Category: Spiritual Science
  • आपके शरीर की बौद्धिक आयु क्या है ,क्या आप जानते हैं ?

    किस स्तर के
    शरीर में आपकी आत्मा रहती है ,क्या आप जानते हैं ?
    ================================
             हर व्यक्ति जन्म लेने के कुछ दिनों बाद
    एक निश्चित मानसिक विकास से गुजरता है किन्तु कुछ लोगों का मानसिक विकास तीव्र
    होता है कुछ लोगों का मानसिक विकास धीमा होता है और कुछ लोगों का मानसिक विकास
    अत्यधिक मंद होता है की वह २५ वर्ष की उम्र में भी
    56 वर्ष के बच्चे की तरह
    की बुद्धि के होते हैं ,भले इन सबको एक सामान ही माहौल क्यों न मिले |कभी कभी एक
    ही समय पर जन्मे बच्चों यहाँ तक की जुड़वाँ बच्चों के भी मानसिक स्तर और रुचियों
    में बड़ी भिन्नता पायी जाती है |क्या आपने कभी सोचा है की यह सब क्यों होता है |विज्ञान
    अनेक सिद्धांत दे सकता है किन्तु ऐसा न हो इसका कोई उपाय उसके पास नहीं है क्योंकि
    वास्तव में विज्ञान यह रहस्य जानता ही नहीं की ऐसा क्यों होता है |ज्योतिषी इसके
    सम्बन्ध में ग्रहों ,नक्षत्रों की स्थिति स्थान अनुसार भिन्न बताकर ,या जन्म समय
    में सेकेण्ड का अंतर कहकर या देश -काल परिस्थिति की बात कहकर इसे परिभाषित करने की
    कोशिश करता है किन्तु यहाँ भी संतोषजनक उत्तर नहीं है |हम आपको इसका रहस्य बताते
    हैं अपने इस विडिओ में और अपने इस चैनल अलौकिक शक्तियां पर |इसका सम्बन्ध आपके
    अवचेतन और आपके शरीर से जुड़े सात ऊर्जा शरीरों से होता है |यह सातो शरीर सभी में
    होते हैं किन्तु हर व्यक्ति एक निश्चित शरीर की अवस्था में जन्म लेता है और उसके
    नीचे के शरीरों के गुणों के साथ उस शरीर के गुण उसमें १४ -१५ वर्ष की उम्र तक
    विकसित होते हैं |ध्यान से पूरा लेख और विडिओ देखिये ,आप उस रहस्य को जानने जा रहे
    जो दुनियां के बहुत कम लोग जानते हैं ,इसलिए ध्यान से पूरा लेख और विडिओ अंत तक
    समझें |
              मानव शरीर एक कम्प्यूटर के समान ही
    रहस्यपूर्ण यन्त्र है ,इसे ठीक से समझने के लिए मानव के विभिन्न आयामों को समझना
    आवश्यक है |बाहरी रूप से जो शरीर हमें दिखाई देता है वास्तव में वह शरीर का केवल
    दस प्रतिशत भाग होता है |विद्वानों ने शरीर के सात स्तरों की बात की है –
    स्थूल शरीर [फिजिकल बाडी] २ आकाश शरीर [ईथरिक बाडी] सूक्ष्म शरीर [एस्ट्रल
    बाडी
    ] मनस शरीर [ मेंटल बाडी] ५-
    आत्म शरीर [स्पिरिचुअल बाडी
    ] ब्रह्म शरीर [कास्मिक बाडी] और ७- निर्वाण शरीर [बाडिलेस बाडी] |अब आप देखिये हमारे सौर मंडल में सात ही ग्रह
    भी मुख्य होते हैं ज्योतिष के अनुसार ,जबकि दो अदृश्य ग्रह माने जाते हैं |हमारे
    शरीर में सात ही चक्र मुख्य माने जाते हैं ,दो चक्र को और स्थान दिया जाता है इनके
    बीच अर्थात सात मुख्य ग्रह ,सात मुख्य चक्र और सात शरीर मानव के |कुछ तो सम्बन्ध
    है इनका |कुंडलिनी जागरण के क्रम में क्रमशः सातो चक्रों के जागरण से इन सात शरीर
    की अवस्था में व्यक्ति पहुँचता है और सातो ग्रहों के प्रभाव भी प्रभावित होते हैं
    |जन्मकालिक मुख्य ग्रह के अनुसार एक विशेष चक्र भी जन्म से ही क्रियाशील होता है
    और व्यक्ति के सप्त शरीर में से एक शरीर विशेष के गुण के अनुसार भी व्यक्ति का
    व्यक्तित्व और मानसिक स्थिति होती है |
           सनातन सिद्धांत और सोच के अनुसार मनस
    शास्त्रियों का कहना है की व्यक्तियों के जीवन में मानव शरीर के यह सातों स्तर
    उत्तरोत्तर विकसित होते हैं, अर्थात क्रमशः उम्र और समय के अनुसार इनका विकास होता
    है |सामान्य जन इसे नहीं समझ पाते ,यहाँ तक की साधक और कुंडलिनी के जानकार भी इसे
    व्यावहारिक स्तर पर न देखते हुए मात्र साधना से ही इनकी प्राप्ति और समझने की बात
    करते हैं |व्यावहारिक दृष्टिकोण की बात करें तो मनस शास्त्रियों के अनुसार सामान्य
    योग व्यवहार में रहते हुए एक शरीर का विकास लगभग सात वर्ष में पूरा हो जाना चाहिए
    और लगभग ५० वर्ष की आयु होने तक व्यक्ति सातवें शरीर का विकास करके विदेह [बाडीलेस
    ]अवस्था में पहुँच जाना चाहिए |अर्थात जन्म से ७ वर्ष तक स्थूल शरीर ,७ से १४ वर्ष
    तक आकाश शरीर ,१४ से २१ वर्ष तक सूक्ष्म शरीर ,२१ से २८ वर्ष तक मनस शरीर ,२८ से
    ३५ वर्ष तक आत्म शरीर ,३५ से ४२ वर्ष तक ब्रह्म शरीर और ४२ से ४९ -५० वर्ष तक
    निर्वाण शरीर की अवस्था में व्यक्ति को होना चाहिए |ध्यान दीजिये यहाँ शरीर यथावत
    रहता है मात्र मानसिक अवस्था इन शरीर के अनुसार पहुंचनी चाहिए |यह सनातन नियमों के
    अनुसार व्यक्ति की नियमित दिनचर्या के अनुसार निर्धारित किया गया है |
              राजा जनक को विदेह और जानकी को वैदेही
    भी कहते हैं ,इसका अर्थ यह होता है की राजा जनक विदेह अवस्था को प्राप्त थे |इस
    विदेह अथवा बाडिलेस अवस्था का अर्थ यह नहीं की व्यक्ति का भौतिक शरीर नहीं रहेगा
    अथवा व्यक्ति कोई भौतिक कर्म नहीं करेगा |इसका अर्थ केवल इतना है की वह सारे कार्य
    इस ढंग से करना सीख लेगा की उसकी आत्मा पर कोई कर्म का बंधन न लग पाए ,अर्थात
    आत्मा निर्लेष रहे |आत्मा प्रायः उस अवस्था में निर्लेष रहती है जब वह शरीर रहित
    होती है |यह एक मेटाफिजिकल सिद्धांत है |यह सूत्र हमारे सनातन दर्शन में जीवन के
    लिए बनाए गए थे और वैदिक काल में इसका पालन होता था |जीवन का ढंग ऐसा था की इसके
    अनुसार जीवन चले |
               इस सूत्र के अनुसार ,जीवन के प्रथम
    सात वर्ष में बच्चे का स्थूल शरीर पूरा होता है जैसे पशु का शरीर विकास को प्राप्त
    होता है |इस अवस्था में व्यक्ति में अनुकरण तथा नकल करने की प्रवृत्ति रहती है
    |प्रायः यह प्रवृत्ति पशुओं की भी होती है |कुछ ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जिनकी
    बुद्धि इस भाव से उपर नहीं उठ पाती और पशुवत जीवन जीते रह जाते हैं |इसे हम योग की
    भाषा में कहते हैं की व्यक्ति प्रथम शरीर से उपर नहीं उठा |यह स्तर व्यक्ति के
    भौतिक शरीर का होता है और इस स्तर का व्यक्ति केवल भोजन -शयन में रूचि रखने वाला
    ,शारीरिक सुख चाहने वाला ,दूसरों के अनुसार चलने वाला होता है |
             द्वितीय शरीर अर्थात आकाश शरीर में
    भावनाओं का उदय होता है अतः इसे भाव शरीर भी कहते हैं |प्रेम और आत्मीयता वाली समझ
    विकसित होने से व्यक्ति सांसारिक सम्बन्धों को समझने लगता है |इस आत्मीयता के कारण
    ही व्यक्ति में पशु प्रवृत्ति कम होकर मनुष्य प्रवृत्ति का विकास होता है |चौदह
    वर्ष का होते होते वह सेक्स के भाव को भी समझने लग जाता है |बहुत से लोगों के चक्र
    यहीं तक विकसित हो पाते हैं और वे पूरे जीवन भर घोर संसारी बने रहते हैं |आकाश
    शरीर की स्थिति वाले लोग सदैव भौतिकता की ओर भागते हुए इसी में लिप्त रहते हैं
    |इनके लिए भोग विलाश ,भोजन ,शयन सुख ,भावना में बहने वाले ,कल्पना में जीने वाले
    ,अक्सर गलतियाँ करने वाले ,कम आत्मविश्वास वाले होते हैं | [पंडित जितेन्द्र मिश्र
    ]
              तृतीय शरीर सूक्ष्म शरीर कहलाता है
    |सामान्यतः इसकी विकास की अवधि २१ वर्ष तक है |इस अवधि में बुद्धि में विचार और
    तर्क की क्षमता का विकास हो जाने के कारण व्यक्ति बौद्धिक रूप से सक्षम हो जाता है
    और व्यक्ति में सांस्कृतिक गुण विकसित हो जाते हैं |सभ्यता भी आ जाती है और शिक्षा
    के आधार पर समझ भी बढ़ जाती है |इस स्तर के लोग जीवन और जन्म -मृत्यु को ही सब कुछ
    समझते हैं |भौतिक रूप से सभी सुखों की चाह भी होती है और मृत्यु की वास्तविकता को
    भी समझते हैं |जीवन सुखी बनाने की सामर्थ्य और बुद्धि भी होती है |इस स्तर पर
    आध्यात्मिक विकास न्यून होता है और कष्ट पर व्यक्ति दूसरों की ओर देखता है |अक्सर
    इस स्तर पर या तो व्यक्ति नास्तिक होता है या भाग्यवादी |नास्तिक कर्म को प्रमुखता
    देते हैं और भाग्यवादी भाग्य को ही सबकुछ मानते हैं |
                 चतुर्थ शरीर अगले सात वर्ष तक
    विकसित हो जाना चाहिए |अर्थात २८ या ३० वर्ष तक इस शरीर का विकास हो जाना चाहिए
    |इसे मनस शरीर कहते हैं |इस स्तर पर मन प्रधान होता है ,अतः व्यक्ति ललित कलाओं
    ,संगीत ,साहित्य ,चित्र कारिता काव्य आदि में रूचि लेने लगता है |टेलीपैथी
    ,सम्मोहन यहाँ तक की कुंडलिनी भी इसी स्तर तक विकसित हुए व्यक्ति को रास आती है
    ,चूंकि यह स्तर व्यक्ति को कल्पना करने की ऐसी शक्ति देता है की वह पशुओं से
    श्रेष्ठ बन जाता है |स्वर्ग नर्क की कल्पना भी इसी स्तर में आती है |व्यक्ति
    आध्यात्मिक जगत को समझने लगता है और ब्रह्मांडीय सूत्रों में रूचि जाग्रत होती है
    |वह अधिकतम ज्ञान पाना चाहता है |हर क्रिया को समझने की कोशिस करता है |गहन साधना
    में रूचि इस शरीर की स्थिति में जाग्रत होती है और व्यक्ति यहाँ कुंडलिनी जाग्रत
    कर सकता है |
                पांचवां शरीर आध्यात्मिक होता है |इस
    स्तर पर पहुंचे व्यक्ति को आत्मा का अनुभव हो पाता है |यदि चौथे स्तर पर कुंडलिनी
    जाग्रत हो जाए तो इस शरीर का अनुभव हो पाता है |यदि नियम संयम से व्यक्ति का विकास
    होता रहे तो लगभग
    35 वर्ष की आयु तक
    व्यक्ति इस स्तर पर पहुँच जाता है |यद्यपि आज के आधुनिक जीवन शैली में सामान्य जन
    के लिए यह बेहद कठिन है |मोक्ष का अनुभव इस स्तर पर हो सकता है ,मुक्ति का अनुभव
    हो जाता है |
            छठवां है ब्रह्म शरीर |इस स्तर पर
    व्यक्ति अहम ब्रह्मास्मि का अनुभव कर पाता है |ऐसी कास्मिक बाडी सामान्यतः अगले
    सात वर्ष में विकसित हो जानी चाहिए |सातवाँ शरीर निर्वाण शरीर कहलाता है जो की
    विदेह अवस्था है |भगवान् बुद्ध ने इस स्थिति को ही निर्वाण कहा है |यहाँ अहं और
    ब्रह्म दोनों ही मिट जाते हैं |मैं और तू दोनों के ही न रहने से यह स्थिति परम
    शून्य की बन जाती है |
    इन सातों
    शरीरों का क्रमिक विकास बहुत से लोगों में जन्म जन्म चलता रहता है |कोई प्रथम शरीर
    के साथ जन्म लेता है तो कोई चौथे स्तर के साथ |करोड़ों में कोई एक छठवें स्तर के
    साथ जन्म लेता है जो जन्म से ही विरक्त हो जाता है |जैसे बाबा कीनाराम ,तेलग
    स्वामी ,स्वामी स्वरूपानंद ,विवेकानंद जी |जैसे स्तर के साथ व्यक्ति का जन्म होता
    है वह चौदह वर्ष का होते होते व्यक्ति में प्रकट होने लगता है |उसकी सोच ,संसार को
    देखने का दृष्टिकोण ,व्यवहार ,समझ आदि में सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा अंतर देखने
    को मिलता है |
                   इसको हम आपको
    थोडा और विस्तार से समझाते हैं |सभी की शुरुआत तो स्थूल शरीर से ही हुई है किन्तु
    कोई मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति कर निर्वाण शरीर तक पहुच जाता है और कोई स्थूल
    शरीर की मानसिक अवस्था में ही रह जाता है जीवन भर |यदि मान लीजिये किसी व्यक्ति ने
    अपने जीवन में सूक्ष्म शरीर की स्थिति पाई है और उसके ऊपर बड़े कर्म बंधन नहीं बनते
    ,किसी का श्राप आदि उसके जन्म को प्रभावित नहीं करते तथा वह अपनी आयु पूर्ण कर
    मृत्यु को प्राप्त होता है तो वह दोबारा जन्म लेता है और १४ वर्ष की आयु होते होते
    उसकी मानसिक अवस्था सूक्ष्म शरीर की मानसिक अवस्था जैसी हो जायेगी ,जैसे वह
    बौद्धिक होगा ,समझदार हो जाएगा ,तार्किक और सांस्कृतिक गुण वाला होगा अर्थात पूर्ण
    विकसित मानव होगा |अब वह यदि यहाँ से अपना विकास करता है तो उसके लिए निर्वाण शरीर
    तक की यात्रा स्थूल शरीर और आकाश शरीर वाले से आसान होगी |वह जहाँ तक की यात्रा
    करेगा और कर्म बंधन को नियत्रित रखेगा तो वह अगले जन्म में आज पहुंची हुई आवस्था
    में जन्म लेगा और १४ वर्ष की आयु तक उसमे वह गुण विकसित हो जायेंगे |यह क्रमिक
    विकास है |यदि कोई अपने कर्म से सूक्ष्म शरीर की अवस्था में जन्म लेकर भी पशुवत
    स्थूल शरीर के भोग सुख में ही झूलता रह जाता है तो वह नीचे जाकर स्थूल शरीर की
    अवस्था भी प्राप्त कर सकता है |यह आध्यात्मिक विज्ञान है जिसे अच्छे अच्छे साधक
    ,ज्ञानी ,कुंडलिनी साधक तक नहीं जानते ,नहीं समझते |इसलिए व्यक्ति को अपने कर्मों
    को नियंत्रित रखना चाहिए |धन्यवाद
    ………………………………………हर हर महादेव

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  • महाकाली दीक्षा के आवश्यक तत्व

    महाविद्या
    महाकाली दीक्षा
    ============     
                दीक्षा एक संस्कार है, जिसके माध्यम से
    कुसंस्कारों
    का क्षय होता है,| अज्ञान, पाप और दारिद्र्य का नाश होता है,| ज्ञान शक्ति व् सिद्धि प्राप्त होती है और मन में उमंग व् प्रसन्नता पाती है। दीक्षा के द्वारा साधक की पशुवृत्तियों का शमन होता है और जब उसके चित्त में शुद्धता जाती है, उसके बाद ही इन दीक्षाओं के गुण प्रकट होने लगते हैं और साधक अपने अन्दर सिद्धियों का दर्शन
    कर आश्चर्य चकित रह जाता है। जब कोई श्रद्धा भाव से दीक्षा प्राप्त करता है, तो गुरु को भी प्रसनता होती है,
    कि मैंने
    बीज को उपजाऊ भूमि में ही रोपा है। वास्तव में ही वे सौभाग्यशाली कहे जाते है, जिन्हें जीवन में योग्य गुरु द्वारा ऐसी दुर्लभ दीक्षाएं प्राप्त होती हैं, ऐसे साधकों से तो देवता भी इर्ष्या करते हैं।
               साधनाओं की बात आते ही दस महाविद्या का नाम सबसे ऊपर आता है। प्रत्येक महाविद्या का अपने आप में अलग ही महत्त्व है। लाखों में कोई एक ही ऐसा होता है जिसे सदगुरू से महाविद्या दीक्षा प्राप्त हो पाती है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद सिद्धियों के द्वार एक के बाद एक कर साधक के लिए खुलते चले जाते है। प्रत्येक महाविद्या दीक्षा अपने आप में ही अद्वितीय है,| साधक अपने पूर्व
    जन्म के संस्कारों से प्रेरित होकर या गुरुदेव से निर्देश प्राप्त कर इनमें से कोई भी दीक्षा प्राप्त कर सकते हैं। मात्र एक महाविद्या साधना सफल हो जाने पर ही साधक के लिए सिद्धियों का मार्ग खुल जाता है, और एकएक करके सभी साधनों में सफल होता हुआ वह पूर्णता की ओर अग्रसर हो जाता है। यहां यह बात भी ध्यान देने योग्य है, कि दीक्षा कोई जादू नहीं है,
    कोई मदारी
    का खेल नहीं है, कि बटन दबाया
    और उधर कठपुतली का नाच शुरू हो गया।
    महाकाली
    महाविद्या दीक्षा
    ===================
              यह तीव्र प्रतिस्पर्धा का युग है। आप चाहे या चाहे विघटनकारी तत्व आपके जीवन की शांति, सौहार्द भंग करते ही रहते हैं। एक दृष्ट
    प्रवृत्ति वाले व्यक्ति की अपेक्षा एक सरल और शांत प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के लिए अपमान, तिरस्कार के द्वार खुले ही रहते हैं। आज ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है,
    जिसका कोई शत्रु हो और शत्रु का तात्पर्य मानव जीवन की शत्रुता से ही नहीं, वरन रोग, शोक, व्याधि, पीडा भी मनुष्य के शत्रु
    ही कहे जाते हैं, जिनसे व्यक्ति हर क्षण त्रस्त रहता है और उनसे छुटकारा पाने के लिए टोने टोटके
    आदि के चक्कर में फंसकर
    अपने समय और धन दोनों
    का ही व्यय करता है,
    परन्तु फिर भी शत्रुओं से छुटकारा नहीं मिल पाता।
               महाकाली दीक्षा के माध्यम से व्यक्ति शत्रुओं को निस्तेज एवं परास्त करने में सक्षम हो जाता है, चाहे वह शत्रु आभ्यांतरिक हों या बाहरी, इस दीक्षा के द्वारा उन पर विजय प्राप्त कर लेता है, क्योंकि महाकाली ही मात्र वे शक्ति
    स्वरूपा हैं, जो शत्रुओं का संहार
    कर अपने भक्तों को रक्षा
    कवच प्रदान करती हैं। जीवन में शत्रु
    बाधा एवं कलह से पूर्ण
    मुक्ति तथा निर्भीक होकर विजय प्राप्त करने के लिए यह दीक्षा अद्वितीय है। देवी काली के दर्शन भी इस दीक्षा के बाद ही सम्भव होते है, गुरु द्वारा यह दीक्षा प्राप्त होने के बाद ही कालिदास में ज्ञान
    का स्रोत
    फूटा था,
    जिससे उन्होंने मेघदूत’ , ‘ऋतुसंहार’ जैसे अतुलनीय काव्यों की रचना की, इस दीक्षा से व्यक्ति की शक्ति
    भी कई गुना बढ़ जाती है।
              काली दीक्षा काली के उच्च कोटि के साधक द्वारा ही दी जा सकती है |हर कोई इस दीक्षा को
    नहीं दे सकता |वैसे भी महाविद्याओं में से किसी की भी दीक्षा केवल सम्बंधित
    महाविद्या की तंत्रोक्त साधना करने वाला साधक ही दे सकता है |अतः इस दीक्षा के
    पहले सुनिश्चित होना चाहिए की गुरु वास्तव में काली का सिद्ध साधक है |ऐसा इसलिए
    कहना पड़ रहा है की आजकल सोसल मीडिया आदि पर प्रचार करके दीक्षाएं रेवड़ियों की तरह
    बांटी जा रही हैं ,कैम्प लगाकर दीक्षा दिया जा रहा है ,सार्वजनिक मंचों से बोलकर
    दीक्षाएं दी जा रही हैं ,जो की पूर्णतया गलत है |ऐसे गुरु दीक्षा दे रहे हैं जो
    सम्बंधित महाविद्या की तो बात ही क्या किसी भी महाविद्या के साधक या सिद्ध नहीं है
    |वैदिक कर्मकांडी और प्रवचनकर्ता भी महाविद्या की दीक्षाएं दे रहे हैं |व्यवसायी
    तांत्रिक अथवा भौतिकता में लिप्त गुरु दीक्षा दे रहे हैं |जिससे अक्सर असफलता मिल
    रही है शिष्यों को और वे फिर किसी और का मुंह देखने को विवश हो रहे हैं अथवा उनका
    मोहभंग हो रहा है |इन गुरुओं को तंत्र की अथवा सम्बन्धित महाविद्या साधना की
    तकनिकी जानकारी नहीं होती ,मात्र मंत्र देकर पैसे -दक्षिणा -उपहार लेकर कर्त्तव्य
    की इतिश्री कर लेते हैं |अक्सर अन्य लोगों से दीक्षा प्राप्त साधक हमने मार्गदर्शन
    के लिए सम्पर्क करते हैं जो की गलत है |यह उन्हें पहले ही सोचना चाहिए |अक्सर शाबर
    मंत्र साधक से दीक्षा प्राप्त साधक तंत्रोक्त मंत्र करना चाहते हैं जो की मुश्किल
    हो जाता है |काली दीक्षा प्राप्त साधक अगर श्रद्धा के साथ साधना करे तो उसके समान
    शक्तिशाली कोई नहीं |वह चारो पुरुषार्थों को प्राप्त कर सकता है |देवता उसके
    इच्छाओं को पूर्ण करने को बाध्य होते हैं |उसकी सर्वत्र विजय होती है और उसे कोई
    बाधा प्रभावित नहीं कर सकती |
             
    दस
    महाविद्या में काली प्रथम रूप है। माता का यह रूप साक्षात और जाग्रत है। काली के रूप में माता का किसी भी प्रकार से अपमान करना अर्थात खुद के जीवन को संकट में डालने के समान है। महा दैत्यों का वध करने के लिए माता ने ये रूप धरा था। सिद्धि प्राप्त करने के लिए माता की वीरभाव में पूजा की जाती है। काली माता तत्काल प्रसन्न होने वाली और तत्काल ही रूठने वाली देवी है। अत: इनकी साधना या इनका भक्त बनने के पूर्व एकनिष्ठ और कर्मों से पवित्र होना जरूरी होता है। यह कज्जल पर्वत के समान शव पर आरूढ़ मुंडमाला धारण किए हुए एक हाथ में खड्ग दूसरे हाथ में त्रिशूल और तीसरे हाथ में कटे हुए सिर को लेकर भक्तों के समक्ष प्रकट होने वाली काली माता को नमस्कार। यह काली एक प्रबल शत्रुहन्ता महिषासुर मर्दिनी और रक्तबीज का वध करने वाली शिव प्रिया चामुंडा का साक्षात स्वरूप है, जिसने देवदानव युद्ध में देवताओं को विजय दिलवाई थी। इनका क्रोध तभी शांत हुआ था जब शिव इनके चरणों में लेट गए थे।
               महाकाली दीक्षा में
    अत्यंत आवश्यक तत्व है गुरु का तकनिकी रूप से सक्षम होना और खुद की साधना में
    अत्यंत उच्च स्थान होना ,क्योंकि महाकाली ही वह शक्ति हैं जो कुंडलिनी जाग्रत कर
    सकती हैं साथ ही समस्त उग्र शक्तियाँ एक साथ प्रदान कर सकती हैं |इनकी साधना की
    तकनीकी गलती साधक का वर्त्तमान और भविष्य दोनों नष्ट कर देती है |श्रद्धा और भावना
    से की गयी आराधना एक अलग विषय है जहाँ यह माँ स्वरुप में हानि नहीं करती किन्तु
    साधना की स्थिति आते ही यह कोई गलती क्षमा नहीं करती |जो गुरु तकनीकी दक्ष होगा और
    अपनी साधना में रम कर उच्चावस्था प्राप्त कर रहा होगा वह सामान्यतया दीक्षा में
    रूचि नहीं लेगा क्योंकि उसे सदैव योग्य शिष्य ही चाहिए जो वास्तविक साधना का
    इच्छुक और भौतिकता से अलग मुक्ति की कामना रखता हो |ऐसा शिष्य मिलना मुश्किल है
    ,अतः गुरु बहुत कम लोगों को दीक्षा देता है वह भी कठिन परीक्षा लेकर |
                 बाजार में तो लाखों
    गुरु भरे पड़े हैं किन्तु शिष्य का सौभाग्य होता है सच्चा गुरु पा लेना |सच्चा गुरु
    कभी पैसे नहीं मांगता और उसका कोई शुल्क नहीं होता किन्तु जब वास्तविक गुरु मिल
    जाए तो दीक्षा समय शिष्य को चाहिए की वह गुरु को उतना पूर्ण वस्त्र समर्पित करे
    जितना वह धारण करते हों |कम से २७ दिन के उनके भोजन योग्य सामग्री अथवा मूल्य और
    एक दिन के उनके परिवार के लिए भोजन सामग्री अथवा मूल्य समर्पित करे |दीक्षा समय
    थोड़े फल -फूल और दक्षिणा उनके चरणों में अर्पित करे |२७ दिन का तात्पर्य २७
    नक्षत्र से है जिनमे शिष्य का भोजन करते हुए गुरु का आशीर्वाद प्राप्त हो |बहुत से
    शिष्य पूरे सौर वर्ष अर्थात १२ राशियों के भ्रमण काल के बराबर श्रद्धा अर्पित करते
    हैं जिससे गुरु का आशीर्वाद पूरे सूर्य के सभी ग्रह नक्षत्रों में भ्रमण करने तक
    मिल सके |कम से कम २७ नक्षत्र तो आवश्यक होता है |पहले के समय में शिष्य भिक्षा
    मांगकर लाकर गुरुकुल चलाते थे किन्तु आज भिक्षा का समय तो नहीं पर गुरु आज भी वैसा
    ही है |वास्तविक गुरु जब व्यावसायिक नहीं होता तो उसका जीवन यापन भी शिष्य की
    जिम्मेदारी होता है ,अतः दीक्षा पूरे सामर्थ्य से लेनी चाहिए |
               महाकाली की दीक्षा
    एकाएक नहीं हो सकती |पहले आपको जानना चाहिए की आपकी क्षमताएं क्या हैं ,उद्देश्य
    क्या है ,जरूरते क्या हैं और आपके संस्कार क्या हैं |महाकाली के अनेक रूप और अनेक
    मंत्र हैं |महाकाली की साधना मतलब तकनिकी तंत्र साधना |यहाँ हर कदम गुरु की जरूरत
    है और हर कदम पर ब्रह्मांडीय उर्जा संरचना के वैज्ञानिक तकनिकी सूत्रों का प्रयोग
    है |आपको महाकाली के अपने अनुकूल रूप को जानना समझना चाहिए |श्मशान काली की साधना
    घर में नहीं हो सकती ,कामकला काली की साधना सात्विक भाव से मुश्किल है और दक्षिण
    काली की साधना भावुकता -कोमलता से रोते हुए नहीं हो सकती |इन अंतरों को समझना
    आवश्यक है |काली की साधना में वीर भाव आवश्यक है अतः यह डरपोक ,कायर लोगों के लिए
    नहीं है |इनके हर स्वरुप के गुण भिन्न हैं और तदनुरूप मंत्र हैं |मूलाधार की
    अधिष्ठात्री यह हैं और इनकी सिद्धि से मूलाधार की शक्तियाँ जाग जाती हैं |इनका
    साक्षात्कार होने का मतलब स्वयमेव कुंडलिनी जागरण |इनकी दीक्षा सामान्यतया
    तांत्रिक पद्धतियों से ही होती हैं किन्तु यदि साधक अत्यधिक सात्विक भाव वाला है
    तो गुरु सात्विक पद्धति से भी दीक्षा दे सकता है |इनकी दीक्षा प्राप्ति के लिए
    शिष्य में प्रबल आत्मबल ,साहस ,आत्मविश्वास ,धैर्य तथा गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण
    होना चाहिए |कोशिश यह होनी चाहिए की काली सिद्ध गुरु से दीक्षा प्राप्ति के बाद आप
    किसी भी अन्य गुरु से दीक्षा न लें और उन्ही को आध्यात्मिक भौतिक सभी गुरु बनाएं
    |यदि आपके पहले से गुरु हैं तो बिना गुरु की अनुमति के आप काली की किसी अन्य से
    दीक्षा न लें |इन स्थितियों में व्यतिक्रम उत्पन्न होता है जो समस्याएं दे सकता है
    |
       काली के
    मुख्य शस्त्र त्रिशूल और विशेष तलवार हैं जिसे खड्ग कहा जाता है |दीक्षा हेतु अथवा
    साधना हेतु सर्वोत्तम दिन शुक्रवार ,शनिवार ,कृष्ण चतुर्दशी ,अमावस्या आदि होता है
    | कालिका पुराण ,महाकाल
    संहिता आदि ग्रंथों में इनका विशेष
    उल्लेख मिलता है |काली का मूल बीज क्रीं और क्लीं है जिनके साथ विभिन्न बीजों का संयोजन
    इनके ऊर्जा की भिन्न प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है |
    इनका एक मंत्र : ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा है किन्तु इनके किसी भी मंत्र की साधना बिना गुरु के नहीं की जानी चाहिए |कालीका के प्रमुख तीन स्थान है:- कोलकाता में कालीघाट पर जो एक शक्तिपीठ भी है। मध्यप्रदेश के उज्जैन में भैरवगढ़ में गढ़कालिका मंदिर इसे भी शक्तिपीठ में शामिल किया गया है और गुजरात में पावागढ़ की पहाड़ी पर स्थित महाकाली का जाग्रत मंदिर चमत्कारिक रूप से मनोकामना पूर्ण करने वाला है।
     महाकाली शाबर मन्त्र
    ———————-
    निरंजन निराकार अवगत पुरुष तत सार, तत सार मध्ये ज्योत, ज्योत मध्ये परम ज्योत, परम ज्योत मध्ये उत्पन्न भई माता शम्भु शिवानी काली काली काली महाकाली, कृष्ण वर्णी, शव वाहनी, रुद्र की पोषणी, हाथ खप्पर खडग धारी, गले मुण्डमाला हंस मुखी जिह्वा ज्वाला दन्त काली मद्यमांस कारी श्मशान की राणी मांस खाये रक्तपीपीवे भस्मन्ति माई जहाँ पर पाई तहाँ लगाई सत की नाती धर्म की बेटी इन्द्र की साली काल की काली जोग की जोगीन, नागों की नागीन मन माने तो संग रमाई नहीं तो श्मशान फिरे अकेली चार वीर अष्ट भैरों, घोर काली अघोर काली अजर बजर अमर काली भख जून निर्भय काली बला भख, दुष्ट को भख, काल भख पापी पाखण्डी को भख जती सती को रख, काली तुम बाला ना वृद्धा, देव ना दानव, नर ना नारी देवीजी तुम तो हो परब्रह्मा काली
    काली का मूल मंत्र है – ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं
    क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।

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  • क्या है शिवलिंग ? [ Shivlingam :: Univarsal Energy]

    :::::::::::: क्या है शिवलिंग::::::::::::
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     समस्त संसार में शिवलिंग पाए जाते हैं ,विभिन्न धर्मों तक में इनकी किसी न किसी रूप में प्रतीकाकृति मिलती हैं |हिन्दू धर्म में यह परम पवित्र शिव के प्रतीक माने जाते हैं और इनकी पूजा की जाती है |यह शिवलिंग है क्या ,कभी इस पर सामान्यतया विचार सामान्य लोग नहीं करते जा इसके बारे में बहुत नहीं जानते |इसलिए जो जैसी परिभाषा इसकी गढ़ कर सुना देता है सामान्य रूप से मान लिया जाता है और कल्पना कर ली जाती है |कुछ महाबुद्धिमान प्राणियों ने परम पवित्र शिवलिंग को जननांग समझ कर पता नही क्या-क्या और कपोल कल्पित अवधारणाएं फैला रखी हैं परन्तु…वास्तव में. शिवलिंग. वातावरण सहित घूमती धरती तथा  सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का प्रतिनिधित्व करता है |इसका अक्ष /धुरी (axis) ही लिंग है।
    दरअसल.इसमें ये गलतफहमी.. भाषा के रूपांतरण और, मलेच्छों द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने  तथा, अंग्रेजों द्वारा इसकी व्याख्या से उत्पन्न हुआ  हो सकता है. |जैसा कि…. हम सभी जानते है कि. एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में. अलग-अलग अर्थ निकलते हैं….! उदाहरण के लिए.- यदि हम हिंदी के एक शब्द “”सूत्र”’ को ही ले लें तो सूत्र मतलब. डोरी/धागा, .गणितीय सूत्र ,.कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है जैसे कि. नारदीय सूत्र ,.ब्रह्म सूत्र इत्यादि | उसी प्रकार “”अर्थ”” शब्द का भावार्थ: सम्पति भी हो सकता है और मतलब (मीनिंग) भी |
    ठीक बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय  चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।
    ध्यान देने योग्य बात है कि””लिंग”” एक संस्कृत का शब्द है जिसके निम्न अर्थ है :
    @ त आकाशे न विधन्ते -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० ५
    अर्थात….. रूप, रस, गंध और स्पर्श ……..ये लक्षण आकाश में नही है ….. किन्तु शब्द ही आकाश का गुण है ।
    @ निष्क्रमणम् प्रवेशनमित्याकशस्य लिंगम् -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० २ ०
    अर्थात….. जिसमे प्रवेश करना व् निकलना होता है ….वह आकाश का लिंग है ……. अर्थात ये आकाश के गुण है ।
    @ अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं क्षिप्रमिति काललिङ्गानि । -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० ६
    अर्थात….. जिसमे अपर, पर, (युगपत) एक वर, (चिरम) विलम्ब, क्षिप्रम शीघ्र इत्यादि प्रयोग होते है, इसे काल कहते है, और ये …. काल के लिंग है ।
    @ इत इदमिति यतस्यद्दिश्यं लिंगम । -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० १ ०
    अर्थात……. जिसमे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर व् नीचे का व्यवहार होता है ….उसी को दिशा कहते है……. मतलब कि….ये सभी दिशा के लिंग है ।
    @ इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिंगमिति -न्याय० अ ० १ । आ ० १ । सू ० १ ०
    अर्थात….. जिसमे (इच्छा) राग, (द्वेष) वैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, सुख, दुःख, (ज्ञान) जानना आदि गुण हो, वो जीवात्मा है…… और, ये सभी जीवात्मा के लिंग अर्थात कर्म व् गुण है ।
    इसीलिए……… शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने के कारन………. इसे लिंग कहा गया है…।
    स्कन्दपुराण में स्पष्ट कहा है कि……. आकाश स्वयं लिंग है…… एवं , धरती उसका पीठ या आधार है …..और , ब्रह्माण्ड का हर चीज ……. अनन्त शून्य से पैदा होकर….. अंततः…. उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है .|यही  कारण है कि इसे कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे कि प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam)  इत्यादि |
    यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि. इस ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और प्रदार्थ | इसमें से हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है जबकि आत्मा एक ऊर्जा है |ठीक इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं | क्योंकि ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है |इसीलिए शास्त्रों में शक्ति की विवेचना में कहा जाता है की जब शक्ति [काली] शिव से निकल जाती है तो शिव भी शव हो जाते हैं ,अर्थात शिव तभी ताल शिव हैं जब तक उनके साथ शक्ति हैं |वैसे ही  पदार्थ में तभी तक जीवन है जबतक उसमे आत्मा है |
    अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की दृष्टि से बोलने की जगह … शुद्ध वैज्ञानिक भाषा में बोला जाए तो. हम कह सकते हैं कि शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि हमारे ब्रह्मांड की आकृति है.,उसकी ऊर्जा संरचना की प्रतिकृति है ,और अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की भाषा में बोला जाए तो शिवलिंग ,भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-अनादि एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक है. | अर्थात शिवलिंग हमें बताता है कि…… इस संसार में न केवल पुरुष का  और न ही केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है बल्कि, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही समान हैं |एक दुसरे की परिकल्पना अथवा पूर्णता एक दुसरे के बिना संभव नहीं है |
    हमें ज्ञात है की ब्रहमांड की प्रत्येक संरचना पदार्थ है जो परमाणुओं से मिलकर बनता है |परमाणु सर्वत्र विद्यमान हैं |जल-आकाश-वायु सर्वत्र |परमाणु की संरचना में नाभिक में प्रोटान और न्यूट्रान होते हैं और इस नाभिक के चारो और इलेक्ट्रान चक्कर लगता रहता है |न्यूट्रान तो उदासीन होता है किन्तु फिर भी नाभिक धनात्मक होता है क्योकि प्रोटान धनात्मक आवेश वाला कण होता है जो पूरे नाभिक को धनात्मक बनाए रखता है ,इस धनात्मक के आकर्षण में बंधकर ऋणात्मक आवेश का कण इलेक्ट्रान उसके चारो और चक्कर लगता रहता है और परमाणु का निर्माण होता है |इलेक्ट्रान का चक्कर लगभग गोलाकार होता है जिसकी तुलना हम शिवलिंग के योनी या अर्ध्य से कर सकते हैं |धनात्मक नाभिक की तुलना लिंग से कर सकते हैं जो स्थिर रहता है |इसमें स्थित न्यूट्रान परम तत्त्व का प्रतीक है जो उदासीन रहता है |इस विज्ञान को हमारा वैदिक ज्ञान जानता था और उसने शिवलिंग की परिकल्पना की |समस्त ब्रह्माण्ड परमाणुओं से बना है ,परमाणु हर कण कण में विद्यमान है |अर्थात ईश्वरीय ऊर्जा हर कण कण में है ,तभी तो हम कहते हैं कण कण में भगवान |इस परमाणु से ही शरीर की कोशिकाएं बनती हैं और शरीर बनता है ,,इससे ही वनस्पतियों की कोशिकाएं और शारीर बनता है |यहा तक की धातु-पत्थर-मिटटी भी इसी से बनते हैं |अर्थात शिवलिंग इस परमाणु का प्रतिनिधित्व करता है |धनात्मक-ऋणात्मक ऊर्जा के साथ निर्विकार शिव का प्रतिनिधित्व करता है |
    अगर पुरुष-स्त्री के परिप्रेक्ष्य में देखें तभी यह शिवलिंग स्थूल रूप से लिंग -योनी का प्रतिनिधित्व करता दीखता है ,परन्तु यह वास्तव में ब्रह्मांडीय ऊर्जा धारा-संरचना का प्रतिनिधित्व करता है | लिंग -योनी में परिभाषित करने का शायद कारण इसके पुरुष और स्त्री अथवा पुरुष और प्रकृति का धनात्मक और ऋणात्मक ऊर्जा रूप है |इस ऊर्जा धरा या संरचना की अनेक परिभाषाएं और विवरण हैं ,पर यह मूल रूप से उर्जा को ,शक्ति को, उसकी क्रियाविधि को व्यक्त करता है |…………………………………………………………….हर-हर महादेव 


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  • शिवलिंग के पूजन का विधान क्यों है ?


    क्यों है शिवलिंग के पूजन का विधान   
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    ॐ माता शक्ति ने १०८ बार जनम ग्रहण किया है| शिव की प्राप्ति हेतु माता शक्ति के पास स्थूल शरीर को अमर करने का ज्ञान न होने के कारण हि उनकी मृत्यु होती गई और प्रत्येक जनम में वो शिव स्वरूप शंकर जी कि अर्धांगिनी बनती गई | जिस का प्रमाण उनके गले में माता के १०८ नर मुंडों से प्रतीत होता है | स्थूल शरीर को अमर करने का ज्ञान माता शक्ति को परमात्मा शिव ने १०८ वे जन्म में परमात्मा शिव ने दिया जब को परवत राज हिमालय की पुत्री पार्वती के नाम से व्यख्यात हुई | माता अपने १०७वें जन्म में राजा दक्ष की पुत्री बनी और उनका नाम सती कहलाया | माता सती के पिता राजा दक्षजी ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन रखा और पूर्ण पृथ्वी के राजा, महाराजाओं इत्यादि को उस यज्ञ में बुलवाया | शंकरजी उनके दामाद होते हुए भी उन को आमंत्रण नहीं दिया गया | भूतनाथ होने के कारण ही राजादक्ष उनसे घृणा करते थे | माता सती ने जब महादेवजी से यज्ञ में पधारने को कहा तो उन्होंने आमंत्रण न दिए जाने की वजह से यज्ञ में जाने से इनकार कर दिया | बिन आमंत्रण के जाने से उचित सम्मान की प्राप्ति नहीं होती | पिता मोह के कारण माता सती से नहीं रूका गया और वो यज्ञ के लिए अकेले ही चल पड़ी | माता जब यज्ञस्थल पर पहुंची तो उन्होंने देखा की पूर्ण यज्ञ में कहीं भी उनके पति महादेवजी का आसन मात्र भी नहीं है | यह देखकर माता को क्रोध आ गया और उन्होंने अपने पिता राजा दक्षजी से इस बात पर तर्क किया | उस समय राजा दक्षजी ने बड़े ही हीन वचन शंकरजी के बारे में कहें जिन को माता न सुन पाई और यज्ञ के अग्नि कुंड में कूदकर स्वयं को उन्होंने भस्म कर लिया | इस बात की सूचना जब महादेवजी को मिली तो वे अत्यंत क्रोधित हुए और उनके गणों ने पूर्ण यज्ञ का विध्वंस कर दिया | महादेवजी ने राजा दक्ष का सिर काट दिया और उसके शरीर पर बकरे का सिर जोड़ दिया | माता सती के पार्थिव शरीर को उठकर शंकरजी वहां से चल दिए | माता का शरीर अग्नि में जलकर कोयला हो चुका था | शक्ति के बिना शिव फिर से अधूरे हो गए | इस समय काल में ही उनकी लिंग का पतन बारह टुकड़ों में हुआ और उसी समय ब्रह्माण्ड से यह बाराह ज्योतिलिंगों की स्थापना पृथ्वी पर हुई |


    इनकी स्थापना के समय पूर्ण पृथ्वी में कंपन मच गई | जिस प्रकार से पृथ्वी का विराट है उसी प्रकार शिव बाबा का भी विराट रूप मौजूद है ब्रह्माण में जिस के दर्शनों तक पहुंचने हेतु मानव के पास कोई यंत्र नहीं है | परमात्मा शिव विराट रूप में भी हैं और ज्योर्तिबिंदू रूप में भी है | ज्योर्तिबिंदू रूप में वो परकाया प्रवेश कर पाते हैं | उनके इस विराट रूपी ज्योर्तिलिंगों ने पूर्ण सृष्टी में कोहराम मचा दिया | सृष्टि को विनाश से बचाने हेतु ब्राह्मणों ने ब्रह्माजी का आव्हान किया और इस समस्या का समाधान उनसे पूछा | उस समय ब्रह्माजी नेे स्पष्ट रूप से बताया कि शिवलिंग पूजन नारी के लिए वर्जित है |


    शिवलिंग पूजन के समय नारी अपने पति के बाएं हाथ पर स्थानग्रहण करेगी और शिवलिंग पूजन का फल पति- पत्नी दोनों ग्रहण कर पाएंगे | यज्ञ आदि के अनुष्ठान में पत्नी नर के दाहिने हाथ पर आसन ग्रहण करती है क्योंकि उस समय वो लक्ष्मी का रूप मानी जाती हैं | नारी अगर शिवलिंग की पूजा आराधना अकेले संपन्न करती है तो वो पाप कर्म की अभागी होती है | शिवलिंग अभिषेक पति- पत्नी दोनों द्वारा ही संपन्न होने चाहिए | ब्रह्माजी ने चारों वर्णों के लिए अलग- अलग शिवलिंग की व्याखा भी बताई है |


    1. ब्राह्मण वर्ग- परशिव (मिट्टी के) बामी मिट्टी जिसमें सर्प का वास होता है |
    2. छत्रिय वर्ग- सफेद मिट्टी
    3. वैश्य वर्ग- पिली मिट्टी
    4. शूद्र वर्ग- काली मिट्टी


    मानव अपने जीवन में अनेकों प्रकार के कष्टों से घिरा रहता है | इन कष्टों के निर्वाण हेतु ही भिन्न- भिन्न तत्वों से रूद्रा अभिषेक के विधान बताऐं गए | जिस प्रकार गाय के दूध से शिवलिंग अभिषेक से स्वास्थ अच्छा रहता है उसी प्रकार से गन्ने के रस से लक्ष्मी की प्राप्ति इत्यादि- इत्यादि | जैसा कष्ट वैसा समाधान …………………………………………………………………………हर-हर महादेव

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  • धर्मपत्नी और पत्नी में अंतर

    पत्नी और
    धर्मपत्नी में अंतर

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    हमारे देश में
    पत्नी को धर्मपत्नी कहा जाता है ,किन्तु सभी पत्नियाँ धर्मपत्नी नहीं होती |इस
    सम्बन्ध में भारी भ्रम है और लोग समझते हैं की पूर्ण विधि विधान से पूरे रीती
    रिवाज से मंत्र और कर्मकांड से होने वाले विवाह के बाद कोई भी स्त्री धर्मपत्नी बन
    जाती है |धर्म द्वारा स्थापित परम्पराओं के अनुसार विवाह होने से किसी स्त्री को
    धर्मपत्नी कहा तो जरुर जा सकता है किन्तु वह वास्तव में धर्म पत्नी होगी यह जरुरी
    नहीं |विवाह तो लगभग हर जोड़े का आज भी भारत में धर्म अनुसार ही होता है तो क्या हम
    सभी को धर्म पत्नी मान लें |मेरा मत कुछ भिन्न है और मैं अलग सोचता हूँ जिसके
    अनुसार मेरा मानना है की वास्तव में आज के समय में शायद कुछ प्रतिशत स्त्रियाँ ही
    धर्म पत्नियाँ होती हैं अन्य सभी मात्र पत्नियाँ होती है |इसी तरह मात्र कुछ
    प्रतिशत पुरुष भी परमेश्वर या धर्म पति हो सकते है ,अन्य सभी मात्र पति ही होते
    हैं |हम आपको पत्नी ,धर्म पत्नी और पति तथा पतिपरमेश्वर या धर्म पति की अपनी सोच
    के अनुसार और अपने अनुभव के अनुसार परिभाषा बताने का प्रयत्न कर रहे हैं ,आप
    इन्हें देखें ,समझें और निर्णय लें की कौन पत्नी है ,कौन धर्मपत्नी है ,कौन पति है
    और कौन धर्मपति है |हमारा विश्लेषण ब्रह्माण्ड के ऊर्जा सूत्रों ,सनातन विज्ञानं
    और तंत्र के आधार पर है जहाँ वास्तविक स्थिति बताई गयी है |
            यद्यपि भारत में सभी लोग गर्व से अपनी
    पत्नी को धर्मपत्नी की संज्ञा देते हैं किन्तु वह होती पत्नी है तथा लोग भ्रम में
    जीते हैं |पत्नी वह होती है जो पति को संतान उत्पन्न करने में योग देती है |संतान
    से समाज वर्धन होता है |यदि संतान विक्सित और मेघा युक्त है तो समाज विकसित बनेगा
    |यदि संतान अविकसित शरीर ,या विकृत शरीर या विकृत मानसिकता या मेघा हीन हुई तो
    समाज भी वैसा ही रुग्ण और पंगु बन जाएगा |अतः पत्नी को धर्म पत्नी और पति को धर्म
    पति बनाकर इससे संतान और समाज दोनों को विकसित बनाने के उद्देश्य से पति पत्नी के
    लिए कुछ रास्ते बनाये गए |अब संतान उत्पन्न करने भर के लिए किसी की पत्नी बनना एक
    सामाजिक रिश्ता है ,जिसे मान्यता देने के लिए रीती रिवाज से संस्कारित किया जाता
    है |मंत्र और पूजा पाठ के साथ ईश्वर को साक्षी मानकर पाणिग्रहण इसलिए कराया जाता
    है की इसी संस्कार से धर्मपत्नी भी प्राप्त होती है तथा पहले के समय में
    धर्मपत्निय ही अधिक मिलती थी |आज के समय में संस्कार में बदलाव से पत्नियाँ अधिक
    मिलती हैं धर्म पत्नियाँ खोजनी पड़ेंगीं अगर वास्तविक तथ्यों का अनुसरण हो तो |मात्र
    संतान उत्पन्न करने वाली पत्नी धर्मपत्नी नहीं है |पत्नी का धर्मपत्नीपन उस समय
    शुरू होता है जब पति के लिए कोई पत्नी धर्म के विकास में सहायक हो ,जब कोई पत्नी
    पति के आध्यात्मिक उन्नति में सहायक हो ,जब पत्नी के पूजा पाठ का सम्पूर्ण आधा
    हिस्सा पति को प्राप्त हो सके |यह धार्मिक विकास सम्भोग से समाधि और उन्नति के
    सूत्रों पर आधारित होता है |आज के समय में अधिकतर पत्नियों अथवा पतियों के पूजा
    -पाठ धर्म -कर्म का आधा हिस्सा किसी भी पति या पत्नी को नहीं मिलता |क्यों नहीं
    मिलता इसे हम संक्षेप में आगे बताएँगे जबकि इस विषय पर हमने पूर्ण और विस्तृत लेख
    अपने ब्लॉग पर तथा यू ट्यूब चैनल पर विडिओ प्रकाशित कर रखा है |
         पत्नी को ही धर्मपत्नी बनने का अधिकार मिला
    हुआ है क्योंकि वह पति से इस प्रकार अन्तरंग सम्बन्ध रखती है की वह अगर साथ दे तो
    पति परमेश्वर बन सकता है और पति के मामले में भी ऐसा ही है |सामाजिकता के सन्दर्भ
    में सम्भोग से समाधि की तरह का धर्म निर्वाह अत्यंत गुप्त रखा जाता है जो की पति
    पत्नी के लिए सहज सम्भव होता है |यह गुप्त धर्म कुंडलिनी तंत्र साधना है |जो
    व्यक्ति [
    shiv के समान] अपनी पत्नी [शिवा के समान] के साथ कुल कुंडलिनी धर्म का विकास करता है
    उसके लिए पत्नी अर्धांगिनी बन जाती है |इस विधि को अकेला पुरुष अथवा अकेली स्त्री
    नहीं कर सकती |दोनों एक होकर ही इस धर्म निर्वाह को पूरा कर पाते हैं अतः पति भी
    आधा अधूरा है और पत्नी भी आधी अधूरी है और दोनों एक दुसरे के पूरक अर्धांग हैं
    |पत्नी तब अर्धांगिनी बनती है जब वह पति के लिए सम्बन्धों के माध्यम से आध्यात्मिक
    उन्नति की सहयोगिनी बनती है |सम्बन्धों के द्वारा आध्यात्मिक उन्नति मात्र
    कुंडलिनी तंत्र साधना द्वारा ही सम्भव है |कुछ लोग सोचेंगे की पत्नी के साथ
    धार्मिक अनुष्ठान ,पूजा -पाठ ,हवन -पूजन में बैठने से पत्नी का धर्म पत्नीपन पूरा
    हो जाएगा |ऐसा नहीं है |इन कामों के लिए तो किसी भी स्त्री को आप बिठा सकते हैं
    ,कोई भी रिश्ता हो सकता है |कोई तात्विक बाधा नहीं आएगी |हमने सूना है की पत्नी के
    न होने पर श्री रामचंद्र जी ने अपने अश्वमेध यज्ञ में सोने की सीता बनाकर बिठा ली
    थी |वहां सोने की ,लोहे की या खून मांस की कोई भी सीता बिठा सकते हैं परन्तु कुल
    कुंडलिनी के धर्मानुष्ठान में जहाँ सम्भोग ही समाधि का द्वार हो असली पत्नी की ही
    आवश्यकता होगी |पूजा में बैठने मात्र वाली पत्नी न अर्धांगिनी होगी न धर्मपत्नी
    अपितु जो पीटीआई को पूर्णता दे वह अर्धांगिनी होगी जो पति के धर्म में सहायक हो वह
    धर्मपत्नी होगी |पत्नी अर्धांग होकर कुंडलिनी साधना में जब पति को पूर्णता देती है
    तब वह अर्धांगिनी होती है अन्यथा तो सभी मनुष्य अपने आप में आतंरिक रूप से
    अर्धनारीश्वर हैं |
             कुल कुंडलिनी का तत्व ज्ञान जानने वाले
    के लिए बाहरी अनुष्ठानों का विशेष महत्व नहीं होता |उसके सारे अनुष्ठान अपने अंदर
    चलते हैं और उसकी अपनी पूर्णता इन आतंरिक गुप्त धर्म अनुष्ठानों को करने के लिए
    केवल अपनी पत्नी से ही प्राप्त होती है |इसके कारण ही धर्म पत्नी अर्धांगिनी कही
    जाती है |इन तथ्यों से व्यक्ति के लिए धर्मपत्नी और अर्धांगिनी की जीवन में कितनी
    आवश्यकता है यह स्पष्ट हो जाता है |इस आवश्यकता को देखते हुए उन तांत्रिक लोगों
    नें बहुत से उपाय किये जिनकी पत्नी नहीं थी |इसमें पहला उपाय उन्होंने यह किया की
    पत्नी का उद्धरण समाप्त कर उसके स्थान पर नारी शब्द जोड़ दिया |आप जानते हैं पत्नी
    की अपेक्षा नारी मिलना अधिक सुगम होता है क्योंकि पत्नी बनना अपने जीवन को दांव पर
    लगाना होता है |पत्नी से धर्म पत्नी फिर अर्धांगिनी और भी कठिन है |यही हाल पतियों
    का है |पत्नी शब्द के स्थान पर नारी शब्द लगा देने से तंत्र बदनामी की ओर उन्मुख
    हुआ |अतः जहाँ तहां तंत्र शास्त्रों में जब नारी शब्द किसी विशेष अनुष्ठान हेतु
    उपयोग में आया है वहां पत्नी शब्द लगा देने से सम्पूर्ण तंत्र गंगाजल की भाँती
    पवित्र और समाज मान्य हो जाता है |
                वास्तव में कुंडलिनी तंत्र साधना या
    कुल कुंडलिनी की अवधारणा गृहस्थ के लिए ही शुरू हुई थी |जो गृहस्थ धर्म में रहते
    हुए संतान उत्पन्न करते हुए ,समाज संवर्धन करते हुए भी साधना कर आध्यात्मिक उन्नति
    करना चाहते थे उनके लिए महेश्वर शिव ने उसी मार्ग से कुंडलिनी साधना की अवधारणा
    विकसित की जिस मार्ग पर चलना उन्हें आवश्यक था गृहस्थ धर्म निभाने के लिए |महेश्वर
    नें व्यक्ति की श्रृष्टि रचना की क्षमता अर्थात जनन क्षमता को ही इसका आधार बना
    ऐसी विधि विकसित की जो अन्य सभी माध्यमों से भी शीघ्र कुंडलिनी जागरण करा देती है
    |इसमें पत्नी बराबर की भागीदार होने से अर्धांगिनी कहलाई और धर्म तथा आध्यात्मिक
    उन्नति इस मार्ग से होने से वह धर्म पत्नी भी हुई |धर्म पत्नी उसे कहते हैं जो पति
    के अपनी परम्परानुसार धार्मिक आध्यात्मिक विकास में सहायक हो |अर्धांगिनी तो मात्र
    कुंडलिनी साधना के क्षेत्र में कही जा सकती है पत्नी किन्तु धर्म पत्नी वह बिना
    कुंडलिनी साधना के भी कही जा सकती है बशर्ते उसके पूजा पाठ धर्म कर्म का आधा
    हिस्सा उसे और आधा हिस्सा उसके पति को प्राप्त हो |आज के समय में मात्र कुछ
    प्रतिशत पत्नियों अथवा पति का ही आधा हिस्सा उनके पति या पत्नी को प्राप्त होता है
    और अधिकतर द्वारा प्राप्त पूजा पाठ की शक्ति या ऊर्जा कई लोगों में बंट जाती है
    |खुद को तो आधा मिलता है किन्तु पति या पत्नी को कम हिस्सा मिलता है |
              ऊर्जा सूत्रों और शारीरिक आध्यात्मिक
    ऊर्जा विज्ञान के अनुसार कोई भी पति या पत्नी का पूजा पाठ ,धर्म कर्म का आधा
    हिस्सा उसके पति या पत्नी को इसलिए मिलता है की उनके बीच शारीरिक सम्बन्ध होता है
    जहाँ दोनों के मूलाधार चक्र की कामनात्मक तरंगों और विशुद्ध चक्र की भावनात्मक
    तरंगों का आपस में सम्बन्ध बन जाता है जो आपसी ऊर्जा स्थानान्तरण करता है |अब कोई
    पति या पत्नी किसी अन्य पुरुष या महिला से शारीरिक सम्बन्ध रखता है तो उनमे भी इन
    चक्रों की तरंगों से एक अदृश्य सम्बन्ध बन जायेंगे |तो यह दोनों जब भी कोई पूजा
    पाठ धर्म कर्म करेंगे इनको प्राप्त होने वाली ऊर्जा उस व्यक्ति को भी प्राप्त होगी
    जिससे उनके सम्बन्ध शारीरिक रूप से बने हैं |सम्बन्ध की संख्या और मानसिक
    भावनात्मक लगाव जितना अधिक होगा ऊर्जा स्थानान्तरण उतना अधिक होगा |इसी सूत्र पर
    तो पति या पत्नी को ऊर्जा या धार्मिक शक्ति आधा स्थानांतरित होने की बात कही गयी
    है अन्यथा कर्मकांड से कोई पति पत्नी बनता तो जो कर्मकांड के बिना विवाह करते हैं
    वह कैसे पति पत्नी होते |यदि किसी स्त्री के पति के अतिरिक्त किसी अन्य से भी
    सम्बन्ध रहे हों या किसी पुरुष के पत्नी के अतिरिक्त किसी अन्य से भी सम्बन्ध रहे
    हों तो उसकी ऊर्जा पति या पत्नी को आधा नहीं मिल पायेगा और उतने हिस्से होकर
    मिलेगा जितने लोगों से उनके सम्बन्ध होंगे |ऐसी स्थिति में पत्नी ,धर्मपत्नी कभी
    नहीं बन सकती और पति धर्मपति कभी नहीं बन सकता |आज के समय में आपको ऐसा बहुत
    मिलेगा लेकिन भ्रम में जीते लोग सोचते हैं की उनकी पत्नी धर्म पत्नी है या उनका
    पति धर्मपति है |यह तो इस तरह कईयों के धर्मपति या धर्मपत्नी हो गए जबकि पहले ऐसा
    नहीं होता था और तभी पत्नी धर्म पत्नी और पति धर्म पति होता था
    |………………………………………हर हर महादेव 

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  • नाथ सम्प्रदाय [Nath Sampradaya]

    नाथ सम्प्रदाय [Nath Sampradaya]
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    नाथ सम्प्रदाय की उत्पत्ति कापालिक सम्प्रदाय से हुई है जो शैव सम्प्रदाय का अंग रहा है |कापालिक सम्प्रदाय में समयक्रम में अनेक विकृतियाँ उत्पन्न हुई और मूल शैव साधकों को भी इनसे परेशानी होने लगी |तब योग्य साधकों ने नाथ सम्प्रदाय के रूप में एक अलग सिद्धात केसाथ भिन्न स्वरुप लिया |इन पंथ के साधक पहले से थे किन्तु वह संगठित नहीं थे और अन्य से बहुत सरोकार नहीं था | नाथ सम्प्रदाय का उदय यौगिक क्रियाओं के उद्धार के लिए हुआ था। जब तान्त्रिकों और सिद्धों के चमत्कार एवं अभिचार बदनाम हो गये, मद्य, माँस आदि के लिए तथा सिद्ध, तान्त्रिक आदि स्त्री-सम्बन्धी आचारों के कारण घृणा की दृष्टि से देखे जाने लगे तथा जब इनकी यौगिक क्रियाएँ भी मन्द पड़ने लगीं, तब ‘नाथ सम्प्रदाय’ का उदय हुआ। इसमें नव नाथ मुख्य कहे जाते हैं : ‘गोरक्षनाथ’, ‘ज्वालेन्द्रनाथ’, ‘कारिणनाथ’, ‘गहिनीनाथ’, ‘चर्पटनाथ’, ‘रेवणनाथ’, ‘नागनाथ’, ‘भर्तृनाथ’ और ‘गोपीचन्द्रनाथ’। गोरक्षनाथ ही गोरखनाथ के नाम से प्रसिद्ध हैं।
    इस सम्प्रदाय के परम्परा संस्थापक आदिनाथ स्वयं शंकर के अवतार माने जाते हैं। इसका सम्बन्ध रसेश्वरों से है और इसके अनुयायी आगमों में आदिष्ट योग साधन करते हैं। अत: इसे अनेक इतिहासयज्ञ शैव सम्प्रदाय मानते हैं। परन्तु और शैवों की तरह न तो लिंगार्चन करते हैं और न ही शिवोपासना के और अंगों का निर्वाह करते हैं। किन्तु ये तीर्थ, देवता आदि को मानते हैं। शिव मन्दिर और देवी मन्दिरों में दर्शनार्थ जाते हैं। कैला देवीजी तथा हिंगलाज माता के दर्शन विशेषत: करते हैं, जिससे इनका शाक्त सम्बन्ध भी स्पष्ट है। योगी भस्म भी रमाते हैं, परन्तु भस्म स्नान का एक विशेष तात्पर्य है- जब ये लोग शरीर में श्वास का प्रवेश रोक देते हैं, तो रोमकूपों को भी भस्म से बन्द कर देते हैं। प्राणायाम की क्रिया में यह महत्व की युक्ति है। फिर भी यह शुद्ध योगसाधना का पन्थ है। इसीलिए इसे महाभारत काल के योग सम्प्रदाय की परम्परा के अन्तर्गत मानना चाहिए। विशेषतया इसीलिए कि पाशुपत सम्प्रदाय से इसका सम्बन्ध हल्का-सा ही दीख पड़ता है। साथ ही योग साधना इसके आदि, मध्य और अन्त में है। अत: यह शैव मत का शुद्ध योग सम्प्रदाय है।
    इस पन्थ वालों की योग साधना पातञ्जल विधि का विकसित रूप है। उसका दार्शनिक अंश छोड़कर हठयोग की क्रिया छोड़ देने से नाथपन्थ की योगक्रिया हो जाती है। नाथपन्थ में ‘ऊर्ध्वरेता’ या अखण्ड ब्रह्मचारी होना सबसे महत्व की बात है। माँस-मद्यादि सभी तामसिक भोजनों का पूरा निषेध है। यह पन्थ चौरासी सिद्धों के तान्त्रिक वज्रयान का सात्विक रूप में परिपालक प्रतीत होता है। उनका तात्विक सिद्धान्त है कि, परमात्मा ‘केवल’ है। उसी परमात्मा तक पहुँचना मोक्ष है। जीव का चाहे उससे जैसा सम्बन्ध माना जाये, परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से उससे सम्मिलन ही कैवल्य मोक्ष या योग है। इसी जीवन में इसकी अनुभूति हो जाए, पन्थ का यही लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रथम सीढ़ी काया की साधना है। कोई काया को शत्रु समझकर भाँति-भाँति के कष्ट देता है और कोई विषयवासना में लिप्त होकर उसे अनियंत्रित छोड़ देता है। परन्तु नाथपन्थी काया को परमात्मा का आवास मानकर उसकी उपयुक्त साधना करता है। काया उसके लिए वह यन्त्र है, जिसके द्वारा वह इसी जीवन में मोक्षनुभूति कर लेता है। जन्म-मरण जीवन पर पूरा अधिकार कर लेता है, जरा-मरण-व्याधि और काल पर विजय पा लेता है।
    इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह पहले काया शोधन करता है। इसके लिए वह यम, नियम के साथ हठयोग के षट् कर्म (नेति, धौति, वस्ति, नौलि, कपालभाति और त्राटक) करता है कि काया शुद्ध हो जाए। यह नाथपन्थियों का अपना आविष्कार नहीं है; हठयोग पर लिखित ‘घेरण्डसंहिता’ नामक प्राचीन ग्रन्थ में वर्णित सात्त्विक योग प्रणाली का ही यह उद्धार नाथपन्थियों ने किया है।
    इस मत में शुद्ध हठयोग तथा राजयोग की साधनाएँ अनुशासित हैं। योगासन, नाड़ी ज्ञान, षट्चक्र निरूपण तथा प्राणायाम द्वारा समाधि की प्राप्ति इसके मुख्य अंग हैं। शारीरिक पुष्टि तथा पंच महाभूतों पर विजय की सिद्धि के लिए रसविद्या का भी इस मत में एक विशेष स्थान है। इस पन्थ के योगी या तो जीवित समाधि लेते हैं या फिर शरीर छोड़ने पर उन्हें समाधि दी जाती है। वे जलाये नहीं जाते। यह माना जाता है कि उनका शरीर योग से ही शुद्ध हो जाता है, उसे जलाने की आवश्यकता नहीं होती है।
    नाथपन्थी योगी अलख (अलक्ष) जगाते हैं। इसी शब्द से इष्टदेव का ध्यान करते हैं और इसी से भिक्षाटन भी करते हैं। इनके शिष्य गुरु के अलक्ष कहने पर ‘आदेश’ कहकर सम्बोधन का उत्तर देते हैं। इन मन्त्रों का लक्ष्य वही प्रणवरूपी परम पुरुष है, जो वेदों और उपनिषदों का ध्येय है। नाथपन्थी जिन ग्रन्थों को प्रमाण मानते हैं, उनमें सबसे प्राचीन हठयोग सम्बन्धी ग्रन्थ ‘घेरण्डसंहिता’ और ‘शिवसंहिता’ हैं। गोरक्षनाथ कृत हठयोग, गोरक्षनाथ ज्ञानामृत, गोरक्षकल्प, गोरक्षसहस्रनाम, चतुरशीत्यासन, योगचिन्तामणि, योगमहिमा, योगमार्तण्ड, योगसिद्धान्त पद्धति, विवेकमार्तण्ड, सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति, गोरखबोध, दत्त गोरख संवाद, गोरखनाथजी रा पद, गोरखनाथ के स्फुट ग्रन्थ, ज्ञानसिद्धान्त योग, ज्ञानविक्रम, योगेश्वरी साखी, नरवैबोध, विरहपुराण और गोरखसार ग्रन्थ भी नाथ सम्प्रदाय के प्रमाण ग्रन्थ हैं।
    इनमे कनफटा योगी भी होते हैं |कनफटा योगियों का सम्बंध ‘गोरख सम्प्रदाय’ से है, क्योंकि इस सम्प्रदाय के लोग कान छिदवाकर उसमें मुद्रा या कुंडल धारण करते हैं, इसीलिए इन्हें ‘कनफटा’ कहा जाता है। कनफटा योगियों में विधवा स्त्रियाँ तथा योगियों की पत्नियाँ भी कुंडल धारण करती देखी जाती हैं| इन योगियों द्वारा धारण की जाने वाली मुद्रा अथवा कुंडल को ‘दर्शन’ और ‘पवित्री’ भी कहते हैं। इसी आधार पर कनफटा योगियों को ‘दरसनी साधु’ भी कहा जाता है। नाथयोगी संप्रदाय में ऐसे योगी, जो कान नहीं छिदवाते और कुंडल नहीं धारण करते, वे ‘औघड़’ कहलाते हैं। औघड़ योगी ‘जालंधरनाथ’ के और कनफटा योगी ‘मत्स्येंद्रनाथ’ तथा ‘गोरखनाथ’ के अनुयायी माने जाते हैं। क्योंकि प्रसिद्ध है कि जालंधरनाथ औघड़ थे और मत्स्येंद्रनाथ एवं गोरखनाथ कनफटा।
    कनफटा योगियों में विधवा स्त्रियाँ तथा योगियों की पत्नियाँ भी कुंडल धारण करती देखी जाती हैं। यह क्रिया प्राय: किसी शुभ दिन अथवा अधिकतर बसंत पंचमी के दिन संपन्न की जाती है और इसमें मंत्रों का प्रयोग भी होता है। कान चिरवाकर मुद्रा धारण करने की प्रथा के प्रवर्तन के संबंध में दो मत मिलते हैं। एक मत के अनुसार इसका प्रवर्तन मत्स्येंद्रनाथ ने और दूसरे मत के अनुसार गोरक्षनाथ ने किया था। कर्णकुंडल धारण करने की प्रथा के आरंभ की खोज करते हुए विद्वानों ने एलोरा गुफा की मूर्ति, सालीसेटी, एलीफैंटा, अर्काट ज़िले के परशुरामेश्वर के शिवलिंग पर स्थापित मूर्ति आदि अनेक पुरातात्विक सामग्रियों की परीक्षा कर निष्कर्ष निकाला है कि मत्स्येंद्र और गोरक्ष के पूर्व भी कर्णकुंडल धारण करने की प्रथा थी और केवल शिव की ही मूर्तियों में यह बात पाई जाती है।
    यह माना जाता है कि गोरक्षनाथ ने (शंकराचार्य द्वारा संगठित शैव सन्न्यासियों से) अवशिष्ट शैवों का 12 पंथों में संगठन किया था, जिनमें गोरखनाथी प्रमुख हैं। इन्हें ही ‘कनफटा’ कहा जाता है। एक मत यह भी मिलता है कि गोरखनाथी लोग गोरक्षनाथ को संप्रदाय का प्रतिष्ठाता मानते हैं, जबकि कनफटा उन्हें पुनर्गठनकर्ता कहते हैं। इन लोगों के मठ, तीर्थस्थानादि बंगाल , सिक्किम , नेपाल ,कश्मीर , पंजाब , सिंध , काठियावाड़ , मुंबई , राजस्थान , उडीसा आदि प्रदेशों में पाए जाते हैं।………………………………………………..हर हर महादेव 

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  • शिव के १९ अवतार कौन कौन से ?

    भगवान शिव के १९ अवतार 
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    भगवान शिव का पिप्पलाद अवतार 
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    मानव जीवन में भगवान शिव के पिप्पलाद अवतार का बड़ा महत्व है,शनि पीड़ा का निवारण पिप्पलाद की कृपा से ही संभव हो सका|कथा है कि पिप्पलाद ने देवताओं से पूछा- क्या कारण है कि मेरे पिता दधीचि जन्म से पूर्व ही मुझे छोड़कर चले गए? देवताओं ने बताया शनिग्रह की दृष्टि के कारण ही ऐसा कुयोग बना। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए। उन्होंने शनि को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे दिया। शाप के प्रभाव से शनि उसी समय आकाश से गिरने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है। शिव महापुराण के अनुसार स्वयं ब्रह्मा ने ही शिव के इस अवतार का नामकरण किया था।
    पिप्पलादेति तन्नाम चक्रे ब्रह्मा प्रसन्नधी:।
    -शिवपुराण शतरुद्रसंहिता 24/61
    अर्थात ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर सुवर्चा के पुत्र का नाम पिप्पलाद रखा .
    भगवान शिव का नंदी अवतार 
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    भगवान शंकर सभी जीवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भगवान शंकर का नंदीश्वर अवतार भी इसी बात का अनुसरण करते हुए सभी जीवों से प्रेम का संदेश देता है। नंदी (बैल) कर्म का प्रतीक है, जिसका अर्थ है कर्म ही जीवन का मूल मंत्र है। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- शिलाद मुनि ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद ने अयोनिज और मृत्युहीन संतान की कामना से भगवान शिव की तपस्या की। तब भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को भूमि से उत्पन्न एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। भगवान शंकर ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष बनाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ।
     भगवान शिव का वीरभद्र अवतार 
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    यह अवतार तब हुआ था, जब दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में माता सती ने अपनी देह का त्याग किया था। जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने क्रोध में अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे रोषपूर्वक पर्वत के ऊपर पटक दिया। उस जटा के पूर्वभाग से महाभंयकर वीरभद्र प्रकट हुए। शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है-
    क्रुद्ध: सुदष्टïोष्ठïपुट: स धूर्जटिर्जटां तडिद्वह्लिïसटोग्ररोचिषम्।
    उत्कृत्य रुद्र: सहसोत्थितो हसन् गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि॥
    ततोऽतिकायस्तनुवा स्पृशन्दिवं।
    भगवान् शिव का भैरव अवतार 
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    शिव महापुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। एक बार भगवान शंकर की माया से प्रभावित होकर ब्रह्मा व विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे। तब वहां तेज-पुंज के मध्य एक पुरुषाकृति दिखलाई पड़ी। उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा- चंद्रशेखर तुम मेरे पुत्र हो। अत: मेरी शरण में आओ। ब्रह्मा की ऐसी बात सुनकर भगवान शंकर को क्रोध आ गया। उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात कालराज हैं। भीषण होने से भैरव हैं। भगवान शंकर से इन वरों को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा के पांचवें सिर को काट दिया।
    ब्रह्मा का पांचवां सिर काटने के कारण भैरव ब्रह्महत्या के पाप से दोषी हो गए। तब काशी में भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल गई। काशीवासियों के लिए भैरव की भक्ति अनिवार्य बताई गई है।
    भगवान शिव का अंशावतार ::अश्वत्थामा 
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    महाभारत के अनुसार पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के अंशावतार हैं। आचार्य द्रोण ने भगवान शंकर को पुत्र रूप में पाने की लिए घोर तपस्या की थी और भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया था कि वे उनके पुत्र के रूप मे अवतीर्ण होंगे। समय आने पर सवन्तिक रुद्र ने अपने अंश से द्रोण के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में अवतार लिया। ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा अमर हैं तथा वह आज भी धरती पर ही निवास करते हैं। इस विषय में एक श्लोक प्रचलित है-
    अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
    कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
    सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
    जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
    अर्थात अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय ये आठों अमर हैं।
    शिवमहापुराण(शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा के किनारे निवास करते हैं। वैसे, उनका निवास कहां हैं, यह नहीं बताया गया है।
    भगवान शिव का शरभावतार 
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    भगवान शंकर का छठे अवतार हैं शरभावतार। शरभावतार में भगवान शंकर का स्वरूप आधा मृग (हिरण) तथा शेष शरभ पक्षी (आख्यानिकाओं में वर्णित आठ पैरों वाला जंतु जो शेर से भी शक्तिशाली था) का था। इस अवतार में भगवान शंकर ने नृसिंह भगवान की क्रोधाग्नि को शांत किया था। लिंगपुराण में शिव के शरभावतार की कथा है, उसके अनुसार हिरण्यकश्पू का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंहावतार लिया था।
    हिरण्यकश्यपू के वध के पश्चात भी जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवता शिवजी के पास पहुंचे। तब भगवान शिव शरभ के रूप में भगवान नृसिंह के पास पहुंचे तथा उनकी स्तुति की, लेकिन नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत नहीं हुई तो शरभ रूपी भगवान शिव अपनी पूंछ में नृसिंह को लपेटकर ले उड़े। तब भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत हुई। उन्होंने शरभावतार से क्षमा याचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की।
    भगवान शिव का गृहपति अवतार 
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    भगवान शंकर का सातवां अवतार है गृहपति। इसकी कथा इस प्रकार है- नर्मदा के तट पर धर्मपुर नाम का एक नगर था। वहां विश्वानर नाम के एक मुनि तथा उनकी पत्नी शुचिष्मती रहती थीं। शुचिष्मती ने बहुत काल तक नि:संतान रहने पर एक दिन अपने पति से शिव के समान पुत्र प्राप्ति की इच्छा की। पत्नी की अभिलाषा पूरी करने के लिए मुनि विश्वनार काशी आ गए। यहां उन्होंने घोर तप द्वारा भगवान शिव के वीरेश लिंग की आराधना की।
    एक दिन मुनि को वीरेश लिंग के मध्य एक बालक दिखाई दिया। मुनि ने बालरूपधारी शिव की पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने शुचिष्मति के गर्भ से अवतार लेने का वरदान दिया। कालांतर में शुचिष्मती गर्भवती हुई और भगवान शंकर शुचिष्मती के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट हुए। कहते हैं पितामह ब्रह्म ने ही उस बालक का नाम गृहपति रखा था।
    भगवान शिव के अंशावतार :: ऋषि दुर्वासा 
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    भगवान शंकर के विभिन्न अवतारों में ऋषि दुर्वासा का अवतार भी प्रमुख है। धर्म ग्रंथों के अनुसार सती अनुसूइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा के निर्देशानुसार पत्नी सहित ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्रकामना से घोर तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों उनके आश्रम पर आए। उन्होंने कहा- हमारे अंश से तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोक में विख्यात तथा माता-पिता का यश बढ़ाने वाले होंगे। समय आने पर ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा हुए, जो देवताओं द्वारा समुद्र में फेंके जाने पर उससे प्रकट हुए। विष्णु के अंश से श्रेष्ठ संन्यास पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्त उत्पन्न हुए और रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया। शास्त्रों में इसका उल्लेख है-
    अत्रे: पत्न्यनसूया त्रीञ्जज्ञे सुयशस: सुतान्।
    दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मïसम्भवान्॥
    -भागवत 4/1/15
    अर्थ- अत्रि की पत्नी अनुसूइया से दत्तात्रेय, दुर्वासा और चंद्रमा नाम के तीन परम यशस्वी पुत्र हुए। ये क्रमश: भगवान विष्णु, शंकर और ब्रह्मा के अंश से उत्पन्न हुए थे।
    भगवान शिव के अवतार हनुमान 
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    भगवान शिव का हनुमान अवतार सभी अवतारों में श्रेष्ठ माना गया है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक वानर का रूप धरा था। शिवमहापुराण के अनुसार देवताओं और दानवों को अमृत बांटते हुए विष्णुजी के मोहिनी रूप को देखकर लीलावश शिवजी ने कामातुर होकर वीर्यपात कर दिया।
    सप्तऋषियों ने उस वीर्य को कुछ पत्तों में संग्रहीत कर लिया। समय आने पर सप्तऋषियों ने भगवान शिव के वीर्य को वानरराज केसरी की पत्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे अत्यंत तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी श्री हनुमानजी उत्पन्न हुए।
    भगवान शिव का वृषभ अवतार 
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    भगवान शंकर ने विशेष परिस्थितियों में वृषभ अवतार लिया था। इस अवतार में भगवान शंकर ने विष्णु पुत्रों का संहार किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार जब भगवान विष्णु दैत्यों को मारने पाताल लोक गए तो उन्हें वहां बहुत सी चंद्रमुखी स्त्रियां दिखाई पड़ी। विष्णु जी ने उनके साथ रमण करके बहुत से पुत्र उत्पन्न किए, जिन्होंने पाताल से पृथ्वी तक बड़ा उपद्रव किया। उनसे घबराकर ब्रह्माजी ऋषिमुनियों को लेकर शिवजी के पास गए और रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे। तब भगवान शंकर ने वृषभ रूप धारण कर विष्णु पुत्रों का संहार किया।
    भगवान शिव का यतिनाथ अवतार 
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    भगवान शंकर ने यतिनाथ अवतार लेकर अतिथि के महत्व का प्रतिपादन किया है। उन्होंने इस अवतार में अतिथि बनकर भील दम्पत्ति की परीक्षा ली थी। भील दम्पत्ति को अपने प्राण गंवाने पड़े। धर्म ग्रंथों के अनुसार अर्बुदाचल पर्वत के समीप शिवभक्त आहुक-आहुका भील दम्पत्ति रहते थे। एक बार भगवान शंकर यतिनाथ के वेष में उनके घर आए। उन्होंने भील दम्पत्ति के घर रात व्यतीत करने की इच्छा प्रकट की। आहुका ने अपने पति को गृहस्थ की मर्यादा का स्मरण कराते हुए स्वयं धनुषबाण लेकर बाहर रात बिताने और यति को घर में विश्राम करने देने का प्रस्ताव रखा। इस तरह आहुक धनुषबाण लेकर बाहर चला गया। प्रात:काल आहुका और यति ने देखा कि वन्य प्राणियों ने आहुक को मार डाला है। इस पर यतिनाथ बहुत दु:खी हुए। तब आहुका ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि आप शोक न करें। अतिथि सेवा में प्राण विसर्जन धर्म है और उसका पालन कर हम धन्य हुए हैं। जब आहुका अपने पति की चिताग्नि में जलने लगी तो शिवजी ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में पुन: अपने पति से मिलने का वरदान दिया।
    भगवान शिव का कृष्णदर्शन अवतार 
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    भगवान शिव ने इस अवतार में यज्ञ आदि धार्मिक कार्यों के महत्व को बताया है। इस प्रकार यह अवतार पूर्णत: धर्म का प्रतीक है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इक्ष्वाकुवंशीय श्राद्धदेव की नवमी पीढ़ी में राजा नभग का जन्म हुआ। विद्या-अध्ययन को गुरुकुल गए। जब बहुत दिनों तक न लौटे तो उनके भाइयों ने राज्य का विभाजन आपस में कर लिया। नभग को जब यह बात ज्ञात हुई तो वह अपने पिता के पास गया। पिता ने नभग से कहा कि वह यज्ञ परायण ब्राह्मणों के मोह को दूर करते हुए उनके यज्ञ को सम्पन्न करके उनके धन को प्राप्त करे। तब नभग ने यज्ञभूमि में पहुंचकर वैश्य देव सूक्त के स्पष्ट उच्चारण द्वारा यज्ञ संपन्न कराया। अंगारिक ब्राह्मण यज्ञ अवशिष्ट धन नभग को देकर स्वर्ग को चले गए। उसी समय शिवजी कृष्णदर्शन रूप में प्रकट होकर बोले कि यज्ञ के अवशिष्ट धन पर तो उनका अधिकार है। विवाद होने पर कृष्णदर्शन रूपधारी शिवजी ने उसे अपने पिता से ही निर्णय कराने को कहा। नभग के पूछने पर श्राद्धदेव ने कहा-वह पुरुष शंकर भगवान हैं। यज्ञ में अवशिष्ट वस्तु उन्हीं की है। पिता की बातों को मानकर नभग ने शिवजी की स्तुति की।
    भगवान शिव का अवधूत अवतार 
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    भगवान शंकर ने अवधूत अवतार लेकर इंद्र के अंहकार को चूर किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार एक समय बृहस्पति और अन्य देवताओं को साथ लेकर इंद्र शंकर जी के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। इंद्र की परीक्षा लेने के लिए शंकरजी ने अवधूत रूप धारण कर उसका मार्ग रोक लिया। इंद्र ने उस पुरुष से अवज्ञापूर्वक बार-बार उसका परिचय पूछा तो भी वह मौन रहा। इस पर क्रुद्ध होकर इंद्र ने ज्यों ही अवधूत पर प्रहार करने के लिए वज्र छोडऩा चाहा त्यों ही उसका हाथ स्तंभित हो गया। यह देखकर बृहस्पति ने शिवजी को पहचान कर अवधूत की बहुविधि स्तुति की। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने इंद्र को क्षमा कर दिया।
    भगवान शिव का भिक्षुवर्य अवतार 
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    भगवान शंकर देवों के देव हैं। संसार में जन्म लेने वाले हर प्राणी के जीवन के रक्षक भी ही हैं। भगवान शंकर का भिक्षुवर्य अवतार यही संदेश देता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार विदर्भ नरेश सत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला। उसकी गर्भवती पत्नी ने शत्रुओं से छिपकर अपने प्राण बचाए। समय पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया। रानी जब जल पीने के लिए सरोवर गई तो उसे घडिय़ाल ने अपना आहार बना लिया। तब वह बालक भूख-प्यास से तड़पने लगा। इतने में ही शिवजी की प्रेरणा से एक भिखारिन वहां पहुंची।
    तब शिवजी ने भिक्षुक का रूप धर उस भिखारिन को बालक का परिचय दिया और उसके पालन-पोषण का निर्देश दिया तथा यह भी कहा कि यह बालक विदर्भ नरेश सत्यरथ का पुत्र है। यह सब कह कर भिक्षुक रूपधारी शिव ने उस भिखारिन को अपना वास्तविक रूप दिखाया। शिव के आदेश अनुसार भिखारिन ने उसे बालक का पालन पोषण किया। बड़ा होकर उस बालक ने शिवजी की कृपा से अपने दुश्मनों को हराकर पुन: अपना राज्य प्राप्त किया।
     सुरेश्वर अवतार
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    भगवान शंकर का सुरेश्वर (इंद्र) अवतार भक्त के प्रति उनकी प्रेमभावना को प्रदर्शित करता है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक छोटे से बालक उपमन्यु की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपनी परम भक्ति और अमर पद का वरदान दिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु अपने मामा के घर पलता था। वह सदा दूध की इच्छा से व्याकुल रहता था। उसकी मां ने उसे अपनी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए शिवजी की शरण में जाने को कहा। इस पर उपमन्यु वन में जाकर ऊँ नम: शिवाय का जाप करने लगा।
    शिवजी ने सुरेश्वर (इंद्र) का रूप धारण कर उसे दर्शन दिया और शिवजी की अनेक प्रकार से निंदा करने लगा। इस पर उपमन्यु क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए खड़ा हुआ। उपमन्यु को अपने में दृढ़ शक्ति और अटल विश्वास देखकर शिवजी ने उसे अपने वास्तविक रूप के दर्शन कराए तथा क्षीरसागर के समान एक अनश्वर सागर उसे प्रदान किया। उसकी प्रार्थना पर कृपालु शिवजी ने उसे परम भक्ति का पद भी दिया।
     किरात अवतार
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    किरात अवतार में भगवान शंकर ने पाण्डुपुत्र अर्जुन की वीरता की परीक्षा ली थी। महाभारत के अनुसार कौरवों ने छल-कपट से पाण्डवों का राज्य हड़प लिया व पाण्डवों को वनवास पर जाना पड़ा। वनवास के दौरान जब अर्जुन भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे, तभी दुर्योधन द्वारा भेजा हुआ मूड़ नामक दैत्य अर्जुन को मारने के लिए शूकर( सुअर) का रूप धारण कर वहां पहुंचा।
    अर्जुन ने शूकर पर अपने बाण से प्रहार किया। उसी समय भगवान शंकर ने भी किरात वेष धारण कर उसी शूकर पर बाण चलाया। शिव की माया के कारण अर्जुन उन्हें पहचान न पाया और शूकर का वध उसके बाण से हुआ है, यह कहने लगा। इस पर दोनों में विवाद हो गया। अर्जुन ने किरात वेषधारी शिव से युद्ध किया। अर्जुन की वीरता देख भगवान शिव प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर अर्जुन को कौरवों पर विजय का आशीर्वाद दिया।
     सुनटनर्तक अवतार
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    पार्वती के पिता हिमाचल से उनकी पुत्री का हाथ मागंने के लिए शिवजी ने सुनटनर्तक वेष धारण किया था। हाथ में डमरू लेकर जब शिवजी हिमाचल के घर पहुंचे तो नृत्य करने लगे। नटराज शिवजी ने इतना सुंदर और मनोहर नृत्य किया कि सभी प्रसन्न हो गए।
    जब हिमाचल ने नटराज को भिक्षा मांगने को कहा तो नटराज शिव ने भिक्षा में पार्वती को मांग लिया। इस पर हिमाचलराज अति क्रोधित हुए। कुछ देर बाद नटराज वेषधारी शिवजी पार्वती को अपना रूप दिखाकर स्वयं चले गए। उनके जाने पर मैना और हिमाचल को दिव्य ज्ञान हुआ और उन्होंने पार्वती को शिवजी को देने का निश्चय किया।
     ब्रह्मचारी अवतार
    ===============
    दक्ष के यज्ञ में प्राण त्यागने के बाद जब सती ने हिमालय के घर जन्म लिया तो शिवजी को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया। पार्वती की परीक्षा लेने के लिए शिवजी ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास पहुंचे। पार्वती ने ब्रह्मचारी को देख उनकी विधिवत पूजा की।
    जब ब्रह्मचारी ने पार्वती से उसके तप का उद्देश्य पूछा और जानने पर शिव की निंदा करने लगे तथा उन्हें श्मशानवासी व कापालिक भी कहा। यह सुन पार्वती को बहुत क्रोध हुआ ,पार्वती की भक्ति व प्रेम को देखकर शिव ने उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप दिखाया। यह देख पार्वती अति प्रसन्न हुईं।
     यक्ष अवतार
    ===========
    यक्ष अवतार शिवजी ने देवताओं के अनुचित और मिथ्या अभिमान को दूर करने के लिए धारण किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार देवताओं व असुरों द्वारा किए गए समुद्रमंथन के दौरान जब भयंकर विष निकला तो भगवान शंकर ने उस विष को ग्रहण कर अपने कंठ में रोक लिया। इसके बाद अमृत कलश निकला। अमृतपान करने से सभी देवता अमर तो हो गए, साथ ही उन्हें अभिमान भी हो गया कि वे सबसे बलशाली हैं।
     देवताओं के इसी अभिमान को तोड़ने के लिए शिवजी ने यक्ष का रूप धारण किया व देवताओं के आगे एक तिनका रखकर उसे काटने को कहा। अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी देवता उस तिनके को काट नहीं पाए। तभी आकाशवाणी हुई कि यह यक्ष सब गर्वों के विनाशक शंकर भगवान हैं। सभी देवताओं ने भगवान शंकर की स्तुति की तथा अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी।…………………………………………………….हर हर महादेव 

    READ MORE: शिव के १९ अवतार कौन कौन से ?
  • सिद्धियाँ कैसे प्राप्त होती हैं ?

    सिद्धियाँ
    कैसे प्राप्त होती हैं ?

    ————————-
    पूजा -पाठ रोज
    करोड़ों लोग करते हैं और विश्व परिप्रेक्ष्य में देखें तो अरबों लोग रोज कहीं न
    कहीं पूजा आराधना करते हैं भले उनके आराध्य ईश्वर अलग हों |सभी अपने ईश्वर से अपनी
    मनोकामना कहते हैं और अधिकतर चाहते हैं की उनकी इच्छा उनका ईश्वर सुने और पूर्ण
    करे किन्तु बहुत ही कम लोगों की इच्छाएं पूर्ण होती हैं क्योकि वह लेने की तकनीक
    ही नहीं जानते |कुछ लोग ईश्वर को अपने पास बुलाना चाहते हैं और चाहते हैं की
    उन्हें उनके आराध्य की शक्ति मिले ,सिद्धि मिले |साधना तो हजारों हजार करते हैं पर
    सबको सफलता नहीं मिलती ,केवल कुछ को सफलता मिलती है उनमे भी कुछ को ही वास्तविक
    सिद्धि प्राप्त हो पाती है ,अन्य के कुछ काम हो जाते हैं और वह उसी आत्म संतुष्टि
    में खुद को सिद्धि का भी कभी कभी स्वामी मान लेता है |सिद्धि का अर्थ है सम्बंधित
    विषय से सम्बंधित शक्ति का साधक के नियंत्रण में आ जाना अथवा वशीभूत हो जाना ,यह
    बहुत कम होता है और इसकी अपनी एक तकनिकी है |इसका आडम्बर आदि से कोई लेना देना
    नहीं होता |इसमें सबसे मुख्य भूमिका मष्तिष्क की होती है ,अवचेतन मन की होती है
    ,अन्य सभी माध्यम सम्बंधित ऊर्जा उत्पन्न करने अथवा बढाने का काम करते हैं |
    आप जब साधना
    करें तो यह बात हमेशा याद रखें की आप किसी शक्ति को नहीं साध सकते ,आप तो हाथ जोड़े
    खड़े हैं ,कोई भी शक्ति आपसे बड़ी है ,अधिक क्षमता वान है तभी तो आप उसकी साधना कर
    रहे हैं ,तो आप उसे कैसे साध सकते हैं |आप उसकी साधना में खुद को साध रहे हैं |खुद
    को साधना है आपको और ऐसा बनाना है की वह शक्ति आपमें समाहित हो सके ,आपमें आ सके
    तभी आपको सिद्धि मिलेगी ,आपकी साधना सफल होगी और आपको उस शक्ति की शक्ति प्राप्त
    हो पाएगी |खुद को साधने के क्रम में खुद को उस शक्ति के गुण ,स्वभाव ,आचरण के
    अनुकूल आपको अपने शरीर और भाव को बनाना होता है तभी आप उससे तालमेल बना पाते हैं
    और आपके पुकारने पर वह शक्ति जब आपको और आपके शरीर को अपने अनुकूल पाती है तभी वह
    आपके पास आती है और आपमें समाहित होती है ,आपका शरीर और आसपास का वातावरण उसकी
    ऊर्जा से संतृप्त होता है |आपको अनुकूल न पाने पर या तो वह शक्ति आएगी ही नहीं और
    आ भी गयी तो वापस चली जायेगी या उसकी उर्जा एकत्र नही हो पाएगी और बिखर जायेगी
    |याद कीजिये कि विष्णु ,सरस्वती की पूजा -उपासना में पवित्रता ,सुचिता ,शुद्धता के
    लिए क्यों कहा जाता है ,जबकि कर्ण पिशाचिनी ,श्मशानिक शक्तियों आदि की उपासना में
    क्यों तामसिक वातावरण में साधना को निर्देशित किया जाता है |कारण है की जिस तरह की
    शक्ति की उपासना कर रहे उसके अनुकूल वातावरण ,पूजा का तरीका ,चढ़ाए जाने वाले सामान
    और आपका भाव होना चाहिए तभी वह आ पाएगी और जुड़ पाएगी |विपरीत भाव ,विपरीत वस्तुएं
    और विपरीत पद्धति शक्ति को प्रतिकर्षित कर देती है |
           किसी एक भाव में डूबिये ,उद्देश्य के
    अनुसार भाव बनाइये ,यदि वह किसी देवी
    देवता का भाव है |अपने उद्देश्य के अनुसार देवीदेवता का चुनाव करें और खूब अच्छी तरह उसे समझें -जानें ,उसके कर्मगुणभाव के अनुसार अपना भाव बनाएं [उग्र शक्ति हेतु उग्र भाव और सौम्य शक्ति
    हेतु सौम्य भाव ],उसके प्रति अपने मन में भाव उत्पन्न करें की आप किस रूप में उस
    शक्ति का अपने लिए आह्वान कर रहे हैं |अब उस भाव में डूबकर विधिवत निश्चित समय
    ,दिशा ,सामग्री ,हवन समिधा आदि के द्वारा विधि पूर्वक प्रत्येक तकनिकी और पूजा
    पद्धति को अपनाकर उसी में लींन हो जाएँ ,डूब जाएँ |५ मिनट की स्मृति विहीनता
    प्राप्त हो जाए तो आप कोई भी देवता ,कोई भी मंत्र सरलता से सिद्ध कर सकते हैं |यह
    ठीक उसी प्रकार है ,जैसा बस के ड्राइवर को ट्रक ड्राइविंग का अभ्यास करना पड़े |यह
    केवल वाहन बदलना है और उसकी तीब्रता को नियंत्रित करने जैसा है |हां इसके लिए पहले
    तो आपको बस चलाना ,उसके पहले हलके वाहन और उसके पहले छोटा वाहन चलाना आना ही चाहिए
    ,|अचानक तो बस या ट्रक जान ले लेगा |अतः सर्व प्रथम तो एकाग्रता का अभ्यास ही होना
    चाहिए और छोटी-छोटी क्रियाएं ,तकनीकियाँ आनी चाहिए |
    वाम मार्ग की
    तकनीकियों में संयम की कठोरता इतनी नहीं है |इसमें साधक के लिए ,साधना के समय संयम
    रखने के लिए केवल काली ,भैरव आदि की साधना में विशेष आवश्यकता पड़ती है |इसमें
    तकनिकी ,तंत्र -सामग्री ,शरीर के अंगों आदि का महत्व है ,जिन्हें अभ्यासित करना
    पड़ता है |इससे शक्ति उत्पन्न होती है |साधक को उस शक्ति को नियंत्रित करने भर का
    अभ्यास करना होता है |इस नियंत्रण के लिए ही तंत्र साधना की जाती है ,खुद को साधा
    जाता है |जैसे काम भाव जाग्रत कीजिये पर स्खलन किये बिना समाधिस्थ हो जाइए |इसमें
    पहले रीढ़ की हड्डी से होकर ऊर्जा उपर खींचा जाता है |यह सब तकनीकियाँ हैं |इन्ही
    तकनीकियों के लिए गुरु की आवश्यकता पड़ती है |कैसे क्या क्रिया करनी चाहिए ,यह जाने
    बिना सफलता नहीं मिल सकती |इसीलिए तंत्र साधना बिना गुरु के नहीं हो सकती |
    सिद्धि की
    विधि कोई हो ,मार्ग कोई हो ,यदि सफलता चाहिए तो मानसिक शक्ति की तीब्रता ,दृढ़ता
    ,भाव को स्थिर किये रहने की क्षमता का विकास ही उद्देश्य होता है |जिसने इसे
    प्राप्त कर लिया उसके लिए सभी सिद्धियाँ आसान हैं |विधि और मार्ग के अनुसार केवल
    कुछ तकनीकियाँ बदलती हैं मूल सूत्र यथावत रहते हैं |मानसिक एकाग्रता और भाव के
    बिना कोई सिद्धि या साधना सफल नहीं हो सकती |तकनिकी और सामग्री ऊर्जा उत्पन्न करते
    या बढाते हैं और उसे नियंत्रित करने का तरीका बताते हैं पर मूल शक्ति का आकर्षण और
    नियंत्रण मानसिक बल से ही होता है |मानसिक बल ,आत्मबल ,साहस ,धैर्य ,अट्टू निष्ठां
    और खुद पर विश्वास के साथ जब भाव गहन हो ,एकाग्रता हो तो कोई भी शक्ति सिद्ध की जा
    सकती है ,इन गुणों को विकसित करना ही तो खुद को साधना है जो आप साधते हैं |इनके बल
    पर ही शक्तियाँ आती हैं और वशीभूत ,आकर्षित होती हैं ,उनकी ऊर्जा आपमें और आसपास
    संघनित होती है |मानसिक बल से से ,मानसिक तरंगों की क्रिया से ही यह उर्जा काम
    करती है जिसे सिद्धि कहते हैं |…………………………………………………….हर हर महादेव 

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  • कौन हैं आपके कुलदेवी /देवता ?क्या पूजा पद्धति है आपके कुलदेवता /देवी की ?

    कैसे
    जाने अपने कुलदेवता को ?कैसे उनकी पूजा
    पद्धति बने ?
    =============================
    कुलदेवता और
    कुलदेवी पर हमने बीसियों वर्षों से ध्यान दिया है ,अध्ययन किया है ,समझा है और
    पाया है की लोगों की अधिकतर समस्याओं के पीछे कहीं न कहीं कुलदेवी या देवता की
    भूमिका होती है ,यद्यपि यह स्वयं कोई समस्या नहीं उत्पन्न करते किन्तु इनकी
    निर्लिप्तता से ,इनके रुष्ट होने से या कमजोर होने से पित्र दोष और बाहरी बाधाएं
    ऐसी ऐसी समस्या उत्पन्न करते हैं की व्यक्ति अनेकानेक उलझनों ,दिक्कतों में घिरता
    जाता है |हमने कुलदेवता और देवी से सम्बन्धित लगभग दो दर्जन पोस्ट लिखे हैं
    जिन्हें हमने अपने ब्लॉग और फेसबुक पेजों पर कई वर्ष पहले से प्रकाशित कर रखा है
    |हमारे पेजों और ब्लॉग से हमारे पोस्टों को कापी करते हुए अनेक लोगों ने उस पर
    विडिओ बना यू ट्यूब पर डाला है किन्तु उन्होंने कुलदेवता या कुलदेवी के नाम वाले
    ही पोस्ट उठाये हैं ,अन्य तकनीकियों ,पूजा पद्धति ,सूत्र और सिद्धांत के लेख वह
    नहीं उठा पायें हैं और न ही यह विषय उनके खुद के खोज का है अतः वह समग्र और तकनिकी
    जानकारी नहीं दे पायें हैं |किसी का पोस्ट उठाकर पढ़ते हुए विडिओ बना देना आसान है
    किन्तु तकनीक जानना और वास्तविक भला करना तो केवल खुद के ज्ञान से ही सम्भव है
    |हमारे इसी लेख को की कुलदेवता या देवी का पता कैसे लगाएं ,लोगों ने कापी भी किया
    होगा और हो सकता है विडिओ भी बनाए हों किन्तु जो गंभीर इससे जुडी बातें हम बताने
    जा रहे हैं वह कोई नहीं बता सकता |इस विषय पर एक लेख तो हम भी पहले ही प्रकाशित कर
    चुके हैं किन्तु आज वह बात कहने जा रहे जो आपका वास्तविक भला करेगा और इसे न कोई
    कापी करने वाला बता सकता है न कोई तांत्रिक ,ज्योतिषी ,पंडित या ओझा -गुनिया |
    कुलदेवता या
    देवी को जानना मुश्किल नहीं ,यह तो आसान है इस छोटी सी विधि से भी ,पर असली समस्या
    उसके बाद ही है क्योंकि आप अपने कुलदेवी या देवता को जानकर भी उन्हें खुश नहीं कर
    सकते ,उन्हें नियमतः पूजा नहीं दे सकते जब तक की आपको यह जानकारी न हो जो कुलदेवता
    का पता लगाने की विधि के बाद बताई जायेगी |इसलिए यदि आप अपना वास्तविक भला चाहते
    हैं और सचमुच कुलदेवी /देवता की स्थापना पूजा करना चाहते हैं तो ध्यान से पढ़ें |
    आज के समय में बहुतायत में पाया जा रहा है की लोगों को अपने कुलदेवता/देवी का पता ही नहीं है |वर्षों
    से कुलदेवता
    /देवी को पूजा नहीं मिल रही है |घरपरिवार का सुरक्षात्मक आवरण समाप्त हो जाने से अनेकानेक समस्याएं अनायास
    घेर रही हैं |नकारात्मक उर्जाओं की आवाजाही बेरिक टोक हो रही है |वर्षीं से स्थान
    परिवर्तन के कारण पता ही नहीं है की हमारे कुलदेवता
    /देवी कौन है
    |कैसे उनकी पूजा होती है |कब उनकी पूजा होती है |आदि आदि |इस हेतु एक प्रभावी
    प्रयोग है जिससे यह जाना जा सकता है की आपके कुलदेवता कौन है | यह एक साधारण
    किन्तु प्रभावी प्रयोग है जिससे आप अपने कुलदेवता अथवा देवी को जान सकते हैं |
     प्रयोग को मंगलवार से शुरू करें
    और ११ मंगलवार तक करते रहें
    |मंगलवार
    को सुबह स्नान आदि से स्वच्छ पवित्र हो अपने देवी देवता की पूजा करें |फिर एक
    साबुत सुपारी लेकर उसे अपना कुलदेवता
    /देवी मानकर स्नान
    आदि करवाकर ,उस पर मौली लपेटकर किसी पात्र में स्थापित करें |इसके बाद आप अपनी
    भाषा में उनसे अनुरोध करें की “हे कुल देवता में आपको  जानना चाहता हूँ ,मेरे परिवार से आपका विस्मरण
    हो गया है ,हमारी गलतियों को क्षमा करते हुए हमें अपनी जानकारी दें ,इस हेतु में
    आपका यहाँ आह्वान करता हूँ ,आप यहाँ स्थान ग्रहण करें और मेरी पूजा ग्रहण करते हुए
    अपने बारे में हमें बताएं |इसके बाद उस सुपारी का पंचोपचार पूजन करें |अब रोज रात
    को उस सुपारी से प्रार्थना करें की हे कुल्द्वता
    /देवी में
    आपको जानना चाहता हूँ ,कृपा कर स्वप्न में मार्गदर्शन दीजिये |फिर सुपारी को तकिये
    के नीचे रखकर सो जाइए |सुबह उठाकर पुनः उसे पूजा स्थान पर स्थापित कर पंचोपचार
    पूजन करें |यह क्रम प्रथम मंगलवार से ११ मंगलवार तक जारी रखें |हर मंगलवार को व्रत
    रखें |इस अवधि के दौरान शुद्धता का विशेष ध्यान रखें ,यहाँ तक की बिस्तर और सोने
    का स्थान तक शुद्ध और पवित्र रखें |ब्रह्मचर्य का पालन करें और मांस
    मदिरा से पूर्ण परहेज रखें |  इस प्रयोग की अवधि के अन्दर आपको
    स्वप्न में आपके कुलदेवता
    /देवी की जानकारी मिल जायेगी |अगर खुद न समझ सकें तो योग्य जानकार से
    स्वप्न विश्लेषण करवाकर जान सकते हैं |इस तरह वर्षों से भूली हुई कुलदेवता की
    समस्या हल हो जाएगी और पूजा देने पर आपके परिवार की बहुत सी समस्याएं समाप्त हो
    जायेंगी |
    यह तो हुई कुलदेवता या देवी का पता लगाने की विधि
    किन्तु आप पता लगाकर क्या करेंगे और आज के अनुसार पूजा करके भी क्या करेंगे जब तक
    की आपको अपने वंश -परंपरा के अनुसार होने
    वाली पूजा पद्धति का पता न हों |उस तिथि का पता न हो जिस तिथि पर आपके पूर्वज पूजा
    करते आये थे |आपको कुलदेवता या देवी का नाम पता लग जाए तो भी आपका वास्तविक भला
    नहीं हो सकता जब तक की आपको अपने कुल परंपरा के अनुसार पूजा पद्धति न पता हो | कुलदेवता
    /देवी के बारे में नाम आदि कुछ सिद्ध बता सकते हैं किन्तु आपकी कुलानुसार पूजा
    पद्धति कोई नहीं बता सकता |
    ध्यान दीजिये आप सभी किसी न किसी ऋषि के ही वंशज
    हैं और आपके पूर्वज ऋषि ने अपने अनुकूल ,अपने
    कर्म के अनुकूल ,अपने संस्कारों के अनुकूल कुल देवता या कुलदेवी की स्थापना की थी
    और अपनी संस्कृति और संस्कार के अनुसार पूजा पद्धति बनाई थी जिससे उस कुलदेवता या
    देवी की कृपा उन्ह प्राप्त होती रहे |उदाहरण के लिए हम गौतम ऋषि के वंशजों को लेते
    हैं |गौतम ऋषि जहाँ रहते थे वहां स्थानिक रूप से उपलब्ध सामग्रियों में से
    उन्होंने अपने कुलदेवता के अनुकूल वस्तुओं का चयन कर एक पूजा पद्धति बनाई और पूजा
    शुरू की |फिर अपने से सम्बन्धित सम्बन्धियों के कर्मानुसार चारो कर्म के अनुकूल
    विशेष पूजा पद्धतियाँ बना दी जो उस कुलदेवता या देवी की चार विशिष्ट प्रकार की
    पूजा हो गयी |यह चार प्रकार के कर्म करने वाले ही बाद में जातियों में बदल गए ,किन्तु
    उनके पूजा पद्धति इन्ही चार प्रकारों में से रहे |ध्यान दीजिये गौतम ऋषि सहित सभी
    ऋषियों के गोत्र अन्य जातियों में भी मिलते हैं |ऊँची ,नीची जाती का कोई विशेष अलग
    गोत्र नहीं होता और सभी ऋषियों की ही संतानें हैं |तो अब उस स्थान विशेष पर
    कर्मानुसार एक देवता की चार प्रकार की पूजा हो गयी |कालान्तर में उस स्थान से कुछ
    लोग निकलकर देश -विदेश के अलग स्थानों पर बसे किन्तु उनकी पूजा पद्धति एक ही रही |
    मूल स्थान से दूरी अधिक होने पर और मूल पूजन सामग्री की उपलब्धता न होने पर
    उन्होंने अपने गुरुओं ,श्रेष्ठों से सलाह -मशवरा करके विकल्प के साथ स्थायी पूजा
    पद्धति उस स्थान पर बना ली |अब उस कुल -गोत्र की वह पूजा पद्धति स्थायी हो गयी और
    वह कुलदेवता /देवी के अनुकूल थी |ऐसा ही सभी ऋषियों के वंशजों और कर्म विशेष वाली
    जातियों के साथ हुआ |अब किसी दूर देश में अलग अलग ऋषियों के वंशजों की पूजा
    पद्धतियों में तो भिन्नता हुई ही उनके कुलदेवता या देवी भी अलग अलग हो गए ,इसके
    बाद इनमे से उत्पन्न जातियों के पूजा पद्धति और अलग हो गए जो अपने मूल ऋषि की पूजा
    पद्धति से तो मिलते जुलते थे किन्तु जाति अनुसार आपस में भी और भिन्न ऋषियों के
    वंशजों से भी बिलकुल भिन्न हो गए |इस प्रकार हर कुल -वंश के लिए अलग पूजा पद्धति
    विकसित हो गयी |विशेष पूजा पद्धति के अनुसार कई हजार वर्ष पूजा होते रहने से उनके
    कुलदेवता और देवी उस पूजा पद्धति के अनुकूल रहे |इस पूजा पद्धति में बाद में बदलाव
    नहीं किया जा सकता क्योंकि ऊर्जा प्रकृति बिगड़ने की सम्भावना रहती है |क्या पता
    किसी कुलदेवता कोई कोई चीज नापसंद हो |
             यह भी ध्यान दीजिये कि उस समय सभी वस्तुएं सभी जगहों पर न पैदा होती थी न ही
    उपलब्ध होती थी अतः स्थान विशेष की पूजा पद्धति विशेष होती थी |आज वह स्थिति नहीं
    है ,हर वस्तु हर स्थान पर उपलब्ध हो जा रही है और यह भी आप नहीं कह सकते की कोई
    वस्तु नहीं मिल रही |आपके कुलदेवता सब देख रहे हैं की आप कितने गंभीर हैं और बहाना
    तो नहीं बना रहे |आप सोचिये स्थान स्थान पर अलग अलग ऋषि वंशजों और जातियों की जब
    अलग अलग पूजा पद्धति हो गयी तो एक ही पूजा पद्धति किसी कुलदेवता या देवी के लिए
    कैसे अनुकूल होगी |कोई ज्ञानी ,जानकार ,पंडित आपके कुलदेवता या देवी के बारे में
    तो बता देगा या आप उपर बताई हमारी ही पद्धति से उनके बारे में जान तो जायेंगे पर
    आप पूजा पद्धति कहाँ से लायेंगे ,यह कौन बतायेगा ,क्या क्या उस देवता के अनुकूल है
    आपके वंश परंपरा के अनुसार आप कैसे जानेंगे ,क्या क्या चढ़ाया जाएगा या चढ़ाया जाता
    रहा है यह आप कैसे जानेंगे ,कौन सी तिथि उनकी पूजा के लिए उपयुक्त रही है और आपके
    पूर्वज किस तिथि को उन्हें पूजते रहे हैं आप कैसे जानेंगे |यह सब कोई सिद्ध ,तांत्रिक
    ,पंडित ,पुरोहित ,ज्योतिषी नहीं बता सकता |न ही कोई विधि इसके बारे में बता सकती
    है |कोई जानकार हर कुल -वंश और उनकी परंपरा के बारे नहीं बता सकता अतः मूल पद्धति
    का ,वस्तुओं का पता लगाना कुलदेवता /देवी को जानने से अधिक जरुरी है क्योंकि एक ही
    देवता की वंश -कुल के अनुसार कई तरह की पूजा पद्धतियाँ हो सकती हैं |
    यह कुलदेवता हजारों वर्षों तक विशेष प्रकार की पूजा पाते पाते
    उसके आदी हो चुके होते हैं और यह उनके अनुकूल भी होता है अतः इसमें परिवर्तन नहीं
    किया जा सकता |छोटा सा परिवरतन इन्हें रुष्ट कर देता है |उस समय के ऋषि ज्ञानी थे
    जो कहीं कहीं उन्होंने विकल्प खोज कर स्थान विशेष की पद्धति बना ली किन्तु आज उस
    स्तर का कोई ज्ञानी नहीं मिलता अतः परिवर्तन नहीं किया जा सकता |मूल पूजा पद्धति
    का कोई विकल्प नहीं |हमने खुद इतने वर्षों की खोज के बाद एक पूजा पद्धति विकसित की
    है किन्तु उसे हमने नवरात्र से जोड़ा है क्योंकि हम जानते हैं की मूल पद्धति का कोई
    विकल्प नहीं |जो भी विकल्प बनाए जायेंगे वह उतना लाभ नहीं दे पायेंगे |हमारे बनाए
    पूजा पद्धति को भी कुछ महागुरु लोग हमारे ब्लॉग से और फेसबुक पेज से कापी करके
    फेसबुक या यू ट्यूब पर डाल चुके हैं किन्तु यह लोग हमारे ज्ञान और विशेष तकनीकी
    पद्धति को कहाँ से लायेंगे जो हम अपने विडिओ में प्रकाशित करेंगे या लिखेंगे |कुलदेवता
    या देवी की पूजा पद्धति हम पहले ही इस ब्लॉग पर और फेसबुक पेजों पर प्रकाशित कर
    चुके हैं किन्तु फिर से नए लेख में विस्तार से वह तकनीकियाँ हम शामिल कर रहे जिससे
    लोगों को अधिकतम लाभ मिल सके |धन्यवाद
    ..………………………………………………………………..हरहर महादेव

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  • महामंगलकारी ,सर्वकष्ट निवारक डिब्बी

    सर्वसौख्य प्रदायक ,सर्वदुष्प्रभाव नाशक डिब्बी
    =========================
    ज्योतिष में ,वैदिक पूजन में ,कर्मकांड में और विशेषकर तंत्र में वनस्पतियों और उनकी जड़ों का प्रयोग
    वैदिक काल से होता रहा है ,क्योंकि भिन्न वनस्पति भिन्न ग्रहों
    की रश्मियों /उर्जाओं ,भिन्न अलौकिक शक्तियों ,भिन्न पारलौकिक उर्जाओं को अवशोषित करती है ,उनके गुण रखती है ,उन्हें
    संगृहीत रखती हैं ,उनसे संतृप्त होती है |इसलिए इनका प्रयोग
    ग्रह शान्ति
    ,देवता प्रसन्नता ,दैवीय शक्ति /ऊर्जा प्राप्त करने ,नकारात्मक शक्तियों को हटाने ,अलग अलग शक्तियों को जोड़ने प्राप्त करने ,शारीरिक ऊर्जा आभामंडल को सुधारने और विकसित
    करने ,शारीरिक क्षमता
    प्राप्त करने में हमेशा से होता रहा है |इनके महत्त्व ,इनके विशेषताओं के कारण ही यह हमारे रूचि का केंद्र रहे हैं |तंत्र और ज्योतिष के वर्षों के शोध और अनुभव के बाद हमने कुछ विशेष जड़ी बूटियों और वनस्पतियों को एकसाथ जोडकर अर्थात इकठ्ठा
    रखकर ,उनका पूजन प्राण प्रतिष्ठा अभिमन्त्रण कर प्रभाव का आकलन किया और पाया की यह वनस्पतियाँ और जड़ें अद्भुत चमत्कारी सिद्ध हुईं |इन्हें इनके लिए शास्त्रों में निर्दिष्ट मुहूर्त नक्षत्र में आमंत्रित ,निष्काषित ,प्राण प्रतिष्ठित और अभिमंत्रित किया गया जिससे इनके मौलिक गुण और ग्रह अथवा शक्ति विशेष के लिए सक्रियता बनी रहे और प्रभावी रहें |इनको क्रमशः इनके लिए निर्दिष्ट नियमों के अंतर्गत एकत्र करते हुए पूरे वर्ष भर में इकठ्ठा
    कर ,साथ में रख पुनः महाविद्या के मन्त्रों से अभिमंत्रित किया गया |इसके बाद इनके प्रभाव
    का कलां करने पर पाया गया की यह सभी कष्टों ,बाधाओं ,नकारात्मक शक्तियों को हटाने में ,सभी ग्रहों को शांत करने में ,सब प्रकार से मंगल करने में ,सर्वसौख्य प्रदान
    करने में सक्षम है |
    इस डिब्बी के निर्माण की प्रक्रिया में रविवार
    को आकडे की लकड़ी और जड़ ,बेलपत्र का निचला मोटा भाग [पत्र मूल ],,,सोमवार को पलाश के फूल ,खिरनी की जड़ ,पलाश की लकड़ी ,,,मंगलवार को अनंत मूल की जड़ ,लाल चन्दन का टुकड़ा ,खैर की जड़ ,खैर की लकड़ी ,,,बुधवार को अपामार्ग का पत्ता ,जड़ और लकड़ी ,विधारा की जड़ ,सफ़ेद चन्दन की जड़ या लकड़ी ,दूब ,,,गुरूवार को पीपल की लकड़ी ,पिला चन्दन की जड़ या लकड़ी ,केले की जड़ ,असगंध की जड़ ,कुश की लकड़ी ,,,शुक्रवार को गूलर की जड़ गूलर की लकड़ी ,सरपंखा की जड़ ,सफ़ेद पलाश के फूल ,,,शनिवार को शमी की जड़ ,शमी की लकड़ी ,बिछुआ पौधे की जड़ ,को लाकर उसी दिन में विधिवत
    प्राण प्रतिष्ठित किया जाता है और उस ग्रह के मन्त्रों से प्रतिदिन अभिमंत्रित करके इकठ्ठा करते हुए एक डिब्बी में रखते जाया जाता है ,इसके बाद इनमे मृगशिरा नक्षत्र में निष्कासित महुआ की जड़ ,पुष्य नक्षत्र में निष्कासित नागरबेल की जड़ ,अनुराधा नक्षत्र में निष्कासित चमेली की जड़ ,भरणी नक्षत्र में निष्कासित शंखाहुली की जड़ ,हस्त नक्षत्र में निष्कासित चम्पा की जड़ ,मूल नक्षत्र में पुनः निष्कासित गूलर की जड़ ,माघ नक्षत्र में पुनः निष्कासित पीपल की जड़ ,चित्रा नक्षत्र में निष्कासित गुलाब की जड़ और आर्द्रा नक्षत्र में पुनः निष्कासित अर्क की जड़ को इकठ्ठा रखा दिया जाता है |
    उपरोक्त वनस्पति योग में रवि पुष्य योग में निष्काषित प्राण प्रतिष्ठित महायोगेश्वरी की जड़ ,सफ़ेद आक की जड़ ,धतूरा की जड़ ,दूब की जड़ ,पीपल की जड़ ,आम की जड़ ,बरगद की जड़ ,निर्गुन्डी की जड़ ,सहदेई की जड़ ,बेल का जड़ ,गूलर के पत्ते और जड़ ,नागदौन की जड़ ,हरसिंगार की जड़ ,अपराजिता की जड़ ,हत्था जोड़ी [एक जड़ ],लघु नारियल
    को भी प्राण प्रतिष्ठित कर रखा जाता है ,फिर गुरु पुष्य योग आने पर इसमें उस दिन निष्कासित तथा प्राण प्रतिष्ठित अभिमंत्रित  कुष की जड़ ,केले की जड़ ,पीला चन्दन का जड़ या लकड़ी को भी प्राण प्रतिष्ठित अभिमंत्रित कर इनके साथ मिला दिया जाता है |इस प्रकार इस योग की निर्माण प्रक्रिया पूर्ण होती है |फिर सभी वनस्पतियों और जड़ों से युक्त इस डिब्बी पर बगला ,काली या श्री विद्या
    के मन्त्रों से २१ दिन अभिमन्त्रण कर हवन करके इसे उसमे ढूपित किया जाता है |इस प्रकार
    सभी वानस्पतिक जड़ और पत्रादि युक्त यह योग अद्भुत ,चमत्कारी प्रभाव
    देने वाला हो जाता है |इन्हें
    एकसाथ संयुक्त इकठ्ठा करके इसमें पीला पारायुक्त सिन्दूर डाल दिया जाता है और ऐसी व्यवस्था रखनी होती है की इसमें जल जाए ताकि यह वनस्पतियाँ और जड़ें खराब हों |
    उपरोक्त वनस्पतियों का योग सभी ग्रहों
    का वैदिक रूप से भी और तंत्रोक्त रूप से भी प्रतिनिधित्व करता है |देवताओं देवियों में गणपति ,विष्णु
    ,शिव ,हनुमान ,दत्तात्रेय ,काली ,चामुंडा ,लक्ष्मी ,दुर्गा ,सरस्वती का भी प्रतिनिधित्व करता है |इनके अतिरिक्त अनेक स्थानीय शक्तियों ,यक्षिणीयों का भी प्रतिनिधित्व करता है |इस पर सभी प्रकार के पूजा और मंत्र जप किये जा सकते हैं |इसकी सामान्य पूजा भी किसी भी अन्य पूजा से अधिक लाभप्रद होती है |यह व्यक्ति के साथ ही सम्पूर्ण परिवार को सुखी रखता है |सबके ग्रह पीड़ा ,ग्रह दोष शांत होते हैं |घर की नकारात्मक ऊर्जा का क्षय होता है ,नकारात्मक शक्तियां ,भूत प्रेत घर से पलायन कर जाते हैं |आर्थिक समृद्धि के मार्ग प्रशस्त होते हैं और आय के नए स्रोत उत्पन्न होते हैं |देवताओं की कृपा प्राप्त होती है |प्रतिदिन पूजन में सभी सामग्रियां बाहर ही अर्पित होती हैं मात्र पीला पारायुक्त सिन्दूर ही अन्दर डिब्बी में डाला जाता है |यह सिन्दूर चमत्कारी हो जाता है और इसका तिलक विजयदायी और सम्मोहक होता है |इस डिब्बी पर चामुंडा ,दुर्गा ,काली ,विष्णु ,हनुमान आदि के मंत्र तीव्र प्रभाव
    दिखाते हैं |इस डिब्बी के प्रभाव
    से जीवन के सभी पक्षों
    में उन्नति
    होती है |
    यह योग हमारे वर्षों के खोज का परिणाम है जिसमे पूरे वर्ष सतत दृष्टि वनस्पतियों की खोज और नक्षत्रों योग पर रखनी होती है ||सम्पूर्ण प्रक्रिया पूर्ण होने पर यह डिब्बी
    इतनी प्रभावकारी हो जाती है की जहाँ भी इसे रखा जाता है वहां से सभी प्रकार
    की नकारात्मक ऊर्जा ,नकारात्मक शक्ति ,भूत प्रेत ,टोने टोटके अभिचार
    का प्रभाव
    समाप्त होने लगता है |यदि किसी बुरी शक्ति या ऊर्जा को वचन बद्ध या मंत्र बद्ध करके भेजा गया तो वह ही मजबूरी में वहां टिक पाती है अन्यथा सभी बुरी शक्तियाँ वहां से पलायन कर जाती है |इससे वास्तु
    दोष का शमन होता है ,ग्रह शांत होते हैं ,दैवीय प्रसन्नता होती है ,पित्र दोष का प्रभाव
    कम होने लगता है ,काल सर्प दोष ,मांगलिक दोष जैसे बुरे ग्रह योग का प्रभाव कम होने लगता है |व्यक्ति के आभामंडल की नकारात्मकता कम होने लगती है |मांगलिक कार्यों में रही बाधाएं समाप्त
    होती हैं |पूजा करने वाले में आकर्षण शक्ति का विकास होता है जबकि पूरे घर परिवार
    में सभी को अपने आप लाभ होता है तथा घर परिवार में सुख शांति समृद्धि का विकास होने लगता है ,सबकी उन्नति होने लगती है |
    हमारे यहं निर्मित होने वाली चमत्कारी दिव्य गुटिका से यह डिब्बी इस मामले में अलग है की ,इसका मूल प्रभाव शान्ति कारक है और यह सभी ग्रहों ,वातावरणीय ,अभिचारात्मक प्रभावों को शांत कर उन्हें दूर करती है, जबकि दिव्य गुटिका तीव्र प्रतिक्रया करती है तथा व्यक्ति में परिवर्तन लाती है |दिव्य गुटिका में वानस्पतिक जड़ी बूटियों के साथ जंतु उत्पाद भी होते हैं जबकि यह डिब्बी शुद्ध वनस्पतियों और जड़ों पर आधारित है |इसमें नवग्रहों की बाधा और बुरे योग ,भाग्य अवरोध ,वास्तु दोष ,पित्र दोष को ध्यान में रखते हुए जड़ी बूटियाँ सम्मिलित की गयी हैं जिससे व्यक्ति के साथ समस्त घर और परिवार को समस्या से मुक्ति मिले |चमत्कारी दिव्य गुटिका का निर्माण नकारात्मक शक्तियों को हटाने और व्यावसायिक अथवा व्यक्तिगत उन्नति को दृष्टिगत रखते हुए किया गया है जबकि इस डिब्बी का निर्माण पारिवारिक समृद्धि /सुख ,ग्रह बाधा के साह ही समस्त विघ्नों के नाश को दृष्टिगत रखते हुए किया गया है |इससे सभी प्रकार से सुख मिले ,इसलिए ही इसका नाम हमने सर्वसौख्य प्रदायक डिब्बी रखा है |सभी प्रकार का मंगल हो इसलिए इसका नाम हमने महामंगल दायक डिब्बी रखा है |सभी प्रकार के कष्ट और दुष्प्रभावों का नाश हो इसलिए इसे हम सर्व दुष्प्रभाव नाशक ,सर्व कष्ट निवारक डिब्बी से भी संबोधित कर रहे |यह हमारा व्यक्तिगत शोध है ,जिसपर अनेक पोस्ट हमारे पेजों ,ब्लागों पर आते रहेंगे |किसी अन्य द्वारा इसे अपने नाम से प्रकाशित करना उसके द्वारा पाठकों को धोखा देना होगा |
    इस डिब्बी और योग के पूजन मात्र से घर में
    चोरी की सम्भावना कम हो जाती है
    ,किसी द्वारा पैसे
    हडपे जाने की संभावना कम होती है
    ,रात्रि में बुरे
    सपने नहीं आते
    ,दुष्ट व्यक्ति से भय कम हो जाता है और शत्रु
    भी मित्र बनने लगते हैं
    ,बुरा व्यक्ति भी प्यार करने लगता है ,उच्च लोग वशीभूत होते हैं ,स्त्री पुरुष वश में होते है ,भूत प्रेत बाधा दूर होती है ,दूसरों द्वारा धन
    प्राप्ति की संभावना बढती है
    ,विवाद मुकदमे परीक्षा प्रतियोगिता में विजय मिलती है ,व्यक्ति की समय के साथ अतीन्द्रिय शक्ति का विकास होने लगता है और अचानक
    निकली बातें सच होने लगती हैं
    ,शारीरिक कष्ट में
    कमी आती है
    |सूर्य की अशुभता शांत होती है और पित्र शांत
    होते हैं
    ,व्यक्ति का तेज बढने लगता है ,बल पौरुष की वृद्धि होती है |चन्द्रमा के दुष्प्रभाव शांत होते हैं और शरीर की कान्ति बढती है |मंगल के दोष मांगलिक आदि प्रभाव से हो रही परेशानी कम होने
    लगती है
    ,मांगलिक कार्यों विवाह आदि में आ रही अडचनें दूर होती हैं |बुध की
    अशुभता का प्रभाव कम होता है और उससे उत्पन्न समस्याओं का क्षरण होता है
    |वृहस्पति शांत होता है ,पित्र और विष्णु
    प्रसन्न होते हैं
    |शुक्र के दुस्प्राभावों में कमी आती है और शनि
    जनित समस्या में कमी आने लगती है
    |कालसर्प दोष के
    प्रभाव कम होने लगते हैं
    ,गंभीर और लम्बी बीमारियों से राहत की संभावना
    बढ़ जाती है
    |आकस्मिक दुर्घटनाओं ,अकाल मृत्यु की संभावना कम हो जाती है और इनसे होने वाली परेशानी में कमी
    आ जाती है
    |व्यक्ति का व्यक्तित्व आकर्षक होता है ,आस पास सम्पर्क में आने वाले लोग प्रभावित और
    वशीभूत होते हैं
    |वाणी की ओज बढ़ जाती है |तुतलाहट ,घबराहट ,हीन भावना ,चिंता ,शारीरिक मानसिक
    अवरोध में कमी आने लगती है
    |सुख समृद्धि क्रमशः बढती जाती है |आय के नए स्रोत बनते हैं ,सही समय सही निर्णय
    क्षमता का विकास होता है
    | यह हमारा व्यक्तिगत शोध है जिसे हमने अपने blog ,पर सर्वप्रथम प्रकाशित किया है |……………………………………………………….हर हर महादेव 

    READ MORE: महामंगलकारी ,सर्वकष्ट निवारक डिब्बी