Category: Self Evolution
  • अपनी शक्ति को पहचानो

    अपनी शक्ति को पहचानो

    अपनी आवाज सुनें

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               यदि आप उलझन में हैं ,अनिर्णय का शिकार हैं ,किसी चिंता से परेशान हैं और हल नहीं मिल रहा ,विचारों के झंझावात चल रहे ,खुद को फंसा और पस्त महसूस कर रहे ,उत्साहहीन हो गए हैं ,आलस्य हावी हो गया है ,कोई काम ढंग से नहीं कर पा रहे ,सब कुछ बिगड़ा बिगड़ा सा महसूस हो रहा ,सलाह पर सलाह देने वाले मिल रहे पर निर्णय नहीं कर पा रहे ,खुद को ठीक से न व्यक्त कर पा रहे न साबित कर पा रहे तो आप चुपचाप मौन हो जाइए ,बिलकुल भी न बोलिए ,केवल बहुत जरूरत पर काम भर का बोलिए ,भीड़ और लोगों से हट जाइए ,किसी को कोई प्रतिक्रया मत दीजिये ,न बोलिए न बताइए ,अधिकतम समय अकेले एकांत में रहने की कोशिस कीजिये |कुछ मत कीजिये खुद में विचारों को चलने दीजिये |कुछ ही समय में आपकी उलझन सुलझ जायेगी ,रास्ता मिल जाएगा ,आपकी समस्या हल हो जायेगी |

              आप कहेंगे की ऐसा कैसे हो सकता है की बिना कुछ किये समस्या का हल मिल जाएगा ,बिना किसी सझाव के ,तो सुझाव आपको मिलेगा और रास्ता भी मिलेगा ,किन्तु यह कोई बाहरी नहीं आप खुद को देंगे |शायद आपको जानकारी न हो किन्तु आपके भीतर ही आपके अवचेतन में सारी समस्याओं का हल है ,सदियों -जन्मों की सूचनाएं हैं ,पर आप उसे लेते ही नहीं |यह आपकी थाती है और यह जो सुझाव देगी वह सबसे बेहतर होगी |यह सुझाव के साथ समस्या हल करने की दिशा में काम भी करेगी बशर्ते आप इसकी सुने तो |आपको पता है या नहीं हम नहीं जानते किन्तु आपको हम बताना चाहेंगे की हर जन्म की यादें आपकी आत्मा के साथ अवचेतन रूप में चलती रहती हैं ,चेतन से अवचेतन तक पहुंची हर सूचना जन्मान्तर के हार्ड डिस्क में सुरक्षित होती है |जन्म के समय गर्भ में पिछली यादें मिट जाती हैं और कुछ जन्म के बाद धीरे धीरे समाप्त हो जाती हैं मनुष्य की रासायनिक संरचना के कारण किन्तु इन्हें जब जाग्रत किया जाता है तो इनसे अद्भुत ज्ञान मिलता है |पिछला जन्म देखने वाले यही तो करते हैं आपकी ही यादों को जगाकर आपको पिछला जन्म दिखाते हैं सम्म्फान प्रक्रिया से |

                  जब आप समस्याग्रस्त होते हैं तब सबसे अधिक आपका चेतन मन क्रियाशील होता है और आपके आज के ज्ञान के अनुसार आपको लगातार सुझाव देता रहता है ,आप उसमे उलझे होते हैं पर अक्सर आपको हल नहीं मिलता |इस स्थिति में भी आपका अवचेतन आपको सलाह देने का प्रयास करता है किन्तु आप उसकी सुनते नहीं क्योंकि चेतन से वह दबा होता है |जब आप शांत होकर बैठ जाते हैं तो धीरे धीरे अवचेतन सक्रिय होकर आपको सुझाव और रास्ते देता है क्योंकि उसके पास सदियों का ज्ञान है |इसे ही अंतरात्मा की आवाज भी कहते हैं जो हमेशा सही होता है |याद कीजिये कभी कभी आपके साथ ऐसा होता होगा की किसी कार्य से पहले आपके अंदर से आवाज आती होगी की यह कार्य जरुर होगा या यह कार्य नहीं होगा ,और वह सच होता है |यही है अंतरात्मा की आवाज या अवचेतन की आवाज |यही आपको सुझाव देगा क्या करें क्या न करें और जब आप इसकी सुनने लगेंगे तो आपको खुद में हमेशा सही सलाह मिलेगी |जगाइए खुद की शक्ति और बिना बाधा ,संकट परेशानी सफल होइए |…………………………………………………हर-हर महादेव

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  • १५ मिनट की साधना से ईश्वर मिल सकता है

    १५ मिनट पर्याप्त हैं ईश्वरीय ऊर्जा प्राप्ति हेतु 
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                                                     ईश्वरीय ऊर्जा की प्राप्ति प्रतिदिन के १५ मिनट के प्रयास में हो सकती है |यदि हम ऐसा कहते हैं तो लोगों को आश्चर्य हो सकता है ,हो सकता है कुछ लोग आलोचनात्मक भी हो जाएँ ,क्योकि बहुतेरे वर्षों साधना करते रहते हैं ,घंटों करते रहते हैं किन्तु परिणाम समझ में नहीं आता ,फिर भी स्वयं को सिद्ध समझे हुए होते हैं |ऐसे में वह लोग आलोचना भी कर सकते है ,अथवा कुछ महाज्ञानी जो लम्बे-चौड़े कर्मकांड को ही सिद्धि और साधना के सूत्र मानते हैं वह भी आलोचना कर सकते हैं |किन्तु हम फिर भी कहना चाहेंगे की ईश्वरीय ऊर्जा केवाल १५ मिनट प्रतिदिन के प्रयास से पायी जा सकती है |हम कोई सिद्ध नहीं हैं ,कोई सन्यासी नहीं हैं ,अज्ञानी और बेहद सामान्य श्रद्धालु  हैं किन्तु फिर भी अनुभव किया है, अपने नजदीकियों को अनुभव कराया है कि यदि हम चाहें तो ईश्वरीय ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं केवल थोड़े से गंभीर प्रयास से |सामान्य ईश्वरीय ऊर्जा, जिससे हमारा भौतिक जीवन सुखमय हो सके ,नकारात्मक ऊर्जा हट सके ,सफलता बढ़ सके आदि के लिए बहुत गंभीर साधना करनी पड़े ,तंत्र की गंभीर क्रियाएं करनी पड़े आवश्यक नहीं है | सामान्य ईश्वरीय ऊर्जा कोई भी, कभी भी, कहीं भी प्राप्त कर सकता है ,केवल कुछ सूत्रों ,कुछ नियमों ,कुछ निर्देशों को गंभीरता से पालन करने की जरुरत है |
                                  हम अपने इस पोस्ट में एक ऐसी महत्वपूर्ण, अति तीब्र प्रभावकारी किन्तु बेहद सरल साधना को प्रस्तुत कर रहे हैं ,जिससे किसी को भी ईश्वरीय ऊर्जा की अलौकिकता का आभास हो सकता है |किसी का भी जीवन बदल सकता है |कोई भी ईश्वरीय ऊर्जा प्राप्त कर सकता है ,केवल १५ मिनट के प्रयास से |हमने बहुतों को यह बताया है ,कुछ सफल हुए ,कुछ घबराकर हट गए ,कुछ नियमित न रह पाने से अथवा अत्यंत सरल पद्धति होने से मजाक समझ अविश्वास में छोड़ बैठे |कुछ इसे करके अत्यंत सफल हो गए और खुद को सिद्ध ही मानने लगे |यह है तो बहुत ही छोटा और सरल प्रयोग पर इसकी शक्ति अद्वितीय है |इससे ईश्वरीय ऊर्जा तो निश्चित रूप से प्राप्त होती ही है ,अगर एकाग्रता और लगन बना रहा तो ईश्वर साक्षात्कार अथवा प्रत्यक्षीकरण भी हो जाता है |भूत-भविष्य-वर्तमान के ज्ञान की शक्ति प्राप्त हो सकती है |किसी भी शक्ति की प्राप्ति हो सकती है ,केवल मार्गदर्शन और तकनिकी ज्ञान मिलता रहे |इस प्रयोग में किसी कर्मकांड की ,लम्बे चौड़े पद्धति की ,विशिष्ट पूजा-पद्धति की भी आवश्यकता नहीं है |कोई भी कर सकता है |
    साधना विधि ::–
                     इस साधना को आप किसी भी गणेश चतुर्थी अथवा शुक्लपक्ष के बुधवार से प्रारम्भ कर  ======= सकते हैं | आप नित्यकर्म और स्नान आदि से स्वच्छ हो ,ऊनि लाल अथवा रंगीन आसन पर स्थान ग्रहण करें |भगवान गणेश का एक सुन्दर सा चित्र लें जिसमे उनकी सूंड उनके दाहिने हाथ की और मुड़ी हो [चित्र पहले से लाकर रखे रहें ] |इस चित्र को अपने पूजा स्थान पर स्थापित करें | फिर उनकी स्थापना करें |आप हाथ जोड़कर अपने ध्यान में गणेश जी को लायें और फिर आँखें खोलकर कल्पना द्वारा उस काल्पनिक गणेश जी को धीरे-धीरे लाकर चित्र में स्थापित कर दें और कल्पना करें की गणेश जी ने आकर उस चित्र में अपने को समाहित कर लिया है |अब उनकी विधिवत पूजा कर दें |पूजा आपको रोज सुबह करनी है किन्तु चित्र स्थापना और गणपति की मानसिक प्रतिष्ठा चित्र में एक बार ही करनी है |पूजा में सिन्दूर, लाल फूल और लौंग यथासंभव प्रतिदिन चढ़ाएं |पूजा करने के बाद आप उठ सकते हैं |इस समय इस स्थान पर अगर श्वेतार्क गणपति की भी स्थापना की जाए तो सफलता और बढ़ जायेगी |
                                        अब आपको दिन में किसी भी समय का एक निश्चित समय निश्चित करना है जप आप रोज नियमित उन्हें १५ मिनट का समय दे सकें |यह समय बिलकुल एकांत का होना चाहिए ,कोई आवाज अथवा विघ्न नहीं होनी चाहिए |इसके लिए स्थान आपका शयन कक्ष भी हो सकता है अथवा पूजा स्थान अथवा कोई भी एकांत स्थान |यदि ब्रह्म मुहूर्त में इसे कर सकें तो अति उत्तम है ,अन्यथा आप इसे रात्रीं में सोने के पूर्व भी कर सकते हैं |जब आप समय निश्चित कर लें की अमुक समय आप रोज साधना कर सकते हैं तो फिर उस समय और स्थान में परिवर्तन न हो |इसीलिए आपको जहाँ और जब सुविधा हो एक बार में ही चुनाव कर लें |यदि सुबह कर रहे है पूजा के समय ही तो फिर स्नान की दोबारा आवश्यकता नहीं है अन्यथा रात्री आदि में साधना करने के पूर्व स्नान आदि करके स्वच्छ हो एक ऊनि लाल अथवा रंगीन ऊनि कम्बल अपनी सुविधानुसार स्थान पर बिछाएं |सामने दो फुट की दूरी पर एक स्टूल अथवा आँखों के बराबर ऊँची कोई ऐसी वस्तु रखे जिसपर दीपक रखा जा सके |अब एक घी का दीपक और अगर बत्ती जलाएं |इन्हें गणेश जी को दिखा -समर्पित कर प्रणाम करें और ध्यान से उनके चित्र को देखें |अब उस दीपक को उठाकर अपने साधना स्थल पर लाकर स्टूल पर रखें ,दो अगर बत्ती जलाकर वहां लगायें |अब आसन पर आराम से सुखासन में बैठ जाएँ |आसन के चारो और पहले से सुरक्षा घेरा बनाकर रखें |इसके लिए सिन्दूर-कपूर और लौंग को चूर्णकर घी में मिला गणपति के मंत्र पढ़ते हुए आसन के चारो और घेरा बना दें और भगवान गणेश से प्रार्थना करें की वह आपकी सब प्रकार से सुरक्षा करें |
                                         अब आसन पर बैठ कर अपनी अपलक दृष्टि आपको दीपक की लौ पर जमानी है |दीपक की लौ में नीचे नीले फ्लेम के ठीक ऊपर मध्य भाग पर ध्यान और दृष्टि केन्द्रित करें |मन में सदैव एक ही कल्पना रहे की इस दीपक में भगवान गणेश मुझे दिखेंगे और आशीर्वाद देंगे |मन में प्रबल विशवास रखें की वह जरुर दिखेंगे और मुझे उनकी कृपा प्राप्त होगी |इस अवधि में उपांशु जप चलता है गणपति के मंत्र का |मंत्र का चुनाव आप खुद भी कर सकते हैं किन्तु किसी सिद्ध साधक से मंत्र प्राप्त करने पर मंत्र पहले से उर्जिकृत रहता है और सफलता/सिद्धि जल्दी प्राप्त होती है | सदैव अपने ध्यान को गणेश पर ही केन्द्रित करने का प्रयास होना चाहिए |यद्यपि मन बहुत भटकता है पर कुछ दिन में एकाग्रता आने लगती है और दीपक में आकृतियाँ उभरने लगती हैं ,जिससे रोमांच भी होता है |कभी क्षणों के लिए गणपति भी दिख सकते हैं और भिन्न भिन्न लोग भिन्न भिन्न आकृतियाँ |यह सब अवचेतन के चित्र होते हैं जिन्हें देखकर आप भी हतप्रभ होते रहते हैं ,किन्तु हमेश दिमाग में एक ही निश्चय रखें की हमें गणेश जी स्पष्ट दिखेंगे और आशीर्वाद देंगे |कुछ दिन बाद गणपति की आकृति उभरने लगती है ,क्षणों-क्षणों के लिए ,कभी कुछ कभी कुछ |फिर धीरे धीरे अनवरत प्रयास से गणपति की आकृति स्थायी होने लगती है |यदि जब कभी आपकी एकाग्रता एक मिनट के लिए भी स्थायी हो जाती है अथवा एक मिनट भी गणपति स्थायी होकर रुकते हैं अथवा स्पष्ट दीखते हुए आशीर्वाद मुद्रा में आशीर्वाद देने लगते हैं आपकी साधना सफल होने लगती है |आपको अनेक परिवर्तन स्वतः नजर आने लगते हैं |एक मिनट की आत्म विस्मृति [खुद की सुध भूल जाना ] प्राप्त होते ही आप सिद्धि की शक्ति से साक्षात्कार करने लगते हैं |
                                           गणपति के चित्र का दीपक में स्थायी होना और आशीर्वाद देने का मतलब आप द्वारा उनकी ऊर्जा को वातावरण से बुलाने पर वह आ रही है और उसका सम्बन्ध आपके मष्तिष्क और अवचेतन से बन गया है |आपमें इसके साथ ही आतंरिक रासायनिक परिवर्तन भी होने लगते हैं और वाह्य भौतिक परिवर्तन भी होने लगते हैं ,क्योकि आपके आज्ञा चक्र की तरंगों की प्रकृति बदल जाती है ,उसकी क्रिया तीब्र हो जाती है |आज्ञा चक्र के ईष्ट देव आप पर प्रसन्न होने लगते हैं ,अतः सब और उनके गुणों के अनुसार मंगल ही मंगल होने लगता है |आपकी सोची इच्छाएं पूर्ण होने लगती हैं क्योकि आपकी मानसिक तरंगों में इतनी शक्ति आ जाती है की वह लक्ष्य पर पहुचकर उसे आंदोलित और आपके पक्ष में करने लगती हैं |
                                       जब गणपति की आकृति रोज स्थायी होने लगे तो उसे अधिकतम देर तक स्थायी रखने का प्रयास करें |कुछ दिनों के प्रयास में यह संभव हो सकता है |फिर उन्हें आप अपने मानसिक बल और मन के भावों से घुमाने का प्रयास करें ,अथवा कभी यह हाथ कभी वह हाथ उठायें ,कभी उन्हें घुमाने का प्रयास करें |एकाग्रता, लगन और निष्ठां से यह भी संभव हो जाएगा |,उनके घुमते ही आपके आसपास का माहौल भी आपकी मानसिक ईच्छाओं के साथ प्रभावित होने लगता है |यह साधना की उच्च स्थिति है |यह स्थिति आने पर समाधि की भी स्थिति संभव है अथवा भाव में डूबने पर साक्षात गणपति आपके सामने आकर खड़े हो सकते हैं |इस प्रकार इस साधना की शक्ति की कोई सीमा नहीं है |इस साधना से आप दुनिया में कुछ भी पा सकते हैं |त्रिकाल दर्शिता की क्षमता भी |
                                            इस साधना की शुरुआत केवल  ५ मिनट से करें ,क्योकि आँखों पर बहुत जोर पड़ता है |लगातार दीपक देखते हुए जब आँखों में जलन हो या अत्यधिक पानी आये तो कुछ सेकण्ड के लिए आँखें बंद कर लें किन्तु ध्यान गणपति पर ही एकाग्र रखें |फिर आँखें खोलकर दीपक की लौ में उन्हें देखने का प्रयास करें |इसे प्रति सप्ताह एक मिनट बढ़ते जाएँ और अंततः १५ मिनट तक जाए |इससे अधिक नहीं |यह पूरी प्रक्रिया ३ महीने की सामान्य रूप से है |तीन महीने में हर हाल में दर्शन/साक्षात्कार हो जाने चाहिए [हो जाते हैं ],यदि तीन महीने में आप सफल नहीं होते हैं तो मान लीजिये की आपके पूर्व कर्म बहुत अच्छे नहीं रहे और आपको ईश्वरीय ऊर्जा या दर्शन या आपकी मुक्ति मुश्किल है |आप में भारी कमियां हैं |आप बहुत ही गंभीर नकारात्मकता से ग्रस्त हैं |फिर तो आपका कल्याण केवल गुरु के हाथों ही संभव हो सकता है |हमारे कुछ शिष्यों को इस प्रक्रिया में केवल दो तीन दिनों में भी सफलता मिली है ,कुछ को महीनो लगे हैं |पर अनुभव सबको अवश्य हुआ है ,परिवर्तन सबके अन्दर आता ही है |आप इसे करके देखें ,और नीचे लिखी सावधानी और चेतावनी पर ध्यान देते हुए साधना मार्ग पर अग्रसर हों ,हमें पूरा विश्वास है आपका जीवन बदल जाएगा ,आपको ईश्वरीय ऊर्जा का साक्षात्कार होगा ,भले आपने कभी कोई साधना न की हो ,भले आप साधक न हों ,पर इससे आप साधक बन जायेंगे और गंभीर प्रयास से सिद्ध भी एक विशेष शक्ति के |इस शक्ति के प्राप्त होने पर इसके अनेकानेक प्रयोग हैं जिससे आप अपने परिवार का ,मित्रों का ,लोगों का भला कर सकते हैं ,उनके दुःख दूर कर सकते हैं जबकि आपका भला तो खुद ब खुद होता है |
    विशेष जानकारी और चेतावनी
    =============–यह साधना कोई भी कर सकता है ,किन्तु यह तांत्रिक साधना ही है |मूल तांत्रिक पद्धति क्लिष्ट और गुरुगम्य होती है किन्तु इसे कोई भी थोड़ी सावधानी से कर सकता है | साधना में साधित की जा रही शक्ति शिव परिवार की और सौम्य हैं ,इनसे किसी प्रकार की हानि नहीं होती ,किन्तु परम सात्विक और उच्चतम सकारात्मक शक्ति होने से इनकी साधना से जब सकारात्मकता का संचार बढ़ता है तो ,आसपास और व्यक्ति में उपस्थित अथवा उससे जुडी नकारात्मक शक्तियों को कष्ट और तकलीफ होती है ,उनकी ऊर्जा का क्षरण होता है ,फलतः वह तीब्र प्रतिक्रया करती है और साधक को विचलित करने के लिए उसे डराने अथवा बाधा उत्पन्न करने का प्रयास करती हैं |इस साधना को करते समय आपको कभी विचित्र अनुभव भी हो सकते हैं ,कभी लग सकता है की कोई आगे से चला गया ,कोई पीछे से चला गया ,कोई पीछे है ,या कमरे में है या कोई और भी आसपास है ,कभी अनापेक्षित घटनाएं भी संभव हैं |
                                              सबका उद्देश्य आपको विचलित करना होता है |यह सब गणेश नहीं करते ,अपितु आपके आपस पास की नकारात्मक शक्तियां करती हैं जिससे आप साधना छोड़ दें |,कभी कभी पूजा से भी दूसरी नकारात्मक शक्ति आकर्षित हो सकती हैं |व्यक्ति के काम को बिगाड़ने और दिनचर्या प्रभावित करने का प्रयस भी यह नकारात्मक उर्जायें कर सकती हैं ,इसलिए यह अति आवश्यक होता है की साधना की अवधि में साधक किसी उच्च सिद्ध साधक द्वारा बनाया हुआ शक्तिशाली यन्त्र-ताबीज अवश्य धारण करे ,जिससे वह सुरक्षित रहे और साधना निर्विघ्न संपन्न करे |तीब्र प्रभावकारी साधना होने से प्रतिक्रिया भी तीब्र हो सकती है अतः सुरक्षा भी तगड़ी होनी चाहिए |यह गंभीरता से ध्यान दें की आप जो यन्त्र-ताबीज धारण कर रहे हैं वह वास्तव में उच्च शक्ति को सिद्ध किया हुआ साधक ही अपने हाथों से बनाए और अभिमंत्रित किये हुए हो ,अन्यथा बाद में सामने खतरे या समस्या  आने पर मुश्किल हो सकती है |सिद्ध अथवा साधक के यहाँ की भीड़ ,अथवा प्रचार से उनका चुनाव आपको गंभीर मुसीबत में डाल सकता है |साधना पूर्ण है ,किन्तु इसमें किसी भी प्रकार की त्रुटी होने अथवा समस्या-मुसीबत आने पर हम जिम्मेदार नहीं होंगे |गुरु का मार्गदर्शन और समुचित सुरक्षा करना साधक की जिम्मेदारी होगी |हमारा उद्देश्य सरल ,सात्विक ,तंत्रोक्त साधना की जानकारी देना मात्र है |………………………………………………हर-हर महादेव

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  • नवरात्र में देवी की शक्ति कैसे पायें ?

    दिव्य गुटिका धारकों के लिए
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                                 नवरात्र को भगवती दुर्गा की पूजा /आराधना  का समय माना जाता है ,यद्यपि वास्तव में यह शक्ति साधना का समय होता है ,फिर वह शक्ति चाहे दस महाविद्या हो ,दुर्गा हो अथवा कोई भी शक्ति |साधकों की और कर्मकांडियों की अपनी तकनीक और अपनी पद्धति होती है जिस पर वह चलते हुए शक्ति साधना करते हैं और अपनी क्षमता -पद्धति अनुसार शक्ति प्राप्त करते हैं ,किन्तु जन सामान्य को नवरात्र बड़े धूमधाम से मनाने ,व्रत -उपवास रखने ,कलश स्थापना आदि करने ,सप्तशती पाठ करवाने आदि के बाद भी बहुत लाभ होता महसूस नहीं होता |बहुत से लोग कहते मिलते हैं नवरात्र में कलश रखते हैं ,सप्तशती करते हैं अथवा पंडित से करवाते हैं ,व्रत रहते हैं ,पूर्ण परहेज बरतते हैं |जब इनके सामान्य समस्या का आकलन किया जाता है तो इनमे से अधिकतर अनेक समस्याओं से ग्रस्त ही मिलते हैं जबकि बहुत सी समस्याएं नवरात्र के पाठ आदि से समाप्त हो जानी चाहिए |दुर्गा सर्वशक्तिशाली शक्ति हैं फिर भी इन लोगों की वह समस्याएं भी हल नहीं होती जो सामान्य सी पूजा से हो जानी चाहिए |नकारात्मक ऊर्जा ,छोटी -मोटी भूत -प्रेत बाधा ,अमंगल ,अकारण रोग -दुर्घटना आदि समाप्त हो जानी चाहिए ,किन्तु बहुत से मामलों में ऐसा नहीं होता |उसके बाद यह लोग किस्मत की बात मान कर खुद को संतोष देते हैं की किस्मत ही खराब हो तो दुर्गा क्या करेंगी |
                                    जब हम इन बातों पर गंभीरता से सोचते हैं तो पाते हैं की वास्तव में दुर्गा की शक्ति तो आपको मिल ही नहीं रही ,जो ऊर्जा आनी चाहिए आई ही नहीं इसलिए आपकी समस्याएं यथावत हैं ,जो बाधाएं आपके लिए रुकावट हैं वह ही नहीं हट पा रही तो पूरा भाग्य का भी नहीं मिल पा रहा इसलिए कोई सुधार नहीं हुआ |शक्ति साधना ,मात्र भावना का पर्व या अवसर नहीं होता ,इसकी अपनी विशिष्टता अपनी तकनीक होती है |इस समय मात्र व्रत ,उपवास ,कलश रखने ,पाठ करवाने से बहुत कुछ होने वाला नहीं ,महत्त्व यह होता है की आप कितना खुद प्रयास कर रहे ,आपने कितना खुद में शक्ति लाने की कोशिश की |दुर्गा देवी या ऊर्जा या शक्ति है ,स्त्री नहीं ,स्त्री रूप तो कल्पना है ,उन्हें मनुष्य या स्त्री मान मात्र पूजन से बहुत कुछ नहीं होना ,उन्हें ब्रह्माण्ड में फैली विशेष ऊर्जा मान खुद में लाने का प्रयास होता है तभी वास्तविक शक्ति प्राप्त होती है और लाभ महसूस होता है |
                                आपने व्रत रखा ,शरीर शुद्ध हुआ ,आपने कलश रखा ,परहेज किया ,भावना शुद्ध हुआ ,आपने मांस -मदिरा ,तामसिक का परित्याग किया ,सात्विकता का संचार हुआ किन्तु मात्र इतना करने से दुर्गा की शक्ति आपमें तो नहीं आ गयी |सप्तशती पंडित से कराई ,अगर उन्होंने शुद्ध भी किया तो अधिकतर ऊर्जा अंश उन्हें मिली और कुछ अंश आपके पूजा स्थान पर व्याप्त हुई |अगर थोड़ी गलती या अशुद्धि हुई तो नुक्सान आपका |आपने सप्तशती पढ़ी और शुद्ध पढ़ी तो आपको अच्छी ऊर्जा मिली पर अगर कहीं प्रिंटिंग में अशुद्धि हुई अथवा आपको पढने नहीं आया तो उच्चारण -नाद दोष के कारण ऊर्जा विकृत हुई और आपको उलटे परिणाम मिलने निश्चित |भूल जाइए की माँ है और माँ सब क्षमा करती है |यही गलती सोचते तो आपके कष्ट कम नहीं हो रहे |माँ एक शक्ति है और एक सर्वत्र व्याप्त ऊर्जा है वह तभी अनुकूल होगी जब उसके अनुकूल प्रयास होगा |आपकी गलती उसको गाली देकर बुलाने सा हो जाएगा और वह रुष्ट होगी खुश नहीं ,फिर आप कितना भी पाठ के बाद गलती की क्षमा मांगे ,विकृत ऊर्जा नहीं सुधरने वाली |यह कुछ वैसा ही हो जाता है जैसे आप किसी को गाली देकर बुलाते हैं ,बार बार बुलाते हैं फिर क्षमा मांगते हैं ,क्या वह इससे खुश होगा या आपको थप्पड़ मारेगा |यही कारण है शक्ति उपासना में थोड़ी भी गलती के परिणाम कई गुना अधिक कष्टकारक हो जाते हैं |इसलिए अगर ज़रा भी अपने पाठ की शुद्धता पर संदेह हो या लगे की पंडित जी जल्दबाजी कर रहे खाना पूर्ती कर रहे तो आप बचिए |पद्धति ठीक से पता न हो तो मत अपनाइए मात्र भावना से हाथ जोड़ काम चला लीजिये कम से कम नुक्सान तो नहीं होगा |
                               जो सामान्य लोग हैं अगर वास्तव में कल्याण चाहते हैं ,नवरात्र में शक्ति अनुभव करना चाहते हैं तो रात्री में अधिक देर जागरण करें ,भगवती का चिंतन करें और रात्री में मंत्र जप करें ,अगर शुद्ध पाठ कर सकते तो खुद से पाठ -स्तोत्र करें |मंत्र जप करें |सुबह सामान्य पूजा करें |महत्त्व संख्या को न दें ,महत्त्व शुद्धता ,सही उच्चारण और एकाग्रता को दें |आपको अधिक आभ होगा |जो हमारे दिव्य गुटिका /डिब्बी के धारक हैं उनके लिए हम एक सामान्य सी उपासना पद्धति बता रहे हैं जो किसी भी साधना से अधिक प्रभावकारी साबित होगी और उन्हें वास्तव में नवरात्र में शक्ति अनुभव होगा |उनके बहुत से कष्ट -समस्याएं समाप्त हो जायेगी |किसी कर्मकांड की जरूरत नहीं ,किसी व्रत की जरूरत नहीं ,किसी विशेष पद्धति की जरूरत नहीं ,किसी विशेष कलश स्थापना की जरूरत नहीं ,[[यदि कलश रखते हैं तो भी कोई दिक्कत नहीं ,अगर पाठ आपके यहाँ चलता है तो उसे चलने दे ]]दैनिक कार्य करते हुए आप इसे कर सकते हैं और आपको ऊर्जा /शक्ति उतनी ही मिलेगी जितनी किसी सामान्य साधक को मिलती है |
                                      आप नवरात्र में सुबह अपने पूजा स्थान में दुर्गा जी की चित्र लगाएं |सामने अपनी दिव्य गुटिका /डिब्बी स्थापित करें |यह प्राण प्रतिष्ठित है ,प्राण प्रतिष्ठा आदि की जरूरत नहीं |हाथ में जल अक्षत पुष्प और एक सिक्का लेकर संकल्प करें ,संस्कृत नहीं आती तो शुद्ध हिंदी में कि-  मैं [अपना नाम ] पुत्र [पिता का नाम ] स्थान [अपना पता ] आज सम्बत [२०७४ ] में चैत्र मॉस के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि अर्थात नवरात्र के पहले दिन ,दिन [बुधवार ] को यह संकल्प लेता हु की में आज से पूरे नवरात्र में प्रतिदिन ११ माला भगवती दुर्गा का मंत्र जप करूँगा |भगवती मेरे परिवार की सुरक्षा करें ,मेरा कल्याण करे ,मेरे समस्त कष्टों दुखों का नाश करें ,मेरे अथवा मेरे परिवार में व्याप्त बाधाओं का शमन करें ,मेरे सर्वविध उन्नति में सहायता करें | अब जल अक्षत पुष्प आदि उनके सामने छोड़ दें |अब गुटिका और भगवती की सामान्य पूजा करें ,अगर षोडशोपचार पूजा आता है तो वह करें अन्यथा जितना आता है मात्र उतना करें |कोई आडम्बर नहीं ,कोई भ्रम न पालें और खुद का दिमाग न उलझाएँ |पूजन बाद आप आरती कर उठ जाए |अब आपका जप रात में होगा |
                              रात के समय १० बजे के बाद आप पुनः स्नान करें और शुद्ध वस्त्र पहन दुर्गा जी और गुटिका के सामने धुप अगर बत्ती लगाकर ,घी का दीपक जलाएं और सामने उनी कम्बल बिछाकर बैठ जाएँ |हाथ में जल लेकर भावना करें की भगवती आपको शुद्ध पवित्र करें और जल आप खुद पर और आसपास छिडक लें |अब एक रुद्राक्ष की माला लेकर [[ रुद्राक्ष की माला या लाल चन्दन की माला की व्यवस्था पहले से रखें ,साथ ही माला करना भी सीख लें ,अंगूठे -मध्यमा -अनामिका इन्ही अँगुलियों के माध्यम से माला फेरें ,तर्जनी और कनिष्ठिका का स्पर्श न हो ]], पहले एक माला महामृत्युंजय मंत्र का जप करें |इसके बाद आप ११ माला दूर्गा जी के नवार्ण मंत्र का जप करें |आपका ध्यान पूरी तरह दुर्गा जी पर एकाग्र हो | रोज ११ माला करें ,एक माला पूर्व में महामृत्युंजय का जरूर रोज करें |पहले दिन अधिक श्रम जरुर लगेगा किन्तु अगले दिन से आदत हो जायेगी |नावें दिन जप के बाद अथवा १० वें दिन आम की लकड़ी पर हवन सामग्री से हवन करें |रोज जप के बाद अपने जप को भगवती के बाएं हाथ में समर्पित करें |समर्पित करने के बाद क्षमा मांग आरती करें और उठ जाएँ |रोज इतना ही करना है |
                              हवन के बाद हवन की राख अपने घर में चारो कोनों में गमलों में डाल सकते हैं अथवा उन्हें प्रवाहित कर दें अन्य पूजन सामग्रियों के साथ |किसी सात्विक -सदाचारी ब्राह्मण को दक्षिणा प्रदान करें |दिव्य गुटिका और दुर्गा जी का चित्र पूजन स्थान पर ही लगा रहने दें और रोज पूजन मात्र करते रहें |या जो अन्य प्रयोग हैं वह आप दिव्य गुटिका पर करने को स्वतंत्र हैं |मात्र इतने जप और हवन से आप खुद में और अपने घर में एक अलौकिक ऊर्जा का अनुभव करेंगे जो आपको बहुत से कर्मकांड करने के बाद भी महसूस होना मुश्किल है |………………………………………………हर-हर महादेव 


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  • नवरात्र में दुर्गा साधना दिव्य गुटिका [चमत्कारी डिब्बी ] पर 

    =============प्रचंडा चामुंडा साधना =============
    जैसा की हमने अपने दिव्य गुटिका अथवा चमत्कारी डिब्बी धारक पेज के पाठकों को सूचित किया था की जो गुटिका उन्होंने कभी भी हमसे किसी भी अन्य उद्देश्य से ली हो वे उस उद्देश्य के साथ -साथ उस दिव्य गुटिका पर अनेक प्रयोग अपनी आवश्यकता अनुसार कर सकते हैं और हम क्रमशः उनकी विधि प्रस्तुत करते रहेंगे |इस क्रम में हम नवरात्र पर विशेष रूप से प्रयोग किये जाने वाले कुछ प्रयोगों के क्रम में दुर्गा साधना की सरलतम विधि प्रस्तुत कर रहे हैं जो नकारात्मक ऊर्जा ,भूत-प्रेत ,वायव्य बाधाएं ,तांत्रिक अभिचार ,अनावश्यक वशीकरण ,उच्चाटन ,विद्वेषण आदि की क्रियाओं को हटाने के साथ ही उन्नति ,सफलता ,विजय ,समृद्धि प्रदान करने वाली है |जिन धारकों को लगता हो की उनके ऊपर अथवा उनके दूकान ,व्यवसाय ,घर-परिवार पर किसी तरह की नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव है ,किसी ने कुछ किया -कराया किया हुआ है या अभिचार किया है ,या व्यवसाय -दूकान बाँध दिया है ,या उन्नति रोक दी है ,या अपने आप किसी वायव्य आत्मा परेशान कर रही है ,किसी बच्चे -स्त्री को कोई पीड़ा पहुंचा रहा हो ,घर-परिवार में अनावश्यक बीमारी -दुर्घटना -कष्ट का वातावरण बन रहा हो तो वह धारक इस प्रयोग को नवरात्र में शुरू कर निश्चित दिनों तक क्रिया प्रयोग कर लाभान्वित हो सकते हैं |इन बाधाओं से तो राहत मिलेगी ही सफलता -समृद्धि -उन्नति -विजय के द्वार खुलेंगे ,रुके कार्य पूर्ण होंगे ,मांगलिक -व्यावसायिक -आर्थिक अवसरों में आ रही बाधाएं समाप्त होंगी |
    सामग्री
    ———- मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुक्त दुर्लभ दिव्य गुटिका [चमत्कारी डिब्बी ],लाल रंग का वस्त्र ,इत्र ,लकड़ी की चौकी या बाजोट ,चांदी की तश्तरी [ न मिले तो पीतल ], असली सिन्दूर ,लौंग ,इलायची ,लाल फूल ,पान बीड़ा ,फल फूल ,प्रसाद चढाने को दूध की लाल मिठाई ,चावल ,सिक्का ,रुई ,देशी घी का दीपक |
    माला
    ——– मंत्र सिद्ध चैतन्य रुद्राक्ष माला
    आसन
    ——– लाल उनी आसन
    वस्त्र
    ——- लाल रंग की धोती
    दिशा
    ——- पूर्व दिशा
    दिन -समय
    ————–  नवरात्र में सुबह का समय
    जप संख्या अवधि
    ———————- प्रतिदिन जप संख्या समान हो और कोशिश हो की नवरात्र भर की अवधि में ५१ हजार जप संख्या पूर्ण हो जाए |इस हेतु कुछ जप सुबह और कुछ रात्री में निश्चित किया जा सकता है |यदि लगता है की ५१ हजार नहीं हो पायेगा तो २१ ,३१ अथवा ४१ हजार अपनी सुविधानुसार निश्चित करके रोज की मालाओं की संख्या निश्चित कर लें |इस अवधि में पूर्ण सात्विकता ,ब्रह्मचर्य पालन आवश्यक |
    मंत्र
    ——- || ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाये बिचै ||
    विधि
    ——– नवरात्र में सुबह जिस समय घट स्थापना का मुहूर्त हो आपके समय के अनुसार उस समय पूजन प्रारम्भ करें |यदि कलश स्थापना करते हों तो और अच्छा है अथवा नवरात्र का पाठ कराते हों तो उस पूजन के पूर्ण होने के बाद बैठें |कुछ न करते हों और कुछ न जानते हों तो केवल दी जा रही प्रक्रिया का पालन करें ,आपको सफलता उतनी ही मिलेगी जितनी नवरात्र पाठ और जप आदि से मिलती है |
     स्नानादि से निवृत्त हो शुद्ध हो लाल धोती धारण कर लाल उनी आसन पर पूर्व की और मुख कर अपने सामने लकड़ी के बाजोट या चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं |उस पर बीचोबीच रोली से अष्टदल कमल बनाएं फिर उस पर चांदी की तश्तरी स्थापित करें और तश्तरी के बीचोबीच रोली से या अष्टगंध से ह्रीं बनाएं |अब  उस पर दिव्यगुटिका स्थापित करें |दिव्य गुटिका के पीछे दुर्गा जी का चित्र स्थापित करें |अब दुर्गा जी का और दिव्य गुटिका का पूजन यथाशक्ति करें और जल ,अक्षत ,लाल फूल ,धुप -दीप ,प्रसाद चढ़ाएं ,असली पिला पारायुक्त सिन्दूर गुटिका के अन्दर चढ़ाएं |पान बीड़ा ,लौंग ,इलायची और एक सिक्का अर्पित करें |अब मंत्र सिद्ध चैतन्य रुद्राक्ष माला से उपरोक्त मंत्र का जप निश्चित संख्या में करें [जो आपने रोज के लिए निर्धारित की है ]|इस प्रकार रोज करते हुए अपनी निश्चित की हुई जप संख्या पूर्ण करें | जप पूर्ण हो जाने पर कम से कम ११माला मन्त्रों से हवन अवश्य करें अंत में स्वाहा जोड़ते हुए |इस प्रकार यह अनुष्ठान पूर्ण होता है |अब चांदी की तश्तरी समेत दिव्य गुटिका अपने पूजा स्थान में स्थापित करें और रुद्राक्ष माला गले में धारण करें |गुटिका के बाहर चढ़ाए गए लौंग ,इलायची को उठाकर सुरक्षित रख ले यह किसी भी अभिचार ,पीड़ा ,बाधा के निवारण में मदद करेगा ,पीड़ित को खिलाने पर अथवा बाजू में बाँध देने पर |अन्य शेष सामग्री को बहते जल या तालाब ,कुएं में प्रवाहित कर दें |इस गुटिका पर सिन्दूर अर्पित करते रहें और प्रतिदिन इसकी पूजा सामान्य रूप से करते रहें |संभव हो तो एक -दो माला भी रोज करें |इस प्रयोग को संपन्न करने पर भूत-प्रेत ,वायव्य बाधा ,अभिचार ,किया कराया दूर होगा ,सब प्रकार उन्नति होगी ,शत्रु पराजित होंगे |घर के अनेक दोष समाप्त होंगे |जहाँ भी रखा जाएगा गुटिका वहां के बंधन समाप्त हो जायेंगे |आगे होने वाले अभिचार काम नहीं करेंगे |गुटिका पर चढ़ाए सिन्दूर का तिलक करने पर आकर्षण शक्ति बढ़ेगी ,लोग प्रभावित होंगे ,सब प्रकार से सुरक्षा प्राप्त होगी |लोग वशीभूत होंगे |……………………………………………………….हर-हर महादेव

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  • महाकाली कृपा प्राप्ति साधना – २

    सामान्य
    किन्तु साहसी लोगों के लिए
    ——————————–
               महाकाली इस ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च
    शक्ति ,जिसका नाम सुनकर भी बहुत से लोगों में भय व्याप्त हो जाता है |इनकी साधना
    ,उपासना कम लोग करते हैं क्योकि डरते हैं इनसे और मानते हैं की यह केवल तांत्रिकों
    की देवी हैं |कुछ लोग कहते हैं की महाकाली की तस्वीर और मूर्ती घर में नहीं रखनी
    चाहिए तो कुछ कहते हैं की इनकी उपासना गृहस्थों को नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह
    विनाश की देवी हैं ,यह श्मशान वासिनी हैं |यह सब सत्य नहीं है ,यह समस्त
    ब्रह्माण्ड में व्याप्त मूल शक्ति हैं जिनके बिना तो शिव भी शव समान हैं |यह
    श्मशान में ही नहीं समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं ,यहाँ तक की आपके शरीर में
    सबसे मुख्य चक्र का अधिपत्य इन्हें प्राप्त है और सबसे पहले यही चक्र भ्रूण में
    बनता भी है |यही नव दुर्गा हैं और यही दस महाविद्या हैं |नव दुर्गा और दस
    महाविद्या इन्ही के स्वरूपों और गुणों का विस्तार हैं |यह विनाशक शत्रुओं
    ,दुर्गुणों और पापियों के लिए हैं ,भक्त के लिए तो महा कृपालु माता हैं |जब आप
    दुर्गा को पूज सकते हैं ,नव दुर्गा की आराधना कर सकते हैं ,दस महाविद्या को उपासित
    कर सकते हैं तो काली को क्यों नहीं |वही तो इन सब में भी हैं |इनकी आराधना ,उपासना
    भी सभी कर सकते हैं ,यह डरावनी नहीं ,यह तो महा कृपालु हैं |इनका स्वरुप आराधक के
    शत्रुओं के लिए डरावना है ,उनके लिए घातक है ,साधक के लिए नहीं |इनकी तो आराधना
    करने वाला सभी दुखों ,कष्टों से मुक्त हो जाता है ,सभी भय समाप्त हो जाते हैं उसके
    |
              जो सामान्य लोग हैं ,वह भी इनकी उपासना
    कर सकते हैं और इनकी कृपा ,शक्ति पा सकते हैं |शक्ति सबके लिए होती है ,इनपर किसी
    का एकाधिकार नहीं |इसे कोई भी प्राप्त कर सकता है |जिनके पास गुरु हैं ,जो दीक्षित
    हैं उन्हें तकनीकियों का ज्ञान होता रहता है जिससे वह सुरक्षित जल्दी कृपा पा जाते
    हैं और अधिक मात्रा में भी पा जाते हैं ,पर जिनके पास गुरु नहीं हैं ,जो दीक्षित
    नहीं हैं वह भी काली की शक्ति पा सकते हैं |अंतर बस समय और मात्रा का हो सकता है
    ,पर मिलता जरुर है |इसके लिए बहुत समय तक या घंटों आराधना ,उपासना करना भी आवश्यक
    नहीं ,कुछ मिनट भी यदि एकाग्र हुआ जाए तो इनकी कृपा और शक्ति पाई जा सकती है |यदि
    हम ऐसा कहते हैं तो लोगों को आश्चर्य हो सकता है ,हो सकता है कुछ लोग आलोचनात्मक
    भी हो जाएँ ,क्योकि बहुतेरे वर्षों साधना करते रहते हैं ,घंटों करते रहते हैं
    किन्तु परिणाम समझ में नहीं आता ,फिर भी स्वयं को सिद्ध समझे हुए होते हैं |सोचते
    हैं की बिना गुरु ,बिना तकनिकी ,बिना शास्त्रीय जानकारी यह नहीं हो सकता |ऐसे में
    वह लोग आलोचना भी कर सकते है ,अथवा कुछ महाज्ञानी जो लम्बे
    चौड़े कर्मकांड को ही सिद्धि और साधना के सूत्र
    मानते हैं वह भी आलोचना कर सकते हैं |किन्तु हम फिर भी कहना चाहेंगे की काली की
    ऊर्जा केवल १५ से ३० मिनट प्रतिदिन के प्रयास से पायी जा सकती है |हम कोई सिद्ध
    नहीं हैं ,कोई सन्यासी नहीं हैं ,अज्ञानी और बेहद सामान्य श्रद्धालु  हैं किन्तु फिर भी अनुभव किया है, अपने
    नजदीकियों को अनुभव कराया है कि यदि हम चाहें तो काली की शक्ति प्राप्त कर सकते
    हैं केवल थोड़े से गंभीर प्रयास से |हमने मात्र काली सहस्त्रनाम के पाठ से काली की
    उस शक्ति का आभास अपने मित्रों और कष्ट में फंसे लोगों को कराया है ,जिसके लिए
    तांत्रिक भी तरसते हैं |जो समस्या तांत्रिक दूर ना कर पाए ,वह समस्या मात्र काली
    सहस्त्रनाम के पाठ से दूर हुई है |ऐसे में अगर मूल काली की शक्ति को खुद में पाने
    का प्रयास किया जाए तो सोचिये कितना कल्याण होगा आराधक का |[[काली सहस्त्रनाम की
    विधि हमने इसके पहले के अंक में ,महाकाली कृपा प्राप्ति साधना -१ या महाकाली की
    साधना और सिद्धि कैसे हो ,के नाम से लिखा और पोस्ट किया है |
            सामान्य काली की ऊर्जा, जिससे हमारा
    भौतिक जीवन सुखमय हो सके ,नकारात्मक ऊर्जा हट सके ,सफलता बढ़ सके आदि के लिए बहुत
    गंभीर साधना करनी पड़े ,तंत्र की गंभीर क्रियाएं करनी पड़े आवश्यक नहीं है | साधारण
    तौर पर महाकाली की शक्ति कोई भी, कभी भी, कहीं भी प्राप्त कर सकता है ,केवल कुछ
    सूत्रों ,कुछ नियमों ,कुछ निर्देशों को गंभीरता से पालन करने की जरुरत है |हम अपने
    इस पोस्ट में एक ऐसी महत्वपूर्ण, अति तीब्र प्रभावकारी किन्तु बेहद सरल साधना को
    प्रस्तुत कर रहे हैं ,जिससे किसी को भी महाकाली की अलौकिकता का आभास हो सकता है
    |किसी का भी जीवन बदल सकता है |कोई भी काली की ऊर्जा प्राप्त कर सकता है ,केवल कुछ
    मिनट के प्रयास से |हमने बहुतों को यह बताया है ,कुछ सफल हुए ,कुछ घबराकर हट गए
    ,कुछ नियमित न रह पाने से अथवा अत्यंत सरल पद्धति होने से मजाक समझ अविश्वास में
    छोड़ बैठे |कुछ इसे करके अत्यंत सफल हो गए और खुद को सिद्ध ही मानने लगे |यह है तो
    बहुत ही छोटा और सरल प्रयोग पर इसकी शक्ति अद्वितीय है |इससे महाकाली की शक्ति तो
    निश्चित रूप से प्राप्त होती ही है ,अगर एकाग्रता और लगन बना रहा तो ईश्वर साक्षात्कार
    अथवा प्रत्यक्षीकरण भी हो जाता है |भूत
    भविष्य-वर्तमान के ज्ञान की शक्ति प्राप्त हो सकती है |किसी भी शक्ति की
    प्राप्ति हो सकती है ,केवल मार्गदर्शन और तकनिकी ज्ञान मिलता रहे |इस प्रयोग में
    किसी कर्मकांड की ,लम्बे चौड़े पद्धति की ,विशिष्ट पूजा
    पद्धति की भी आवश्यकता नहीं है |कोई भी कर सकता है |हाँ एक अनिवार्य शर्त
    तो है आपको भयमुक्त होना चाहिए |डरपोक लोग साधना काली की तो नहीं ही कर सकते हैं |
    साधना विधि
    ::–इस साधना को आप किसी भी शनिवार अथवा कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी से प्रारम्भ
    कर               
    ==========
    सकते हैं | आप नित्यकर्म और स्नान आदि से स्वच्छ हो ,ऊनि लाल अथवा रंगीन आसन पर
    स्थान ग्रहण करें |भगवती महाकाली का एक सुन्दर सा चित्र लें जिसमे वह तरुणी हों
    ,सुन्दर और सौम्य दिखें [चित्र पहले से लाकर रखे रहें ] |इस चित्र को अपने पूजा
    स्थान पर किसी चौकी आदि पर लाल वस्त्र बिछाकर स्थापित करें | फिर उनकी स्थापना
    करें |आप हाथ जोड़कर अपने ध्यान में भगवती काली जी को लायें और फिर आँखें खोलकर
    कल्पना द्वारा उस काल्पनिक भगवती को धीरे
    धीरे लाकर चित्र में स्थापित कर दें और कल्पना करें की भगवती ने आकर उस
    चित्र में अपने को समाहित कर लिया है |अब उनकी विधिवत पूजा कर दें |पूजा आपको रोज
    सुबह करनी है किन्तु चित्र स्थापना और भगवती की मानसिक प्रतिष्ठा चित्र में एक बार
    ही करनी है |पूजा में सिन्दूर
    , लाल
    फूल और लौंग यथासंभव प्रतिदिन चढ़ाएं |पूजा करने के बाद आप उठ सकते हैं |इस समय इस
    स्थान पर अगर हत्थाजोड़ी -सियार्सिंगी अथवा हमारे द्वारा निर्मित दिव्य गुटिका
    /डिब्बी की भी स्थापना की जाए तो सफलता और बढ़ जायेगी |इसके बाद आप भगवती के चित्र
    के सामने टेनिस की गेंद के आकार की एक क्रिस्टल बाल अर्थात पारदर्शी शीशे का गोला
    जिसमे कोई बूँद ,दरार अथवा दाग आदि न हो उसके स्टैंड पर स्थापित करें |क्रिस्टल
    बाल की साइज अथवा मोटाई कम से कम दो इंच की हो यदि पूजा स्थान में छाया आदि एक ही
    दिशा में अधिक हो तो आप एक लाल जीरो वाट का बल्ब क्रिस्टल बाल के पीछे इस प्रकार
    स्थापित करें की आपके सामने क्रिस्टल बाल के बाद बल्ब न दिखे और केवल लाल प्रकाश
    ही बाल में नजर आये |
              अब आपको दिन में किसी भी समय का एक
    निश्चित समय निश्चित करना है जब आप रोज नियमित उन्हें १५ मिनट का समय दे सकें
    |बेहतर हो यह समय रात्री १० बजे के बाद का हो |यह समय बिलकुल एकांत का होना चाहिए
    ,कोई आवाज अथवा विघ्न नहीं होनी चाहिए |इसके लिए स्थान आपका शयन कक्ष भी हो सकता
    है अथवा पूजा स्थान अथवा कोई भी एकांत स्थान |पूजन रोज सुबह और साधना रात्री में
    करें |जब आप समय निश्चित कर लें की अमुक समय आप रोज साधना कर सकते हैं तो फिर उस
    समय और स्थान में परिवर्तन न हो |इसीलिए आपको जहाँ और जब सुविधा हो एक बार में ही
    चुनाव कर लें |रात्री आदि में साधना करने के पूर्व स्नान आदि करके स्वच्छ हो एक
    ऊनि लाल अथवा रंगीन ऊनि कम्बल अपनी सुविधानुसार स्थान पर बिछाएं |आपका आसन
    क्रिस्टल बाल से दो फुट की दूरी पर हो | अब एक घी का दीपक और अगर बत्ती जलाएं
    |इन्हें भगवती को दिखा -समर्पित कर प्रणाम करें और ध्यान से उनके चित्र को देखें |
    अब आसन पर आराम से सुखासन में बैठ जाएँ |आसन के चारो और पहले से सुरक्षा घेरा
    बनाकर रखें |इसके लिए सिन्दूर
    कपूर
    और लौंग को चूर्णकर घी में मिला भगवती के किसी मंत्र को पढ़ते हुए आसन के चारो और
    घेरा बना दें और भगवती से प्रार्थना करें की वह आपकी सब प्रकार से सुरक्षा करें
    |[पंडित जितेन्द्र मिश्र ]
            अब आसन पर बैठ कर अपनी अपलक दृष्टि आपको
    क्रिस्टल बाल पर जमानी है ठीक बीचोबीच | मन में सदैव एक ही कल्पना रहे की इस
    क्रिस्टल बाल के लाल प्रकाश में भगवती मुझे दिखेंगी और आशीर्वाद देंगी |मन में
    प्रबल विश्वास रखें की वह जरुर दिखेंगी और मुझे उनकी कृपा प्राप्त होगी |इस अवधि
    में कोई मंत्र जप तभी कर सकते हैं जब आपको किसी सिद्ध साधक अथवा गुरु से काली का
    मंत्र प्राप्त हो ,अन्यथा मंत्र जप न करें |कोई भी शाबर मंत्र तो कदापि न करें
    |प्रक्रिया में सदैव अपने ध्यान को काली पर ही केन्द्रित करने का प्रयास होना
    चाहिए |यद्यपि मन बहुत भटकता है पर कुछ दिन में एकाग्रता आने लगती है और बाल में
    आकृतियाँ उभरने लगती हैं ,जिससे रोमांच भी होता है |कभी क्षणों के लिए भगवती भी
    दिख सकती हैं जो कभी किसी रूप में तो कभी किसी रूप में दिख सकती हैं |यह सब आपकी
    पूर्व कल्पनाओं की आकृतियाँ होंगी पर प्रयास आपको चित्र वाली देवी को ही लाने का
    होना चाहिए |इसके साथ ही भिन्न भिन्न लोग भिन्न भिन्न आकृतियाँ ,भिन्न दृश्य उभरते
    हैं |यह सब अवचेतन के चित्र होते हैं जिन्हें देखकर आप भी हतप्रभ होते रहते हैं
    ,किन्तु हमेश दिमाग में एक ही निश्चय रखें की हमें भगवती स्पष्ट दिखेंगी और
    आशीर्वाद देंगी |कुछ दिन बाद भगवती की आकृति उभरने लगती है ,क्षणों
    क्षणों के लिए ,कभी कुछ कभी कुछ |फिर धीरे धीरे
    अनवरत प्रयास से आकृति स्थायी होने लगती है |यदि जब कभी आपकी एकाग्रता एक मिनट के
    लिए भी स्थायी हो जाती है अथवा एक मिनट भी भगवती स्थायी होकर रुकती हैं अथवा
    स्पष्ट दीखते हुए आशीर्वाद मुद्रा में आशीर्वाद देने लगती हैं आपकी साधना सफल होने
    लगती है |आपको अनेक परिवर्तन स्वतः नजर आने लगते हैं |एक मिनट की आत्म विस्मृति
    [खुद की सुध भूल जाना ] प्राप्त होते ही आप सिद्धि की शक्ति से साक्षात्कार करने
    लगते हैं |
             भगवती का चित्र बाल में स्थायी होना और
    आशीर्वाद देने का मतलब आप द्वारा उनकी ऊर्जा को वातावरण से बुलाने पर वह आ रही है
    और उसका सम्बन्ध आपके मष्तिष्क और अवचेतन से बन गया है |आपमें इसके साथ ही आतंरिक
    रासायनिक परिवर्तन भी होने लगते हैं और वाह्य भौतिक परिवर्तन भी होने लगते हैं
    ,क्योकि आपके आज्ञा चक्र की तरंगों की प्रकृति बदल जाती है ,उसकी क्रिया तीब्र हो
    जाती है |भगवती की ऊर्जा के अनुरूप भावना होने से शरीर और सोच में परिवर्तन आता है
    |अंगों में अथवा चक्र में स्फुरण हो सकता है | इस स्थिति में आपकी कुंडलिनी में भी
    स्फुरण हो सकता है |आपकी सोची इच्छाएं पूर्ण होने लगती हैं क्योकि आपकी मानसिक
    तरंगों में इतनी शक्ति आ जाती है की वह लक्ष्य पर पहुचकर उसे आंदोलित और आपके पक्ष
    में करने लगती हैं |
             जब भगवती की आकृति रोज स्थायी होने लगे
    तो उसे अधिकतम देर तक स्थायी रखने का प्रयास करें |कुछ दिनों के प्रयास में यह
    संभव हो सकता है |फिर उन्हें आप अपने मानसिक बल और मन के भावों से घुमाने का
    प्रयास करें ,अथवा कभी यह हाथ कभी वह हाथ उठायें ,कभी उन्हें घुमाने का प्रयास
    करें |एकाग्रता, लगन और निष्ठां से यह भी संभव हो जाएगा |,उनके घुमते ही आपके
    आसपास का माहौल भी आपकी मानसिक ईच्छाओं के साथ प्रभावित होने लगता है |यह साधना की
    उच्च स्थिति है |यह स्थिति आने पर समाधि की भी स्थिति संभव है अथवा भाव में डूबने
    पर साक्षात भगवती आपके सामने आकर खडी हो सकती हैं |आपकी कुंडलिनी जाग सकती है |आप
    समाधि में जा सकते हैं |आपसे भगवती का वार्तालाप हो सकता है |आपको वरदान आदि
    प्राप्ति की स्थिति आ सकती है |इस प्रकार इस साधना की शक्ति की कोई सीमा नहीं है
    |इस साधना से आप दुनिया में कुछ भी पा सकते हैं |त्रिकाल दर्शिता की क्षमता भी
    |सर्वत्र विजय भी ,मन के सोचने मात्र से शत्रु संहार भी |इस साधना की सबसे
    अनिवार्य शर्त है की आप डरपोक न हों ,आपको भयभीत नहीं होना है किसी भी स्थिति में
    ,क्योकि यह उग्र शक्ति है और अनियंत्रित होने पर क्षति संभव है |
            इस साधना की शुरुआत केवल  ५ मिनट से करें ,क्योकि आँखों पर बहुत जोर पड़ता
    है |लगातार बाल देखते हुए जब आँखों में जलन हो या अत्यधिक पानी आये तो कुछ सेकण्ड
    के लिए आँखें बंद कर लें किन्तु ध्यान भगवती पर ही एकाग्र रखें |फिर आँखें खोलकर
    क्रिस्टल में उन्हें देखने का प्रयास करें |इसे प्रति सप्ताह एक मिनट बढ़ते जाएँ और
    अंततः १५ मिनट तक जाए |इससे अधिक नहीं |यह पूरी प्रक्रिया ३ महीने की सामान्य रूप
    से है |तीन महीने में भगवती की शक्ति का अनुभव आपको होने लगता है |,यदि तीन महीने
    में आप सफल नहीं होते हैं तो मान लीजिये की आपके पूर्व कर्म बहुत अच्छे नहीं रहे
    और आपको ईश्वरीय ऊर्जा या दर्शन या आपकी मुक्ति मुश्किल है |आप में भारी कमियां
    हैं |आपकी एकाग्रता बहुत खराब है |आपकी श्रद्धा और विश्वास में कमियां हैं |आप
    बहुत ही गंभीर नकारात्मकता से ग्रस्त हैं |फिर तो आपका कल्याण केवल गुरु के हाथों
    ही संभव हो सकता है |यद्यपि पूर्ण साक्षात्कार की स्थिति विरले को ही मिलती है पर
    शक्तियां तो मिलने ही लगती हैं ,सिद्धियाँ तो प्राप्त होती ही है |यदि मंत्र और गुरु
    मार्गदर्शन है तो अधिक अन्यथा कुछ कम पर प्राप्ति होती जरुर है |पूर्ण प्रक्रिया
    की कोई समय सीमा नहीं क्योकि यह साधना है कोई अनुष्ठान ,उपासना अथवा आराधना नहीं |
    आप इसे करके देखें ,और नीचे लिखी सावधानी और चेतावनी पर ध्यान देते हुए साधना
    मार्ग पर अग्रसर हों ,हमें पूरा विश्वास है आपका जीवन बदल जाएगा ,आपको भगवती की
    ऊर्जा का साक्षात्कार होगा ,भले आपने कभी कोई साधना न की हो ,भले आप साधक न हों
    ,पर इससे आप साधक बन जायेंगे और गंभीर प्रयास से सिद्ध भी हो जायेंगे एक विशेष
    शक्ति के |इस शक्ति के प्राप्त होने पर इसके अनेकानेक प्रयोग हैं जिससे आप अपने
    परिवार का ,मित्रों का ,लोगों का भला कर सकते हैं ,उनके दुःख दूर कर सकते हैं जबकि
    आपका भला तो खुद ब खुद होता है |
    विशेष जानकारी
    और चेतावनी
    =====================
    –यह साधना कोई भी कर सकता है ,किन्तु यह तांत्रिक साधना है |मूल तांत्रिक पद्धति
    क्लिष्ट और गुरुगम्य होती है किन्तु इसे कोई भी थोड़ी सावधानी से कर सकता है |
    साधना में साधित की जा रही शक्ति शिव परिवार की और ब्रह्माण्ड की सर्वाधिक उग्र शक्ति
    हैं ,इनसे किसी प्रकार की हानि भी संभव है और लाभ भी |यह परम तामसिक और उच्चतम
    सकारात्मक शक्ति होने से इनकी साधना से जब सकारात्मकता का संचार बढ़ता है तो ,आसपास
    और व्यक्ति में उपस्थित अथवा उससे जुडी नकारात्मक शक्तियों को कष्ट और तकलीफ होती
    है ,उनकी ऊर्जा का क्षरण होता है ,फलतः वह तीब्र प्रतिक्रया करती है और साधक को
    विचलित करने के लिए उसे डराने अथवा बाधा उत्पन्न करने का प्रयास करती हैं |इस
    साधना को करते समय आपको कभी विचित्र अनुभव भी हो सकते हैं ,कभी लग सकता है की कोई
    आगे से चला गया ,कोई पीछे से चला गया ,कोई पीछे है ,या कमरे में है या कोई और भी
    आसपास है ,कभी अनापेक्षित घटनाएं भी संभव हैं |सबका उद्देश्य आपको विचलित करना
    होता है |
           यह सब काली नहीं करती ,अपितु आपके आस पास
    की नकारात्मक शक्तियां करती हैं जिससे आप साधना छोड़ दें |,कभी कभी पूजा से भी
    दूसरी नकारात्मक शक्ति आकर्षित हो सकती हैं |व्यक्ति के काम को बिगाड़ने और
    दिनचर्या प्रभावित करने का प्रयस भी यह नकारात्मक उर्जायें कर सकती हैं ,इसलिए यह
    अति आवश्यक होता है की साधना की अवधि में साधक किसी उच्च सिद्ध काली साधक द्वारा
    बनाया हुआ शक्तिशाली काली यन्त्र
    ताबीज
    अवश्य धारण करे ,जिससे वह सुरक्षित रहे और साधना निर्विघ्न संपन्न करे |तीब्र
    प्रभावकारी साधना होने से प्रतिक्रिया भी तीब्र हो सकती है अतः सुरक्षा भी तगड़ी
    होनी चाहिए |यह गंभीरता से ध्यान दें की आप जो काली यन्त्र
    ताबीज धारण कर रहे हैं वह वास्तव में काली को
    सिद्ध किया हुआ साधक ही अपने हाथों से बनाए और अभिमंत्रित किये हुए हो ,अन्यथा बाद
    में सामने खतरे या समस्या आने पर मुश्किल हो सकती है |सिद्ध अथवा साधक के यहाँ की
    भीड़ ,अथवा प्रचार से उनका चुनाव आपको गंभीर मुसीबत में डाल सकता है |साधना पूर्ण
    है ,किन्तु इसमें किसी भी प्रकार की त्रुटी होने अथवा समस्या
    मुसीबत आने पर हम जिम्मेदार नहीं होंगे |गुरु का
    मार्गदर्शन और समुचित सुरक्षा करना साधक की जिम्मेदारी होगी |हमारा उद्देश्य सरल
    ,सात्विक ,तंत्रोक्त साधना की जानकारी देना मात्र है |..
    जिन
    लोगों के पास गुरु हैं किन्तु गुरु को ही तकनिकी ज्ञान नहीं है ,जिनके पास गुरु
    हैं किन्तु गुरु किसी और मार्ग के अथवा सात्विक मार्ग के हैं |जिन लोगों के पास
    गुरु हैं किन्तु गुरु आडम्बरी हैं और मात्र पैसे को महत्त्व देने वाले हैं |जिनके
    गुरु तो हैं किन्तु उनके पास मार्गदर्शन के लिए समय नहीं या जिनकी प्रसिद्धि और
    प्रचार देखकर गुरु बना लिया है अथवा किसी कथा वाचक को गुरु बना लिया है जिनको कोई
    तन्त्र की जानकारी ही नहीं तो ऐसे लोगों के लिए भी हमारे पास काली साधना के रास्ते
    हैं |हमने इस साधना पद्धति से भी विशेष और उत्कृष्ट साधना पद्धति बनाई है उनके लिए
    जो साधक हैं ,साहसी हैं और तंत्र समझते हैं |किसी कारण गुरु का लाभ नहीं पा रहे
    किन्तु साधना करना चाह रहे |उस पद्धति को भी समय मिला तो प्रकाशित करेंगे थोड़े काट
    छांट के साथ क्योंकि पूर्ण तकनिकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती तंत्र के
    गोपनीयता के नियमों के अनुसार |तंत्र का मतलब तकनिकी साधना होता है जो सनातन
    विज्ञानं के सूत्रों पर सिद्धियाँ देता है |यह लेख इन्ही तकनिकी ज्ञान का विस्तार
    है जहाँ आज्ञा चक्र और विशुद्ध चक्र की ऊर्जा से काली की सिद्धि हमने बताई है |मूलाधार
    को तो हमने छुआ ही नहीं इस लेख में जबकि काली की वास्तविक शक्ति वहीँ होती है |वह
    ज्ञान केवल हमारे शिष्यों के लिए सुरक्षित है ,हम अपने शिष्यों के लिए विशेष तकनीक
    अलग रखते हैं चूंकि तांत्रिक तकनीके सामान्य लोगों के लिए नहीं होती |………………
    ………………………………………………हरहर महादेव

    READ MORE: महाकाली कृपा प्राप्ति साधना – २
  • कापालिक क्या होते हैं ?

    कापालिक
    : भैरवी तंत्र साधक

    =============
               भारतीय साधना अथवा उपासना जगत में पांच सम्प्रदाय रहे हैं |शैव ,शाक्त ,वैष्णव ,सौर और गाणपत्य |सौर और गाणपत्य सम्प्रदाय को मानने वाले अब कम पाए जाते हैं जबकि वैष्णव
    सम्प्रदाय अधिकतर
    वैदिक मार्गी
    और कर्मकांड की प्रमुखता वाले सांसारिक लोग अथवा सन्यासी मानते हैं |तंत्र जगत में मूल रूप से शैव और शाक्त सम्प्रदाय हैं |इनमे कापालिक सम्प्रदाय के लोग शैव सम्प्रदाय के अंतर्गत आते हैं जिनके मुख्य आराध्य
    शिव हैं |ये लोग मानव खोपड़ियों को पात्र के रूप में उपयोग करते हैं और उसके माध्यम
    से ही खाते पीते हैं इसलिए इन्हें कापालिक कहा जाता है |माहेश्वर सम्प्रदाय के चार मूल सम्प्रदायों में कापालिक सम्प्रदाय भी है |इन्हें कापालिक शैव कहा जाता है कापालिक संप्रदाय को महाव्रतसंप्रदाय भी माना जाता है। इसे तांत्रिकों का संप्रदाय माना गया है। नर कपाल धारण करने के कारण ये लोग कापालिक कहलाए। कुछ विद्वान इसे नहीं मानते हैं। उनके अनुसार कपाल में ध्यान लगाने के चलते उन्हें कापालिक कहा गया। पुराणों अनुसार इस मत को धनद या कुबेर ने शुरू किया था।
                    बौद्ध आचार्य हरिवर्मा और असंग के समय में भी कापालिकों के संप्रदाय विद्यमान थे। सरबरतंत्र में 12 कापालिक गुरुओं
    और उनके 12 शिष्यों के नाम सहित वर्णन मिलते हैं। गुरुओं के नाम हैंआदिनाथ, अनादि, काल,
    अमिताभ, कराल, विकराल आदि। शिष्यों के नाम हैंनागार्जुन, जड़भरत, हरिश्चन्द्र, चर्पट आदि। ये सब शिष्य तंत्र के प्रवर्तक रहे हैं। कापालिक एक तांत्रिक शैव सम्प्रदाय है जो अपुराणीय था |इन्होने भैरव तंत्र तथा कॉल तंत्र की रचना की |कापालिक सम्प्रदाय पाशुपत
    या शैव सम्प्रदाय का वह अंग है जिसमे वामाचार अपने चरम रूप में पाया जाता है |कापालिक सम्प्रदाय के अंतर्गत नकुलीश तथा लकुलीश को पाशुपत
    मत का प्रवर्तक माना जाता है |यह कहना कठिन है की लकुलीश
    [जिसके हाथ में लकुट ] हो ऐतिहासिक व्यक्ति था या काल्पनिक |इनकी मूर्तियाँ लकुट के साथ हैं ,इस कारण इन्हें लकुटीश कहते हैं |इतिहासवेत्ताओं की दृष्टि
    में तो पाशुपत सम्प्रदाय की उत्पत्ति का समय .पूदूसरी शताब्दी है ,किन्तु
    जिस तरह तांत्रिक सम्प्रदाय वैदिक युग में भी था उससे अनुमान
    है की यह इससे पूर्व गुप्त और समाज से दूर क्रियाशील था |
    कापालिक सम्प्रदाय के रहन सहन और साधना पद्धतियों से ज्ञात होता है की इसका मूल उद्गम हिमालय और पर्वतीय क्षेत्र हैं |चूंकि यह मूलतः कुंडलिनी साधना से सम्बंधित सम्प्रदाय रहा है और यह तंत्र साधना से कुंडलिनी जागरण में विश्वास रखता है अतः इनकी पद्धतियाँ भी उसी अनुरूप हैं |पर्वतीय पर्यावरण के अनुरूप
    रहने के लिए इन्होने मांस– मदिरा और पंचमकार को अपनाया
    और काम भाव द्वारा कुंडलिनी जागरण को माध्यम बनाने से इन्होने मैथुन को इसमें स्थान दिया |इनका पंचमकार उपयोग बहुत हद तक एक विशिष्ट वातावरण के अनुकूल
    रहने और ऊर्जा प्राप्ति के लिए था ,केवल मैथुन और मुद्रा कुंडलिनी साधना के लिए विशिष्ट आवश्यक
    तत्व के रूप में लिया गया था |मांस ,मदिरा ,मीन
    विशिष्ट वातावरण की अनुकूलता और एकाग्रता हेतु था जो अलग पर्यावरण में आवशक तत्व
    नहीं था किन्तु
    चूंकि बाद के अधिकतर वाम मार्गी
    पंथ और सम्प्रदाय इसी से विकसित हुए अतः सबमे यह आता गया और कुछ के अतिरिक्त अधिकतर
    में विकृत रूप लेता गया |
                  कापालिक मत में प्रचलित साधनाएं बहुत कुछ वज्रयानी साधनाओं में गृहीत हैं ,अर्थात इनसे यह बौद्धों की वज्रयान सम्प्रदाय में भी गया ,चूंकि
    वज्रयानों का
    भी उद्गम हिमालयीय क्षेत्र ही था |इनकी पद्धतिय अन्य शैव सम्प्रदायों और नाथ सम्प्रदाय में भी गयी |यक्ष देव परम्परा के देवताओं और साधनाओं का सीधा प्रभाव शैव और बौद्ध कापालिकों पर पड़ा क्योकि तीनो में ही प्रायः
    कई देवता समान गुण धर्म और स्वभाव के हैं |चर्याचर्यविनिश्चय की टीका में एक श्लोक आया है जिसमे प्राणी को वज्रधर
    कहा गया है और जगत की स्त्रियों को स्त्री जन साध्य होने के कारण यह साधना कापालिक कही गयी |
                 पाशुपत सम्प्रदाय से ही कालमुख और कापालिक शाखाएं उद्भूत
    हुई |कालमुख मुख्य रूप से राज दरबारों और नगरों में सीमित रहा किन्तु कापालिक मत दक्षिण और उत्तर भारत में गुह्य साधना के रूप में फैला |कापालिकों के देवता माहेश्वर थे |गोरक्ष
    सिद्धांत संग्रह
    के अनुसार
    श्री नाथ के दूतों ने जब विष्णु के चौबीस अवतारों के कपाल काट लिए तब वे कापालिक कहलाये |इससे तथा बहुत सी अन्य कथाओं के द्वारा
    वैष्णव सम्प्रदाय से कापालिक या शैव सम्प्रदाय का विरोध लक्षित होता है |अधिकतर
    कहानियों में शिव को राक्षसों और दानवों
    का उपास्य
    देव बताया जाता है और उनकी शक्ति से वे देवताओं को भी पराजित करते हैं |यह भी इन्ही सम्प्रदायों की आपसी विरोधात्मक रचनाएँ हैं |आर्य
    लोग
    विष्णु ,इंद्र ,रूद्र आदि के आराधक थे जबकि आर्येतर जातियां शिव जैसे देवता की उपासना
    करती थी |बाद में भक्तिवाद का प्रभाव शैव धर्म पर पड़ा और वैदिक देवता तथा आर्येतर स्रोत के देवता एक हो गए |रूद्र को शिव कहा जाने लगा और अन्य देवताओं को भी आपस में मिला दिया गया |वैदिक कर्मकांड ,तंत्र में घुस गया |भक्तिवादी उपासना में शिव उदार और भक्त वत्सल चित्रित किये गए |गुह्य साधनाओं में शिव का आदिम रूप न्यूनाधिक रूप में विद्यमान रहा जिसके अनुसार वे विलासी
    और घोर क्रियाकलापों से सम्बद्ध थे |
               बौद्ध सम्रदाय में सहजयान और वज्रयान में भी स्त्री साहचर्य की अनिवार्यता स्वीकार की गयी है और बौद्ध साधक अपने को कपाली कहते थे |[चर्यापद ११ ,चर्या गीत कोष ]|यह प्रकट करता है की बौद्ध सम्प्रदाय से पहले से कापालिक सम्प्रदाय था और बौद्ध सम्प्रदाय ने इनके काफी कुछ नियम और पद्धतियाँ अपनी साधनाओं में ली हैं |प्राचीन साहित्य [जैसे मालती माधव ]में कपाल कुंडला
    और अघोरघंट का उल्लेख
    आया है |इस ग्रन्थ से कापालिक मत के सम्बन्ध में कुछ स्थूल तथ्य स्थिर किये जा सकते हैं |कापालिक मत ,नाथ संप्रदायियों और हठ योगियों की तरह चक्र और नाड़ियों में विश्वास करता था |उसमे जीव और शिव में अभिन्नता मानी गयी है |
                योग से ही शिव का साक्षात्कार संभव है |शिव का शक्ति संयुक्त रूप ही समर्थ और प्रभावकारी है |शिव और शक्ति के इस मिलनसुख को ही कापालिक अपनी कपालिनी के माध्यम
    से अनुभव करता है जिसे वह महासुख की संज्ञा देता है |सोम को कापालिक [ उमा ]शक्ति सहित शिव का भी प्रतीक
    मानता है और उसके पान से उल्लसित हो योगिनी के साथ विहार करते हुए अपने को कैलास स्थित शिव उमा जैसा अनुभव करता है |मद्य ,मांस ,मत्स्य ,मुद्रा और मिथुन इस पंचमकारों के साथ कापालिकों ,शाक्तों और वज्रयानी सिद्धों का समानतः सम्बन्ध था और पूर्व मध्यकाल की साधनाओं में इनका महत्वपूर्ण स्थान था |
                  कापालिक साधना एक वाम मार्गीय तीव्र
    प्र
    भावी साधना पद्धति रही है जिससे इसके साधकों
    को अतुलनीय शक्तियां और सिद्धियाँ प्राप्त होती थी ,चूंकि यह कुंडलिनी से सम्बंधित साधना भी रही है और इसमें नारी को भी सहयोगिनी बनाया जाता रहा है ,इसलिए
    कापालिक
    साधना को विलास और वैभव का परिरूप मानकर आकर्षणबद्ध कई साधक इसमें शामिल हुए और उद्देश्य पवित्र
    होने से उचित स्थान नहीं प्प्राप्त कर सके ,किन्तु
    उन्होंने इसे भोग का मार्ग बना दिया और इसके मूल स्वरुप
    को विकृत जरुर कर दिया |मूल कापालिक ,समाज से दूर रहा और धीरे धीरे इन तथाकथित कापालिकों को देखकर निर्लिप्त होता गया और मूल साधना लगभग विलुप्त हो गई |मूल अर्थों में कापालिकों की चक्र साधना एक उत्तमोत्तम साधना थी किन्तु इसे भोग विलास तथा काम पिपासा शांत करने का साधन बना दिया गया |इसमें आई विकृतियों और भ्रष्ट
    साधकों के कारण धीरे धीरे इस मार्ग को घृणा भाव से देखा जाने लगा |जो सही अर्थों में कापालिक थे ,उन्होंने पृथक पृथक होकर व्यक्तिगत साधनाएं शुरू कर दी |आदि शंकराचार्य तक आते आते इसका मूल स्वरुप विलुप्त होकर विकृत रूप ही दिख रहा था |आदि शंकराचार्य ने कापालिक सम्प्रदाय में
    अनैतिक
    आचरण का विरोध किया ,जिससे इस सम्प्रदाय का एक बहुत बड़ा हिस्सा
    नेपाल के सीमावर्ती इलाके में तथा तिब्बत में चला गया |यह सम्प्रदाय तिब्बत में लगातार गतिशील रहा ,जिससे की बौद्ध कापालिक साधना के रूप में यह सम्प्रदाय जीवित रह सका |
    असंख्य इतिहारकार मानते हैं की इसी सम्प्रदाय से शैव शाक्त कौल मार्ग का प्रचलन
    हुआ |इस सम्प्रदाय से सम्बंधित साधनाएं अत्यधिक महत्वपूर्ण रही हैं |कापालिक चक्र में मुख्य साधक भैरव तथा साधिका को त्रिपुर सुन्दरी कहा जाता है ,तथा काम शक्ति के विभिन्न साधन से इनमे असीम शक्तियां जाती हैं |फल की इच्छा मात्र से अपने शारीरिक अवयवों पर नियंत्रण रखना या किसी भी प्रकार
    के निर्माण तथा विनाश करने की बेजोड़ शक्ति इस मार्ग से प्राप्त की जा सकती थी |इस मार्ग में कापालिक अपनी भैरवी साधिका को पत्नी के रूप में भी स्वीकार कर सकता था |इनके मठ जीर्ण शीर्ण अवस्था
    में उत्तरी
    पूर्व राज्यों में आज भी देखे जाते हैं |
                 कापालिक साधनाओं में महाकाली ,भैरव ,चाण्डाली ,चामुंडा ,शिव तथा त्रिपुरा जैसे देवी देवताओं की साधना होती है |वहीं बौद्ध कापालिक साधना में वज्र भैरव ,महाकाल ,हेवज्रा जैसे तिब्बती देवी देवताओं की साधना होती है |पहले के समय में मन्त्र मात्र से मुख्य कापालिक ,साथी कापालिकों की काम शक्ति को न्यूनता या उद्वेग
    देते थे ,जिससे योग्य मापदंड में यह साधना पूरी होती थी |इस प्रकार
    यह अद्भुत
    मार्ग लुप्त होते हुए भी गुप्त रूप से सुरक्षित तो है पर सामान्य के लिए अप्राप्य है |विभिन्न तांत्रिक मठों में आज भी गुप्त रूप से कापालिक अपनी तंत्र साधनाओं को करते हैं |
    जो समाज में भैरवी साधना करने या करवाने के दावे कर रहे अथवा जो हिमालय क्षेत्र के विभिन्न मठों ,आश्रमों के नाम पर खुद को महागुरु प्रचारित कर रहे वास्तव में वह तो भैरवी साधक हैं , कापालिक , कौल |यह केवल इन आश्रमों ,मठों के नाम पर समाज में व्यवसाय कर रहे हैं और लोगों को लूट रहे हैं |जो भोग लिप्सा ,कापालिक सम्प्रदाय को विकृत कर गई आज उससे बढ़कर बचे खुचे तंत्र को भी यह महागुरु घंटाल समाप्त करने पर अमादा हैं |भोली भाली जनता और लोग अपनी समस्याओं से निजात पाने अथवा शक्ति ,समृद्धि पाने के लालच में इनके हाथों मूर्ख बन रहे |वास्तव में जो साधक हैं वह खुद को प्रचारित करते हैं , खुद को व्यक्त करते हैं |उनका तो बस एक ही लक्ष्य होता है अपनी मुक्ति |चूंकि उनके पास शक्ति और सिद्धि होती है अतः इस तरह प्रचार करने और दीक्षाएं बांटने की उन्हें जरुरत ही नहीं होती |वह तो समाज और लोगों से दूर खुद में रमा रहता है |समाज में रहने वाला कुंडलिनी साधक तक खुद को कभी व्यक्त नहीं करता |……………………………………………….हर– हर महादेव 

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  • मूलाधार चक्र के जागरण पर क्या शक्तियां /सिद्धियाँ मिलती हैं ?

    मूलाधार के जागरण से भौतिक जीवन में क्या लाभ होते हैं ?

    —————————————————
    सामान्य रूप से योग मार्ग व्यक्ति को कठोरता से स्व नियंत्रण की बात करता
    है अतः इससे कुंडलिनी जागरण पर सामान्य जीवन में कम ही साधक शक्तियों का उपयोग
    करते है और उनकी मन स्थिति पहले ही ऐसी बन जाती है की वह समाज से एकाकी होने लगते
    हैं |अधिकतर कुंडलिनी शक्ति का उपयोग तंत्र मार्गीय साधक ही भौतिक जीवन में करते
    हैं ,क्योंकि तंत्र मार्ग से कुंडलिनी साधना भोग से मोक्ष की ओर की प्रक्रिया पर
    आधारित होती है |मूलाधार के जाग्रत हुए बिना कुंडलिनी जागरण नहीं होता और मूलाधार
    जागरण ही सबसे कठिन होता है |मूलाधार जागरण से ही सबसे अधिक शक्तियां और सिद्धियाँ
    भी मिलती हैं तो सबसे अधिक पतित भी साधक इसी चक्र के प्रभाव से होते हैं |योग में
    इस चक्र के जागरण के पूर्व की साधक शरीर और मन को नियंत्रित भी कर चूका होता है और
    योग से जागरण धीरे धीरे भी होता है अतः पतन कम होता है किन्तु तंत्र मार्ग में भोग
    से साधना होने से काम शक्ति की प्रमुखता होती है अतः कामशक्ति के तीव्र ऊर्जा
    प्रवाह से जागरण होने पर मूलाधार का जागरण जल्दी तो होता है किन्तु इसका प्रभाव
    इतना तीव्र होता है की व्यक्ति इन सिद्धियों के चक्कर में फंसकर भोग की ओर भागने
    लगता है |बहुत ही कम साधक इस तीव्र ऊर्जा प्रवाह को नियंत्रित कर आगे बढ़ पाते हैं
    और तब उनकी कुंडलिनी का जागरण योग मार्ग की अपेक्षा बहुत ही कम समय में हो जाता है
    |हम आपको अब बताते हैं की कुंडलिनी में मूलाधार के जागरण से क्या -क्या सिद्धियाँ
    ,क्या क्या उपलब्धियां प्राप्त होती हैं और कैसे व्यक्ति मानव से महामानव बन जाता
    है |उसका जीवन कैसे बदलता है ,भौति जीवन में उसे क्या लाभ प्राप्त होते हैं ,वह
    क्या -क्या कर सकता है |
    मूलाधारचक्र वह चक्र है जहाँ पर शरीर का संचालन वाली कुण्डलिनी महाशक्ति ,शक्ति से युक्त मूल’ आधारित अथवा स्थित है। यह चक्र शरीर के अन्तर्गत गुदा और लिंग मूल के मध्य में स्थित है जो अन्य स्थानों से कुछ उभरा सा महसूस होता है। शरीर के अन्तर्गत मूल’, शिवलिंग आकृति का एक मांस पिण्ड होता है, जिसमें शरीर की संचालिका शक्ति रूप कुण्डलिनीशक्ति साढ़े तीन फेरे में लिपटी हुई शयनमुद्रा में रहती है। चूँकि यह कुण्डलिनी जो शरीर की संचालिका शक्ति है और वही इस मूल रूपी मांस पिण्ड में साढ़े तीन फेरे में लिपटी रहती है इसी कारण इस मांसपिण्ड को मूल और जहाँ यह आधारित है, वह मूलाधारचक्र कहलाता है।मनुष्य में रीढ़ के
    नीचे तिकोनी हड्डी और मांस पिंड तो होता है किन्तु भौतिक रूप से कुंडलिनी को वहां
    नहीं देखा जा सकता क्योंकि यह सूक्ष्म शरीर में स्थित ऊर्जा है |इसकी कोई भी
    क्रिया भौतिक शरीर को तुरंत प्रभावित करती है ,भौतिक शरीर की उर्जा इसे प्रभावित
    करती है किन्तु फिर भी इसका भौतिक अस्तित्व नहीं होता ,जैसे कि आपमें प्राण तो
    होते हैं किन्तु आप उसे देख नहीं सकते |प्राण को देखन के लिए आपको कुंडलिनी के
    किसी चक्र को जगाना होगा |
    मूलाधारचक्र अग्नि वर्ण का त्रिभुजाकार एक आकृति होती है जिसके मध्य कुण्डलिनी सहित मूल स्थित रहता है| इस त्रिभुज के तीनों उत्तंग कोनों पर इंगला, पिंगला और सुषुम्ना आकर मिलती है| इसके अन्दर चार अक्षरों से युक्त अग्नि वर्ण की चार पंखुणियाँ नियत हैं। ये पंखुणियाँ अक्षरों से युक्त हैं वे , , , यहाँ के अभीष्ट देवता के रूप में गणेश जी नियत किए गए हैं ,जबकि यहाँ की मूल शक्ति काली हैं जिनको केवल गणेश की शक्ति से ही
    संतुलित किया जा सकता है ,बिना विवेक के यह शक्ति महिसासुर बना देती है ।
    जो साधक साधना के माध्यम से कुण्डलिनी जागृत कर लेता है अथवा जिस साधक की स्वासप्रस्वास रूप साधना से जागृत हो जाती है ,और जागृत अवस्था में उर्ध्वगति में जब तक मूलाधार में रहती है,, तब तक वह साधक गणेश जी की शक्ति से युक्त व्यक्ति हो जाता है|जागरण की अवस्था में काली का प्रभाव पूर्ण
    शक्ति से उदित होता है जिसे यदि नियंत्रित कर लिया गया तभी साधक गणेश की शक्ति से
    युक्त हो पाता है
    ,अन्यथा साधक
    पतित हो जाता है |
     मनुष्य के मूलाधार चक्र में कुंडलिनी का सम्पर्क तंतु है जो व्यक्ति सत्ता को विश्व सत्ता के साथ जोड़ता है कुण्डलिनी जागरण से चक्र संस्थानों में जागृति उत्पन्न होती है उसके फलस्वरूप पारभौतिक (सुपर फिजीकल) और भौतिक (फिजीकल) के बीच आदानप्रदान का द्वार खुलता है यही है वह स्थिति जिसके सहारे मानवी सत्ता में अन्तर्हित दिव्य शक्तियों का जागरण सम्भव हो सकता है |मूलाधार चक्र में वीरता और आनन्द भाव का निवास है मूलाधार का जागरण योग के
    अंतर्गत योगासनों ,मुदाओं और ध्यान साधना से की जाती है ,जबकि तंत्र में इसका
    जागरण भैरवी तंत्र या कौल तंत्र के अंतर्गत की जाती है जहाँ मनुष्य की जनन शक्ति
    की मुख्य भूमिका होती है और यौनांगों की क्रिया होती है जिससे तीव्र उर्जा उत्पन्न
    कर नियंत्रण रखते हुए कुंडलिनी जागरण किया जाता है |एक और मार्ग से मूलाधार का
    जागरण होता है और यह मार्ग है महाविद्या साधना |महाविद्या में काली साधना से काली
    की सिद्धि होने पर मूलाधार चक्र का जागरण होता है किन्तु पूर्ण कुंडलिनी पर इसका
    प्रभाव तभी होता है जब काली का प्रत्यक्षीकरण हो जाय और वह इच्छानुसार क्रिया करने
    लगे |इस स्थिति में काली की उर्जा व्यक्ति में इतनी बढती है की उसकी कुंडलिनी
    जाग्रत हो जाती है |
    मूलाधार चक्र के जाग्रत हो जाने पर जब साधक या सिद्ध व्यक्ति सिद्धियों के चक्कर अथवा प्रदर्शन में फँस जाता है तो, उसकी कुण्डलिनी उर्ध्वमुखी से अधोमुखी होकर पुनः शयनमुद्रा में चली जाती है, जिसका परिणाम यह होता है की वह सिद्धसाधक सिद्धि का प्रदर्शन अथवा दुरुपयोग करतेकरते पुनः सिद्धिहीन हो जाता है| परिणाम यह होता है कि वह उर्ध्वमुखी यानि सिद्ध योगी तो बन नहीं पाता, सामान्य सिद्धि से भी वंचित हो जाता है| परन्तु जो साधक सिद्धि की तरफ ध्यान देकर निरन्तर मात्र अपनी साधना करता रहता है. उसकी कुण्डलिनी उर्ध्वमुखी के कारण ऊपर उठकर स्वासप्रस्वास रूपी डोरी (रस्सी) के द्वारा मूलाधार से स्वाधिष्ठानचक्र में पहुँच जाती है|
    जब प्रयत्नशील योगसाधक जब किसी महापुरूष का सान्निध्य प्राप्त करता है तथा अपने मूलाधार चक्र का ध्यान उसे लगता है तब उसे अनायास ही क्रमशः सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है। वह योगी देवताओं द्वारा पूजित होता है तथा अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त कर वह त्रिलोक में इच्छापूर्वक विचरण कर सकता है। वह मेधावी योगी महावाक्य का श्रवण करते ही आत्मा में स्थिर होकर सर्वदा क्रीड़ा करता है। मूलाधार चक्र का ध्यान करने वाला साधक दादुरी सिद्धि प्राप्त कर अत्यंन्त तेजस्वी बनता है। उसकी जठराग्नि प्रदीप्त होती है तथा सरलता उसका स्वभाव बन जाता है। वह भूत, भविष्य तथा वर्त्तमान का ज्ञाता, त्रिकालदर्शी हो जाता है तथा सभी वस्तुओं के कारण को जान लेता है। जो शास्त्र कभी सुने हों, पढ़े हों, उनके रहस्यों का भी ज्ञान होने से उन पर व्याख्यान करने का सामर्थ्य उसे प्राप्त हो जाता है। मानो ऐसे योगी के मुख में देवी सरस्वती निवास करती है। जप करने मात्र से वह मंत्रसिद्धि प्राप्त करता है। उसे अनुपम संकल्पसामर्थ्य प्राप्त होता है।
    जब योगी मूलाधार चक्र में स्थित स्वयंभु लिंग का ध्यान करता है, उसी क्षण उसके पापों का समूह नष्ट हो जाता है। किसी भी वस्तु की इच्छा करने मात्र से उसे वह प्राप्त हो जाती है। जो मनुष्य आत्मदेव को छोड़कर बाह्य देवों की पूजा करते हैं, वे हाथ में रखे हुए फल को छोड़कर अन्य फलों के लिए इधरउधर भटकते हैं। अतः सुज्ञ सज्जनों को आलस्य छोड़कर शरीरस्थ शिव का ध्यान करना चाहिए। यह ध्यान परम पूजा है, परम तप है, परम पुरूषार्थ है।
    मूलाधार के अभ्यास से छः माह में ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इससे सुषुम्णा नाड़ी में वायु प्रवेश करती है। ऐसा साधक मनोजय करके परम शांति का अनुभव करता है। उसके दोनों लोक सुधरसँवर जाते हैं।योग मार्ग द्वारा सम्यक प्राणायाम ,आसन ,मुद्राओं और एकनिष्ठ ध्यान से ही ६ महीने से एक साल में इसका जागरण
    होता है जबकि व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान हो ,योग्य गुरु का मार्गदर्शन हो और शरीर योग
    और प्राणायाम से शुद्ध हो चूका हो |शुरूआती चरणों और शरीर शुद्धता तथा योग्य बनने
    में ही अधिक समय लगता है जिसमें वर्षों लगते हैं |
             तंत्र में इसी चक्र का
    महत्व सर्वाधिक होता है ,क्योकि यही चक्र जाग्रत करना सबसे कठिन होता है |इसके
    जाग्रत और उर्ध्वमुखी होते ही अन्य चक्र आसानी से क्रियाशील हो सकते हैं किन्तु यह
    जाग्रत ही जल्दी नहीं होता |अगर हो भी गया तो सबसे पहले इसका प्रभाव इतना बढ़ता है
    की व्यक्ति के पतित होने की ही संभावना अधिक होती है |तंत्र इसीलिए पृथ्वी का सबसे
    कठिन साधना मार्ग है की यह सबसे पहले इस मूलाधार के महिसासुर को ही नियंत्रित करता
    है जिससे बाद के देवता स्वतः अनुकूल होने लगते हैं |इसे ही तंत्र जगाकर नियंत्रित
    करता है जबकि योग मार्ग इस पर ध्यान लगाकर इसे क्रियाशील करता है |यह सभी भौतिक
    ,लौकिक ,तामसिक सिद्धियों का केंद्र है जिस पर नियंत्रण से भैरव ,काली ,डाकिनी
    ,शाकिनी ,भूत ,पिशाच ,यक्षिणी ,अप्सरा ,जैसी समस्त शक्तियां नियंत्रण में आने लगती
    हैं |इनकी साधना विशेष रूप से करने की आवश्यकता नहीं होती अपितु थोड़े प्रयास से
    ,थोड़ी तकनीकियों का प्रयोग से ,थोड़े से साधना से इन शक्तियों की सिद्धि होने लगती
    है |यह कुछ ऐसा ही होता है जैसे अतिथि दरवाजे पर आये जिसकी आवभगत करके घर में
    बैठाना होता है |मूलाधार के जागरण से व्यक्ति भूत -प्रेत -ब्रह्म -पिशाच बाधा हटा
    सकता है ,भूत -भविष्य जान सकता है ,किसी के रोग -कष्ट दूर कर सकता है ,नकारात्मकता
    हटा सकता है ,शरीर का ऊर्जा प्रवाह सुधार सकता है |उसके आशीर्वाद और श्राप फलित
    होने लगते हैं |मूलाधार के जाग्रत होने का अर्थ है भगवती काली की शक्तियों का
    जागना ,क्योंकि मूलाधार के केंद्र में ही काली का डाकिनी स्वरुप होता है और यह
    स्वरुप बेहद उग्र है |सम्पूर्ण मूलाधार में काली की ही शक्तियाँ स्थित होती हैं
    ,अतः चाहे योगी हो अथवा तांत्रिक मूलाधार जागरण पर उग्रता ,तामसिकता ,भौतिकता
    ,विलासिता ,कामुकता के भाव एक बार उभरते जरुर हैं और इन्हें ही नियंत्रित रखते हुए
    सतत साधना रत रह कुंडलिनी शक्ति को स्वाधिष्ठान तक उठाया जाता है जहाँ यह सब
    महिसासुर वाले भावों का वहां दुर्गा संहार कर देती हैं और व्यक्ति इन भावों पर विजय
    पा लेता है |
    मूलाधार के जागरण से शरीर का आभामंडल अर्थात औरा
    बदल जाती है ,शरीर तेज युक्त हो जाता है ,आँखों का तेज ऐसा हो जाता है की सामने
    वाला सहन नहीं कर पाता |यहाँ की शक्तियाँ मष्तिष्क के तरंगों के साथ क्रिया करते
    हुए व्यक्ति के सोचने की दिशा से उस लक्ष्य तक पहुँच क्रिया करने लगती हैं जहाँ
    व्यक्ति सोच रहा होता है ,इससे व्यक्ति के कोई कार्य करने के पहले ही सफलता की
    दिशा में कार्य होने का वातावरण बनने लगता है |व्यक्ति किसी को भी थोड़े एकाग्रता
    के साथ कोई भी संदेश दे सकता है और वह व्यक्ति इसे स्वप्न अथवा अचेतन के विचार के
    रूप में सुन लेगा |मूलाधार चक्र जाग्रत व्यक्ति जहाँ भी जाता है एक दबंग और उग्र
    व्यक्ति का उसका प्रभाव लोगों पर पड़ता है भले वह उग्रता न दिखाए किन्तु अनजाना भय
    लोगों में उत्पन्न होता ही है |ऐसे व्यक्ति पर की गयी कोई तांत्रिक क्रिया
    प्रभावहीन हो जाती है अथवा पलटकर करने वाले का ही नुकसान करती है |व्यक्ति का साहस
    ,आत्मबल ,आत्मविश्वास ,कर्मठता ,क्षमता ,प्रभावशालिता बहुत बढ़ जाती है जिससे उसकी
    सफलता कई गुना बढ़ जाती है तथा उसके आय के अनेक स्रोत अपने आप बनते जाते हैं |वह
    ऐसा हो जाता है की लोग उससे मदद मांगते हैं और उसे किसी के मदद की जरूरत नहीं होती
    |समृद्धि ,सम्पत्ति ,भौतिक सुखों से व्यक्ति परिपूर्ण तो होता ही है ,अत्यंत उच्च
    कोटि की आध्यात्मिक शक्ति भी उसमे होती है |इसी प्रकार ऐसे हजारों लाभ हैं जो
    मूलाधार के जागरण पर प्राप्त होते हैं ,,जिन्हें लिखने या बताने में कई पोस्ट कम
    पड़ जायेंगे |यदि आप भौतिक जीवन में सुखी रहते हुए आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं तो
    कुंडलिनी और मूलाधार जागरण का प्रयास करें |गुरु तलाश करें और साधना में भी थोडा
    समय दें तो आपका बहुविध कल्याण होगा |धन्यवाद
    ………………………………………………..हरहर
    महादेव

    READ MORE: मूलाधार चक्र के जागरण पर क्या शक्तियां /सिद्धियाँ मिलती हैं ?
  • कुंडलिनी तंत्र साधना में प्रवेश कैसे हो ?

    कुंडलिनी तंत्र साधना में प्रवेश
    ====================
    अक्सर हमारे पास युवकों ,युवतियों ,साधकों ,साधिकाओं के फोन ,मेसेज आदि
    आते रहते हैं जिनमें अधिकतर भैरवी साधना के इच्छुक होते हैं ,किन्तु कठिनतम साधना
    पद्धति होने से अधिकतर इसके लिए अयोग्य होते हैं अथवा आसान या भौतिक सुख की
    उपलब्धी के लालच में ही अधिकतर सम्पर्क किये जाते हैं |यद्यपि यह साधना प्रत्येक
    गृहस्थ के योग्य बनाया गया था किन्तु आज के समय में योग्यता और पात्रता इस मार्ग
    में इतनी कठिन और दुर्लभ है की लाखों में कोई एक इस साधना के योग्य होता है |पहले
    के समय में गुरु श्रद्धा और समर्पण पूरी तरह था अतः तब सबके अनुकूल था ,आज श्रद्धा
    ,समर्पण के अभाव से यह साधना कठिनतम की श्रेणी में आ गयी है |
    आज के समय में कुंडलिनी तंत्र साधना सीखना और जानना तो बहुत लोग चाहते हैं
    किन्तु वास्तविक योग्यता और पात्रता अधिकतर के पास नहीं होती साथ ही वास्तविक गुरु
    मिलना तो आज भूसे के ढेर में सुई ढूँढने जैसा है |कोई भी वास्तविक साधक और गुरु
    खुद को कभी व्यक्त नहीं करता और समाज में सामान्य जीवन जीते हुए भी किसी को पता
    नहीं लगने देता की वह कुंडलिनी तंत्र का साधक है |खुद को व्यक्त करने वाले अथवा
    खुद को इस विद्या का गुरु बताने वाले अथवा कैम्प ,शिविर चलाने वाले अधिकतर की चाह
    भौतिक होती है जबकि वास्तविक कुंडलिनी साधक भौतिकता से दूर अपने उद्देश्य पर
    एकाग्र होता है ऐसे में आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं की समाज में दिखावा करने
    वाले गुरु कैसे होंगे और इनका उद्देश्य क्या होगा |इस विद्या को सीखने के इच्छुक
    लोग भी वास्तव में इसमें भौतिकता ,सिद्धि अथवा शक्ति की इच्छा से ही आते हैं जबकि
    यह मोक्ष का मार्ग है और केवल एक प्रतिशत लोग ही इस उद्देश्य से इस क्षेत्र में
    आते हैं ,इसीलिए अधिकतर वास्तविक साधक और गुरु यही कहते रहते हैं की वह इस विद्या
    को नहीं सिखाए या नहीं जानते |यह परीक्षण में नहीं पड़ना चाहते और अपना समय व्यर्थ
    नहीं गंवाना चाहते शिष्यों आदि के चक्कर में |बहुत योग्य शिष्य मिलने पर ही यह उसे
    कुछ बताने को तैयार होते हैं जबकि आज के शिष्यों में धैर्य और समर्पण की नितांत
    कमी देखी जाती है |पहले के समय में इस विद्या के आश्रम और साधना स्थल गुप्त
    स्थानों और जंगलों में होते थे और आज भी कुछेक हैं किन्तु वहां सामान्य लोगों का
    प्रवेश सम्भव नहीं केवल साधना को ही जीवन बना चुके लोगों के लिए वहां स्वीकार्यता
    है |चूंकि मूलतः यह विद्या गृहस्थ के अनुकूल रही अतः इसके साधक आज अधिकतर समाज में
    ही मिलते हैं किन्तु वह इसे गोपनीय रखते हैं क्योंकि समाज इस विद्या के रहस्य को
    समझ नहीं पाता तथा इसे भोग मानता है |धारा के विपरीत चलने वाली साधना को धार्मिक
    वर्ग भी अपने लिए खतरा मानता रहा है अतः इसके सम्बन्ध में भ्रांतियां भी बहुत
    फैलाई गयी हैं तथा इसे ध्रिनास्पद प्रचारित किया गया है |वास्तविकता यह है की यह
    मोक्ष मार्गीय साधना है जो गृहस्थ अपने पारिवारिक दायित्व पूर्ण करते हुए भी अपने
    साथी के साथ साधनारत रहते हुए वह सबकुछ पा सकता है जो एक योगी और सन्यासी पा सकता
    है |
          इस क्षेत्र में प्रवेश भी
    अति कठिन है और साधना तो अत्यंत कठिन है ही |यहाँ हर कार्य धारा के विपरीत है और
    हर क्रिया में आत्मबल की आवश्यकता है |प्रत्येक जीव की प्रवृत्ति इस पृथ्वी पर
    अधोगामी है जिसमें वह जन्म लेकर पृथ्वी पर गिरता है ,जीवन भर पृथ्वी पर गिरता
    -पड़ता रहता है ,पृथ्वी पर ही और पृथ्वी से उत्पन्न तत्वों पर ही अपनी ऊर्जा फेंकता
    रहता है तथा अंततः पृथ्वी पर ही बिखर जाता है |मनुष्य की ऊर्जा की प्रवृत्ति भी
    अधोगामी होती है और इसे भी अपनी ऊर्जा को अधोगामी रखने में ही सुख महसूस होता है
    क्योंकि यह सामान्य प्रकृति है |बलात्कार ,बलात संग ,छेड़छाड़ ,गलत दृष्टि ,विपरीत
    लिंगी के प्रति आकर्षण ,असंतुष्टि आदि सभी के पीछे मनुष्य की यही अधोगामी
    प्रवृत्ति है जिससे वह हमेशा पतित होना चाहता है ,उसे ऊर्जा फेंकने में सुख महसूस
    होता है ,उसकी उर्जा गिरना चाहती है |यह सृष्टि रचना अर्थात नए मनुष्य की उत्पत्ति
    अर्थात संतानोत्पत्ति तक तो ठीक है ,यही इसका उद्देश्य भी होता है किन्तु मनुष्य
    इससे भी अलग इसका दुरुपयोग करता है या इसे यहाँ वहां फेंकता फिरता है ,इसमें उसे
    सुख मिलता है |इस सामान्य प्रवृत्ति के विपरीत जाकर इसे नीचे गिरने से रोक देना हर
    धर्म -सम्प्रदाय में सिद्धि और शक्ति प्राप्ति का स्रोत माना गया है |इसे ही
    ब्रह्मचर्य कहा गया है |सामान्यतया ब्रह्मचर्य का अर्थ संसर्ग विहीन होना माना
    जाता है अर्थात अपनी ऊर्जा को रोक लेना |इससे उर्जा संचित हो शक्ति देती है |हर
    साधना -उपासना में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने को कहा जाता है क्योंकि इससे
    शक्ति प्राप्त होती है जो सिद्धि में सहायक होती है |यही ऊर्जा जब अधोमुखी न होकर
    उर्ध्वमुखी हो जाती है तो कुंडलिनी जाग्रत कर देती है |
      जब सामान्य ब्रह्मचर्य अर्थात
    बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के सामान्य रूप से ऊर्जा पतन को रोक लेने से शक्ति और
    सिद्धि आसान हो जाती है तो सोचिये इस ऊर्जा को तीव्रतम स्थिति तक बढाकर यदि रोक
    दिया जाय तो यह कितनी तीव्र क्रिया करेगी |कुंडलिनी तंत्र साधना इसलिए ही अति कठिन
    है की इस उर्जा को तीव्र करते हुए रोक कर उर्ध्वगामी किया जाता है जिससे सामान्य
    स्थिति की तुलना में कई गुना अधिक शक्ति से ऊर्जा उठती है और चक्रों का भेदन कर
    कुंडलिनी जागरण करती है |वर्षों की साधना ,तपस्या के परिणाम महीनों में मिलते हैं
    और व्यक्ति को भौतिक के साथ ही आध्यात्मिक उपलब्धियां भी शीघ्र ही प्राप्त होती
    हैं |
          इस क्षेत्र में प्रवेश ही
    सबसे कठिन है क्योंकि कोई भी गुरु किसी भी सामान्य व्यक्ति को शिष्य नहीं बनाता
    |वह योग्यता और क्षमता देखता है |हमने अपने अनुभव के आधार पर एक प्रक्रिया बनाई है
    जो किसी किताब में ,किसी शास्त्र में नहीं है और पूरी तरह खुद की सोच और अनुभव की
    देन है |यह प्रक्रिया उन लोगों में योग्यता और क्षमता उत्पन्न करने के लिए है जो
    वास्तव में इस क्षेत्र में प्रवेश करना चाहते हैं |यह प्राथमिक चरण है अपनी ऊर्जा
    बढाने और योग्य बनने का जब तक की गुरु न मिल जाय |हर गुरु और सम्प्रदाय की अलग
    -अलग प्रक्रिया होती है जो वह अपने निर्देशन में कराते हैं किन्तु सभी व्यक्ति की
    क्षमता और योग्यता परखने के बाद ही कुछ सिखाना शुरू करते हैं |इस प्रक्रिया को
    अपनाकर आप योग्य बन सकते हैं |आप गुरु तलाशते रहें तथा बताई जा रही साधना करते
    रहें तो आपमें शक्ति और क्षमता उत्पन्न हो जायेगी और गुरु आपको स्वीकार कर ले इसकी
    सम्भावना बढ़ जायेगी |
           सबसे पहला काम तो यह करें
    की अपने आज्ञा चक्र की तरंगों को नियंत्रित करें अर्थात विचारों को नियंत्रित करें
    |व्यक्ति के विचार गणेश जी के सूंड की तरह हमेशा हिलते डुलते यानी यहाँ वहां भागते
    रहते हैं |इन्हें नियंत्रित किये बिना कोई साधना सफल नहीं हो सकती |आज्ञा चक्र का
    आधिपत्य गणेश जी को प्राप्त है और यही सभी सफलताओं का केंद्र है |इनकी कृपा बिना
    कोई कार्य सफल नहीं हो सकता तो सबसे पहले यहीं से शुरू करना होगा |इसके लिए आप
    ध्यान करें अथवा त्राटक करें |गणपति पर ध्यान करते हुए उन्ही पर एकाग्र हो अपने
    विचारों नियंत्रित और संतुलित करें |यह क्रिया सुबह -सुबह मात्र १५ मिनट करें पूरी
    एकाग्रता से |सुबह का अर्थ सुबह ही है दिन के दस बजे आप सोकर उठते हों तो वह सुबह
    नहीं है |इसे तो
    5 बजे ही करना होगा
    |इस अवधि में आप चाहें तो गणपति का मंत्र जप भी कर सकते हैं |इसके साथ ही आप
    रात्री दस बजे कालिका सहस्त्रनाम का पाठ रोज करें पूरे नियम से |नियम और तरीका के
    साथ सहस्त्रनाम का पाठ हमने अपने पहले के विडिओ में महाकाली की सिद्धि और साधना
    कैसे हो नाम से प्रकाशित कर रखा है आप उसे देख सकते हैं |यह दोनों क्रिया आप
    लगातार १०८ दिन तक अनवरत करें और हाँ सबसे जरुरी बात इस १०८ दिन तक आपको अखंड
    ब्रह्मचर्य का पालन करना है |अगर आप इस अवधि के बीच ब्रह्मचर्य तोड़ते हैं या किसी
    कारण टूटता है तो आपको फिर से १०८ दिन का अखंड ब्रह्मचर्य का पालन दोनों पूजा
    -साधना पद्धति के साथ करना होगा |१०८ दिन की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद आपको
    पुनः १०८ दिन की यही प्रक्रिया दोहरानी है किन्तु यहाँ आपको सुबह के ध्यान में
    निर्विकार होना है या शिव -शक्ति के एकीकृत स्वरुप पर ध्यान करना है |आपका विचार
    निर्विकार हो या शिव शिवा पर केन्द्रित होना चाहिए भटकना नहीं चाहिए |रात के पाठ
    की जगह आप काली के मन्त्रों का जप कम से कम आधा घंटा करेंगे रात १० बजे के बाद और
    हाँ यहाँ आपको पूरी तरह निर्वस्त्र होकर जप करना है बाल बिखेरकर खुद को ही काली या
    भैरव स्वरुप मानते हुए |इस १०८ दिन की प्रक्रिया में भी पूर्ण अखंड ब्रह्मचर्य का
    पालन करना है |
    इन दो चरण की प्रक्रिया पूर्ण करने के बाद आप कुंडलिनी तंत्र साधना में
    प्रवेश के योग्य बन जाए हैं यदि आपमें कोई शारीरिक कमी नहीं है तो |इन चरणों के
    बाद आपका आभामंडल परिवर्तित हो जाएगा |आपका आत्मविश्वास बढ़ जाएगा |आपकी सफल बढ़
    जायेगी जीवन के हर क्षेत्र में |आपमें अतीन्द्रिय शक्ति का उदय होगा और आपमें काली
    की शक्ति आ जायेगी जिससे आपके सोचे हुए कार्यों की सफलता का प्रतिशत बढ़ जाएगा
    |आपकी और आसपास की नकारात्मकता का ह्रास होगा |मूलाधार सशक्त होगा और एकाग्रता बढ़
    जायेगी जिससे याददास्त तो सुधरेगी ही अवचेतन की सक्रियता भी बढ़ जायेगी |आपमें वह
    योग्यता विकसित होगी जो कुंडलिनी तंत्र साधना में आवश्यक है |आपमें यदि गुरु के
    प्रति श्रद्धा और पूर्ण समर्पण की भावना होगी तो आप सफल हो जायेंगे |चूंकि यह
    क्षेत्र जन्म मरण के चक्र से मुक्ति का तो है ही उससे भी आगे पूर्ण मोक्ष का है
    अतः यहाँ गुरु को जब तक खुद को पूर्ण समर्पित नहीं कर देंगे आपकी सफलता संदिग्ध
    होगी |गुरु भांप लेगा आपको और फिर वह अपना सबकुछ नहीं देगा |जितना आपकी श्रद्धा और
    समर्पण होगा उतना ही वह आपको देगा |चूंकि यह क्षेत्र सांसारिक जीवन से जुड़ा है अतः
    गुरु को पूर्ण सांसारिक जीवन समर्पित कर देना होता है और फिर उसके निर्देशों के
    अनुसार चलना होता है तभी पूर्णता सम्भव है |……………………………………………हर हर महादेव 

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  • कुंडलिनी तंत्र साधना के नियम

    कुंडलिनी
    तंत्र साधना के नियम  
    ————————————
    . पूर्ण गोपनीयता का ध्यान रखते हुए गुरु के
    निर्देशों का पालन और प्रदत्त मार्ग का अनुसरण आवश्यक तत्व है इस साधना पद्धति में
    |अपने विचार और अपनी बुद्धि का प्रयोग तकनिकी रूप से न करें |
    . स्वयं को भैरव अर्थात शिवांश मानते हुए
    सहयोगिनी को भैरवी अर्थात देवी मानें और पूर्ण श्रद्धा की भावना से पूज्य रूप में
    ही साधना करें |सदैव मन में रहे की भगवती की ही कृपा से उनके ही द्वारा आपको शक्ति
    और साधना में सफलता मिलेगी |
    . किसी भी प्रकार के भोग अथवा पतन के विचार मन
    में नहीं आने चाहिए |
    . गुरु पत्नी ,बहन ,भाई की पत्नी ,पुत्री
    ,पुत्रवधू के साथ कभी न तो साधना होती है न ही कल्पना की जा सकती है |यह सदैव
    ध्यान रखें |
    ५.
    स्वयं को शुद्ध और पवित्र रखें
    |
    आचरण को शुद्ध रखते हुए सत्य बोलना और सभी से विनम्रतापूर्वक मिलना आवश्यक है |
    . स्वयं की दिनचर्या में सुधार करते हुए जल्दी
    उठना और समय पर सोना |प्रातः और संध्या को प्रार्थना -संध्यावंदन करते हुए नियमित
    प्राणायाम ,धारणा और ध्यान का अभ्यास करना चाहिए |
    ७. भैरवी
    साधना कुंडलिनी जागरण साधना है तंत्र मार्ग से अतः कुंडलिनी प्राणायाम अत्यंत
    प्रभावशाली सिद्ध होते हैं |अपने मन और मष्तिष्क को नियंत्रण में रखकर कुंडलिनी
    योग का लगातार अभ्यास स्वास्थ्य और सफलता की द्रृष्टि से उत्तम होता है |
    . संयम और सम्यक नियमों का पालन करते हुए लगातार
    साधना रत अवस्था में भगवती का ध्यान करने से धीरे धीरे कुंडलिनी जाग्रत होने लगती
    है और जब यह जाग्रत हो जाती है तो व्यक्ति पहले जैसा नहीं रह जाता |वह दिव्य पुरुष
    बन जाता है |
    . साधना में रति की अवस्था में स्खलन नहीं होना
    चाहिए |ऐसा होने पर शक्ति जाती रहती है और जिस चक्र तक स्थिति होती है वहीं वापस आ
    जाती है ,अतः इस बात का ध्यान रखें और सावधान रहें |
    १०. कोई भी ऐसा कार्य अथवा क्रिया न करें जो
    अंतरात्मा की दृष्टि में गलत हो अर्थात जिस कार्य के लिए मन कहे की यह नहीं होना
    चाहिए अथवा यह गलत है वह कार्य न करें क्योंकि गलत होने की भावना आना ही पाप का
    बोधक है तथा पाप का प्रायश्चित करना होता है अतः इससे बचें |
    भैरवी चक्र साधना में साधकसाधिकाओं के लिए निर्देश  
    =====================================
    1.किसी भी नारी कि उपेक्षा या अपमान करें।
    2.कन्याओं को देवी का रूप समझकर उनकी पूजा करें।
    3.कन्याओंनारियों की शक्ति पर सहायता एवं रक्षा करें।
    4.पेड़ काटे, कटवाएं।
    5.मदिरापान या मांसाहार केवल साधना हेतु है। इसे व्यसन बनाये।जो मस्तिष्क और विवेक को नष्ट कर दे; उस मदिरापान से भैरव जी कुपित होकर उसका विनाश कर देते है।
    6.भैराविमार्ग की अपनी साधना को गुप्त रखें, किसी को बताएं।
    7.दिन में सामान्य पूजा करें।साधना 9 से 1 बजे तक रात्रि में प्रशस्त हैं।
    8.नवमी एवं चतुर्दशी को भैरवी में स्थित देवी की पूजा करें।
    9.इस मार्ग के आलोचकों से मत उलझे। इस संसार में भांतिभांति के प्राणी रहते है। सब की प्रवृत्ति एवं एवं सोच अलगअलग होती है। तो किसी को इस मार्ग कि ओर प्रेरित करे, ही विरोध करे।
    10.यह प्रयास रखे कि भैरवी सदा प्रसन्न रहे।
    11.यदि वह मांसाहारी नहीं है; तो वानस्पतिक गर्म और कामोत्तेजक पदार्थों का सेवन करें और विजया से निर्मित मद का प्रयोग करें।
    अन्य जानकारियाँ
    11.आसन, वस्त्र लाल होते हैं। एक वस्त्र का प्रयोग करे, जो ढीला हो। कुछ सिले हुए वस्त्र की भी वर्जना करते हैं।
    12.पूजा केवल नवमीचतुर्दशी को होती है। अन्य तिथियों में केवल साधना होती है।
    13.साधना के अनेक स्तर है। यहाँ सामान्य स्तर दिया गया है। भैरवी को सामने बैठाकर देवीरुप कल्पना में मंत्र जप करने से मन्त्र सिद्ध होते है।
    14.मूलाधार के प्लेट के नीचे से खोपड़ी कि जोड़ तक और सिर के चाँद तक में मुख्य चक्र होते है। साधकसाधिका को इस पर जैतून या चमेली के तेल की मालिश करते रहना चाहिए।
    15.इन चक्रों पर नीचे से ऊपर तक होंठ फेरने और चुम्बन लेने से ये शक्तिशाली होते है।
    16.एकदूसरे के आज्ञाचक्र को चूमने से मनासिक शक्ति प्रबल होती है।
    17.चषक (पानपात्र) को सम्हाल कर रखें। इनका दिव्य महत्त्व होता है।
    18.घट हर बार न्य लें, पूराने को विसर्जित कर दें।
    घट के प्रसाद में मध के साथ सुगन्धित पदार्थ और गुलाब केवड़ा जैसे फूलों को रखने का निर्देश मिलता है |
    १२.
    जब कुंडलिनी
    जाग्रत होने लगती है तो पहले व्यक्ति को उसके मूलाधार चक्र में स्पंदन का अनुभव
    होने लगता है |फिर वह कुंडलिनी तेजी से ऊपर उठती है और अगले चक्र पर जाकर रूकती है
    |उसके बाद साधना जारी रहने पर फिर ऊपर उठने लग जाती है और अगले चक्र तक पहुचती है
    |जिस चक्र पर यह रूकती है उसके व् उसके नीचे के चक्रों में स्थित नकारात्मक ऊर्जा
    को हमेशा के लिए नष्ट कर चक्र को स्वच्छ और स्वस्थ कर देती है |
    कुंडलिनी के
    जाग्रत होने पर व्यक्ति सांसारिक विषय भोगों से दूर होने लगता है और उसका रुझान
    अध्यात्म ,पवित्रता ,शुद्धता के साथ रहस्य जानने की और होने लगता है |कुंडलिनी
    जागरण से शारीरिक और मानसिक ऊर्जा बढ़ जाती है और व्यक्ति खुद में शक्ति और सिद्धि
    का अनुभव करने लगता है |कुंडलिनी जागरण के प्रारम्भिक काल में हूँ हूँ की गर्जना
    सुनाई दे सकती है |आँखों के सामने पहले काला ,फिर पीला और बाद में नीला रंग दिखाई
    दे सकता है |साधक को अपना शरीर गुबारे की तरह हवा में उठता अथवा हल्का लग सकता है
    |वह गेंद की तरह अपने स्थान पर ऊपर नीचे उठता गिरता महसूस कर सकता है |ऐसा लग सकता
    है की गर्दन का भाग ऊपर उठ रहा है |उसे सर में शिखा के स्थान पर चींटियाँ चलने का
    अनुभव हो सकता है |सर के उपरी भाग पर दबाव महसूस हो सकता है |सर पर प्रकाश अथवा
    ऊर्जा आती महसूस हो सकती है |रीढ़ में कम्पन महसूस हो सकता है |
    भैरवीसाधना सिद्ध होे जाने पर साधक को ब्रह्माण्ड में गूँज रहे दिव्य मंत्र सुनायी पड़ने लगते हैं,दिव्य प्रकाश दिखने लगता है तथा साधक के मन में दीर्घ अवधि तक कामवासना जागृत नहीं होती साथ ही उसका मन शान्त स्थिर हो जाता है तथा उसके चेहरे पर एक अलौकिक आभा झलकने लगती है ।प्रत्येक साधना में कोईकोई कठिनाई अवश्य होती है भैरवीसाधना में भी जो सबसे बड़ी कठिनाई हैवह है अपने आप को काबू में रखना तथा साधक साधिका का पतित न होना । निश्चय ही गुरुकृपा और निरन्तर के अभ्यास से यह सम्भव हो पाता है ।भैरवीसाधना प्रकारान्तर से शिवशक्ति की आराधना ही है शुद्ध और समर्पित भावसे,गुरुआज्ञानुसार साधक यदि इसको आत्मसात् करें तो जीवन के परम लक्ष्यब्रह्मानंद की उपलब्धि उनके लिए सहज सम्भव हो जाती है ।किन्तु,कलिकाल के करालविकराल जंजाल में फंसे हुए मानव के लिए भैरवीसाधना के रहस्य को समझ पाना अति दुष्कर है यंत्रवत् दिनचर्या व्यतीत करने वाले तथा भोगों की लालसा में रोगोंको पालने वाले आधुनिक जीवनशैली के दास भला इस दैवीय साधना के परिणामों से वैâसे लाभान्वित हो सकते हैं?इसके लिए शास्त्र और गुरुनिष्ठा के साथसाथ गहन आत्मविश्वास भी आवश्यक है
    विशेष –
    उपरोक्त प्रक्रिया एक सामान्य ज्ञान है जो कुंडलिनी तंत्र पर आधारित है ,जबकि
    पूर्ण ज्ञान गुरु सानिध्य में ही संभव है |तंत्र द्वारा कुंडलिनी जागरण हेतु तथा
    विभिन्न प्रकार की अलग -अलग भैरवी साधना मीन कुछ भिन्न प्रक्रियाएं भी अपनाई जाती
    हैं जो अत्यंत गोपनीय और कठिन होती है ,उनका ज्ञान गुरु ही कराता है
    |……………………………………………………………………हर
    हर महादेव

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  • तंत्र में पंचमकार ,क्यों–कब–कैसे

    तंत्र में पंचमकार ,क्योंकबकैसे :

    =========================

    साधारनतया यह विश्वास किया जाता है की मंत्र ,यन्त्रपंचमकार ,जादू ,टोना आदि जिसपद्धति में हो वही तंत्र है |कुछ इस मत के हैं की पंचमकार ही सभी तंत्रों का आवश्यक अंग है |पंचमकार का अर्थ है जिसमे पांच मकार अर्थात पांच  शब्द से शुरू होने वाले अवयव आये यथामांसमदिरामत्स्यमुद्रा और मैथुन |कौलावली निर्णय में यह मत दिया है की मैथुन सेबढ़कर कोई तत्व् नहीं हैइससे साधक सिद्ध हो जाता है ,जबकि केवल मद्य से भैरव ही रहजाता है ,मांस से ब्रह्म ,मत्स्य से महाभैरव और मुद्रा से साधकों में श्रेष्ठ हो जाता है |केवलमैथुन से ही सिद्ध हो सकता है |

    इस सम्बन्ध में कुछ बातें ध्यान देने की हैं |प्रथमपंचामाकारों का सेवन बौद्धों की बज्रयानशाखा में विकसित हुआ |इस परंपरा के अनेक सिद्धबौद्ध एवं ब्राह्मण परंपरा में सामान रूप सेगिने जाते हैं |बज्रयानी चिंतन ,व्यवहार और साधना का रूपांतर ब्राह्मण परंपरा में हुआ ,जिसेवामाचार या वाम मार्ग कहते हैं |अतः पंचमकार केवल वज्रयानी साधना और वाम मार्ग मेंमान्य है |वैष्णवशौर्यशैव ,व् गाणपत्य तंत्रों में पंचमकार को कोई स्थान नहीं मिला |काश्मीरीतंत्र शास्त्र में भी वामाचार को कोई स्थान नहीं है |वैष्णवों को छोड़कर शैव व् शाक्त में कहीं कहींमद्यमांस व् बलि को स्वीकार कर लिया है ,लेकिन मैथुन को स्थान नहीं देते |

     

    वाममार्ग की साधना में भी १७१८ वि सदी में वामाचार के प्रति भयंकर प्रतिक्रिया हुई थी |विशेषकर महानिर्वाण तंत्र ,कुलार्णव तंत्र ,योगिनी तंत्र ,शक्तिसंगम तंत्र आदि तंत्रों मेंपंचाम्कारों के विकल्प या रहस्यवादी अर्थ कर दिए हैं |जैसे मांस के लिए लवण ,मत्स्य के लिएअदरक ,मुद्रा के लिए चर्वनिय द्रव्य मद्य के स्थान पर दूध ,शहद ,नारियल का पानी ,मैथुन केस्थान पर साधक का समर्पण या कुंडलिनी शक्ति का सहस्त्रार में विराजित शिव से मिलन |यद्यपि इन विकल्पों में वस्तु भेद है ,लेकिन महत्वपूर्ण यह है की वामाचार के स्थूल पंचतत्वशक्ति की आराधना के लिए आवश्यक नहीं हैं |लेकिन यह भी सही है की अभी भी अनेकवामाचारी पंचमकरो का स्थूल रूप में ही सेवन करते हैं |अतः शक्ति आराधना के लिए स्थूल रूपमें पंचमकार  तो आवश्यक है  ही उनसे कोई सिद्धि प्राप्त होने की संभावना है सारे पृष्ठभूमिपर दृष्टि डालने पर ज्ञात होता है की मूलतः पंचमकारों के उपयोग की शुरुआत संभवतःआवश्यक तत्व के रूप में नहीं हुई होगी ,अपितु यह तात्कालिक सहजता के अनुसार साधना कोपरिवर्तित करने के लिए हुई होगी |जब यह शुरू हुआ उस परिवेश के अनुसार मांसमदिरा मत्स्य का उपयोग करने वालों के लिए एक साधना पद्धति का विकास हुआ होगा जिसमे यहपदार्थ अनुमान्य किये गए ,सामान्य वैदिक साधनों में मैथुन की वर्जना रहती है जिससे भीअसुविधा महसूस हुई होगी और इसे अनुमन्य कर इसके साथ विशेष विधि और नियमो काविकास किया गया ,साधनाओं में पहले से मुद्रादी का उपयोग होता था इसे सम्मिलित कर लिया गया  कुल मिलाकर एक ऐसी पद्धति विकसित की गयी जिसमे सामान्य जन भी भागीदारी करसकें चूंकि यह जन सामान्य के पारिवारिक और दैनिक जीवन के अनुकूल था अतः इसका बहुततेजी से विकास और विस्तार हुआ ,साथ ही सुधार भी आये और कुछ दोष भी कुछ जगहों परजुड़ते गए किन्तु मूल रूप से यही आवश्यक तत्व नहीं थे ,इनके वैकल्पिक स्वरुप भीसमानांतर थे और ग्राह्य भी हुए |शक्ति साधना के क्रम में शारीरिक ऊर्जा और उग्रता बढ़ाने केसाथ ही दैनिक असुविधा के दृष्टिगत इनका विकास हुआ किन्तु विकल्पों के साथ भी साधना संभव थे और होते भी थे अतः यह कहना की यह आवश्यक तत्व हैं निरर्थक है |………………………………………………………….हरहर महादेव

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