Category: Self Evolution
  • सात शरीर [Seven Bodies] :: भौतिक जीवन और सनातन अवधारणा

    सात
    शरीर :: सनातन अवधारणा और भौतिक जीवन
    =========================
    मानव शरीर एक
    कम्प्यूटर के समान ही रहस्यपूर्ण यन्त्र है ,इसे ठीक से समझने के लिए मानव के
    विभिन्न आयामों को समझना आवश्यक है |बाहरी रूप से जो शरीर हमें दिखाई देता है
    वास्तव में वह शरीर का केवल दस प्रतिशत भाग होता है |विद्वानों ने शरीर के सात
    स्तरों की बात की है –
    स्थूल शरीर [फिजिकल बाडी] २ आकाश शरीर [ईथरिक बाडी] सूक्ष्म शरीर [एस्ट्रल
    बाडी
    ] मनस शरीर [ मेंटल बाडी] ५-
    आत्म शरीर [स्पिरिचुअल बाडी
    ] ब्रह्म शरीर [कास्मिक बाडी] और ७- निर्वाण शरीर [बाडिलेस बाडी]
    सनातन
    सिद्धांत और सोच के अनुसार मनस शास्त्रियों का कहना है की व्यक्तियों के जीवन में
    यह सातों स्तर उत्तरोत्तर विकसित होते हैं |सामान्य जन इसे नहीं समझ पाते ,यहाँ तक
    की साधक और कुंडलिनी के जानकार भी इसे व्यावहारिक स्तर पर न देखते हुए मात्र साधना
    से ही इनकी प्राप्ति और समझने की बात करते हैं |व्यावहारिक दृष्टिकोण की बात करें
    तो मनस शास्त्रियों के अनुसार सामान्य योग व्यवहार में रहते हुए एक शरीर का विकास
    लगभग सात वर्ष में पूरा हो जाना चाहिए और लगभग ५० वर्ष की आयु होने तक व्यक्ति
    सातवें शरीर का विकास करके विदेह [बाडीलेस ]अवस्था में पहुँच जाना चाहिए |इस विदेह
    अथवा बाडिलेस अवस्था का अर्थ यह नहीं की व्यक्ति का भौतिक शरीर नहीं रहेगा अथवा
    व्यक्ति कोई भौतिक कर्म नहीं करेगा |इसका अर्थ केवल इतना है की वह सारे कार्य इस
    ढंग से करना सीख लेगा की उसकी आत्मा पर कोई कर्म का बंधन न लग पाए ,अर्थात आत्मा
    निर्लेष रहे |आत्मा प्रायः उस अवस्था में निर्लेष रहती है जब वह शरीर रहित होती है
    |यह एक मेटाफिजिकल सिद्धांत है |यह सूत्र हमारे सनातन दर्शन में जीवन के लिए बनाए
    गए थे और वैदिक काल में इसका पालन होता था |जीवन का ढंग ऐसा था की इसके अनुसार
    जीवन चले |
    इस सूत्र के
    अनुसार ,जीवन के प्रथम सात वर्ष में बच्चे का स्थूल शरीर पूरा होता है जैसे पशु का
    शरीर विकास को प्राप्त होता है |इस अवस्था में व्यक्ति में अनुकरण तथा नकल करने की
    प्रवृत्ति रहती है |प्रायः यह प्रवृत्ति पशुओं की भी होती है |कुछ ऐसे व्यक्ति भी
    होते हैं जिनकी बुद्धि इस भाव से उपर नहीं उठ पाती और पशुवत जीवन जीते रह जाते हैं
    |इसे हम योग की भाषा में कहते हैं की व्यक्ति प्रथम शरीर से उपर नहीं उठा |
    द्वितीय शरीर
    अर्थात आकाश शरीर में भावनाओं का उदय होता है अतः इसे भाव शरीर भी कहते हैं |प्रेम
    और आत्मीयता वाली समझ विकसित होने से व्यक्ति सांसारिक सम्बन्धों को समझने लगता है
    |इस आत्मीयता के कारण ही व्यक्ति में पशु प्रवृत्ति कम होकर मनुष्य प्रवृत्ति का
    विकास होता है |चौदह वर्ष का होते होते वह सेक्स के भाव को भी समझने लग जाता है
    |बहुत से लोगों के चक्र यहीं तक विकसित हो पाते हैं और वे पूरे जीवन भर घोर संसारी
    बने रहते हैं |
    तृतीय शरीर
    सूक्ष्म शरीर कहलाता है |सामान्यतः इसकी विकास की अवधि २१ वर्ष तक है |इस अवधि में
    बुद्धि में विचार और तर्क की क्षमता का विकास हो जाने के कारण व्यक्ति बौद्धिक रूप
    से सक्षम हो जाता है और व्यक्ति में सांस्कृतिक गुण विकसित हो जाते हैं |सभ्यता भी
    आ जाती है और शिक्षा के आधार पर समझ भी बढ़ जाती है |इस स्तर के लोग जीवन और जन्म
    -मृत्यु को ही सब कुछ समझते हैं |
    चतुर्थ शरीर
    अगले सात वर्ष तक विकसित हो जाना चाहिए |इसे मनस शरीर कहते हैं |इस स्तर पर मन
    प्रधान होता है ,अतः व्यक्ति ललित कलाओं ,संगीत ,साहित्य ,चित्र कारिता काव्य आदि
    में रूचि लेने लगता है |टेलीपैथी ,सम्मोहन यहाँ तक की कुंडलिनी भी इसी स्तर तक
    विकसित हुए व्यक्ति को रास आती है ,चूंकि यह स्तर व्यक्ति को कल्पना करने की ऐसी
    शक्ति देता है की वह पशुओं से श्रेष्ठ बन जाता है |स्वर्ग नर्क की कल्पना भी इसी
    स्तर में आती है |
    पांचवां
    शरीर आध्यात्मिक होता है |इस स्तर पर पहुंचे व्यक्ति को आत्मा का अनुभव हो पाता है
    |यदि चौथे स्तर पर कुंडलिनी जाग्रत हो जाए तो इस शरीर का अनुभव हो पाता है |यदि
    नियम संयम से व्यक्ति का विकास होता रहे तो लगभग
    35 वर्ष की आयु तक व्यक्ति इस स्तर पर पहुँच जाता है |यद्यपि आज के आधुनिक
    जीवन शैली में सामान्य जन के लिए यह बेहद कठिन है |मोक्ष कका अनुभव इस स्तर पर हो
    सकता है ,मुक्ति का अनुभव हो जाता है |
    छठवां है
    ब्रह्म शरीर |इस स्तर पर व्यक्ति अहम ब्रह्मास्मि का अनुभव कर पाता है |ऐसी
    कास्मिक बाडी सामान्यतः अगले सात वर्श्ह में विकसित हो जानी चाहिए |सातवाँ शरीर
    निर्वाण शरीर कहलाता है जो की विदेह अवस्था है |भगवान् बुद्ध ने इस स्थिति को ही
    निर्वाण कहा है |यहाँ अहं और ब्रह्म दोनों ही मिट जाते हैं |मैं और तू दोनों के ही
    न रहने से यह स्थिति परम शून्य की बन जाती है |
    इन
    सातों शरीरों का क्रमिक विकास बहुत से लोगों में जन्म जन्म चलता रहता है |कोई
    प्रथम शरीर के साथ जन्म लेता है तो कोई चौथे स्तर के साथ |करोड़ों में कोई एक छठवें
    स्तर के साथ जन्म लेता है जो जन्म से ही विरक्त हो जाता है |जैसे स्तर के साथ
    व्यक्ति का जन्म होता है वह चौदह वर्ष का होते होते व्यक्ति में प्रकट होने लगता
    है |उसकी सोच ,संसार को देखने का दृष्टिकोण ,व्यवहार ,समझ आदि में सामान्य व्यक्ति
    की अपेक्षा अंतर देखने को मिलता है |[[क्रमशः – अपने ब्लॉग
    Tantra Marg और पेज पाठकों के लिए – पंडित जितेन्द्र मिश्र
    ]]……………………………………………….हर हर महादेव

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  • मनुष्य की शक्तियों के गुप्त केंद्र

    मनुष्य के असीम शक्तियों के गुप्त केन्द्र    
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    मनुष्य के भीतर असीम सूक्ष्म शक्तियों के गुप्तकेन्द्र भरे पड़े हैं। इन्हें चक्रग्रन्थि एवं उपत्यिकाओंके नाम से पुकारा जाता हैं  प्राणशक्ति के प्रहार से ही इनमें भीतर सोई हुई सिद्धियाँ जाग्रत होती हैं।कुण्डलिनी जागरण से मनुष्य इसी शरीर में देवताओं जैसी सामर्थ्य का अनुभव करने लगता हैं। यहकुण्डलिनी जागरण प्राणायाम की सहायता से ही किया जाता हैं जिसने अपने बिखरे हुए प्राण कोएकत्र कर लिया उस योगी के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। जिसका प्राणतत्त्व पर जितनाआधिपत्य है वह प्रकृति की सूक्ष्म शक्तियों को भी उतनी ही मात्रा में अपने वशवर्ती कर सकेगा।इन्द्रियों का नियंत्रण भी प्राण निरोध के साथ सम्बन्धित है दुष्प्रवृत्तियाँ भी इस प्राणग्निहोत्र हीअग्नि में जल कर भस्म होती हैं। प्राणविद्या अध्यात्म क्षेत्र में एक स्वतन्त्र विद्या मानी जाती हैं।उसके अंतर्गत अनेक प्रयोजनों के लिए अनेक साधनाएँ की जाती हैं। 84 आसनों की तरह प्राणायामभी 84 प्रकार के हैं। उनके उद्देश्यप्रयोगलाभ तथा उपयोग भी भिन्नभिन्न प्रकार के हैं। उनसबका वर्णन इस लेख में करना अभीष्ट नहीं हैं। वह सब तो समयानुसार होगा। इस समय तोप्राणमयकोश की साधना के लिए प्रथम वर्ष की प्राण प्रक्रिया का ही उल्लेख करना है। इसे बच्चे सेलेकर बूढ़े तक सभी रोगीनिरोग नरनारी बड़ी आसानी से कर सकते हैं। इसमें किसी को किसीप्रकार की हानि की आशंका नहीं हैं  सबको लाभ ही होगा।इन्हें प्राण विद्या की साधनाएं कहते हैं|………………………………………………………….हरहर महादेव 

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  • शाम्भवी मुद्रा [ SHAMBHAVI MUDRA ]

    शाम्भवी मुद्रा और उसके लाभ
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    शाम्भवी मुद्रा को भगवान शिव की मुद्रा भी कहा जाता हैजब इस साधना को लम्बे समय तककिया जाता है तो बहुत ज्यादा नींद आने लगती हैइस मुद्रा को करने के बाद साधक घण्टो तक एकआसन पर चेतन अवस्था मे रहकर साधना कर सकते है। जब इस शाम्भवी योग को किया जाता हैतो दोनो आँखे ऊपर मस्तिष्क में चढ़ जाती है और दिव्य प्रकाश के दर्शन भी होने लगते है। 
    दृष्टि को दोनों भौहों के मध्य स्थिर करके एकाग्र मन से परमात्मा का चिंतन करें तो ध्यान कीपरिवक्वता होने पर ज्योति दर्शन होता हैयही शाम्भवी मुद्रा हैआत्म साक्षात्कार के आकांक्षीपुरुषों के लिए यह अत्यंत कल्याणकारी मुद्रा है|
    शाम्भवी मुद्रा का अभ्यास करने पर आपकी मानसिक क्षमता में इजाफा होता हैयह आपकेमस्तिष्क में जबरदस्त तालमेल बिठाता है जिसके चलते मानसिक क्षमता बढती हैइससे बुद्धीबढती है तथा सिखने की गति भीइसलिए स्टूडेंट्स को तो इसे जरुर करना चाहिएइससे नींद कीगुणवत्ता में भी सुधार आता है याने की आप रात को अच्छी नींद ले पाते हैइसके मात्र 20 से 25मिनट के नियमित अभ्यास से आपके अन्दर ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता बढती हैइससेआपका तनाव दूर होता है और आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होती है | इसके अभ्यास से मासिक धर्म कीअनियमितताचिड़चिड़ापनरक्त का बहुत ज्यादा स्त्राव आदि लक्षणों में सुधार देखने को मिला है|
    इससे मानसिक और भावनात्मक सेहत सुधरती हैइसके नियमित अभ्यास से मधुमेहसिरदर्द,मोटापाथाइरॉयड आदि में दिक्कत होती हैइससे दिल की सेहत सुधरती है और दिल के रोग होनेका खतरा कम होता हैइससे उर्जा का स्तर 80% तक बढ़ जाता है|
    Wear loose fitting clothes which does not constrict you in any
    way. Sit on a smooth surface , in a comfortable meditation pose. This is to
    eliminate sense of touch/feeling.
    Put your thumbs in your ears and palm your eyes with your middle
    and fourth finger.
    Now do Om Chant with an audible mmmmmm.You will feel intense
    vibrations inside your ear. 
    Now select a silent, not so bright, cool place space, where
    there are no strong smells. This is to prevent any input of sense of
    hearing/sense/ smell. If you can even feel the clock ticking-put  ear
    plugs –only if you are a beginner.
    Keep the head, shoulder and spine upright and straight. And
    place the hands on the knees in (Jyana Mudra). Upright is to keep the spirit
    level in the inner ear at equilibrium so that your brain lobes get balanced and
    synchronized.Shut your eyes. No need to be cockeyed .
    Simply be mindful of in-and-out diaphrgmic breathing where you
    stomach rises and falls. You may feel that your breathing is too short, too
    long, too gentle or too heavy.  Do not try to control it.  
    When you become distracted, gently refocus your attention on
    your breathing.   Restrict your attention to what is occurring in the
    immediate present moment.   
    When you feel you have blocked out all ahara via your senses of
    smell, sight, hearing and feeling, take a deep breath where you fill your lungs
    only 90 % and hold it. Put your tongue on your upper palate and tickle it for
    just 2 seconds and stop.
    Now start exhaling very slowly while keeping the tip of your
    tongue stationary on the roof of your mouth.Don’t think about the past or
    future— don’t think about anything at all. Let go of worries, concerns , and
    memories. Empty your mind of everything.  
    Do this 3 more times. This means you inhale again , hold your
    breath and do the same thing.
    Later on you do not need to hold your breath and you can do this
    procedure for longer time , without ear plugs and your eyes open against a
    blank far away wall of your room.Do this exercise 5 times a day. You must not
    have a full stomach. You can drink some water before you do this.
    Do Shambhavi mudra to overcome emotional
    and mental blocks that create negativity and spoil your social
    relationships…………………………………………………………
    हरहर महादेव 

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  • वजौली मुद्रा [ VAJROLI MUDRA ]

    बज्रौली मुद्रा :: तेजस्वी बनाए
    ====================
    बज्रौली मुद्रा भी मूलबंध का अच्छा अभ्यास किए बिना किसी प्रकार संभव नहीं हैयह मुद्रा केवलयोगी के लिए ही नहींभोगी के लिए भी अत्यंत लाभकारी हैइस मुद्रा में पहले दोनों पांवों को भूमिपर दृढ़तापूर्वक टिकाकरदोनों पांवों को धीरेधीरे दृढ़तापूर्वक ऊपर आकाश में उठा देंइससे बिंदुसिद्धि होती है|
    शुक्र को धीरेधीरे ऊपर की आकुंचन करें अर्थात् इंद्रिय के आंकुचन के द्वारा वीर्य को ऊपर की ओरखींचने का अभ्यास करें तो यह मुद्रा सिद्ध होती हैविद्वानों का मत है कि इस मुद्रा के अभ्यास मेंस्त्री का होना आवश्यक हैक्योंकि भग में पतित होता हुआ शुक्र ऊपर की ओर खींच लें तो रज औरवीर्य दोनों ही चढ़ जाते हैंयह क्रिया अभ्यास से ही सिद्ध होती हैकुछ योगाचार्य इस प्रकार काअभ्यास शुक्र के स्थान पर दुग्ध से करना बताते हैंजब दुग्ध खींचने का अभ्यास सिद्ध हो जाएतबशुक्र को खींचने का अभ्यास करना चाहिएवीर्य को ऊपर खींचनेवाला योगी ही ऊर्ध्वरेता कहलाता है|
    इस मुद्रा से शरीर हृष्टपुष्टतेजस्वीसुंदरसुडौल और जरामृत्यु रहित होता हैशरीर के सभीअवयव दृढ़ होकर मन में निश्‍चलता की प्राप्ति होती हैइसका अभ्यास अधिक कठिन नहीं हैयदिगृहस्थ भी इसके करेंतो बलवर्द्धन और सौंदर्यवर्द्धन का पूरा लाभ प्राप्त कर सकते हैं|
    Vajroli Mudra is one of the ways in yoga which can help you deal
    with premature ejaculation and urinary disorders. This is easy to practice but
    difficult to master. If you practice this mudra for a long time you will also
    have other benefits like activation of chakras and great self control.Advanced
    practice can lead to one being able to control the ejaculation of semen and
    even ability to pull back the ejaculated semen. These advanced stages are known
    as Sahjoli and Amroli and references to these are found in ancient yogic texts.
    Sit erect in either Padmasana or Sidhasana so that the spine is
    straight. Close your eyes and inhale slowly. Focus on the muscles which
    can be used to control the urine flow near the pubic bone. This is known as
    urethral sphincter.With the air retained, contract the abdomen and pull it
    towards the spine.Now gradually contract and release the urethral sphincter
    with air retained in the lungs.When you start feeling that you cannot retain
    the breath, gradually exhale with release of the muscle and release the abdomen
    also.
    You may notice that it is difficult to keep the urethral muscle
    contracted and you would need to release it quite soon. When the above steps
    are practiced regularly, you will develop more control of the muscles, and
    would be able to practice easily.Note: There is another way to practice, though
    it will not fully qualify as Vajroli Mudra, though it will empower your
    urethral muscles. Drink around one liter of water and while urinating start and
    stop and trying to control the urine flow by contracting and releasing the
    urethral muscles.
    Vajroli MudraCures premature
    ejaculation.Cures diseases of the urinary system like infections and
    enlargement of the prostrate gland.Calms the and increases concentration once
    the sexual distractions are calmed down.Helps in spiritual progress and chakras
    are
    activated…………………………………………………………………..
    हरहर महादेव 

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  • अश्विनी मुद्रा [ ASHWINI MUDRA ]

    अश्‍विनी मुद्रा :; गुदा ,उदर रोग दूर करे
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    इस मुद्रा से साधक में घोड़ों जैसी शक्ति  जाती हैजिसे ‘हॉर्स पॉवर’ कहते हैंइस मुद्रा में गुदाद्वार का बारबार संकोचन और प्रसार किया जाता हैइसी से मुद्रा की सिद्धि हो जाती हैइसकेद्वारा कुण्डलिनी जागरण में सुगमता रहती है और अनेक रोग नष्ट होकर शारीरिक बल की वृद्धिहोती हैअश्‍विनी मुद्रा सिद्ध होने से साधक की अकालमृत्यु कभी नहीं होतीगुदा और उदर सेसंबंधित रोगों का इसके द्वारा शमन होता है तथा दीर्घजीवन की उपलब्धि होती हैबिना मूलबंध केअश्‍विनी मुद्रा नहीं हो सकती|
     Ashwa means
    “horse” in Sanskrit, and mudra is
    a “gesture” or “sign” but this doesn’t say much about what ashwini (asvini,
    ashvini) mudra is. The real meaning of it lies in its definition: the practice
    of a rhythmic contraction of anal sphincter, which allows directing the prana
    (apana) flow upward the spine through the main energy channel
    called sushumna. In yoga ashwini mudra is a beginners technique,
    which means it’s relatively easy, and precedes some other techniques such
    as mula bandha or vajroli mudra.
    First of all you need to take an asana or yoga pose. While the
    best pose for such practices is considered to be the lotus pose or padmasana,
    you can also do well with some simpler poses. For example, it can be siddhasana
    or vajrasana; you can even use sukhasana as an ashwini mudra asana.
    Once you got into the posture, relax for a minute, breathing
    freely and deeply. Then inhale fully (especially filling the lower part of the
    lungs), hold your breath, and contract the anal sphincter muscles with a 1-2
    seconds interval. For men there should be 4 contractions, and for women – 5.
    This is due to the differences between men and women physiology. These numbers
    designate the average quantity of anal muscles contractions required to push
    the prana from the pelvis to the head. Try to completely relax the anal muscles
    between the contractions.
    now, press your chin against the bottom of the neck, touch the
    palate with the tip of your tongue and start releasing your breathe (exhaling),
    then release the mudra, and after that slowly raise your head. The success in
    this practice comes when your feel like shivering wave goes through your body.
    This wave is actually the prana which has been stimulated by your practice. You
    can repeat it 3-5 times or as much as you want
    In a physical plane the asana stimulates the abdomen and pelvis
    area including reproductive and digestive organs. This simple practice can help
    you get rid of constipation, deals with diseases of the rectum and hemorrhoids,
    and can improve your sexual health. Since it stimulates the prana flow toward
    the upper part of the body, it slows down the aging process and improves the
    health in general. It also makes your body more resistant to diseases if you
    practice this yoga mudra regularly.
    On a more subtle level, it increases the
    awareness, makes your mind more peaceful, gives more energy, and can even
    improve your
    mood…………………………………………………………
    हरहर महादेव 

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  • छठी इन्द्रिय अर्थात अतीन्द्रिय ज्ञान से घटनाओं का पूर्वाभास

    छठी इन्द्रिय अर्थात अतीन्द्रिय ज्ञान से घटनाओं का पूर्वाभास 
    ————————————————–
    क्या मनुष्य की छठी इंद्रिय होती हैकुछ लोग इसे हकीकत मानते हैं और कुछ कोरी कल्पना। अब वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में स्पष्ट किया है कि छठी इंद्रिय की बात सिर्फ कल्पना नहींवास्तविकता हैजो हमें किसी घटित होने वाली घटना का पूर्वाभास कराती है।  यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया के रॉन रेसिक ने एक अध्ययन कर पाया कि छठी इंद्रिय के कारण ही हमें भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास होता है। ऐसा माना जा रहा है कि अब लोगों की छठी इंद्रिय को और सक्रिय करने का प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि वाहनों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं में कमी
    हो सके। रेसिक के अनुसार छठी इंद्रिय जैसी कोई भावना तो है और यह सिर्फ एक अहसास नहीं है। वास्तव में होशो
    हवास में आया विचार या भावना हैजिसे हम देखने के साथ ही महसूस भी कर सकते हैं। और यह हमें घटित होने वाली बात से बचने के लिए प्रेरित करती है। करीब एकतिहाई लोगों की छठी इंद्रिय काफी सक्रिय होती है। उन्हें घटनाओं का पूर्वाभास हो जाता है। इसे सही तरीके से परिभाषित करना तो मुश्किल हैलेकिन इसके होने से इंकार भी नहीं किया जा सकता है। 
    अल सुबह नींद से जागने के लिए अलार्म घड़ियाँ तो हर कोई इस्तेमाल करता है। लेकिन बहुत कम लोग इस बात को जानते होंगे कि प्रकृति ने हमारे शरीर के भीतर भी एक अलार्म घड़ी की व्यवस्था कर रखी है। हाल ही में हुए वैज्ञानिक
    शोध से इस बात का पता चला है कि जब कभी हमें तड़के कहीं जाना होता है तो जागने के समय का अलार्म हमारे मस्तिष्क में स्वतः भर जाता है।
     हम भले ही सोते रहते हैंलेकिन निर्धारित समय से 1 घंटे पूर्व हमारे रक्त में एक विशेष हार्मोन का स्राव होने लगता है और जब वह चरम सीमा पर पहुँच जाता है तो हमारी नींद खुल जाती है। वैज्ञानिक इसे हार्मोन घड़ी कहते हैं। 
    छठी इंद्री के जाग्रत होने से  व्यक्ति में भविष्य में झाँकने की क्षमता का विकास होता अतीत में जाकर घटना कीसच्चाई का पता लगाया जा सकता है। मीलों दूर बैठे व्यक्ति की बातें सुन सकते हैं। किसके मन में क्या विचार चल रहा हैइसका शब्दशपता लग जाता है। एक ही जगह बैठे हुए दुनिया की किसी भी जगह की जानकारी पल में ही हासिल की जासकती है। छठी इंद्री प्राप्त व्यक्ति से कुछ भी छिपा नहीं रह सकता और इसकी क्षमताओं के विकास की संभावनाएँ अनंतहैं। आपने अगर स्टीवेन स्पिलबर्ग की चर्चित फिल्म मॉइनॉरिटी रिपोर्ट देखी हो तो आपको याद होगा कि कैसे उस फिल्म में एक विशेष सेल के सदस्य भविष्य में होने वाले अपराध को पता करके उसे घटित होने से पहले ही रोक देते थे। यह मजह एक फिल्मी कहानी नहीं है।
    अतीन्द्रिय ज्ञान को वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित करने वाले विद्वानों का मानना है कि यदि कोई तत्व प्रकाश की गति से भी तीव्र गति करे तो उसके लिए समय रुक जाता है। दूसरे शब्दों मेंवहां बीते कल,आज और आने वाले कल में कोई अंतर न रहेगा। अपने चित्त में यह गति साध ली जाए तो अतीत और भविष्य की घटनाएं चलचित्र की तरह देखी जा सकती हैं। अधिकतर दार्शनिकों का मत है कि घटनाओं के पूर्वाभास जीवन बचाने के लिए होते हैं और यह बात भी सच है कि यदि हम कमजोर मन इंसान से इस तरह के पूर्वाभासों का जिक्र करते हैतो वे किसी की मौत का कारण भी बन सकते हैं। अनेक बार पूर्वाभास स्पष्ट नहीं होते और न उनकी व्याख्या की जा सकती है। प्रिमोनीशन एक्स्टां सॅन्सरी परसॅप्शन्स का वह रूप हैजिसे हम इन्स्टिंक्ट या भावी घटना का एक तीव्र आभास कह सकते हैं। ये एक तरह की ‘इन्ट्यूटिव वॉर्निंग होती हैजो अवचेतन मन पर अंकित हो जाती है और कभीकभी व्यक्ति को नियोजित कार्योँ को करने से मनोवैज्ञानिक तरह से रोकती हैं।
    इसे बहुत से चिन्तक विशिष्ट घटनाओं की ‘भविष्यवाणी भी कहते हैं। साइंस इसके स्टेट्स को अस्वीकार करता है। लेकिन दार्शनिकों का मानना है कि प्रिमोनीशन और प्रौफॅसी को व्यर्थ की चीज मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। क्योंकि घटनाओं के पूर्वाभास की जानकारी और उनका सही घटना प्रमाणित करता है किप्रिमोनीशन में तथ्य हैइसकी अर्थवत्ता है।इस तरह से यह साइंस के लिए एक चेतावनी हैक्योंकि यह सृष्टि की गतिविधियों के साथ मानव मन के सघन संबंध का संकेत देती है। यह आन्तरिक शक्तियों और सृष्टि में स्पन्दित अलौकिक शक्तियों व उसके चक्र के अन्तर्संबंध का विज्ञान है। कहा जाता है कि नॉस्टेंडम ने अपनी मृत्यु की ‘पूर्व घोषणा कर दी थी। जुलाई 1, 1566 जब एक पुरोहित उनसे मिलने आया और जाने लगा तो नॉस्टेंडम ने उससे अपने बारे में कहा कि ‘वह कल सूर्योदय होने तक मर चुका होगा। इसी तरह अब्राहम लिंकन ने अपनी मौत का सपना देखा और अपनी पत्नी व अंगरक्षक को अपने कत्ल से कुछ घंटे पहले इस बारे में बताया। …………………….हरहर महादेव 
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  • व्यक्तित्व सम्मोहक बनाने का तंत्र प्रयोग

    व्यक्तित्व सम्मोहक बनाने का तंत्र प्रयोग
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    व्यक्तित्व सम्मोहक बनाने में नवग्रह संतुलन की युक्ति सर्वाधिक कारगर होती है क्योंकि ग्रह ही सबसे अधिक प्रभावित करते हैं और इन्ही की रश्मियों के अनुसार व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व निर्मित होता है |इन्हें यदि अपने जरूरत के अनुसार संतुलित कर लिया जाय तो यह व्यक्ति को ऊच्च्ता पर पहुंचा सकते हैं |इनके साथ तंत्र को जोड़ देना इनके प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है |इस प्रयोग में इसी को दृष्टिगत रखते हुए नवरत्न की अंगूठी और तांत्रिक मंत्र का प्रयोग किया गया है |नवरत्न की अंगूठी कितनी लाभप्रद होती है यह किसी से छिपा नहीं है |इसका विशेष प्रयोग निम् प्रकार है |
    सामग्री 
    ——— नवरत्न की अंगूठी अथवा महामंगलकारी गुटिका ,स्फटिक माला ,तेल का दीपक ,सवा किलो साबुत उड़द ,मंत्र सिद्ध चैतन्य विद्युत् माला ,पहनने के लिए लाल रंग की धोती ,लाल रंग का आसन ,सामने बिछाने के लिए लाल वस्त्र ,लकड़ी की चौकी ,धुप -दीप ,प्रसाद ,माला फूल आदि |
    समय -दिन और दिशा 
    ————————- बुधवार की रात्री का समय ,पश्चिम दिशा 
    जपा संध्या और दिनों की अवधि –
    ———————————— १००० मंत्र अर्थात १० माला प्रतिदिन ,५१ दिन तक 
    मंत्र 
    —— ॐ नमो ह्राँ ह्रीं ह्रूं फट चक्रे सुरे अदृश्य देवी शोणित भोज पक्षे मम् इच्छानुसार दृश्यम कुरु कुरु स्वाहा |
    विधि 
    ——– किसी भी बुधवार के दिन लाल धोती पहन ,लाल आसन पर विराजमान हो सामने चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर नवरत्न की अंगूठी और स्फटिक माला रख दें |,संकल्प लें प्रतिदिन पूजन की और १००० जप प्रतिदिन की ५१ दिन तक करने की |इसके बाद अंगूठी और माला इनकी पूर्ण पूजा करें |पूजा के बाद मंत्र जप उपरोक्त मंत्र की शुरू करें और १० माला जप स्फटिक माला से करें |प्रतिदिन आगे से यह क्रिया जारी रखें और ५१ दिन तक करें |५१ दिन बाद इसी मंत्र से १० माला जप संख्या बराबर हवन करें नवग्रह की लकड़ी और हवन सामग्री से |जब जप पूरा हो जाए तो वहां पहले दिन से राखी सवा किलो उड़द को ले जाकर दक्षिण दिशा में उछालकर फेंक देवे और घर आ जाए |हवन बाद उस नवरत्न की अंगूठी को धारण कर लें और उसके साथ रखी स्फटिक माला को गले में धारण करें |इससे धीरे धीरे व्यक्तित्व में सम्मोहकता उत्पन्न होने लगती है |………………………………………………हर -हर महादेव 
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