिनी जाग्रत कर देती है |
      जब सामान्य ब्रह्मचर्य अर्थात
    बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के सामान्य रूप से ऊर्जा पतन को रोक लेने से शक्ति और
    सिद्धि आसान हो जाती है तो सोचिये इस ऊर्जा को तीव्रतम स्थिति तक बढाकर यदि रोक
    दिया जाय तो यह कितनी तीव्र क्रिया करेगी |कुंडलिनी तंत्र साधना इसलिए ही अति कठिन
    है की इस उर्जा को तीव्र करते हुए रोक कर उर्ध्वगामी किया जाता है जिससे सामान्य
    स्थिति की तुलना में कई गुना अधिक शक्ति से ऊर्जा उठती है और चक्रों का भेदन कर
    कुंडलिनी जागरण करती है |वर्षों की साधना ,तपस्या के परिणाम महीनों में मिलते हैं
    और व्यक्ति को भौतिक के साथ ही आध्यात्मिक उपलब्धियां भी शीघ्र ही प्राप्त होती
    हैं |
          इस क्षेत्र में प्रवेश ही
    सबसे कठिन है क्योंकि कोई भी गुरु किसी भी सामान्य व्यक्ति को शिष्य नहीं बनाता
    |वह योग्यता और क्षमता देखता है |हमने अपने अनुभव के आधार पर एक प्रक्रिया बनाई है
    जो किसी किताब में ,किसी शास्त्र में नहीं है और पूरी तरह खुद की सोच और अनुभव की
    देन है |यह प्रक्रिया उन लोगों में योग्यता और क्षमता उत्पन्न करने के लिए है जो
    वास्तव में इस क्षेत्र में प्रवेश करना चाहते हैं |यह प्राथमिक चरण है अपनी ऊर्जा
    बढाने और योग्य बनने का जब तक की गुरु न मिल जाय |हर गुरु और सम्प्रदाय की अलग
    -अलग प्रक्रिया होती है जो वह अपने निर्देशन में कराते हैं किन्तु सभी व्यक्ति की
    क्षमता और योग्यता परखने के बाद ही कुछ सिखाना शुरू करते हैं |इस प्रक्रिया को
    अपनाकर आप योग्य बन सकते हैं |आप गुरु तलाशते रहें तथा बताई जा रही साधना करते
    रहें तो आपमें शक्ति और क्षमता उत्पन्न हो जायेगी और गुरु आपको स्वीकार कर ले इसकी
    सम्भावना बढ़ जायेगी |
           सबसे पहला काम तो यह करें
    की अपने आज्ञा चक्र की तरंगों को नियंत्रित करें अर्थात विचारों को नियंत्रित करें
    |व्यक्ति के विचार गणेश जी के सूंड की तरह हमेशा हिलते डुलते यानी यहाँ वहां भागते
    रहते हैं |इन्हें नियंत्रित किये बिना कोई साधना सफल नहीं हो सकती |आज्ञा चक्र का
    आधिपत्य गणेश जी को प्राप्त है और यही सभी सफलताओं का केंद्र है |इनकी कृपा बिना
    कोई कार्य सफल नहीं हो सकता तो सबसे पहले यहीं से शुरू करना होगा |इसके लिए आप
    ध्यान करें अथवा त्राटक करें |गणपति पर ध्यान करते हुए उन्ही पर एकाग्र हो अपने
    विचारों नियंत्रित और संतुलित करें |यह क्रिया सुबह -सुबह मात्र १५ मिनट करें पूरी
    एकाग्रता से |सुबह का अर्थ सुबह ही है दिन के दस बजे आप सोकर उठते हों तो वह सुबह
    नहीं है |इसे तो
    5 बजे ही करना होगा
    |इस अवधि में आप चाहें तो गणपति का मंत्र जप भी कर सकते हैं |इसके साथ ही आप
    रात्री दस बजे कालिका सहस्त्रनाम का पाठ रोज करें पूरे नियम से |नियम और तरीका के
    साथ सहस्त्रनाम का पाठ हमने अपने पहले के विडिओ में महाकाली की सिद्धि और साधना
    कैसे हो नाम से प्रकाशित कर रखा है आप उसे देख सकते हैं |यह दोनों क्रिया आप
    लगातार १०८ दिन तक अनवरत करें और हाँ सबसे जरुरी बात इस १०८ दिन तक आपको अखंड
    ब्रह्मचर्य का पालन करना है |अगर आप इस अवधि के बीच ब्रह्मचर्य तोड़ते हैं या किसी
    कारण टूटता है तो आपको फिर से १०८ दिन का अखंड ब्रह्मचर्य का पालन दोनों पूजा
    -साधना पद्धति के साथ करना होगा |१०८ दिन की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद आपको
    पुनः १०८ दिन की यही प्रक्रिया दोहरानी है किन्तु यहाँ आपको सुबह के ध्यान में
    निर्विकार होना है या शिव -शक्ति के एकीकृत स्वरुप पर ध्यान करना है |आपका विचार
    निर्विकार हो या शिव शिवा पर केन्द्रित होना चाहिए भटकना नहीं चाहिए |रात के पाठ
    की जगह आप काली के मन्त्रों का जप कम से कम आधा घंटा करेंगे रात १० बजे के बाद और
    हाँ यहाँ आपको पूरी तरह निर्वस्त्र होकर जप करना है बाल बिखेरकर खुद को ही काली या
    भैरव स्वरुप मानते हुए |इस १०८ दिन की प्रक्रिया में भी पूर्ण अखंड ब्रह्मचर्य का
    पालन करना है |
    इन दो चरण की प्रक्रिया पूर्ण करने के बाद आप कुंडलिनी तंत्र साधना में
    प्रवेश के योग्य बन जाए हैं यदि आपमें कोई शारीरिक कमी नहीं है तो |इन चरणों के
    बाद आपका आभामंडल परिवर्तित हो जाएगा |आपका आत्मविश्वास बढ़ जाएगा |आपकी सफल बढ़
    जायेगी जीवन के हर क्षेत्र में |आपमें अतीन्द्रिय शक्ति का उदय होगा और आपमें काली
    की शक्ति आ जायेगी जिससे आपके सोचे हुए कार्यों की सफलता का प्रतिशत बढ़ जाएगा
    |आपकी और आसपास की नकारात्मकता का ह्रास होगा |मूलाधार सशक्त होगा और एकाग्रता बढ़
    जायेगी जिससे याददास्त तो सुधरेगी ही अवचेतन की सक्रियता भी बढ़ जायेगी |आपमें वह
    योग्यता विकसित होगी जो कुंडलिनी तंत्र साधना में आवश्यक है |आपमें यदि गुरु के
    प्रति श्रद्धा और पूर्ण समर्पण की भावना होगी तो आप सफल हो जायेंगे |चूंकि यह
    क्षेत्र जन्म मरण के चक्र से मुक्ति का तो है ही उससे भी आगे पूर्ण मोक्ष का है
    अतः यहाँ गुरु को जब तक खुद को पूर्ण समर्पित नहीं कर देंगे आपकी सफलता संदिग्ध
    होगी |गुरु भांप लेगा आपको और फिर वह अपना सबकुछ नहीं देगा |जितना आपकी श्रद्धा और
    समर्पण होगा उतना ही वह आपको देगा |चूंकि यह क्षेत्र सांसारिक जीवन से जुड़ा है अतः
    गुरु को पूर्ण सांसारिक जीवन समर्पित कर देना होता है और फिर उसके निर्देशों के
    अनुसार चलना होता है तभी पूर्णता सम्भव है |……………………………………………हर हर महादेव 

    READ MORE: कुंडलिनी तंत्र साधना में प्रवेश कैसे हो ?
  • कुंडलिनी तंत्र साधना के नियम

    कुंडलिनी
    तंत्र साधना के नियम  
    ————————————
    . पूर्ण गोपनीयता का ध्यान रखते हुए गुरु के
    निर्देशों का पालन और प्रदत्त मार्ग का अनुसरण आवश्यक तत्व है इस साधना पद्धति में
    |अपने विचार और अपनी बुद्धि का प्रयोग तकनिकी रूप से न करें |
    . स्वयं को भैरव अर्थात शिवांश मानते हुए
    सहयोगिनी को भैरवी अर्थात देवी मानें और पूर्ण श्रद्धा की भावना से पूज्य रूप में
    ही साधना करें |सदैव मन में रहे की भगवती की ही कृपा से उनके ही द्वारा आपको शक्ति
    और साधना में सफलता मिलेगी |
    . किसी भी प्रकार के भोग अथवा पतन के विचार मन
    में नहीं आने चाहिए |
    . गुरु पत्नी ,बहन ,भाई की पत्नी ,पुत्री
    ,पुत्रवधू के साथ कभी न तो साधना होती है न ही कल्पना की जा सकती है |यह सदैव
    ध्यान रखें |
    ५.
    स्वयं को शुद्ध और पवित्र रखें
    |
    आचरण को शुद्ध रखते हुए सत्य बोलना और सभी से विनम्रतापूर्वक मिलना आवश्यक है |
    . स्वयं की दिनचर्या में सुधार करते हुए जल्दी
    उठना और समय पर सोना |प्रातः और संध्या को प्रार्थना -संध्यावंदन करते हुए नियमित
    प्राणायाम ,धारणा और ध्यान का अभ्यास करना चाहिए |
    ७. भैरवी
    साधना कुंडलिनी जागरण साधना है तंत्र मार्ग से अतः कुंडलिनी प्राणायाम अत्यंत
    प्रभावशाली सिद्ध होते हैं |अपने मन और मष्तिष्क को नियंत्रण में रखकर कुंडलिनी
    योग का लगातार अभ्यास स्वास्थ्य और सफलता की द्रृष्टि से उत्तम होता है |
    . संयम और सम्यक नियमों का पालन करते हुए लगातार
    साधना रत अवस्था में भगवती का ध्यान करने से धीरे धीरे कुंडलिनी जाग्रत होने लगती
    है और जब यह जाग्रत हो जाती है तो व्यक्ति पहले जैसा नहीं रह जाता |वह दिव्य पुरुष
    बन जाता है |
    . साधना में रति की अवस्था में स्खलन नहीं होना
    चाहिए |ऐसा होने पर शक्ति जाती रहती है और जिस चक्र तक स्थिति होती है वहीं वापस आ
    जाती है ,अतः इस बात का ध्यान रखें और सावधान रहें |
    १०. कोई भी ऐसा कार्य अथवा क्रिया न करें जो
    अंतरात्मा की दृष्टि में गलत हो अर्थात जिस कार्य के लिए मन कहे की यह नहीं होना
    चाहिए अथवा यह गलत है वह कार्य न करें क्योंकि गलत होने की भावना आना ही पाप का
    बोधक है तथा पाप का प्रायश्चित करना होता है अतः इससे बचें |
    भैरवी चक्र साधना में साधकसाधिकाओं के लिए निर्देश  
    =====================================
    1.किसी भी नारी कि उपेक्षा या अपमान करें।
    2.कन्याओं को देवी का रूप समझकर उनकी पूजा करें।
    3.कन्याओंनारियों की शक्ति पर सहायता एवं रक्षा करें।
    4.पेड़ काटे, कटवाएं।
    5.मदिरापान या मांसाहार केवल साधना हेतु है। इसे व्यसन बनाये।जो मस्तिष्क और विवेक को नष्ट कर दे; उस मदिरापान से भैरव जी कुपित होकर उसका विनाश कर देते है।
    6.भैराविमार्ग की अपनी साधना को गुप्त रखें, किसी को बताएं।
    7.दिन में सामान्य पूजा करें।साधना 9 से 1 बजे तक रात्रि में प्रशस्त हैं।
    8.नवमी एवं चतुर्दशी को भैरवी में स्थित देवी की पूजा करें।
    9.इस मार्ग के आलोचकों से मत उलझे। इस संसार में भांतिभांति के प्राणी रहते है। सब की प्रवृत्ति एवं एवं सोच अलगअलग होती है। तो किसी को इस मार्ग कि ओर प्रेरित करे, ही विरोध करे।
    10.यह प्रयास रखे कि भैरवी सदा प्रसन्न रहे।
    11.यदि वह मांसाहारी नहीं है; तो वानस्पतिक गर्म और कामोत्तेजक पदार्थों का सेवन करें और विजया से निर्मित मद का प्रयोग करें।
    अन्य जानकारियाँ
    11.आसन, वस्त्र लाल होते हैं। एक वस्त्र का प्रयोग करे, जो ढीला हो। कुछ सिले हुए वस्त्र की भी वर्जना करते हैं।
    12.पूजा केवल नवमीचतुर्दशी को होती है। अन्य तिथियों में केवल साधना होती है।
    13.साधना के अनेक स्तर है। यहाँ सामान्य स्तर दिया गया है। भैरवी को सामने बैठाकर देवीरुप कल्पना में मंत्र जप करने से मन्त्र सिद्ध होते है।
    14.मूलाधार के प्लेट के नीचे से खोपड़ी कि जोड़ तक और सिर के चाँद तक में मुख्य चक्र होते है। साधकसाधिका को इस पर जैतून या चमेली के तेल की मालिश करते रहना चाहिए।
    15.इन चक्रों पर नीचे से ऊपर तक होंठ फेरने और चुम्बन लेने से ये शक्तिशाली होते है।
    16.एकदूसरे के आज्ञाचक्र को चूमने से मनासिक शक्ति प्रबल होती है।
    17.चषक (पानपात्र) को सम्हाल कर रखें। इनका दिव्य महत्त्व होता है।
    18.घट हर बार न्य लें, पूराने को विसर्जित कर दें।
    घट के प्रसाद में मध के साथ सुगन्धित पदार्थ और गुलाब केवड़ा जैसे फूलों को रखने का निर्देश मिलता है |
    १२.
    जब कुंडलिनी
    जाग्रत होने लगती है तो पहले व्यक्ति को उसके मूलाधार चक्र में स्पंदन का अनुभव
    होने लगता है |फिर वह कुंडलिनी तेजी से ऊपर उठती है और अगले चक्र पर जाकर रूकती है
    |उसके बाद साधना जारी रहने पर फिर ऊपर उठने लग जाती है और अगले चक्र तक पहुचती है
    |जिस चक्र पर यह रूकती है उसके व् उसके नीचे के चक्रों में स्थित नकारात्मक ऊर्जा
    को हमेशा के लिए नष्ट कर चक्र को स्वच्छ और स्वस्थ कर देती है |
    कुंडलिनी के
    जाग्रत होने पर व्यक्ति सांसारिक विषय भोगों से दूर होने लगता है और उसका रुझान
    अध्यात्म ,पवित्रता ,शुद्धता के साथ रहस्य जानने की और होने लगता है |कुंडलिनी
    जागरण से शारीरिक और मानसिक ऊर्जा बढ़ जाती है और व्यक्ति खुद में शक्ति और सिद्धि
    का अनुभव करने लगता है |कुंडलिनी जागरण के प्रारम्भिक काल में हूँ हूँ की गर्जना
    सुनाई दे सकती है |आँखों के सामने पहले काला ,फिर पीला और बाद में नीला रंग दिखाई
    दे सकता है |साधक को अपना शरीर गुबारे की तरह हवा में उठता अथवा हल्का लग सकता है
    |वह गेंद की तरह अपने स्थान पर ऊपर नीचे उठता गिरता महसूस कर सकता है |ऐसा लग सकता
    है की गर्दन का भाग ऊपर उठ रहा है |उसे सर में शिखा के स्थान पर चींटियाँ चलने का
    अनुभव हो सकता है |सर के उपरी भाग पर दबाव महसूस हो सकता है |सर पर प्रकाश अथवा
    ऊर्जा आती महसूस हो सकती है |रीढ़ में कम्पन महसूस हो सकता है |
    भैरवीसाधना सिद्ध होे जाने पर साधक को ब्रह्माण्ड में गूँज रहे दिव्य मंत्र सुनायी पड़ने लगते हैं,दिव्य प्रकाश दिखने लगता है तथा साधक के मन में दीर्घ अवधि तक कामवासना जागृत नहीं होती साथ ही उसका मन शान्त स्थिर हो जाता है तथा उसके चेहरे पर एक अलौकिक आभा झलकने लगती है ।प्रत्येक साधना में कोईकोई कठिनाई अवश्य होती है भैरवीसाधना में भी जो सबसे बड़ी कठिनाई हैवह है अपने आप को काबू में रखना तथा साधक साधिका का पतित न होना । निश्चय ही गुरुकृपा और निरन्तर के अभ्यास से यह सम्भव हो पाता है ।भैरवीसाधना प्रकारान्तर से शिवशक्ति की आराधना ही है शुद्ध और समर्पित भावसे,गुरुआज्ञानुसार साधक यदि इसको आत्मसात् करें तो जीवन के परम लक्ष्यब्रह्मानंद की उपलब्धि उनके लिए सहज सम्भव हो जाती है ।किन्तु,कलिकाल के करालविकराल जंजाल में फंसे हुए मानव के लिए भैरवीसाधना के रहस्य को समझ पाना अति दुष्कर है यंत्रवत् दिनचर्या व्यतीत करने वाले तथा भोगों की लालसा में रोगोंको पालने वाले आधुनिक जीवनशैली के दास भला इस दैवीय साधना के परिणामों से वैâसे लाभान्वित हो सकते हैं?इसके लिए शास्त्र और गुरुनिष्ठा के साथसाथ गहन आत्मविश्वास भी आवश्यक है
    विशेष –
    उपरोक्त प्रक्रिया एक सामान्य ज्ञान है जो कुंडलिनी तंत्र पर आधारित है ,जबकि
    पूर्ण ज्ञान गुरु सानिध्य में ही संभव है |तंत्र द्वारा कुंडलिनी जागरण हेतु तथा
    विभिन्न प्रकार की अलग -अलग भैरवी साधना मीन कुछ भिन्न प्रक्रियाएं भी अपनाई जाती
    हैं जो अत्यंत गोपनीय और कठिन होती है ,उनका ज्ञान गुरु ही कराता है
    |……………………………………………………………………हर
    हर महादेव

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  • तंत्र में पंचमकार ,क्यों–कब–कैसे

    तंत्र में पंचमकार ,क्योंकबकैसे :

    =========================

    साधारनतया यह विश्वास किया जाता है की मंत्र ,यन्त्रपंचमकार ,जादू ,टोना आदि जिसपद्धति में हो वही तंत्र है |कुछ इस मत के हैं की पंचमकार ही सभी तंत्रों का आवश्यक अंग है |पंचमकार का अर्थ है जिसमे पांच मकार अर्थात पांच  शब्द से शुरू होने वाले अवयव आये यथामांसमदिरामत्स्यमुद्रा और मैथुन |कौलावली निर्णय में यह मत दिया है की मैथुन सेबढ़कर कोई तत्व् नहीं हैइससे साधक सिद्ध हो जाता है ,जबकि केवल मद्य से भैरव ही रहजाता है ,मांस से ब्रह्म ,मत्स्य से महाभैरव और मुद्रा से साधकों में श्रेष्ठ हो जाता है |केवलमैथुन से ही सिद्ध हो सकता है |

    इस सम्बन्ध में कुछ बातें ध्यान देने की हैं |प्रथमपंचामाकारों का सेवन बौद्धों की बज्रयानशाखा में विकसित हुआ |इस परंपरा के अनेक सिद्धबौद्ध एवं ब्राह्मण परंपरा में सामान रूप सेगिने जाते हैं |बज्रयानी चिंतन ,व्यवहार और साधना का रूपांतर ब्राह्मण परंपरा में हुआ ,जिसेवामाचार या वाम मार्ग कहते हैं |अतः पंचमकार केवल वज्रयानी साधना और वाम मार्ग मेंमान्य है |वैष्णवशौर्यशैव ,व् गाणपत्य तंत्रों में पंचमकार को कोई स्थान नहीं मिला |काश्मीरीतंत्र शास्त्र में भी वामाचार को कोई स्थान नहीं है |वैष्णवों को छोड़कर शैव व् शाक्त में कहीं कहींमद्यमांस व् बलि को स्वीकार कर लिया है ,लेकिन मैथुन को स्थान नहीं देते |

     

    वाममार्ग की साधना में भी १७१८ वि सदी में वामाचार के प्रति भयंकर प्रतिक्रिया हुई थी |विशेषकर महानिर्वाण तंत्र ,कुलार्णव तंत्र ,योगिनी तंत्र ,शक्तिसंगम तंत्र आदि तंत्रों मेंपंचाम्कारों के विकल्प या रहस्यवादी अर्थ कर दिए हैं |जैसे मांस के लिए लवण ,मत्स्य के लिएअदरक ,मुद्रा के लिए चर्वनिय द्रव्य मद्य के स्थान पर दूध ,शहद ,नारियल का पानी ,मैथुन केस्थान पर साधक का समर्पण या कुंडलिनी शक्ति का सहस्त्रार में विराजित शिव से मिलन |यद्यपि इन विकल्पों में वस्तु भेद है ,लेकिन महत्वपूर्ण यह है की वामाचार के स्थूल पंचतत्वशक्ति की आराधना के लिए आवश्यक नहीं हैं |लेकिन यह भी सही है की अभी भी अनेकवामाचारी पंचमकरो का स्थूल रूप में ही सेवन करते हैं |अतः शक्ति आराधना के लिए स्थूल रूपमें पंचमकार  तो आवश्यक है  ही उनसे कोई सिद्धि प्राप्त होने की संभावना है सारे पृष्ठभूमिपर दृष्टि डालने पर ज्ञात होता है की मूलतः पंचमकारों के उपयोग की शुरुआत संभवतःआवश्यक तत्व के रूप में नहीं हुई होगी ,अपितु यह तात्कालिक सहजता के अनुसार साधना कोपरिवर्तित करने के लिए हुई होगी |जब यह शुरू हुआ उस परिवेश के अनुसार मांसमदिरा मत्स्य का उपयोग करने वालों के लिए एक साधना पद्धति का विकास हुआ होगा जिसमे यहपदार्थ अनुमान्य किये गए ,सामान्य वैदिक साधनों में मैथुन की वर्जना रहती है जिससे भीअसुविधा महसूस हुई होगी और इसे अनुमन्य कर इसके साथ विशेष विधि और नियमो काविकास किया गया ,साधनाओं में पहले से मुद्रादी का उपयोग होता था इसे सम्मिलित कर लिया गया  कुल मिलाकर एक ऐसी पद्धति विकसित की गयी जिसमे सामान्य जन भी भागीदारी करसकें चूंकि यह जन सामान्य के पारिवारिक और दैनिक जीवन के अनुकूल था अतः इसका बहुततेजी से विकास और विस्तार हुआ ,साथ ही सुधार भी आये और कुछ दोष भी कुछ जगहों परजुड़ते गए किन्तु मूल रूप से यही आवश्यक तत्व नहीं थे ,इनके वैकल्पिक स्वरुप भीसमानांतर थे और ग्राह्य भी हुए |शक्ति साधना के क्रम में शारीरिक ऊर्जा और उग्रता बढ़ाने केसाथ ही दैनिक असुविधा के दृष्टिगत इनका विकास हुआ किन्तु विकल्पों के साथ भी साधना संभव थे और होते भी थे अतः यह कहना की यह आवश्यक तत्व हैं निरर्थक है |………………………………………………………….हरहर महादेव

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