Category: Spiritual Science
  • भाग्य अलग कैसे हो जाता है दो एक ही समय जन्मे लोगों का ?

    क्यों एक समान जन्म समय पर भी भाग्य अलग होते हैं?

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    ———————–तंत्रिकीय विश्लेषण ———————–

             अक्सर एक प्रश्न ज्योतिष जगत में उठाया जाता है की एक ही समय एक ही स्थान पर एक ही घर में यहाँ तक की एक ही गर्भ अर्थात एक ही माता पिता की जुडवा संतानों के भाग्य अलग क्यों और कैसे हो जाते हैं |ज्योतिष को नीचा दीखाने के लिए भी कुछ लोग इस प्रश्न का उपयोग करते हैं |ज्योतिष जगत इसका उत्तर देश -काल -परिस्थिति के रूप में देता है ,अर्थात देश -काल और परिस्थिति अलग होने से भाग्य अलग हो जाता है ,किन्तु यह तर्क वहां बेमानी हो जाता है जब एक ही गर्भ से एक ही समय दो बच्चे पैदा हों और उनके भाग्य अलग हों |फिर यहाँ तर्क दिया जाता है की सेकण्ड के अंतर से मिनट के अंतर से भाग्य बदल जाता है |कुछ लोग षट्यांश अर्थात सातवें अंश की तो कुछ लोग नक्षत्र ,चरण आदि की बात करते हैं |ज्योतिष की थोड़ी ही सही पर जानकारी हमें भी है और उसके आधार पर हम पूर्ण संतुष्ट नहीं हो पाए ,जो इसे परिभाषित करते हैं वह खुद कितने संतुष्ट होते हैं पता नहीं हालांकि अपने ज्ञान के अनुसार व्यक्ति खुद तो संतुष्ट हो सकता है पर जब तक लोग संतुष्ट न हों तर्क बेमानी होता है |सोचने की बात है अगर लग्न और राशि ,नवांश ,महादशा ,नक्षत्र ,चरण ,अन्तर्दशा ,ग्रह स्थितियां तक समान हों तो भी एकदम से भाग्य विपरीत दो लोगों का कैसे हो सकता है |क्या केवल किन्ही एक दो वर्गों में थोडा अंतर आ जाने से पूरा भाग्य बदल जाएगा |तर्क पूरी तरह गले नहीं उतरता |चूंकि हम व्यावसायिक ज्योतिषी नहीं हैं ,[यद्यपि ज्योतिष की मूल भूत जानकारी है ]यह प्रश्न हममे उत्कंठा जगाता है तो हम इसका उत्तर जानने का प्रयास अपने तंत्र ज्ञान ,मनोवैज्ञानिक ज्ञान और अपने साधना अनुभवों के आधार पर करते रहे हैं ,जो हमने महसूस किया उसे प्रस्तुत कर रहे अपने इस अलौकिक शक्तियां चैनल और ब्लॉग पर अब पढने वाले पाठक निर्णय करेंगे की हम कितना सही हैं |जरुरी नहीं की हम पूरी तरह सही ही हों |

              इस प्रश्न का एक उत्तर ज्योतिष में ही मौजूद है जो कुछ हद तक सही है |ज्योतिष कहता है व्यक्ति के संचित कर्म उसका भाग्य बनाते हैं ,यह संचित कर्म हर व्यक्ति के अलग होते हैं अतः व्यक्ति का भाग्य अलग होता है |यहाँ इसे काटने वाला तर्क उत्पन्न होता है की संचित कर्मों के ही आधार पर तो ग्रह स्थितियां जन्म की बनती हैं और उन स्थितियों में जन्म लेने वाले वाले का भाग्य निर्धारित होता है ,फिर संचित कर्म अलग से कैसे प्रभावित करते हैं |इसका उत्तर ज्योतिष के पास कठिन होता है |अलग अलग तर्क प्रस्तुत किये जाने लगते हैं |किन्तु इसका उत्तर तंत्र के पास है |संचित कर्म अगले जन्म के भाग्य में भारी परिवर्तन लाते हैं भले ग्रह स्थितियां समान हों ,जन्म समय समान हों कई लोगों के ,परिस्थितियां और परिवार समान हों |

                  जन्म लेने वाले हर व्यक्ति के पिछले जन्मों की अनुभूतियाँ अलग होती हैं ,उसकी यादें अलग होती हैं ,संघर्ष अलग होते हैं ,लग्न अलग होते हैं [भले इस जन्म में समान हों ],जिनके आधार पर उनकी अवधारणा और व्यक्तित्व अलग होता है पिछले जन्मों में |उन व्यक्तित्वों के अनुसार उनके अवचेतन की संगृहीत यादें अलग होती हैं |अवचेतन की कार्यप्रणाली अलग होती हैं |जैसा की हिन्दू मतावलंबी जानते हैं आत्मा अमर है कभी नहीं मरती ,शरीर बदलती है यह आत्मा |तो इस आत्मा के शरीर से अलग हो जाने पर आत्मा की यादें पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती |अवचेतन की यादें आत्मा के साथ बनी रहती हैं |अगर आत्मा की यादें समाप्त हो जाती तो फिर पित्र नहीं होते ,न उन्हें अपने कुल की याद होती |भूत-प्रेत की यादें भी न होती और वह प्रतिक्रया अलग अलग नहीं कर रहे होते |गुरु और साधू महात्मा अपने अनुयाइयों और शिष्यों का मार्गदर्शन न कर रहे होते शरीर छूटने पर भी |कोई बच्चा अपने पूर्व जन्म की बातें न बता देता |इस तरह यह यादें व्यक्ति की आत्मा के साथ जुडी रहती हैं और जन्म के बाद अवचेतन में सुरक्षित रहती हैं |कभी कभी कोई स्वप्न दिखाती हैं किसी स्थान अथवा दृश्य की और कुछ दिन बाद व्यक्ति को आभास होता है की अरे यहाँ तो में सपने में पहले आ चूका हूँ |या अचानक लगता है अरे यहाँ तो पहले आया हूँ कभी ,भले स्वप्न नहीं आया था |यह पूर्व जन्म की यादें होती हैं जो अवचेतन में सुरक्षित होती हैं |

                 जब व्यक्ति जन्म लेता है तो भले उसकी लग्न और ग्रह स्थितियां समान हों किन्तु अवचेतन की यादें और सोच अलग होती हैं |इसके कारण उसके निर्णय ,सोचने की दिशा ,उसका व्यक्तित्व ,उसकी अनुभूतियाँ दुसरे समान लग्न और समय में जन्मे बच्चे से अलग होती हैं |उसके सोचे प्रश्नों के उत्तर मन में अलग मिलते हैं अथवा उसकी प्रतिक्रिया दुसरे से अलग हो जाती है |इनके आधार पर उसके निर्णय ,क्षमता प्रभावित होते हैं फलतः उसका विकास अलग हो जाता है जिससे उसका भाग्य अलग होने लगता है |समान अवसर पर भी कोई अधिक विकास कर जाता है कोई कम क्योकि उसके अवचेतन में भिन्न ज्ञान हैं |सबके गुण ,रुचियाँ भी धीरे धीरे बदल जाती हैं ,कार्यशैली बदल जाती है |अपनी अनुभूतियों के अनुसार कोई साहसी होता है और रिस्क लेने में नहीं हिचकता क्योकि उसे उसका परिणाम और हल पता है अनजाने में ही सही वह साहस भरे निर्णय लेता है जबकि दूसरा असमंजस में होता है अथवा भययुक्त होता है ,क्योकि पिछले जन्मो में उसकी यादों में ऐसा कुछ नहीं ,उसका अवचेतन रिस्क लेने की गवाही नहीं देता उसे परिणाम नहीं पता |यहाँ भी समान ग्रह स्थितियां प्रभावित करती हैं और ग्रह रश्मियों से प्रतिक्रिया शरीर पर समान होने पर भी मन की दिशा अलग हो जाती है |

                यह विश्लेषण सामान्य ज्योतिषी ,यहाँ तक की सामान्य तांत्रिक और वैदिक ज्ञाता की भी समझ में नहीं आएगा किन्तु एक मनोवैज्ञानिक और जानकार तांत्रिक इसे समझ जाएगा |ऐसा ही होता है |यहाँ संचित कर्म कार्य करता है ,भले वह दिखाई नहीं देता |यद्यपि आलोचक इसके प्रमाण मांग सकते हैं किन्तु फिर भी ज्योतिषी इस तर्क को समझ कर उपरोक्त प्रश्न का उत्तर दे सकता है |यह विश्लेषण तो समान गर्भ से समान समय में जन्मे व्यक्तियों के लिए था |अब देखते हैं समान समय अलग परिवारों में जन्मे व्यक्तियों के भाग्य कैसे होंगे |

            एक ही समान जन्म समय पर समान परिस्थिति में किन्तु अलग परिवारों में जन्मे व्यक्तियों का भाग्य निश्चित रूप से अलग होगा |क्योकि यहाँ कई फैक्टर कार्य करते हैं जो भाग्य निश्चित रूप से बदल देते हैं |ऐसे लोगों में उपरोक्त अवचेतन की अनुभूतियाँ और यादें तो अलग होती ही हैं ,घर परिवार ,माता-पिता पर कार्य कर रही शक्तियां और उर्जायें भी अलग होती हैं जो जन्म लेने वाले बच्चे के आनुवंशिक गुणों के साथ ही जन्म के बाद उसके विकास को भी प्रभावित करती हैं |माता-पिता ,दादा-दादी ,परिवारीजनों के कर्मानुसार सकारात्मक अथवा नकारात्मक उर्जायें अथवा शक्तियाँ उनसे जुडी होती हैं |घर पर अलग उर्जाओं का प्रभाव हो सकता है ,कुलदेवता-देवी की अलग प्रकृति हो सकती है ,पितरों की अलग स्थिति और प्रभाव हो सकता है ,अलग ईष्टों के अनुसार अलग प्रभाव हो सकता है |यह सब मिलकर हर उस बच्चे पर अलग प्रभाव डालते हैं जो उसके विकास ,सोच ,अनुभव को प्रभावित कर देते हैं फलतः भिन्न वातावरण में विकास होता है और प्रतिक्रिया भिन्न हो जाती है जिससे उन्नति और भाग्य बदल जाते हैं |यहाँ तो लाखों वर्षों के संचित आनुवंशिक गुण अथवा उत्परिर्वन भी प्रभावी होते हैं फलतः बच्चा दुसरे समान समय के बच्चे से पूरी तरह अलग होता है और उसका भाग्य भी अलग होता है |

                जब एक गर्भ के समान समय के बच्चों और अलग परिवारों के समान परिस्थिति और समय के बच्चों में इतना अंतर आ जाता है तो अलग परिस्थिति और पारिवारिक स्तर के बच्चों में कितना अंतर आएगा यह आप समझ सकते हैं |इसीलिए कोई बच्चा गरीब परिवार में जन्म लेकर राजा बन जाता है जबकि समान समय में जन्मा राजा के घर का बच्चा राज्य गवां देता है |कोई कोई मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा होता है तो कोई भुखमरी में इसका विश्लेषण हम कभी दुसरे पोस्ट में करेंगे |हमारा विचार है भाग्य का अंतर क्यों होता है यह सामान्य जन को समझ आ गया होगा |इसे इस तरह से समझा जा सकता है |विज्ञान के अनुसार किसी बच्चे का 90% मानसिक विकास ५ वर्ष की उम्र तक हो जाता है |यदि उसे बेहद अनुकूल वातावरण ,सकारात्मक ऊर्जा ,ऊत्तम सोच का मार्गदर्शन मिले तो उसका 90% बेहतरीन विकास समय से हो जाता है ,पर यदि नकारात्मक उर्जाओं का प्रभाव घर-परिवार में हो ,बेहतर वातावरण न हो ,सही मार्गदर्शन न मिले जिसके बहुत से कारण हो सकते हैं तो उसी समान समय में जन्मे बच्चे का समय से विकास नहीं हो पायेगा ,फलतः जीवन भर यह समय उसे प्रभावित करेगा |

               जिस तरह किसी पौधे में छोटी अवस्था में ही कोई रोग लग जाए अथवा उचित भूमि अथवा पोषक तत्व न मिले तो वह अविकसित रह जाता है ,भले बाद में उसे कितने ही अच्छे वातावरण मिले ,उसी तरह बचपन के ऊर्जा प्रभाव जीवन भर बच्चे को प्रभावित करते हैं |इसे धन- संपत्ति ,समृद्धि से न जोड़ें अपितु इनके अर्थ सकारात्मक ऊर्जा से हैं |इसी प्रकार जीन विविधता और उनके विशेष गुण भी समान लग्न ,समय होने पर भी दो बच्चे के कर्म -सोच -क्रिया-प्रतिक्रिया अलग कर देतें हैं जिससे एक ही विषय पर उनकी प्रतिक्रिया और नजरिया भिन्न होता है जिससे उनका भाग्य अलग हो जाता है |किसी के कुलदेवता ,घर पर प्रभावी ईष्ट की प्रकृति ,किसी वायव्य बाधा का प्रभाव ,घर पर प्रभावी उर्जाओं की प्रकृति ,पितरों की स्थिति भी पारिवारिक स्थिति और माहौल के साथ विकास की संभावनाओं को प्रभावित करते हैं जिसका सीधा प्रभाव बच्चे के आगे के भविष्य पर जरुर पड़ता है और भाग्य अलग हो जाता है |……………………….हर-हर महादेव

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  • भाग्य जानने की हानियाँ

    भाग्य जानने की हानियाँ

    भविष्य जानना खतरनाक भी हो सकता है ?

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    बिना सोचे उपाय करने से होने वाली स्थायी हानि को कोई नहीं सुधार सकता 

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                  हर व्यक्ति अपने भविष्य के प्रति उत्सुक होता है और जिसे देखो यहाँ वहां हाथ फैला देता है ,अपनी कुंडली डाल देता है भविष्य जानने के लिए ,पर भविष्य जानने के अपने खतरे हैं |,भविष्य जानना भी बुरा हो सकता है ,कभी यह बहुत खतरनाक भी हो सकता है ,कभी किसी ने सोचा नहीं होगा अपितु हर व्यक्ति तो अपना भविष्य ही जानने के पीछे भागता रहता है |किसी ज्योतिषी को देखा नहीं ,किसी को जाना नहीं की बस अपना भविष्य जानने को उत्सुक |जिसे परेशानी है उसकी तो जिज्ञासा समझ आती है की वह अपनी समस्या /परेशानी का कारण जानना चाहता है ,[[वैसे कारण कम ही लोग जानना चाहते हैं लोग बस उपाय जानना चाहते हैं जो अच्छा नहीं होता ]] जिससे वह उससे निकल सके पर जिन्हें कोई परेशानी नहीं वह भी अपना भविष्य जानना चाहता है |कोई कोई व्यक्त भले ऐसा न करे पर ९९.९९ प्रतिशत में भविष्य को लेकर जिज्ञासा होती ही होती है |आइये हम आपको बताते हैं की भविष्य जानना कभी आपको परेशानी में भी डाल सकता है और उस परेशानी से फिर आपको कोई भविष्यवक्ता नहीं निकाल सकता |हालांकि बहुत से भविष्यवक्ताओं ,ज्ञानिओं ,जानकारों ,बुद्धिजीवियों और भविष्य जानने का दावा करने वाले ज्योतिषियों को मेरी बात बुरी भी लग सकती है अथवा उनके समझ में नहीं आ सकती ,क्योकि उन्होंने कभी सोचा ही नहीं इस बारे में |सामान्य लोगों ने भी नहीं सोचा ,जानेंगे कैसे |

                  जब आप भविष्य देख सकते हैं तो उसमे परिवर्तन भी किया जा सकता है |यही तो ज्योतिष का आधार है |भविष्य जानने का उद्देश्य भी होता है और यही भविष्यवाणी का अंतिम उद्देश्य होता है की भविष्य में होने वाली घटना को सुधारा जा सके |अगर सुधारा न जा सकता तो ज्योतिष और भविष्यवाणी का कोई अर्थ नहीं था |इसे इतनी न लोकप्रियता मिलती न इसकी कोई उपयोगिता थी |यद्यपि कुछ तथाकथित ज्योतिषी जो खुद को  आधुनिक और अधिक ज्ञानी मानते हैं ,उपाय और सुधार की संभावना को नकारते हैं ,की ऐसा नहीं हो सकता और वह यह नहीं जानते की वैदिक काल से ही ज्योतिष आदि में उपायों की अवधारणा इसी लिए रही है की भविष्य जानकर उसे सुधारा जा सके |इन्हें छोड़ दें तो लगभग सभी प्रकार की भविष्यवाणी और ज्योतिष आदि जैसी भविष्य आधारित विद्याओं के मूल में भविष्य जानकर उसे सुधारना ही है |ज्योतिष का उद्देश्य ही रहा है की ग्रहों द्वारा उत्पन्न भाग्य के प्रभाव को ग्रहों के उपाय द्वारा कैसे अधिकतम मनुष्य के लिए हितकर बनाया जाय|

                   जब आप भविष्य देख पाते हैं तो उसे सुधारने का भी प्रयत्न करते हैं अपने अनुकूल |प्रयास तो सभी का यही होता है |ज्योतिषी -तांत्रिक आदि भी उपाय तो इसीलिए बताते हैं की जो हो रहा ,जो होने वाला है उसमे कैसे परिवर्तन किया जा सकता है |अर्थात भविष्य जानने पर उसे सुधारा जा सकता है या बदला जा सकता है |जब कोई भी उपाय किया जाता है तो उससे ऊर्जा उत्पन्न होती है और उस ऊर्जा का प्रभाव ग्रह के प्रभाव पर होता है |भविष्य में सुधार अथवा थोड़े से भी परिवर्तन के लिए किया गया प्रयास कुछ तो परिवर्तन ला ही देता है और कुछ तो भविष्य बदल ही जाता है ,भले १ प्रतिशत ही सही |अर्थात जब आपने उपाय किया तो उसकी शक्ति से थोडा परिवर्तन हुआ |यानी भविष्य बदला ,और इसे बदला जा सकता है |अब अगर भविष्य बदला जा सकता है तो इस परिवर्तन से एक नया भविष्य उत्पन्न होगा |यानी जो उपाय आपने किये उससे जो परिवर्तन हुए उनसे एक नए भविष्य का निर्माण हुआ ,भले यह निर्माण मात्र १ प्रतिशत ही हुआ पर इसका उल्लेख अब आपकी नैसर्गिक कुंडली में तो नहीं होगा |क्योकि जो भविष्य आज किसी कुंडली ,अथवा अन्य माध्यम से देखा गया है उसका तो आधार है ग्रह स्थितियां आदि पर जो भविष्य आज बदला जा रहा उसका कोई आधार नहीं होगा ,कोई कुंडली नहीं होगी ,कोई ग्रह स्थितियां नहीं होंगी |क्योकि आपके प्रयास कब ,किस घडी फलीभूत हुए और भविष्य में बदलाव किस घडी आया कोई नहीं जानता |इस प्रकार जो नया भविष्य बना उसको जानने का तरीका सामान्यतया नहीं होता ,केवल बहुत सिद्ध व्यक्ति ही उसे देख सकता है ,ज्योतिष से तो यह कत्तई संभव नहीं |

                   अब सबसे बड़ा खतरा तब उत्पन्न होता है की जो नया भविष्य आपने पिछले भविष्य को सुधारने के प्रयास में उपाय आदि करके बनाए हैं उसमे कब कौन सा खतरा है किसी को नहीं पता |यानी आज जो नया भविष्य बना उसमे आगे जाकर नुक्सान है या लाभ है अथवा कोई परिवर्तन तो नहीं होने वाले कोई नहीं जानता |आपके उपाय सही तरीके से हुए हैं की नहीं |सही उपाय बताये गए थे की नहीं |नीम हकिम की तरह ऐसे उपाय तो नहीं करवा दिए गए जो एक नई समस्या खड़ी करने वाले हैं नए भविष्य में |अगर उपाय गलत थे तो भी एक नया भविष्य बनेगा और उपाय सही थे तो भी एक नया भविष्य बनेगा |अगर सही ही उपाय बताये गए तो उनके साइड इफेक्ट क्या हो सकते हैं जो नए भविष्य में आयेंगे यह भी सोचने लायक होगा |आज की समस्या तो आपने उपाय करके हल कर दी किन्तु यह परिवर्तन कल के भविष्य के लिए घातक तो नहीं |ऐसा तो नहीं की आज की समस्या कम करने में भविष्य में बड़ी समस्या उत्पन्न कर दी गयी |क्योकि अब नए भविष्य को तो पुरानी कुंडली से देखा नहीं जा सकता |वह कुंडली तो जन्म के समय की स्थितियों पर आधारित है |उसमे परिवर्तन के बाद क्या स्थितियां होंगी वह तो वह बता नहीं पाएगी |वह कुंडली तो सामान्य भविष्य बताती है जबकि उसमे कोई परिवर्तन का प्रयास न किया गया हो |

                ज्योतिषी -तांत्रिक के कहने पर ,बताने पर आपने गंभीर उपाय /प्रयास किये और आपकी स्थितियां परिवर्तित भी हो गयी |आपका माहौल बदल गया |स्थितियों में परिवर्तन से स्वभाव बदल गया ,वातावरण बदल गया ,घर-परिवार में परिवर्तन हो गया |अब आगे जो होना है या जो परिवर्तन आ गया उसके अनुकूल क्या आपका यह स्वभाव ,वातावरण ,माहौल आदि सहायक होंगे या आपमें या आपके आसपास जो परिवर्तन हुए हैं वह आपके नए भविष्य से सामना करने में सहायक होंगे या नहीं कोई नहीं जानता |इस नए भविष्य से सबकुछ अनजान हो जाएगा |जब एक बार आपने अपने लिए गंभीर उपाय कर लिए तो ज्योतिषी की भविष्यवाणी आप पर फिर कभी शतप्रतिशत सही नहीं होगी |कुछ घटनाएं सही बैठेंगी तो कुछ गलत हो जायेंगी |क्योकि आपके भविष्य में तो परिवरतन हो गया है |कुछ उपाय सही काम करेंगे तो कुछ के परिणाम विपरीत होंगे |जैसे जैसे आप परिवर्तन का प्रयास करते जायेंगे ,नए पर नए भविष्य उत्पन्न होंगे और स्थिति जटिल से जटिलतम होती जायेगी |गोचरीय परिवर्तन पर आधारित फलादेश कुछ हद तक सही होंगी तो नैसर्गिक स्थितियों पर आधारित फलादेश में परिवर्तन मिलेगा |ऐसा नहीं की ग्रहों का प्रभाव आपके लिए बदल जाएगा |वह नहीं बदलेगा क्योकि जन्मकालिक स्थिति के अनुसार उनका प्रभाव तो पड़ेगा ही ,पर आपके शरीर की उनके रश्मियों की स्वीकार्यता अथवा अस्वीकार्यता में परिवरतन हो गया रहेगा |क्योकि आपने विभिन्न उपाय से एक नया ऊर्जा संरचना उत्पन्न किया था ,इस रश्मियों के ही प्रभाव को बदलने के लिए |

                यह लेख हमारी सोच की उपज है ,सभी सहमत हों जरुरी नहीं और हमें अपेक्षा भी नही ऐसी |कुछ विपरीत कमेन्ट भी कर सकते हैं पर हमारी यह सोच अचानक नहीं बनी या उत्पन्न हुई |बहुत सारी घटनाओं को देखने ,समझने के बाद बनी ,जबकि अति विद्वान् ज्योतिषियों के भी भविष्यवाणी कुछ स्थानों पर गलत हो जाते हैं |गलती या कमी ज्योतिषी में नहीं होती ,अपितु दिक्कत उन गंभीर उपायों आदि की है जो जातक ने पहले करके नया भविष्य उत्पन्न कर दिया है |चाहे उसने जिज्ञासा में किया हो अथवा किसी ज्योतिषी /भविष्यवक्ता के कहने पर किया हो ,पर हो तो कुछ गया ही है ,जो आज समस्या की तरह खड़ा हो गया |ऐसी स्थिति में जातक के पास केवल एक ही बेहतर विकल्प बचता है किसी सिद्ध व्यक्ति के पास पहुचना जो इस परिवर्तित भविष्य को भी देख सके और सुधार करा सके |पर जो व्यक्ति इतना सिद्ध हो की वह बिना किसी आधार के किसी का भविष्य देख सके ,वह पहले तो किसी का भविष्य बताता नहीं ,दुसरे वह समाज से ही दूर रहता है ,क्योकि यह क्षमता बहुत गंभीर साधनाओं के बाद ही आ पाती है |भूत और वर्त्तमान देखना तो मुश्किल नहीं पर भविष्य देखना सर्वाधिक मुश्किल काम है |कोई कर्ण पिशाचिनी ,वामकी ,कर्ण मातंगी  आदि का साधक भविष्य नहीं बता सकता ,हाँ यह भूत और वर्त्तमान बता देते हैं और चुकी भूत सही बता देते हैं अतः भविष्य के तुक्के भी लोग सही ही मान लेते हैं ,जबकि ये भविष्य देख ही नहीं सकते |पंचंगुली का साधक परिवर्तित भाग्य नहीं बता सकता ,हाँ सामान्य भाग्य बता सकता है ,अतः यह भी बदले हुए भाग्य में कारगर नहीं होता |केवल बहुत पहुंचा हुआ सिद्ध व्यक्ति ही यह सब बता सकता है ,जिसे खोजना भूसे के ढेर से सुई ढूँढने जैसा ही है हालांकि दावा करने वाले तो लाखों मिलते हैं ,पर तुक्के लगाने से अधिक किसी की औकात नहीं होती भविष्य देखना तो दूर की बात है |

              इस पूरे लेख को लिखने का मकसद केवल अपने मन में उठे विचार व्यक्त करना ही मात्र है पर पढने वाले लोग कहेंगे कोई निष्कर्ष नहीं बताया की फिर आखिर करें तो क्या करें |इसलिए कुछ निष्कर्ष तो निकालना ही पड़ेगा और कुछ बचाव तो बताने ही पड़ेंगे |आप खुद के विवेक से जो भी बचाव कर सकते हैं करें ,हम केवल यह कहाँ चाहेंगे की जब भी आप भविष्य को लेकर उत्सुक हों अथवा किसी कठिनाई में पड़े हों और भविष्य आदि जानकर निराकरण की अपेक्षा हो तो किसी अच्छे ,विद्वान् ,ज्ञानी ज्योतिषी ,भविष्यवक्ता को ही अपने मार्गदर्शन के लिए चुनें |यहाँ वहां ,नीम -हकीम से सलाह लेना ,दो महीने ज्योतिष पढ़कर ज्योतिषी बन जाने वाले ,टोटके जानकर तांत्रिक बन जाने वाले ,कल तक यहाँ वहां घूमने वाले और आज तांत्रिक या ज्योतिषी खुद को कहने वाले ,कम उम्र युवा अथवा अनुभव हीन व्यक्ति ,भले जो खुद को चाहे जितना बड़ा बताये ,ऐसे ज्योतिषी -तांत्रिक -भविष्यवक्ता से बचें |इससे अधिक जरुरी यह की कोई भी उपाय तब तक न करें जब तक किसी विद्वान् की सलाह के साथ उसके अच्छे बुरे परिणाम की जानकारी न हो जाए या वह काम कैसे करेगा ,कहाँ करेगा ,उसका प्रभाव कहाँ होगा ,कैसा होगा ,वह परिवर्तन या सुधार कहाँ और कैसे करेगा यह सब न समझ लें |आप जो भी उपाय करेंगे उससे एक परिवर्तन जरुर होगा और नया भविष्य बनेगा ,जिसे कोई ज्योतिषी नहीं पढ़ पायेगा और इसलिए जब वहां समस्या आएगी तो कोई सुधार भी नहीं पायेगा |जो करें सोच कर करें ,ऐसा न हो की कुछ बनाने में कुछ ऐसा बिगड़ जाए जो सुधारना मुश्किल हो जाए |इसके बाद के बचाव आपकी इच्छा पर |…………[[व्यक्तिगत चिंतन ]]…………………………………………..हर-हर महादेव

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  • खुद की तबाही का रास्ता बना रहे ?

    खुद की तबाही का रास्ता बना रहे ?

    क्या अपनी बर्बादी खुद लिख रहे ?

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    कभी सोचा है

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           आप जिस देवता को पूजते हैं आपका अंतिम पड़ाव उस देवता तक ही अधिकतम हो सकता है ,अर्थात आप अधिक से अधिक उसके लोक तक ही जा सकते हैं ,अगर वह प्रसन्न हो गया अथवा सिद्ध हो गया तो |आप अगर भूत -प्रेत ,पिशाचिनी ,यक्षिणी ,अप्सरा ,पीर ,मजार ,शहीद ,बीर ,सती ,ब्रह्म पूजते हैं तो आपका अंतिम पड़ाव यही होंगे आपको देवी-देवताओं का लोक नहीं मिलने वाला इन्हें पूजने से |इतना तो सभी जानते हैं की किस देवता को पूजने से क्या मिलता है ,उसी तरह जिसे आप पूजते हो वह आपको मिलता है और आपको उसका लोक मिलता है |अगर कोई मनुष्य मरा है और ब्रह्म ,पीर ,बीर ,सती ,शहीद ,प्रेत ,भूत बना है तो उसकी तो क्षमता ही उसके लोक तक है ,जब वह खुद आत्मा रूप में घूम रहा तो आपको क्या देवताओं तक ले जाएगा |

                इसी तरह पिशाचिनी ,यक्षिणी ,अप्सरा भी अपने लोक और क्षमता से ऊपर तो आपको नहीं ही पहुचा सकते |क्या आप गारंटी से कह सकते हैं की अमुक शहीद ,ब्रह्म ,बीर का मोक्ष हो गया या वह देव लोक तक चले गए |जब खुद नहीं गए तो आपको क्या ले जायेंगे |अगर चले गए तो उनके पूजने पर यहाँ आपका काम कैसे होता है |यहाँ आपका काम होता है इसका मतलब वह इसी भौतिक दुनिया में भटक रहे और आपके पूजा को लेकर अपनी शक्ति बढ़ा रहे और अपना शक्ति बरकरार रख रहे |वैसे आपकी मनोकामना पूर्ण होने की थ्योरी और विज्ञान कुछ अलग होता है जिसके बारे में ९९ प्रतिशत लोग नहीं जानते |आप किसी भी काल्पनिक देवता की पूजा करने लगें और आपकी श्रद्धा अट्टू हो तो आपमें मानसिक बल ,क्षमता ,आस्था -विश्वास की ताकत उत्पन्न होगी जो आपके अवचेतन के साथ ही आपके व्यक्तित्व को भी प्रभावित करेगी और आपकी स्थिति सुधरती जायेगी |

                इसे आप प्रेत शक्ति की पूजा से मत जोड़ लीजियेगा की उनकी पूजा पर भी आपको यही लाभ मिलेंगे |प्रेत शक्ति की पूजा पर वह आपकी पूजा लेते हैं ,कभी कभी तो खुद को देवी देवता बताकर भी लेते हैं ,आपके काम बनते हैं उनकी सहायता से किन्तु आपके आस पास ऐसा घेरा भी बन जाता है की आप फिर उनसे निकल नहीं सकते और आपकी मुक्ति बाधित हो जाती है ,मोक्ष की तो बात ही भूल जाइए |आपकी अगली पीढ़ी से भी यह पूजा चाहते हैं और अगली पीढ़ी ने इन्हें पूजा नहीं दी तो उनकी बर्बादी शुरू |इनकी पूजा से आपके पित्र तो नाराज रहते ही हैं आपसे आपके कुलदेवता भी स्थान छोड़ जा चुके होते हैं ,फिर आपके पास वापसी का कोई रास्ता नहीं होता और आप इन्हें ही पूज सकते हैं |

              आपकी पूजा किसी भी देवी देवता तक नहीं पहुँचती |आप कहेंगे की क्या यह देवी -देवताओं से भी शक्तिशाली हो गए जो उन तक आपकी पूजा नहीं पहुंचेगी तो हम आपको बताना चाहेंगे की हां आपकी पूजा देवताओं तक नहीं पहुंचेगी भले देवी देवता बहुत शक्तिशाली होते हैं क्योंकि गलती आपने खुद की है |कुलदेवता नाराज हो गए हों या कुलदेवता की पूजा न हो रही हो तो किसी भी देवी देवता को पूजा नहीं मिलती यह एक चक्र और सीढ़ी होती है भारतीय पूजा नियमों में |क्रम बनाए गए हैं ,संरचना बनी है ऊर्जा की जिसमे ऊर्जा विनिमय होता है |पित्र नाराज तो कुलदेवता रुष्ट ,कुलदेवता रुष्ट तो कोई देवता पूजा नहीं पायेगा |अंततः आप न मुक्त होंगे ना पाजिटिव ऊर्जा पायेंगे |ग्रहों तक के उपाय काम नहीं करेंगे |ले देकर आप उसी शक्ति पर निर्भर हो जायेंगे जो प्रेत शक्ति आप पूज रहे थे |अक्सर आपने देखा भी होगा की इन्हें पूजने वाले कुछ समय बहुत तेजी से वृद्धि करते हैं पर अंततः अंतिम समय बुरा होता है और बाद में परिवार तबाह होने लगता है ,क्योंकि कोई भी ऐसी शक्ति बिना स्वार्थ किसी की सहायता नहीं करती चूंकि आखिर हैं तो वह आत्मा ही तथा उसमे इच्छाएं भी बाकी होती हैं |

             इनमे एक दोष और होता है यह पूजे जाने पर आपके कुलदेवता की पूजा ले लेते हैं और कुलदेवता साथ छोड़ देते हैं ,आज तो नहीं समझ आएगा पर अगली पीढियां परिणाम गंभीर भुगतेंगी जब कुलदेवता का सुरक्षा चक्र समाप्त हो जाएगा |दूसरी समस्या की कुलदेवता को पूजा न मिलने से ईष्ट तक आपकी पूजा नहीं पहुचेगी |आप तीन घंटे पूजा करो पर लाभ कुछ भी नहीं होगा |ईष्ट तक पूजा पहुच ही नहीं रही |थक कर आप कहोगे की पूजा पाठ ,तंत्र मन्त्र सब बेकार है |

            एक और समस्या यह होगी आपके इन शक्तियों को पूजने से की जब तक आप इन्हें पूजोगे ये आपको सुखी रखेंगी क्योकि इनका स्वार्थ है आपकी पूजा से इन्हें शक्ति मिलेगी |आने वाली पीढ़ियों में जब कोई भूलेगा या पूजा नहीं देगा या आप ही कभी पूजा बंद कर दिए तो यह उनका या आपका विनाश कर देंगी |कुलदेवता और ईष्ट पहले ही गायब हैं आपका या पीढ़ियों का भला कोई नहीं कर पायेगा |इन सब कारणों को आपने सोचा नहीं पूजने लगे आत्मा की प्रतीक शक्तियों को ,जब परिणाम बंद हुआ तो पूजा पाठ सब बेकार बना दिया |पहले नहीं सोचा तो भैया अब सोचो ,अभी आपके पास समय हो सकता है |वर्ना अपना तो बेडा गर्क करोगे ही आने वाली पीढियां भी गाली देंगी की कहाँ फंसा कर चले गए उन्हें आप |दुसरे की देखा -देखि शहीद -पीर ,मजार ,ब्रह्म बाबा .बीर बाबा .के भ्रम से बाहर निकलो नहीं तो पछताने पर भी रास्ता नहीं मिलेगा |ध्यान दीजिये हम संतों और गुरुओं की समाधि की बात नहीं कर रहे ,इन पर हम किसी दुसरे लेख में विस्तार से चर्चा करेंगे |इनका प्रभाव और परिणाम अलग होता है |अभी हम केवल शहीद ,ब्रह्म ,बीर ,सती ,पीर ,चौकी ,मजार आदि उन शक्तियों की चर्चा कर रहे जो प्रेत योनी में गए |आप पीर और संत समाधि को भी आपस में मत जोड़ समान मत मान लीजियेगा क्योंकि दोनों के प्रभाव आपके लिए समान नहीं होते हैं |इस पर हम विस्तार से आपको अगले अंक में समझायेंगे |

                    आप हिन्दू हो तो बड़े सहिष्णु और दयालु भी हो ,सबको बराबर मानकर कहीं भी सर झुका देते हो ,किसी की पूजा करने लगते हो पर कहीं यह आपके गले की फांस तो नहीं बन रहा इस पर भी तो सोचो |आप आज के थोड़े से स्वार्थ और लाभ के लालच में कहीं अपनी मुक्ति तो नहीं बिगाड़ रहे ,कहीं अपनी आने वाली पीढ़ियों को कांटे और बर्बादी तो नहीं देकर जा रहे |.हम यह बिलकुल भी नहीं कह रहे की आप इनकी पूजा मत कीजिये ,आप इनको पूजा दीजिये ,जरुर दीजिये आपको अति आवश्यक लगता हो तो किन्तु अपने घर में स्थापित करके नहीं ,आप जब भी इन्हें पूजा दें तो इनके लिए बनाए गए स्थान पर जाकर ही |इन्हें लाकर घर में स्थापित नहीं कीजिये ,क्योंकि आपकी सभी समस्याएं तभी शुरू होंगी जब आप इन्हें घर में स्थापित कर देंगे |ऐसी कोई मान्यता मत मान दीजिये की आपका यह काम होगा तो आप इन्हें घर में स्थान देकर पूजा करेंगे |आपने घर में स्थान दिया तो फिर वह होगा जो हमने उपर बताया है |…[इस विडिओ और पोस्ट का उद्देश्य किसी की भावना  को  ठेस  पहुचना नहीं है ,अपितु पूजा -पाठ  के आतंरिक रहस्य को समझने का प्रयत्न मात्र है ,जो हम अपने website-alaukikshaktiyan.com,alaukikshaktiyan.in,facebook पेज ,youtube चैनल और ब्लॉग के पाठकों -श्रोताओं से साझा कर रहे ,वैचारिक स्वतंत्रता के अधिकार के आलोक में ]………………………………………………………….हर-हर महादेव

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  • महाशंख  

                          महाशंख के विषय में समस्त प्रभावशाली तथ्य केवल कुछ शाक्त ही जानते हैं |इसके अलावा सभी लोग tantra में शंख का प्रयोग इसी महाशंख के कारण करते हैं |लेखक लोग शंख को ही तांत्रिक सामग्री मानकर ग्रन्थ पूर्ण कर देते हैं |में आपसे यह स्पष्ट करना चाहता हूँ की शंख और महाशंख दोनों अलग हैं |यह क्या है और इसके tantra प्रयोग क्या हैं यह हम स्पष्ट करते हैं |शंख को बजाना शुभ होता है |शंख के द्वारा अर्ध्य दिया जाता है |शंख द्वारा देव स्नान कराया जाता है ,कुछ सेवन किया जाता है ,|इसके आलावा शंख के tantra में कोई प्रयोग नहीं होते |दक्षिणावर्ती शंख भी पूजन में ही प्रयुक्त होता है जिसका प्रयोग लक्ष्मी उपासना में किया जाता है ,इसके अतिरिक्त बहुत प्रयोग tantra में शंख के नहीं हैं ,जबकि महत्त्व बहुत दिया जाता है ,इसका कारण यही महाशंख है जिसके बारे में हम आगे बताने जा रहे हैं |वास्तव में शंख और महाशंख में बहुत भेद होता है |
                       व्यक्ति के प्राणांत हो जाने पर उसी शव से यह महाशंख प्राप्त होता है ,जबकि शंख तो समुद्र में जीव का खोल है |इसे हमेशा याद रखना चाहिए |स्त्री और शूद्र से चांडाल की उत्पत्ति होती है तथा “तज्जायश्चेव चांडाल सर्व मंत्र विवर्जितः ” इसी कारण यह लोग मन्त्रों से हीन होते हैं |”मंत्रहीनेतुस्थ्यादिसर्ववर्ण विभुषिताम” जो लोग मन्त्रों से हीन होते हैं उन्ही की अस्थियों में सभी वर्ण रहते हैं |
                         जो साधक महाशंख की माला से जप करता है वह निःसंदेह अणिमा आदि सिद्धियों को प्राप्त करता है |यह माला बनानी तथा प्राप्त करनी तो सरल है क्योकि इसमें धन का कोई व्यय नहीं होता किन्तु खतरनाक अवश्य है |धन के विषय में जितनी सरल है उतनी ही स्वर्ग से भी दुर्लभ है ,क्योकि स्वर्ग तो आपको प्राप्त हो जाएगा परन्तु इस माला की प्राप्ति किसी व्यावसायिक व्यक्ति से नहीं होती |यहाँ तक की आज के तथाकथित बड़े बड़े तांत्रिक और स्वयंभू साधक तक इसके बारे में जानते तक नहीं ,पानी और देखनी तो दूर की बात है |इसे प्राप्त करने के लिए श्मशान में घूमना पड़ता है अथवा यह माला भाग्यवश ही गुरुकृपा से प्राप्त होती है |व्यक्ति इसे बना सकता है अगर खुद भी प्रयास करे तो |इस माला के द्वारा सही मन्त्रों का जप करना चाहिए |मंत्र के सभी दोषों को यह माला समाप्त कर देती है |मंत्र किसी भाँती के दोष से युक्त हो सकता है परन्तु यह माला कभी भी दोषी नहीं होती है |इसी कारण    महाशंख सर्वत्र तेषु योजितम अर्थात महाशंख ही सब प्रकार के मन्त्रों से लाभ प्राप्त करने के लिए सर्वश्रेष्ठ है |
    पूर्वजन्म के शुभ तथा सफल कर्मो के प्रयास से यदि कभी किसी को महाशंख की माला प्राप्त हो जाती है तो वह व्यक्ति तो क्या उसका समस्त परिवार ही समस्त साधनाओं का लाभ प्राप्त कर लेता है |
    क्या है महाशंख
    ——————– महाशंख के विषय में समस्त प्रभावशाली तथ्य केवल कुछ शाक्त ही जानते हैं |इसके अलावा सभी लोग तंत्र में शंख का प्रयोग इसी महाशंख के कारण करते हैं |लेखक लोग शंख को ही तांत्रिक सामग्री मानकर ग्रन्थ पूर्ण कर लेते हैं |इसका कारण यह है की लेखक अच्छे साधक ही मुश्किल से होते हैं उस पर वे उच्च स्तर के शाक्त साधक हों बेहद मुश्किल है |खुद साधना और मूल तंत्र का अनुभव न होने से यहाँ वहां से सुनी हुई बातों और पुराने शास्त्रों को तोड़ मरोड़कर कुछ अपनी कल्पनाएँ घुसेड़कर एक किताब लिख देते हैं और कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं |वास्तविक तंत्र एक तो वैसे भी गोपनीय होता है जो इन लेखकों को पता ही नहीं चलता उस पर खुद साधना ज्ञान न होना कोढ़ में खाज हो जाता है और सतही षट्कर्म की किताब सामने होती है |आज तंत्र की दुर्दशा का यह बहुत बड़ा कारण है और मूल तंत्र के लोप का भी |
    सामान्य शंख को बजाना शुभ होता है |शंख के द्वारा अर्ध्य दिया जाता है |शंख द्वारा कुछ सेवन किया जाता है |शंख द्वारा देव स्नान भी कराते हैं |इसके अलावा तंत्र में शंख के कोई काम नहीं होते जबकि शंख का महत्त्व बहुत अधिक है |तो आखिर वह कौन सा शंख है जो इतना महत्त्व पूर्ण है |तंत्र में दक्षिणावर्ती शंख का प्रयोग लक्ष्मी प्राप्ति हेतु जरुर किया जाता है ,किन्तु यह पूजन होता है |वास्तव में शंख और महाशंख में बहुत बड़ा अंतर होता है |
    व्यक्ति के प्राणांत हो जाने पर उसी शव से यह महाशंख प्राप्त होता है जबकि शंख की प्राप्ति सबको मालूम है |चांडाल लोग मन्त्रों से हीन होते हैं और जो लोग मन्त्रों से हीन होते हैं उन्ही की अस्थियों में सभी वर्ण होते हैं |हिंदी की शब्दमाला को ही वर्ण या वर्णमाला कहते हैं |इन्ही वर्णों पर अं की मात्रा लगाने से यह वर्ण बीज वर्ण बन जाते हैं |अ से लेकर क्ष तक के सभी वर्ण अस्थियों के मध्य सदा विद्यमान रहते हैं |प्रस्तुत चित्र के अनुसार दर्शाए गएँ अंगों पर चिन्ह के स्थानों की अस्थि लेकर माला बनाने पर वह महाशंख की माला कहलाती है |
    इस माला के द्वारा जप करने पर समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं |इन स्थानों की अस्थियाँ लेकर स्थानानुसार ही माला में पिरोया जाता है ||इस माला को सर्प की भाँती बनाया जाता है अर्थात आगे से मोती होती होती पीछे जाकर पतली हो जाए |स्पष्टतः यह समझ लें की माला का मूल मोटा और फिर क्रमशः पतला होता चला जाता है |माला को बनाते समय पहले मोती अस्थि डाली जाती है ,फिर उससे पतली ,फिर और उससे पतली अस्थि पिरोते जाते हैं |जहाँ जहाँ चित्र में चिन्ह लगे हैं वहां वहां की अस्थि ली जाती है |सर से पैर तक की अस्थियाँ क्रम से पिरोई जाती हैं |जब माला बन जाती है तो प्रणव की गाँठ लगाईं जाती है |इसके उपर एक लम्बी अस्थि डालकर पुनः ब्रह्मगाँठ लगाईं जाती है |इसे बनाकर प्राण प्रतिष्ठा की जाती है |प्राण प्रतिष्ठा का विधान अत्यंत गोपनीय होता है |
    इस माला को गोपनीय रखा जाता है और इस पर जप की शुरुआत मोटी तरफ से करके समापन पतली तरफ किया जाता है |पुनः मोती तरफ से शुरुआत होती है |इस भाँती जप करने से निश्चित सिद्धि प्राप्त होती है |
    महाशंख की माला बनाने के लिए स्त्री ,ब्राह्मण तथा मन्त्र दीक्षित व्यक्ति के शव की अस्थियाँ नहीं ली जाती |शव साधना में भी स्त्री का शरीर उपयोग नहीं किया जाना चाहिए |महाशंख की माला हेतु बिना दीक्षित ,जो ब्राह्मण न हो उसके शव की अस्थियाँ उपयुक्त होती हैं इसीलिए शूद्र अथवा चांडाल की अस्थियाँ अधिक उपयुक्त होती हैं |………………………………………………………..हर-हर महादेव 

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  • गृहस्थ कैसे ईश्वरीय शक्ति महसूस करे ?

    गृहस्थ कैसे ईश्वरीय शक्ति महसूस करे       
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            हमने अपने ब्लॉग पर प्रकाशित लेख -“” क्यों अपना कष्ट खुद दूर नहीं करते“” में सामान्य लोगों के जीवन ,कष्टों ,समस्याओं पर लिखा था और सुझाव रखा था की क्यों न हम खुद अपना कष्ट दूर करें ,बजाय यहाँ वहां ,पंडितों ,मौलवियों ,ज्योतिषियों ,तांत्रिकों ,मंदिरों ,मस्जिदों तक दौड़ने के |हमारा उद्देश्य यह है की व्यक्ति खुद इतनी ईश्वरीय ऊर्जा प्राप्त करे की उसके कष्ट दूर हो जाएँ |वह शोषण ,धोखे ,फरेब से बच सके ,साथ ही एक शक्ति ऐसी उसके साथ जुड़े जो हमेशा उसकी सहायक रहे ,अर्थात ईश्वर वास्तविक रूप से व्यक्ति के साथ जुड़े |इस सम्बन्ध में लोगों के पास अक्सर कोई स्पष्ट दृष्टि नहीं होती |तकनिकी ज्ञान नहीं होता ,जबकि लगभग हर आस्तिक व्यक्ति पूजा पाठ करता है ,मंदिरों मस्जिदों में जाता है और चाहता है की ईश्वर उससे जुड़े ,उस पर कृपा करे ,उसके कष्ट दूर करे ,उसे सुखी करे |हर व्यक्ति ईश्वर और ईश्वरीय ऊर्जा महसूस करना चाहता है किन्तु अधिकतर को वर्षों पूजा पाठ करने पर कुछ भी महसूस नहीं होता ,बड़े बड़े कर्मकांड ,अनुष्ठान का कभी कभी कोई परिणाम नहीं दिखता ,इसलिए ही हमें यह लेख लिखने की जरूरत महसूस हुई की कुछ मूलभूत बातें जो हमें ज्ञान हैं यदि उनसे किन्ही लोगों का भला हो जाए और उन्हें ईश्वरीय ऊर्जा महसूस हो तो बताने
    में कोई बुराई नहीं
    |
            ईश्वरीय ऊर्जा या शक्ति महसूस करना आसान नहीं ,किन्तु यह उतना कठिन भी नहीं जितना लोग सोचते हैं या कहा जाता है |यदि निष्ठा ,चाहत ,लगन ,श्रद्धा ,विश्वास है तोईश्वर जरुर मिलता है “|ईश्वर का साक्षात्कार अक्सर साधकों को होता है ,किन्तु उसकी शक्ति ,उसकी ऊर्जा तो हर कोई महसूस कर सकता है यदि चाह ले तो |हालांकि जो तरीके हम लिखने जा रहे उनसे भी साक्षात्कार हो सकता है यदि
    व्यक्ति एकाग्र हुआ तो
    |ईश्वरीय उर्जा या शक्ति प्राप्त करने ,उसे महसूस करने के लिए सबसे पहले तो खुद को उससे जोड़ना होना ,उसमे डूबना होगा ,उसका चिंतन करना होगा ,उस पर एकाग्र होना होगा ,खुद को उसका और उसको अपना समझना होगा ,इतना जुड़ाव महसूस करना होगा की वह अवचेतन तक जुड़ जाए |यहाँ महत्त्व वस्तुओं ,पदार्थों ,पूजन सामग्रियों ,आडम्बरों ,मंत्र संख्याओं का नहीं होता अपितु महत्त्व भावना ,एकाग्रता और चाहत का होता है |ईश्वरीय ऊर्जा महसूस करने के लिए गुरु की भी कोई बहुत आवश्यकता नहीं ,यद्यपि साक्षात्कार और सिद्धि बिन गुरु के मुश्किल होती है |हमने जो भी पद्धतियाँ सोची हैं अथवा विकसित की हैं इस हेतु उन्हें बिन गुरु के किया जा सकता है ,हाँ सुरक्षा कवच की जरूरत पड़ती है जो सिद्ध साधक से बनवाकर धारण किया जा सकता है |कुछ पद्धतियाँ ईश्वरीय
    ऊर्जा महसूस करने के लिए निम्न हो सकती हैं
    |
    हमने अपने blogपर तथा अपने फेसबुक पेजों अलौकिक शक्तियाँतथा “tantramarg” पर एक साधना पद्धति प्रकाशित की हुई है जिसका शीर्षक है ,”15 मिनट पर्याप्त हैं ईश्वरीय ऊर्जा प्राप्ति के लिए या “15 मिनट और ईश्वरीय शक्ति प्राप्ति “| इस पद्धति में दीपक पर त्राटक करते हुए गणपति की साधना बताई गयी है जिससे आज्ञा चक्र की सिद्धि ,गणपति की सिद्धि और कृपा प्राप्त होती है |एकाग्रता
    के अनुसार यह पद्धति भूत
    भविष्य वर्तमान देखने तक की शक्ति प्रदान कर सकती है |इससे गणपति की कृपा प्राप्त होती है और विघ्न बाधाएं समाप्त हो खुशहाली प्राप्त होती है |इस साधना हेतु मात्र १० से १५ मिनट का समय पर्याप्त होता है और इसे बिन गुरु के भी किया जा सकता है ,मात्र सुरक्षा कवच धारण करके |
    हमने दूसरी साधना पद्धति भगवती काली से सम्बंधित ,अपने उपरोक्त blogs और फेसबुक पेजों पर प्रकाशित की है जिसमे मात्र काली सहस्त्रनाम के पाठ से काली की शक्ति महसूस करने की पद्धति बताई गयी है |इसका शीर्षक महाकाली साधना “-[जिन्हें गुरु न मिले ] अथवा काली सहस्त्रनाम सौ समस्या
    का एक इलाज
    है |इस पद्धति में मात्र काली जी के एक हजार नामों को एक विशेष समय पद्धति से पढने या पाठ करने के बारे में बताया गया है |इससे भगवती की कृपा मिलती है और उनकी ऊर्जा महसूस भी होती है |यह साधना भी बिन गुरु के मात्र सुरक्षा कवच के साथ की जा सकती है |
    आप सामान्य व्यक्ति हैं ,आपको कोई पूजा पद्धति कर्मकांड नहीं आता ,अपनी समस्या के लिए मंदिरों ,मौलवियों ,पंडितों ,ज्योतिषियों के चक्कर काटने पर मजबूर हैं ,आपको कोई परिणाम नहीं समझ में आता ,नकारात्मक प्रभावों से कष्ट पा रहे तो आप अपने उस ईष्ट देवता का सुन्दर सा चित्र ले आयें जो
    आपको सबसे अधिक प्रिय हों
    |इस चित्र को पूजा स्थान या अपने कमरे में अपने बैठने के स्थान के स्थान पर इस प्रकार लगाएं की चित्र आपके आँखों के सामने पड़े |जो आपको समझ आता तो उतनी पूजा प्रतिदिन करें ,स्नान जरुर करें रोज और भोजन पूर्व ईष्ट को मन की भावना से अथवा उपलब्ध संसाधनों से भोजन जरुर कराएं |स्नान बाद सामान्य पूजन ,नैवेद्य चढ़ाकर आप अपने ईष्ट से अपनी मनोकामना कहें |आप अपने ईष्ट में गुरु ,माता पिता ,भाई बहन ,मित्र की भावना करें |यह जरुर याद रखें की रोज आपकी मनोकामना बदलनी नहीं चाहिए ,कम से कम एक महीने तक एक प्रकार की मनोकामना स्थिर रहनी चाहिए |आप जिस रूप में अपने ईष्ट को एक बार मान लें फिर उसे कभी नहीं बदलें और हमेशा उसी रूप में उसे याद करें |अब आप अपने ईष्ट के चित्र पर एकटक एकाग्र हो जाएँ और कल्पना रखें की वह आपकी ओर देख रहे हैं ,आपको आशीर्वाद दे रहे हैं ,मुस्करा रहे हैं ,बात कर रहे या बात करेंगे |कुछ समय बाद ही चित्र बदलता लगेगा ,ईष्ट की भाव भंगिमा ,स्वरुप बदलेगा ,और कुछ समय बाद आपको लगेगा की चित्र साकार होकर ईष्ट में बदल गया |एकाग्रता अच्छी होने पर यह एक सप्ताह से १५ दिन में संभव है |जिस दिन ईष्ट साकार रूप ले लिया ,या आपकी एकाग्रता इतनी हुई की आप खुद का अस्तित्व मात्र एक मिनट भूल जाएँ और ईष्ट के स्वरुप में खो जाएँ तो ईष्ट की कृपा आपको मिल जायेगी और उसकी ऊर्जा आपसे जुडकर आपकी सोच ,भावना के अनुरूप काम करने लगेगी ,आपकी शारीरिक ,मानसिक और चक्रों की स्थिति में परिवर्तन के साथ साथ आसपास का वातावरण तक उसकी ऊर्जा से संतृप्त होने लगेगा और आपको उसकी शक्ति ,ऊर्जा महसूस होने लगेगी |यहाँ हम यह
    चेतावनी देना चाहेंगे की ईष्ट का चुनाव हमेशा सौम्य शक्ति में से ही करें यदि आपके पास सक्षम गुरु नहीं हैं या आपने सुरक्षा कवच नहीं पहना
    |इस प्रकार के ईष्ट में हनुमान ,भैरव ,काली ,बगला ,दुर्गा ,रूद्र ,दक्षिणावर्ती सूंड के गणेश आदि का चयन न करें ,यदि आप इनमे से या ऐसी उग्र शक्ति का चयन करते
    हैं तो सुरक्षा कवच जरुर पहने या सक्षम गुरु की अनुमति के बाद ही यह करें
    | यदि नकारात्मक ऊर्जा से पीड़ित नहीं हैं तो सौम्य शक्ति से आपकी मनोकामना पूर्ण हो जायेगी |
    ईश्वरीय शक्ति प्राप्ति ,ईश्वर का साक्षात्कार ,ईश्वर से वार्तालाप अवचेतन पर आधारित क्रिया है |चेतन
    की चंचलता के बीच यह मुश्किल होता है
    |जब तक ईष्ट का जुड़ाव अवचेतन स्तर पर नहीं होता उसका साक्षात्कार ,वार्तालाप संभव नहीं होता |एक बार ऐसा होने पर फिर वह चेतन स्तर और स्वरुप पर भी सक्रीय हो जाता है |यद्यपि सभी पद्धतियों में अवचेतन की भूमिका होती ही है किन्तु हमारी इस पद्धति में अवचेतन अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है |आप अपने ईष्ट का एक सौम्य सुंदर का चित्र अपने पूजन स्थान में स्थापित करें |एक क्रिस्टल बाल टेनिस की गेंद के आकार का लें और उसे चित्र के सामने स्थापित करें ,बाल के पीछे ईष्ट के रंग के अनुकूल रंग का एक जीरो वाट का बल्ब इस प्रकार जलाएं की पूरे बाल का रंग उसी रंग से छा जाए |ईष्ट का चित्र और क्रिस्टल बाल इस प्रकार रखें की यह आँखों की सीध में २ फुट की दूरी पर रहें |ईष्ट की सामान्य पूजा प्रतिदिन होनी चाहिए |पूजन बाद अपने ईष्ट को कुछ पल एकटक देखें फिर क्रिस्टल बाल पर ध्यान एकाग्र करें और उसमे ईष्ट के चित्र को उभारने का प्रयत्न करें |शुरू में क्रिस्टल बाल बिलकुल सादा नजर आएगा ,फिर एकाग्रता बढने के साथ भिन्न भिन्न चित्र ,लोगों के आकार ,दृश्य दिखेंगे |यह सब अवचेतन की तस्वीरें होंगी |समय के साथ ईष्ट भी दिखेगा ,फिर स्थिर होगा ,फिर आशीर्वाद दे सकता है ,वार्तालाप हो सकता है ,साक्षात्कार हो सकता है |यह क्रिया प्रतिदिन १० से १५ मिनट करें |यदि आपकी एकाग्रता ,याददास्त ,विश्वास ,श्रद्धा अच्छी है तो इस क्रिया में साक्षात्कार भी मुश्किल नहीं |इस साधना की सफलता ,शक्ति की कोई सीमा नहीं |भूत भविष्य वर्त्तमान के दर्शन संभव हैं |इस साधना में किसी अवचेतन के जानकार से कुछ लाइनें लिखवाकर प्रतिदिन उनका तीन चार बार १० मिनट दोहराव करने से ईष्ट आपके अवचेतन से जुड़ जाता है और उस पर श्रद्धा विश्वास बढ़ता है |ईष्ट के अवचेतन से जुड़ने पर एक अदृश्य ऊर्जा ईष्ट की आपसे जुड़ जाती है |उसके गुण ,आकृति स्थायी होने लगते हैं |इस साधना में सुरक्षा कवच अति आवश्यक होता है जिससे शरीर की सुरक्षा रहे |कभी कभी खुद को भूलने ,ईष्ट में डूबने पर भयात्मक या रोमांचक अनुभूतियाँ होती हैं ,ऐसे में सुरक्षा कवच जरुरी होता है |इस साधना हेतु तब तक उग्र देवी देवता का चयन न करें ,जब तक सक्षम गुरु न हों अन्यथा सौम्य शक्ति का ही चयन करें |
    5. यदि आप साधक हैं और वर्षों साधना करने के बाद भी आपको ईश्वरीय ऊर्जा महसूस नहीं हो पा रही ,अथवा आप दीक्षित तो हैं पर आपको आपके गुरु से पर्याप्त सहायता नहीं मिल पा रही या आपके गुरु आपका लक्ष्य दिलाने में अक्षम लग रहे तो आप अश्रद्धा मत रखिये या भटकिये मत |आप सक्षम व्यक्ति या अपने गुरु से सुरक्षा कवच प्राप्त कीजिये ,उनसे चयनित ईष्ट की साधना की अनुमति प्राप्त कीजिये |आप अपने सुविधानुसार स्थान का चयन कीजिये और मिटटी युक्त जमीन पर ईशान कोण में किसी चौकी या बाजोट पर ईष्ट की मूर्ती स्थापित कर उसके सामने मिटटी में हवन कुंड बनाइये |ईष्ट की पूजा रोज सुबह जरुर कीजिये |यदि सौम्य शक्ति है तो सुबह का समय और उग्र शक्ति है या देवी शक्ति है तो
    रात्री का समय साधना के लिए चयनित कीजिये
    |साधना समय अपने आसन के चारो ओर सिन्दूर कपूर लौंग घी की सहायता से पेस्ट बना घेरा बनाएं |अब अपनी पद्धति अनुसार या कुछ नहीं पता तो सामाय
    पूजन कर धुप दीप जलाकर बिलकुल धीमे स्वरों में
    ,धीरे धीरे लंबा खींचते हुए पूर्ण नाद के साथ ईष्ट के मंत्र की दो माला जप करें |मन्त्र जप में जल्दबाजी न हो ,रटते हुए जप न हो ,समय न देखें इस समय ,घड़ी मोबाइल साथ न हो ,स्थान पर प्रकाश धीमा हो ,जप समय ध्यान मूर्ती पर हो |जप के बाद इष्ट के अनुकूल हवन सामग्री से कुण्ड में हवन करें और अपना जप हवन अपने ईष्ट को समर्पित करें |यह क्रम लगातार कम से कम ५१ दिन चले |इस सामान्य सी लगने वाली साधना से आपके ईष्ट की कृपा आपको प्राप्त हो जायेगी और उसकी ऊर्जा ,शक्ति आपको अपने आसपास और स्वयं में महसूस होने लगेगी |यहाँ तक की आप द्वारा अभिमंत्रित जप ,वस्तु लोगों का भला करने लगेगी |खुद के कल्याण के साथ
    दूसरों का कल्याण भी कुछ हद तक आप करने में सक्षम होंगे
    |यहाँ भी उग्र शक्ति का चयन आप बिना सक्षम गुरु के न करें |यहाँ विस्तृत पद्धति इसलिए नहीं दी जा रही की इस प्रकार की साधना साधक ही कर सकते हैं जिन्हें अपने गुरु से जानकारी लेनी चाहिए या जो पहले से काफी कुछ जानते हैं ,साथ
    ही हामारा लेख सामान्य लोगों को ईश्वरीय ऊर्जा महसूस कराने से सम्बंधित है
    |
                  उपरोक्त सभी साधनाएं ,बिना गुरु के भी संभव हैं ,और सक्षम साधक द्वारा प्रदत्त सुरक्षा कवच धारण करके की जा सकती हैं |सभी साधनाओं में ईष्ट कृपा ,उसकी ऊर्जा महसूस होना ,यहाँ तक की साक्षात्कार ,वार्तालाप ,तक संभव है ,और सभी के लिए संभव है ,बस जरूरत है श्रद्धा विश्वास
    एकाग्रता निष्ठां आत्मबल की |इन्हें करके खुद की समस्या हल करने के साथ दूसरों की भी समस्याएं हल की जा सकती हैं और हमेशा के लिए पंडित ,मौलवी ,ज्योतिषी ,तांत्रिक के चक्कर से मुक्ति पायी जा सकती है |आज की समस्या तो हल होगी ही भविष्य में कोई समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी ,जो भाग्य में है उसका अधिकतम मिलेगा |साक्षात्कार की स्थिति आते ही भाग्य तक बदल जाएगा |……………………………………………हरहर महादेव 
     
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  • वर्षों की साधना का परिणाम भी नगण्य क्यूँ ?

    मंत्र जप सवा लाख ,मिला कुछ नहीं [ समय -श्रम दोनों बर्बाद ]
    =============================
              आज के समय में साधकों की बाढ़ आई हुई है ,ज्योतिषियों की बाढ़ आई हुई है |ज्योतिषी सलाह देता है ,अमुक मंत्र इतना संख्या में जपो ,अमुक पूजा करो ,आपकी समस्या हल हो जायेगी |उसके बारे में बताया कुछ नहीं की कैसे करें ,पद्धति-तरीका क्या हो ,बस जप लो |आधे को तो खुद पता नहीं होता ,कुछ को पता होता है तो समय बचाने के लिए बस मंत्र बता कर छुट्टी कर लेते हैं |मंत्र जपने वाल दुगुना जप लेता है पर उसे कोई परिणाम समझ नहीं आता ,तो वह सोचता है की ज्योतिषी सही नहीं ,पूजा -मंत्र जप से कुछ नहीं होता |उसकी गलती भी नहीं होती |उसे जितना पता होता है वह करता तो है ही |
               ऐसा ही नवागंतुक साधकों के साथ होता है ,तंत्र अथवा मंत्र -यन्त्र के क्षेत्र में अधिकतर आते हैं शक्ति पाने ,चमत्कार करने के लालच में ,कुछ अपनी समस्या दूर करने चक्कर में और कुछ वास्तव में मुक्ति की इच्छा से ,पर ९९ प्रतिशत को अपेक्षित सफलता नहीं मिलती |कारण सही पद्धति -सही ज्ञान -सही तरीका नहीं पता |या तो किताब से कुछ करने का प्रयास करते हैं या अधकचरे ज्ञान वाले गुरुओं के चक्कर में पड़ जाते हैं जिन्हें या तो खुद कुछ आता नहीं या एकाध मंत्र अपने गुरु से पाकर कुछ सिद्धियाँ करके गुरु बन बैठते हैं |साधक बेचारे क्या करेंगे जब गुरु ही उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं दे पाता |गुरु जी को मंत्र का विज्ञान पता ही नहीं है |कैसे काम करता है ,कहाँ किस मंत्र का क्या प्रभाव होता है |कैसे इसकी ऊर्जा साधक तक आती है ,कहाँ से आती है |कैसे इस ऊर्जा को प्राप्त किया जाए |कैसे मंत्र को जपा जाए |कैसे उसका उच्चारण हो |कहाँ आरोह अवरोह हो |कहाँ नाद हो |किस मंत्र को करने में कितना समय लें |आदि आदि [[व्यक्तिगत विचार अलौकिक शक्तियां पेज के पाठकों के लिए ]]
               अधिकतर व्यक्ति या साधक मंत्र जप करते समय जप की संख्या पर ध्यान देते हैं |अधिकतर का ध्यान होता है की इतनी संख्या करनी है या इतनी संख्या करेंगे तो इतने दिन में इतना हो जाएगा और साधना या अनुष्ठान या संकल्प पूरा हो जाएगा |रेट रटाये ढंग से जल्दबाजी में मंत्र जप करते हैं ,करते रोज हैं और निश्चित संख्या के दिनों तक भी करते हैं पर जब कर चुकते हैं और जितनी जानकारी है उस हिसाब से हवन आदि भी कर लेते हैं तो परिणाम की प्रतीक्षा करते हैं पर समझ में कुछ नहीं आता |अब उनमे अविश्वास जन्म लेता है की किया तो इतना दिन ,इतनी तपस्या की कुछ नहीं हुआ ,मंत्र जप पूजा आदि से कुछ नहीं होता जो भाग्य में लिखा है वाही होता है |आदि आदि |
    लोग यह ध्यान नहीं देते की वह जिस मंत्र का जप कर रहे हैं वह सही है की नहीं ,शुद्ध है की नहीं ,सही लक्ष्य के लिए सही मंत्र है की नहीं |मंत्र का उच्चारण क्या होना चाहिए ,मंत्र कितने समय में होना चाहिए या कितना लम्बा या किस स्वर  में होना चाहिए |इसका समय क्या होना चाहिए |आदि |अधिकतर का ध्यान मंत्र जप के समय कहीं और घूमता रहता है |अधिकतर जल्दबाजी में होते हैं की कब जप पूरा हो और अमुक कार्य किया जाए |जैसे साधना -पूजा न कर रहे हों एक जिम्मेदारी पूरी कर रहे हों |जैसे पहाडा रत रहे हों देवता को नहीं सूना रहे होते या बुला रहे होते वह तो कर्त्तव्य की आईटीआई श्री कर रहे होते हैं |देवता या ईष्ट की ओर ध्यान एकाग्र होता ही नहीं |भावहीनता में होते हैं ,एकमात्र अपना लक्ष्य दिखाई देता है |देवता से मानसिक जुड़ाव हुआ ही नहीं होता |परिणाम होता है की प्रकृति की सम्बंधित ऊर्जा मंत्र के द्वारा व्यक्ति से जुड़ पाती ही नहीं |देवता को मंत्र सुनाई देता ही नहीं |मंत्र जप मात्र रटने से ,बिना नाद के जपने से उसमे कोई ऊर्जा उत्पन्न नहीं होती ,वह आपके ही चक्रों को आंदोलित नहीं करता तो प्रकृति की ऊर्जा से क्या जुड़ पायेगा और उन्हें आकर्षित कर पायेगा |यहाँ तक की शाबर मन्त्र जिनमे न अर्थ होते हैं न नाद वह भी बिना भाव के काम नहीं करते |बिना भाव और आत्मबल के आप शाबर मंत्र भी रटेंगे तो आपको परिणाम मुश्किल है मिलना |
             ध्यान दीजिये हर मंत्र की एक विशिष्ट नाद होती है ,विशिष्ट उच्चारण होता है ,विशिष्ट देवता होते हैं |विशिष्ट मंत्र का विशिष्ट चक्र से सम्बन्ध होता है |विशिष्ट मंत्र प्रकृति के विशिष्ट प्रकार की ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है और उसे आकर्षित करता है ,साधक या मंत्र जपने वाले से जोड़ता है |अतः उसका पाठ उसी तरह के भाव ,नाद ,उच्चारण के साथ होना चाहिए |आपका मानसिक तारतम्य सम्बंधित शक्ति और मंत्र की ऊर्जा से बना होना चाहिए |नहीं तो वह अगर आकर्षित हो भी गई तो आपसे जुड़ नहीं पाएगी और वातावरण में पुनः बिखर जायेगी |महत्त्व मंत्र की संख्या जपने का नहीं होता ,सही उच्चारण ,सही नाद का होता है |सही भाव का होता है ,सही भावना का होता है |सही तरीके और पद्धति का होता है |सही समय का होता है .एकाग्रता का होता है |अगर यह सब नहीं है तो आप कई लाख भी जप कर लीजिये आपको परिणाम मिलना मुश्किल है |मंत्र असंदिग्ध रूप से काम करते हैं बशर्ते आप सही ढंग से उन्हें जप सकें |अगर रटंत जप करेंगे तो कुछ नहीं मिलेगा ,इससे तो अच्छा होगा की आप कोई जप न करो और केवल सम्बंधित देवता के रूप -गुण -भाव में ही डूबिये आपको जरुर लाभ मिलेगा |अगर मंत्र कर रहे हैं तो ढंग से कीजिये |
              सवा लाख ,लाखों लाख या निश्चित संख्या में जप करना कोई मायने नहीं रखता |आप कुछ हजार ही जप कर लीजिये और सही ढंग से कर लीजिये तो आपको लाखों लाख से अधिक लाभ हो जाएगा |उदाहरण के लिए ॐ का जप कुछ लोग करते हैं ,अधिकतर ॐ को मंत्र के आगे लगाते हैं |पर बहुत कम को पता है की अगर ॐ का सही ढंग से जप कर दिया जाए तो दीवार टूट जाती है ,यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो चूका है |हम क्या करते हैं ॐ को लगाया या ॐ ॐ करते चले गए ,न नाद न समयांतराल न उच्चारण न गूँज किसी पर ध्यान नहीं दिया |ऊर्जा उत्पन्न हुई ही नहीं ,आपके चक्र को आन्दोलित की ही नहीं |प्रकृति की ऊर्जा से जुडी ही नहीं तो लाभ क्या होगा |ॐ का जप जब भी हो एक गूँज पैदा होनी चाहिए ,जो आपको और वातावरण को गुंजित करें |इसकी गूँज ह्रदय में गुंजित होनी चाहिए |तभी यह आंदोलित करेगा आपके सम्बंधित चक्र को और वहां से तरंग उत्पादन बढ़ेगा और वातावरण की ऊर्जा को आकर्षित करेगा |ऐसा ही सभी मन्त्रों में है |अगर ऐसा न होता तो अलग बीज और बिन्दुओं का प्रयोग क्यों होता |हर बीज का हर मंत्र का अपना उच्चारण ,नाद है उसे उसी ढंग से किया जाना चाहिए |सही ढंग से कर दीजिये कुछ हजार में आपको लाभ मिल जाएगा |रोज हजारों जप मत कीजिये कुछ सौ कीजिये पर आराम से धीरे धीरे पूरी एकाग्रता ,ध्यान ,भाव ,नाद ,उच्चारण से कीजिये देवता प्रसन्न हो जाएगा |[[व्यक्तिगत विचार ब्लॉग पाठकों के लिए ]]…………………………………………………………….हर -हर महादेव 

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  • शिवलिंग का अर्थ क्या है ?

    शिवलिंग का अर्थ
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     अन्य धर्म के लोग अथवा नास्तिक अथवा नासमझ लोग शिवलिंग की पूजा की आलोचना करते है.. छोटे छोटे बच्चो को बताते है कि हिन्दू लोग लिंग और योनी की पूजा करते है..इन नासमझों को संस्कृत का ज्ञान नहीं होता है..हिन्दुओ के प्रति नफ़रत पैदा करने अथवा हिन्दुओं में ही अविश्वास और संदेह उत्पन्न करने के लिए इस तरह की बातें उड़ाई जाती हैं |हमारे तथाकथित विद्वान् भी उनकी सोच का खंडन अधिकतर नहीं कर पाते क्योकि उनमे से सब को इसके सही अर्थ का खुद ज्ञान नहीं होता | इसका अर्थ इस प्रकार है..
    पहले भाषा का ज्ञान ले……
    लिंग>>> लिंग का संस्कृत भाषा में चिन्ह ,प्रतीक अर्थ होता है… जबकी जनर्नेद्रीय (मानव अंग ) को संस्कृत भाषा मे (शिशिन) कहा जाता है..
    शिवलिंग >>> शिवलिंग का अर्थ शिव का प्रतीक….
    ” शिवलिंग ” शब्द में ‘ लिंग ‘ शब्द दो शब्दों से बना है, ” लीन + गा (गति) ” अर्थात, शिव में लीन होकर ही मनुष्य को गति प्राप्त होता है;  यानी, शिव के निराकार स्वरूप में ध्यान-मग्न आत्मा सद्गति को प्राप्त होती है, उसे परब्रह्म की प्राप्ति होती है।
    तात्पर्य यह है कि हमारी आत्मा का मिलन परमात्मा के साथ कराने का माध्यम-स्वरूप है, शिवलिंग! 
    शिवलिंग साकार एवं निराकार ईश्वर का ‘प्रतीक’ मात्र है, जो परमात्मा – आत्म-लिंग का द्योतक है। 
    शिवलिंग शाश्वत-आत्मा का स्वरूप है, जो न जल से प्रभावित होता है, न अग्नि से, न पृथ्वी से, न किसी अस्त्र-शस्त्र से… जो अजित है, अजेय है! शिव और शक्ति का पूर्ण स्वरूप है, शिवलिंग।
    >>पुरुषलिंग का अर्थ पुरुष का प्रतीक  इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ स्त्री का प्रतीक और  नपुंसकलिंग का अर्थ है ..नपुंसक का प्रतीक —-
    अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य के जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है..तो वे बताये ”स्त्री लिंग ”’के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना चाहिए… और खुद अपनी औरतो के लिंग को बताये फिर आलोचना करे—-
    ”शिवलिंग”’क्या है >>>>>
    शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। 
    स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है। शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है नाही शुरुवात | जो शाश्वत है |
    ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और प्रदार्थ |  हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है|
    इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है | ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है. वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है. (The universe is a sign of Shiva Lingam.) शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान है
    अब बात करते है योनि शब्द पर —- मनुष्ययोनि ”पशुयोनी”पेड़-पौधों की योनि”’पत्थरयोनि”’ >>>> योनि का संस्कृत में प्रादुर्भाव ,प्रकटीकरण अर्थ होता है.. जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है.. कुछ धर्म में पुर्जन्म की मान्यता नहीं है ..इसीलिए योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते है जबकी हिंदू धर्म मे ८४ लाख योनी यानी ८४ लाख प्रकार के जन्म है अब तो वैज्ञानिको ने भी मान लिया है कि धरती मे ८४ लाख प्रकार के जीव (पेड, कीट,जानवर,मनुष्य आदि) है…. मनुष्य योनी >>>>पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि होता है..अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है।
    शिव लिंग ऊर्जा ब्रह्मांडीय ऊर्जा प्राप्ति का माध्यम
    ——————————————-
    भारत का रेडियोएक्टिविटी मैप उठा लो तो हैरान हो जाओगे। क्योंकि भारत सरकार के नुक्लिएर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगो के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है |यहाँ रेडियेशन नहीं होता किन्तु रेडियेशन चित्र में रेडियेशन दिखता है अर्थात यहाँ ऊर्जा उत्पन्न होती है | शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि एक प्रकार के न्यूक्लिअर रिएक्टर्स ही हैं एक उर्जा स्रोत है ,जिनका सम्बन्ध ब्रह्मांडीय ऊर्जा धाराओं से होता है ,iइन ज्योतिर्लिंगों से ऊर्जा निकलती है जो अभिषेक करने वालों और आसपास आने वालों को प्रभावित करती है ,ज्योर्लिंगों पर अनवरत जल धारा डाली जाती है ,उनपर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे।
    महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे कि बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं | क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है तभी जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता |
    भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिव लिंग की तरह है |शिव लिंग से सम्बन्धित हम जिस रेडियो एक्टिविटी या रिएक्टिव जल की बात कर रहे वह वास्तव में युरेनियम ,थोरियम ,प्लुटोनियम रेडियेशन या एटामिक रिएक्टर्स जैसा रेडियेशन नहीं अपितु प्रबल उर्जा का प्रवाह है जो बिलकुल भिन्न होता है और चढ़ाया जल भी ऊर्जा संतृप्त होता है |शिवलिंग जिस वस्तु का बना होगा ऊर्जा की प्रकृति भिन्न होगी तभी कहा जाता है की कुछ विशेष प्रकार के शिवलिंग पर चढ़ाया प्रसाद ही खाया जा सकता है सभी शिवलिंग पर चढ़ा प्रसाद और जल नहीं ग्रहण किया जा सकता |यहाँ तक की शिवलिंग पर चढ़ी वस्तुएं भी तीव्र प्रभावकारी हो जाती है जैसे फल फूल पत्र आदि |इनसे अच्छे और बुरे दोनों ही प्रकार के प्रयोग तांत्रिक कर डालते हैं |
                        शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिल कर औषधि का रूप ले लेता है | तभी हमारे बुजुर्ग हम लोगों से कहते कि महादेव शिव शंकर अगर नराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी |
    ज़रा गौर करो, हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है  | आज इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारी परम्पराओं को समझने के लिए ,जिस विज्ञान की आवश्यकता है वो हमें पढ़ाया नहीं जाता और विज्ञान के नाम पर जो हमें पढ़ाया जा रहा है उस से हम अपनी परम्पराओं को समझ नहीं सकते | जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है वो सनातन है,, विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें |हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों द्वारा हजारों लाखों वर्ष पूर्व जिस वैज्ञानिक संस्कृति ,पंरम्परा को नियम बनाकर मानवजीवन का एक अभिन्न अंग बना दिया है |उसे देख कर ही आज के वैज्ञानिक दाँतो तले अंगुली दबा लेते है।.सोचिये शिव की पूजा तो आप करते हैं किन्तु शिवलिंग पूरे विश्व में पाए जाते हैं ,क्यों ,दुसरे धर्मों ,सम्प्रदायों में यह कहाँ से आया ,किसी न किसी रूप में अन्य स्थानों पर क्यों इनकी प्रतिष्ठा है |इससे आपको समझ आ जाएगा की शिवलिंग इतना महान क्यों हैं |…………………………………………………………..हर-हर महादेव 

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  • शिवलिंग को आप कितना जानते हैं ?

    ::::::::::: क्या है शिवलिंग::::::::::::
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     समस्त संसार में शिवलिंग पाए जाते हैं ,विभिन्न धर्मों तक में इनकी किसी न किसी रूप में प्रतीकाकृति मिलती हैं |हिन्दू धर्म में यह परम पवित्र शिव के प्रतीक माने जाते हैं और इनकी पूजा की जाती है |यह शिवलिंग है क्या ,कभी इस पर सामान्यतया विचार सामान्य लोग नहीं करते जा इसके बारे में बहुत नहीं जानते |इसलिए जो जैसी परिभाषा इसकी गढ़ कर सुना देता है सामान्य रूप से मान लिया जाता है और कल्पना कर ली जाती है |कुछ महाबुद्धिमान प्राणियों ने परम पवित्र शिवलिंग को जननांग समझ कर पता नही क्या-क्या और कपोल कल्पित अवधारणाएं फैला रखी हैं परन्तु…वास्तव में. शिवलिंग. वातावरण सहित घूमती धरती तथा  सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का प्रतिनिधित्व करता है |इसका अक्ष /धुरी (axis) ही लिंग है।
    दरअसल.इसमें ये गलतफहमी.. भाषा के रूपांतरण और, मलेच्छों द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने  तथा, अंग्रेजों द्वारा इसकी व्याख्या से उत्पन्न हुआ  हो सकता है. |जैसा कि…. हम सभी जानते है कि. एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में. अलग-अलग अर्थ निकलते हैं….! उदाहरण के लिए.- यदि हम हिंदी के एक शब्द “”सूत्र”’ को ही ले लें तो सूत्र मतलब. डोरी/धागा, .गणितीय सूत्र ,.कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है जैसे कि. नारदीय सूत्र ,.ब्रह्म सूत्र इत्यादि | उसी प्रकार “”अर्थ”” शब्द का भावार्थ: सम्पति भी हो सकता है और मतलब (मीनिंग) भी |
    ठीक बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय  चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।
    ध्यान देने योग्य बात है कि””लिंग”” एक संस्कृत का शब्द है जिसके निम्न अर्थ है :
    @ त आकाशे न विधन्ते -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० ५
    अर्थात….. रूप, रस, गंध और स्पर्श ……..ये लक्षण आकाश में नही है ….. किन्तु शब्द ही आकाश का गुण है ।
    @ निष्क्रमणम् प्रवेशनमित्याकशस्य लिंगम् -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० २ ०
    अर्थात….. जिसमे प्रवेश करना व् निकलना होता है ….वह आकाश का लिंग है ……. अर्थात ये आकाश के गुण है ।
    @ अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं क्षिप्रमिति काललिङ्गानि । -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० ६
    अर्थात….. जिसमे अपर, पर, (युगपत) एक वर, (चिरम) विलम्ब, क्षिप्रम शीघ्र इत्यादि प्रयोग होते है, इसे काल कहते है, और ये …. काल के लिंग है ।
    @ इत इदमिति यतस्यद्दिश्यं लिंगम । -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० १ ०
    अर्थात……. जिसमे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर व् नीचे का व्यवहार होता है ….उसी को दिशा कहते है……. मतलब कि….ये सभी दिशा के लिंग है ।
    @ इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिंगमिति -न्याय० अ ० १ । आ ० १ । सू ० १ ०
    अर्थात….. जिसमे (इच्छा) राग, (द्वेष) वैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, सुख, दुःख, (ज्ञान) जानना आदि गुण हो, वो जीवात्मा है…… और, ये सभी जीवात्मा के लिंग अर्थात कर्म व् गुण है ।
    इसीलिए……… शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने के कारन………. इसे लिंग कहा गया है…।
    स्कन्दपुराण में स्पष्ट कहा है कि……. आकाश स्वयं लिंग है…… एवं , धरती उसका पीठ या आधार है …..और , ब्रह्माण्ड का हर चीज ……. अनन्त शून्य से पैदा होकर….. अंततः…. उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है .|यही  कारण है कि इसे कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे कि प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam)  इत्यादि |
    यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि. इस ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और प्रदार्थ | इसमें से हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है जबकि आत्मा एक ऊर्जा है |ठीक इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं | क्योंकि ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है |इसीलिए शास्त्रों में शक्ति की विवेचना में कहा जाता है की जब शक्ति [काली] शिव से निकल जाती है तो शिव भी शव हो जाते हैं ,अर्थात शिव तभी ताल शिव हैं जब तक उनके साथ शक्ति हैं |वैसे ही  पदार्थ में तभी तक जीवन है जबतक उसमे आत्मा है |
    अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की दृष्टि से बोलने की जगह … शुद्ध वैज्ञानिक भाषा में बोला जाए तो. हम कह सकते हैं कि शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि हमारे ब्रह्मांड की आकृति है.,उसकी ऊर्जा संरचना की प्रतिकृति है ,और अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की भाषा में बोला जाए तो शिवलिंग ,भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-अनादि एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक है. | अर्थात शिवलिंग हमें बताता है कि…… इस संसार में न केवल पुरुष का  और न ही केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है बल्कि, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही समान हैं |एक दुसरे की परिकल्पना अथवा पूर्णता एक दुसरे के बिना संभव नहीं है |
    हमें ज्ञात है की ब्रहमांड की प्रत्येक संरचना पदार्थ है जो परमाणुओं से मिलकर बनता है |परमाणु सर्वत्र विद्यमान हैं |जल-आकाश-वायु सर्वत्र |परमाणु की संरचना में नाभिक में प्रोटान और न्यूट्रान होते हैं और इस नाभिक के चारो और इलेक्ट्रान चक्कर लगता रहता है |न्यूट्रान तो उदासीन होता है किन्तु फिर भी नाभिक धनात्मक होता है क्योकि प्रोटान धनात्मक आवेश वाला कण होता है जो पूरे नाभिक को धनात्मक बनाए रखता है ,इस धनात्मक के आकर्षण में बंधकर ऋणात्मक आवेश का कण इलेक्ट्रान उसके चारो और चक्कर लगता रहता है और परमाणु का निर्माण होता है |इलेक्ट्रान का चक्कर लगभग गोलाकार होता है जिसकी तुलना हम शिवलिंग के योनी या अर्ध्य से कर सकते हैं |धनात्मक नाभिक की तुलना लिंग से कर सकते हैं जो स्थिर रहता है |इसमें स्थित न्यूट्रान परम तत्त्व का प्रतीक है जो उदासीन रहता है |इस विज्ञान को हमारा वैदिक ज्ञान जानता था और उसने शिवलिंग की परिकल्पना की |समस्त ब्रह्माण्ड परमाणुओं से बना है ,परमाणु हर कण कण में विद्यमान है |अर्थात ईश्वरीय ऊर्जा हर कण कण में है ,तभी तो हम कहते हैं कण कण में भगवान |इस परमाणु से ही शरीर की कोशिकाएं बनती हैं और शरीर बनता है ,,इससे ही वनस्पतियों की कोशिकाएं और शारीर बनता है |यहा तक की धातु-पत्थर-मिटटी भी इसी से बनते हैं |अर्थात शिवलिंग इस परमाणु का प्रतिनिधित्व करता है |धनात्मक-ऋणात्मक ऊर्जा के साथ निर्विकार शिव का प्रतिनिधित्व करता है |
    अगर पुरुष-स्त्री के परिप्रेक्ष्य में देखें तभी यह शिवलिंग स्थूल रूप से लिंग -योनी का प्रतिनिधित्व करता दीखता है ,परन्तु यह वास्तव में ब्रह्मांडीय ऊर्जा धारा-संरचना का प्रतिनिधित्व करता है | लिंग -योनी में परिभाषित करने का शायद कारण इसके पुरुष और स्त्री अथवा पुरुष और प्रकृति का धनात्मक और ऋणात्मक ऊर्जा रूप है |इस ऊर्जा धरा या संरचना की अनेक परिभाषाएं और विवरण हैं ,पर यह मूल रूप से उर्जा को ,शक्ति को, उसकी क्रियाविधि को व्यक्त करता है |…………………………………………………………….हर-हर महादेव 

    READ MORE: शिवलिंग को आप कितना जानते हैं ?
  • पूजा से नुकसान तो नहीं ?

    क्या अपनी बर्बादी खुद लिख रहे ?
    ===============
    कभी सोचा है ?
    ————
                           आप जिस देवता को पूजते हैं आपका अंतिम पड़ाव उस देवता तक ही अधिकतम हो सकता है ,अर्थात आप अधिक से अधिक उसके लोक तक ही जा सकते हैं ,अगर वह प्रसन्न हो गया अथवा सिद्ध हो गया तो |आप अगर भूत -प्रेत ,पिशाचिनी ,यक्षिणी ,अप्सरा ,पीर ,मजार ,शहीद ,बीर ,सती ,ब्रह्म ,साईं पूजते हैं तो आपका अंतिम पड़ाव यही होंगे आपको देवी-देवताओं का लोक नहीं मिलने वाला इन्हें पूजने से |इतना तो सभी जानते हैं की किस देवता को पूजने से क्या मिलता है ,उसी तरह जिसे आप पूजते हो वह आपको मिलता है और आपको उसका लोक मिलता है |अगर कोई मनुष्य मरा है और ब्रह्म ,पीर ,बीर ,सती ,शहीद ,साईं ,प्रेत ,भूत बना है तो उसकी तो क्षमता ही उसके लोक तक है ,जब वह खुद आत्मा रूप में घूम रहा तो आपको क्या देवताओं तक ले जाएगा |
                            इसी तरह पिशाचिनी ,यक्षिणी ,अप्सरा भी अपने लोक और क्षमता से ऊपर तो आपको नहीं ही पहुचा सकते |क्या आप गारंटी से कह सकते हैं की अमुक शहीद ,ब्रह्म ,बीर ,साईं का मोक्ष हो गया या वह देव लोक तक चले गए |जब खुद नहीं गए तो आपको क्या ले जायेंगे |अगर चले गए तो उनके पूजने पर यहाँ आपका काम कैसे होता है |यहाँ आपका काम होता है इसका मतलब वह इसी भौतिक दुनिया में भटक रहे और आपके पूजा को लेकर अपनी शक्ति बढ़ा रहे और अपना शक्ति बरकरार रख रहे |
                     इनमे एक दोष और होता है यह पूजे जाने पर आपके कुलदेवता की पूजा ले लेते हैं और कुलदेवता साथ छोड़ देते हैं ,आज तो नहीं समझ आएगा पर अगली पीढियां परिणाम गंभीर भुगतेंगी जब कुलदेवता का सुरक्षा चक्र समाप्त हो जाएगा |दूसरी समस्या की कुलदेवता को पूजा न मिलने से ईष्ट तक आपकी पूजा नहीं पहुचेगी |आप तीन घंटे पूजा करो पर लाभ कुछ भी नहीं होगा |ईष्ट तक पूजा पहुच ही नहीं रही |थक कर आप कहोगे की पूजा पाठ ,तंत्र मन्त्र सब बेकार है |
                          तीसरी समस्या यह होगी आपके इन शक्तियों को पूजने से की जब तक आप इन्हें पूजोगे ये आपको सुखी रखेंगी क्योकि इनका स्वार्थ है आपकी पूजा से इन्हें शक्ति मिलेगी |आने वाली पीढ़ियों में जब कोई भूलेगा या पूजा नहीं देगा या आप ही कभी पूजा बंद कर दिए तो यह उनका या आपका विनाश कर देंगी |कुलदेवता और ईष्ट पहले ही गायब हैं आपका या पीढ़ियों का भला कोई नहीं कर पायेगा |इन सब कारणों को आपने सोचा नहीं पूजने लगे आत्मा की प्रतीक शक्तियों को ,जब परिणाम बंद हुआ तो पूजा पाठ सब बेकार बना दिया |पहले नहीं सोचा तो भैया अब सोचो ,अभी आपके पास समय हो सकता है |वर्ना अपना तो बेडा गर्क करोगे ही आने वाली पीढियां भी गाली देंगी की कहाँ फंसा कर चले गए उन्हें आप |दुसरे की देखा -देखि साईं -पीर के भ्रम से बाहर निकलो नहीं तो पछताने पर भी रास्ता नहीं मिलेगा |….[पोस्ट का उद्देश्य किसी की भावना  को  ठेस  पहुचना नहीं है ,अपितु पूजा -पाठ  के आतंरिक रहस्य को समझने का प्रयत्न मात्र है ,जो हम अपने पेज और ब्लॉग के पाठकों से साझा कर रहे ,वैचारिक स्वतंत्रता के अधिकार के आलोक में ]………………………………………………………….हर-हर महादेव 

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  • ताबीज भाग्य बदल सकता है .

    :::::::::::::एक ताबीज आपकी किस्मत पलट सकता है::::::::::::::
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              ताबीज आदि के निर्माण में एक वृहद् उर्जा विज्ञानं काम करता है ,जिसे प्रकृति का विज्ञान कहा जाता है | एक विशिष्ट प्रक्रिया ,विशिष्ट पद्धति और विशिष्ट वस्तुओं के विश्सिष्ट समय में संयोग से विशिष्ट व्यक्ति द्वारा निर्मित ताबीज और यन्त्र में एक विशिष्ट शक्ति का समावेश हो जाता है ,जो किसी भी सामान्य व्यक्ति को चमत्कारिक रूप से प्रभावित करती है जिससे उसके कर्म-स्वभाव-सोच-व्यवहार-प्रारब्ध सब कुछ प्रभावित होने लगता है |
              -ताबीज में प्राणी के शरीर और प्रकृति की उर्जा संरचना ही कार्य करती है ,,इनका मुख्य आधार मानसिक शक्ति का केंद्रीकरण और भावना के साथ विशिष्ट वस्तुओं-पदार्थों-समय का तालमेल होता है| ,,,,प्रकृति में उपस्थित वनस्पतियों और जन्तुओ में एक उर्जा परिपथ कार्य करता है ,मृत्यु के बाद भी इनमे तरंगे कार्य करती है और निकलती रहती हैं ,,,,इनमे विभिन्न तरंगे स्वीकार की जाती है और निष्कासित की जाती है |जब किसी वस्तु या पदार्थ पर मानसिक शक्ति और भावना को केंद्रीकृत करके विशिष्ट क्रिया की जाती है तो उस पदार्थ से तरंगों का उत्सर्जन होने लगता है ,,,,जिस भावना से उनका प्रयोग जिसके लिए किया जाता है ,वह इच्छित स्थान पर वैसा कार्य करने लगता है ,|उदहारण के लिए ,,,किसी व्यक्ति को व्यापार वृद्धि के लिए कुछ बनाना है ,तो इसके लिए इससे सम्बंधित वस्तुएं अथवा यन्त्र विशिष्ट समय में विशिष्ट तरीके से निकालकार अथवा निर्मित करके जब कोई उच्च स्तर का साधक अपने मानसिक शक्ति के द्वारा उच्च शक्तियों के आह्वान के साथ जब प्राण प्रतिष्ठा और अभिमन्त्रण करता है तो वस्तुगत उर्जा -यंत्रागत उर्जा के साथ साधक की मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा का ऐसा अद्भुत संयोग बनता है की निर्मित ताबीज से तीब्र तरंगें निकालने लगती हैं ,इन्हें जब सम्बंधित धारक को धारण कराया जाता है तो यह ताबीज उसके व्यापारिक चक्र [लक्ष्मी या संमृद्धि के लिए उत्तरदाई ] को स्पंदित करने लगता है ,दैवीय प्रकृति की शक्ति आकर्षित हो धारक से जुड़ने लगती है और उसकी सहायता करने लगती है ,अनावश्यक विघ्न बाधाएं हटाने लगती है ,साथ ही मन और मष्तिष्क  भी प्रभावित होने लगता है ,जिससे उसके निर्णय लेने की क्षमता ,शारीरिक कार्यप्रणाली ,दैनिक क्रिया कलाप बदल जाते है ,उसके प्रभा मंडल पर एक विशेष प्रभाव पड़ता है ,जिससे उसकी आकर्षण शक्ति बढ़ जाती है ,बात-चीत का ढंग बदल जाता है ,सोचने की दिशा परिवर्तित हो जाती है ,कर्म बदलते हैं ,,प्रकृति और वातावरण में एक सकारात्मक बदलाव आता है और व्यक्ति को लाभ होने लगता है,, |यह एक उदाहरण है ,ऐसा ही हर प्रकार के व्यक्ति के लिए हो सकता है उसकी जरुरत और कार्य के अनुसार ,|यहाँ यह अवश्य ध्यान देने योग्य होता है की यह सब तभी संभव होता है जब वास्तव में साधक उच्च स्तर का हो ,उसके द्वारा निर्मित ताबीज खुद उसके हाथ द्वारा निर्मित हो ,सही समय और सही वस्तुओं से समस्त निर्माण हो ,|ऐसा न होने पर अपेक्षित लाभ नहीं हो पाता| ताबीज और यन्त्र तो बाजार में भी मिलते है और आजकल तो इनकी फैक्टरियां सी लगी हैं ,जो प्रचार के बल पर बेचीं जा रही हैं ,कितना लाभ किसको होता है यह तो धारक ही जानता है |


           ताबीज बनाने वाले साधक की शक्ति बहुत मायने इसलिए रखती है की  जब वह अपने ईष्ट में सचमुच डूबता है तो वह अपने ईष्ट के अनुसार भाव को प्राप्त होता है ,,भाव गहन है तो मानसिक शक्ति एकाग्र होती है ,जिससे वह शक्तिशाली होती है ,यह शक्तिशाली हुई तो उसके उर्जा परिपथ का आंतरिक तंत्र शक्तिशाली होता है और शक्तिशाली तरंगे उत्सर्जित करता है |ऐसा व्यक्ति यदि किसी विशेष समय,ऋतू-मॉस में विशेष तरीके से ,विशेष पदार्थो को लेकर अपनी मानसिक शक्ति और मन्त्र से उसे सिद्ध करता है तो वह ताबीज धारक व्यक्ति को अच्छे-बुरे भाव की तरंगों से लिप्त कर देता है |यह समस्त क्रिया शारीर के उर्जा चक्र को प्रभावित करती है और तदनुसार व्यक्ति को उनका प्रभाव दिखाई देता है| यह ताबीजें इतनी शक्तिशाली होती हैं की व्यक्ति का प्रारब्ध तक प्रभावित होने लगता है |अचानक आश्चर्यजनक परिवर्तन होने लगते हैं |आपने अनेक कहानियाँ सुनी होंगी की अमुक चीज अमुक साधू ने दिया और ऐसा हो गया |अथवा यह सुना होगा की अमुक तांत्रिक ने अमुक छीजें कुछ बुदबुदाकर फेंकी व्यक्ति को लाभ हो हया |यह बहुत छोटे उदाहरण हैं |जिस तरह साधना से ईश्वरीय ऊर्जा आती है उसी तरह यह मानसिक एकाग्रता से वस्तु और यन्त्र में स्थापित भी होती है |तभी तो मूर्तियाँ और यन्त्र प्रभावी होते हैं |यही यन्त्र ताबीजों में भरे जाते हैं और प्रभाव देते हैं |यह किसी  यन्त्र विशेष का प्रचार नहीं अपितु वैज्ञानिक विश्लेष्ण का प्रयास है और हमने इसे बहुत सत्य पाया है |यही कारण है की हम अपने सभी अनुष्ठानों में भोजपत्र पर यंत्र अवश्य बनाते हैं और साधना समाप्ति पर उन्हें धारण करते भी हैं और कराते भी हैं |यह धारण मात्र से साधना जैसा प्रभाव देते हैं |………………………………………………………हर-हर महादेव 
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