Category: Spiritual Science
  • जीवन बदल सकता है इन जड़ों और वनस्पतियों से

    ये जड़ें और वनस्पतियाँ जीवन
    बदल देंगी [सर्वमंगल कारक ,सर्वसौख्य प्रदायक डिब्बी ]

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    मनुष्य का
    जीवन वनस्पतियों पर आश्रित है चाहे भोजन हो ,आवास हो अथवा वस्त्र |इन्ही पर समस्त
    जीव जंतु भी आश्रित हैं |यह इतना ही नहीं करते अपितु अलग अलग वनस्पति अलग अलग
    ग्रहों की रश्मियों को भी अधिक या कम मात्रा में अवशोषित करती है तथा अलग अलग
    ग्रहों के प्रभावों को भी संतुलित या प्रभावित करती है |यह भिन्न भिन्न दैवीय
    शक्तियों के गुणों का भी प्रतिनिधित्व करती हैं |भिन्न भिन्न वनस्पतियों में भिन्न
    भिन्न शक्तियों के तरंगों और उर्जाओं को अवशोषित और संगृहीत करने की क्षमता होती
    है |इनकी इन्ही सब विशेषताओं के कारण इनका ग्रहों की शान्ति के लिए भिन्न वनस्पति
    का भिन्न ग्रह के लिए उपयोग होता है |भिन्न दैवीय शक्ति के प्रतिनिधि रूप में
    भिन्न वृक्ष /वनस्पति की पूजा होती है |भिन्न ऊर्जा के रूप में भिन्न जड़ें धारण की
    जाती हैं |वृक्ष /वनस्पति में क्षमता होती है की यह व्यक्ति की भावना को भी पकडती
    हैं ,शब्दों के तरंग को भी पकडती हैं और व्यक्ति की क्रिया पर भी प्रतिक्रिया करती
    हैं |यह वैज्ञानिक रूप से भी प्रमाणित हो चूका है जिसे भारतीय सनातन ज्ञान हजारों
    वर्षों से कहता आया है |यह मनुष्य की भावना को एम्प्लीफायर की तरह वातावरण में
    विस्तार दे देती हैं और लक्ष्य तक पहुँचने में मदद देती हैं |इनके जलने से इनके
    गुणों के अनुसार विशिष्ट ऊर्जा उत्पन्न होती है जिसे उपयोग किया जाता रहा है वैदिक
    पूजन /आराधना में |
    तंत्र में भी
    और ज्योतिष में भी वनस्पतियों का उपयोग वैदिक काल से हो रहा है और यह सीधे
    प्रभावित करते हैं |तंत्र में इन पर विशेष अनुसंधान हुए हैं और इनका षट्कर्मो में
    भी उपयोग होता है और व्यक्तिगत साधना में भी |हवन में इनकी लकड़ियों का प्रयोग
    विशेष मन्त्रों के साथ विशेष ग्रह को अनुकूल करता है तो पूजन में इनकी जड़ों का
    उपयोग विशिष्ट मन्त्रों से विशिष्ट उर्जा संगृहीत भी करता है और उन्हें प्रक्षेपित
    भी करता है वातावरण में अपने गुण के अनुसार बदलकर ,जिससे विशेष शक्ति या ऊर्जा
    समूह के साथ व्यक्ति का जुड़ाव हो जाता है और उसके जीवन पर तदनुरूप प्रभाव पड़ता है
    |विशेष नक्षत्र में ,विशेष तिथि में ,विशेष मुहूर्त में विशेष वनस्पति के निष्कासन
    और प्राण प्रतिष्ठा /पूजन से विशिष्ट ऊर्जा का उस वनस्पति का जुड़ाव सामान्य दिनों
    की अपेक्षा अधिक होता है जिससे वह अधिक प्रभावकारी हो जाता है ,इसीलिए वनस्पतियों
    का एकत्रीकरण अथवा जड़ों का निष्कासन विशेष मुहूर्त और दिन में करने का निर्देश
    मिलता है |यहाँ तक की इनकी भावना पकड़ने के गुण के कारण एक दिन पूर्व इन्हें
    आमंत्रण भी दिया जाता है और निष्कासन में नुकीली अथवा लोहे की वस्तुओं का उपयोग भी
    नहीं किया जाता |
    तंत्र में
    गंभीर रूचि के कारण वनस्पति तंत्र पर हमारी गहरी दृष्टि रही है और इनका संतुलन
    बनाते हुए हमने अनेक प्रयोग किये हैं |हमारी बनाई चमत्कारी दिव्य गुटिका /डिब्बी
    ऐसे ही दुर्लभ जड़ी -बूटियों ,तंत्र की दुर्लभ सामग्रियों का संयुक्त संयोग रहा है
    जिसके बहुत अच्छे परिणाम मिलते हैं |इसके बाद हमने केवल वनस्पतियों के जड़ों पर
    अपनी खोज को केन्द्रित करते हुए इनके संयोग से ऐसा संयुक्त योग तैयार किया जो
    नवग्रह शांति ,उनके दुष्प्रभाव में कमी लाने के साथ ही भिन्न दैवीय शक्तियों का भी
    प्रतिनिधित्व करता है और व्यक्ति के जीवन की लगभग समस्त समस्याओं में लाभदायक होता
    है |हमने पाया है की –
    यदि ,रविवार
    को आकडे की लकड़ी और जड़ ,बेलपत्र का निचला मोटा भाग [पत्र मूल ],,,सोमवार को पलाश
    के फूल ,खिरनी की जड़ ,पलाश की लकड़ी ,,,मंगलवार को अनंत मूल की जड़ ,लाल चन्दन का
    टुकड़ा ,खैर की जड़ ,खैर की लकड़ी ,,,बुधवार को अपामार्ग का पत्ता ,जड़ और लकड़ी
    ,विधारा की जड़ ,सफ़ेद चन्दन की जड़ या लकड़ी ,दूब ,,,गुरूवार को पीपल की लकड़ी ,पिला
    चन्दन की जड़ या लकड़ी ,केले की जड़ ,असगंध की जड़ ,कुष की लकड़ी ,,,शुक्रवार को -गूलर
    की जड़ गूलर की लकड़ी ,सरपंखा की जड़ ,सफ़ेद पलाश के फूल ,,,शनिवार को शमी की जड़ ,शमी
    की लकड़ी ,बिछुआ पौधे की जड़ ,को लाकर उसी दिनों में विधिवत प्राण प्रतिष्ठित किया
    जाय और उस ग्रह के मन्त्रों से प्रतिदिन अभिमंत्रित करके इकठ्ठा करते हुए एक
    डिब्बी में रखते जाया जाय ,इसके बाद इनमे रवि पुष्य योग में निष्काषित -प्राण
    प्रतिष्ठित महायोगेश्वरी की जड़ ,सफ़ेद आक की जड़ ,धतूरा की जड़ ,दूब की जड़ ,पीपल की
    जड़ ,आम की जड़ ,बरगद की जड़ ,निर्गुन्डी की जड़ ,सहदेई की जड़ ,बेल का जड़ ,गूलर के
    पत्ते और जड़ ,नागदौन की जड़ ,हरसिंगार की जड़ ,अपराजिता की जड़ ,हत्था जोड़ी [एक जड़
    ],लघु नारियल को भी रख दिया जाय ,फिर गुरु पुष्य योग आने पर में कुष की जड़ ,केले
    की जड़ ,पीला चन्दन का जड़ या लकड़ी को भी प्राण प्रतिष्ठित -अभिमंत्रित कर इनके साथ
    मिला दिया जाय तो यह योग अद्भुत ,चमत्कारी प्रभाव देने वाला हो जाता है |इन्हें
    एकसाथ संयुक्त इकठ्ठा करके इसमें पीला पारायुक्त सिन्दूर डाल दिया जाता है और ऐसी
    व्यवस्था रखनी होती है की इसमें जल न जाए ताकि यह वनस्पतियाँ और जड़ें खराब न हों |
    उपरोक्त
    वनस्पतियों का योग सभी ग्रहों का वैदिक रूप से भी और तंत्रोक्त रूप से भी
    प्रतिनिधित्व करता है |देवताओं -देवियों में गणपति ,विष्णु ,शिव ,हनुमान
    ,दत्तात्रेय ,काली ,चामुंडा ,लक्ष्मी ,दुर्गा ,सरस्वती का भी प्रतिनिधित्व करता है
    |इनके अतिरिक्त अनेक स्थानीय शक्तियों ,यक्षिणीयों का भी प्रतिनिधित्व करता है |इस
    पर सभी प्रकार के पूजा और मंत्र जप किये जा सकते हैं |इसकी सामान्य पूजा भी किसी
    भी अन्य पूजा से अधिक लाभप्रद होती है |यह व्यक्ति के साथ ही सम्पूर्ण परिवार को
    सुखी रखता है |सबके ग्रह पीड़ा ,ग्रह दोष शांत होते हैं |घर की नकारात्मक ऊर्जा का
    क्षय होता है ,नकारात्मक शक्तियां ,भूत -प्रेत घर से पलायन कर जाते हैं |आर्थिक
    समृद्धि के मार्ग प्रशस्त होते हैं और आय के नए स्रोत उत्पन्न होते हैं |देवताओं
    की कृपा प्राप्त होती है |प्रतिदिन पूजन में सभी सामग्रियां बाहर ही अर्पित होती
    हैं मात्र पीला पारायुक्त सिन्दूर ही अन्दर डिब्बी में डाला जाता है |यह सिन्दूर
    चमत्कारी हो जाता है और इसका तिलक विजयदायी और सम्मोहक होता है |इस डिब्बी पर
    चामुंडा ,दुर्गा ,काली ,विष्णु ,हनुमान आदि के मंत्र तीव्र प्रभाव दिखाते हैं |इस
    डिब्बी के प्रभाव से जीवन के सभी पक्षों में उन्नति होती है |यद्यपि इस डिब्बी का
    निर्माण और जड़ों ,वनस्पतियों का एकत्रीकरण बेहद श्रमसाध्य ,समय लेने वाला और
    विशेषज्ञता वाला है किन्तु इसे थोड़ी ज्योतिष और तंत्र की समझ और जानकारी रखने वाला
    बना सकता है जिसे तंत्रोक्त प्रतिष्ठा और अभिमन्त्रण का ज्ञान हो |इससे वह खुद के
    साथ अनेकों का भला कर सकता है
    |इस डिब्बी और योग के बारे में अधिक जानकारी हमारे अगले अंकों में प्रकाशित होगी तथा इस डिब्बी का नाम हमने सर्वसौख्य प्रदायक डिब्बी या महा मंगलकारी डिब्बी रखा है |……………………………………………….हर हर महादेव

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  • वशीकरण तंत्र [Vashikaran Tantra] :: कैसे काम करता है ?

    :::कैसे कार्य करता है वशीकरण तंत्र
    प्रयोग 
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    किसी को अपने प्रति या किसी अन्य के प्रति वशीभूत, अर्थात वश में , अर्थात अधीन कर लेना या कर देना वशीकरण होता है ,चाहे वह देवता हो ,मनुष्य हो या पशुपक्षी |वशीकरण शारीरिक ,मानसिक तरंगों पर आधारित एक प्रक्रिया है जो अपने एक निश्चित विज्ञान के आधार पर कार्य करता है ,,इसमें लक्ष्य किये गए व्यक्ति में मानसिकशारीरिकरासायनिक और तरंगीय परिवर्तन होने से उसकी रुचियो ,स्वभाव ,पसंदनापसंद में परिवर्तन हो जाता है और वह प्रयोगकर्ता के अनुकूल हो उसके वशीभूत हो जाता है ,,हार्मोन्सफेरोमिंस के प्रति आकर्षण परिवर्तित हो जाता है ,अवचेतन मन प्रभावित हो जाता है ,उसे प्रयोगकर्ता के साथ रहना ,उसकी गंध,उसके कार्य,,उसका स्वभाव ,इतना अच्छा लगने लगता है की वह उससे दूर नहीं रहना चाहता और इस प्रकार वह प्रयोगकर्ता की सभी बाते मानने लगता है |
           वशीकरण की कार्यप्रणाली तरंगों पर आधारित है ,इसमें तांत्रिक वस्तुओ की ऊर्जा और तरंगों को मानसिक शक्ति और निश्चित भाव के साथ एक निश्चित लक्ष्य पर प्रक्षेपित किया जाता है |जब व्यक्ति विशेष के लिए प्रबल मानसिक बल से तरंगों और उर्जा का प्रक्षेपण किया जाता है तो यह लक्षित व्यक्ति के ऊर्जा परिपथ ,मष्तिष्क और अवचेतन मन को प्रभावित करता है और वहा परिवर्तन होने लगता है ,इसमें तंत्रिकीय वस्तुए ऊर्जा बढाने वाली ,परिवर्तन करने वाली ,वशीकरण की तीब्रता बढाने वाली और समय में शीघ्रता लाने वाली होती है |जबकि लक्ष्य के कपडे ,बाल ,चित्र या उपयोग की हुई वस्तुए उसके शरीर में तरंगों को पकड़ने और ग्रहण करने का माध्यम बन जाते है |यहाँ मूल शक्ति प्रयोगकर्ता की मानसिक शक्ति होती है |मंत्र और हवनीय द्रव्य ऊर्जा उत्पन्न करने वाले ,लक्ष्य पकड़ने वाले और कार्य से किसी ऊर्जा शक्ति को जोड़ने वाले होते है |वशीकरण केवल मंत्र से ,,मंत्र के साथ व्यक्ति की उपयोग की हुई वस्तुओ के प्रयोग के साथ ,अथवा अभिमंत्रित वास्तु के खिलानेपिलाने से भी हो सकता है ,|सामान्यतया व्यक्ति जो भी खाता है वह पचाकर निकल जाता है ,किन्तु जब किसी वस्तु विशेष को अभिमंत्रित करके खिलाया जाता है तो वह पचता नहीं [यह विज्ञान के नियमों के प्रतिकूल हो सकता है पर होता है ऐसा ]और पेट के किसी कोने में पड़ा रहता है ,साथ ही उसका प्रभाव भी बना रहता है ,जब तक की विशिष्ट तांत्रिक क्रिया से उस वस्तु को निकला जाए |इस प्रकार व्यक्ति किसी अन्य के प्रति वशीभूत रहता है ,,कभीकभी वह अपने स्वभाव ,कुलखानदान,परिवार से अलग भी किसी के वशीभूत हो सकता है ,सबकी अवहेलना कर सकता है ,क्योकि उसकी स्थिति ..दिल लगी दीवार से तो पारी क्या चीज है वाली हुई हो सकती है ,,वह  क्रिया के प्रभाव में हो सकता है |

       वशीकरण ऐसा तांत्रिक षट्कर्म है जिसका सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों होता है ,,अपने किसी बिगड़े को सुधारने के लिए इसका उपयोग उचित कहा जा सकता है ,पर किसी को स्वार्थवश वशीभूत करना दुरुपयोग है ,,जानकारों को इसपर विशेष ध्यान और सावधानी रखनी चाहिए ……………………………………………………………………हरहर महादेव
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  • शक्तिपीठ क्या होते हैं ?

    ::::::::::::शक्तिपीठ ::::::::::::::

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    शक्ति पीठ ऐसे स्थल होते हैं जो स्वयं सिद्ध होते हैं और वहाँ पर दैवीय शक्तियों कि प्रचुरता होती है तथा साथ ही वहाँ पर किये जप या साधनात्मक कार्य आश्चर्यजनक रूप से अन्य सामान्य स्थलों कि अपेक्षा शीघ्र फलीभूत होते हैं अक्सर देखने में आता है कि कई साधक ऐसे होते हैं कि बार बार साधना करते हैं लेकिन उनकी साधनाएं सफल होती हैं और सिद्धियाँ ऐसे साधकों को कम से कम एक बार किसी शक्तिपीठ में जाकर अपनी साधना सम्पन्न करनी चाहिए इसके पश्चात् उन्हें इनका महत्व खुद ही पता चल जायेगा |
    पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि जिस समय राजा दक्ष के यज्ञ में सती ने छुभित होकर आत्मदाह कर लिया और इस सम्बन्ध में जो शिवगण माता सती के साथ गए थे जब उन्होंने उपद्रव शुरू किया तो राजा दक्ष के सैनिकों के द्वारा उन्हें बलपूर्वक यज्ञस्थल से बहार निकाल दिया गया जब यह समाचार भगवान् शिव को मिला तो उन्होंने क्रोधातिरेक से अपनी जटाओं कि एक लट को पत्थर पर पटक दिया जिससे वीरभद्र नमक एक अति तामसी गण का प्रादुर्भाव हुआ भगवान शिव कि इच्छा समझकर उस गण ने जाकर दक्ष के यज्ञ का भंग कर दिया –! इसके पश्चात् भगवान् शिव सती का पार्थिव शरीर लेकर अखिल ब्रह्माण्ड में चक्कर लगाने लगे उनके वेग और क्रोध से समस्त ब्रह्माण्ड का अस्तित्व खतरे में गया तब देवताओं ने भगवान् विष्णु कि प्रार्थना कि जिसके जवाब में भगवान् विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के पार्थिव शरीर को छिन्नभिन्न कर दिया और वे टुकड़े जहाँ जहाँ पर गिरे वही एक शक्तिपीठ कहलाया इस तरह से कुल ५१ इक्यावन शक्तिपीठों का अस्तित्व बना |

    शक्तिपीठ , द्वादश ज्योतिर्लिंग और देव स्थान आदि पर गहन चिंतन करें तो हम पाते हैं की समस्त प्रकृति दो प्रकार के गुणों [आवेशो, प्रकृतियों ] के आपसी संयोग से निर्मित होती है ,यहाँ तक की ब्रह्माण्ड के समस्त चराचर |यह है धनात्मक और ऋणात्मक गुण |शक्तिपीठ में ऋणात्मक प्रकृति के गुण की अधिकता होती है |यह ऐसे स्थानों पर निर्मित हैं जहाँ से ऋणात्मक गुणों ,आवेशों ,प्रकृतियों की तरंगें धरती से अधिक मात्र में निकलती है ,प्रकृति से अधिक मात्र में वहां संघनित होती हैं ,जिससे उनकी प्राप्ति वहां से अधिक मात्र में संभव है |चुकी सभी देवियाँ ,स्त्रियाँ ऋणात्मक गुण का प्रतिनिधित्व करती हैं अतः शक्तिपीठ देवी स्थान होते हैं और वहां इनकी शक्ति सिद्धि अधिक आसान होती है |इनके साथ धनात्मक गुण अर्थात देवता अवश्य जुड़े होते हैं अतः इनके वहां भिन्न भैरव निर्धारित हैं |……………………………………………………हरहर महादेव 

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  • संग्रीला घाटी [Sangrila Ghati]:: एक रहस्य लोक

    संग्रीला घाटी ::पृथ्वी का आध्यात्मिक नियंत्रण केंद्र

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    चीन के भारत
    पर आक्रमण का कारण
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    संग्रीला घाटी सामान्य
    जन के लिए अनजान जगह हो सकती है ,किन्तु उच्च स्तरीय अध्यात्म क्षेत्र से जुड़ा
    व्यक्ति इससे अनजान नहीं रह सकता ,फिर वह चाहे वह व्यक्ति योग से जुड़ा हो ,
    tantra से जुड़ा हो अथवा किसी तरह के अध्यात्म क्षेत्र से जुड़ा हो ,हाँ
    उसकी स्थिति उच्च अवश्य होनी चाहिए |यह घाटी भारत ही नहीं पूरे विश्व के अध्यात्म
    जगत का नियंत्रण और पथ प्रदर्शक क्षेत्र है ,साथ ही यह सामान्य व्यक्ति की दृष्टि
    से देखा भी नहीं जा सकता | न इसे कोई देख सकता है न वहां जा सकता है ,जब तक की
    वहां रहने वाले सिद्ध न चाहें |यहाँ तक की पूरी चीनी सेना खोज कर थक गई किन्तु इस
    क्षेत्र को न खोज पायी |
    जिस प्रकार वायु मंडल में बहुत से स्थान हैं जहाँ वायु शून्यता रहती है,उसी प्रकार इस धरती पर अनेक ऐसे स्थान है जो भू हीनता के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं। भू हीनता और वायु शून्यता वाले स्थान चौथे आयाम से प्रभावित होते हैं। ऐसे स्थान देश और काल से परे होते हैं। यदि उनमें कोई वस्तु या व्यक्ति अनजाने में चला जाय तो इस तीन आयाम वाले स्थूल जगत में उसका अस्तित्व लुप्त हो जाता है। वह वस्तु इस दुनिया से गायब हो जाती है।
    आपने सुना होगा ,समाचार पत्रों में पढ़ा होगा की बरमूढा
    त्रिकोनाकृति एक ऐसा समुद्र में स्थान है जहाँ कोई पानी का जहाज चला जाय या उसके
    ऊपर आकाश में हवाई जहाज़ चला जाय तो एकाएक वह गायब हो जायेगा। वह स्थान भू हीनता के
    क्षेत्र में आता है।
    ऐसी ही तिब्बत और अरुणांचल की सीमा स्थित
    संग्रिला घाटी है। लेकिन भू हीनता और चौथे आयाम से प्रभावित होने के कारण वह घाटी
    अभी तक रहस्यमयी बानी हुई है। वह इन चर्म चक्षुओं से दिखाई नहीं देती है। ऐसा माना
    जाता है कि इस घाटी का सम्बन्ध अंतरिक्ष के किसी लोक से है।
    इस विषय से सम्बंधित एक प्राचीन पुस्तक हैकाल
    विज्ञान। तिब्बती भाषा में लिखी यह पुस्तक तवांग मठ के पुस्तकालय में विद्यमान है।
    काल विज्ञान के अनुसार इस तीन आयाम वाली दुनियां की हर चीज़ देश
    ,काल और निमित्त से बंधी हुई है। लेकिन संग्रीला घाटी में काल नगण्य है।
    वहां प्राण
    ,मन और विचार की शक्ति एक विशेष सीमा तक बढ़
    जाती है। शारीरिक क्षमता और मानसिक चेतना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।
    काल की नगण्यता के फलस्वरूप वहां आयु अति धीमी गति से बढ़ती है। यदि किसी
    व्यक्ति ने उसमे
    25 वर्ष की उम्र में प्रवेश किया है तो उसका
    शरीर लंबे समय तक युवा बना रहेगा।
    स्वर्ग जैसी वातावरण
    में डूबी हुई यह घाटी एक कालंजयी की इच्छा सृष्टि है। जो लोग इस घाटी से परिचित
    हैं उनका कहना है कि प्रसिद्द योगी श्यामा चरण लाहिड़ी के गुरु अवतारी बाबा
    जिन्होंने आदि शंकराचार्य को भी दीक्षा दी थी
    ,संग्रीला
    घाटी के किसी सिद्ध आश्रम में अभी भी निवास कर रहे हैं। जब कभी आकाश मार्ग से चल
    कर अपने शिष्यों को दर्शन भी देते हैं।
    यहाँ के तीन साधना केंद्र प्रसिद्द हैं। पहला है-“ज्ञानगंज मठ“, दूसरा है-“सिद्ध विज्ञान आश्रमऔर तीसरा है-” योग सिद्धाश्रम। यहाँ पर
    दीर्घजीवी
    ,कालंजयी योगी अपने आत्म शरीर से निवास करते
    हैं ।सूक्ष्म शरीर से विचरण करते हैं और कभी कदा स्थूल शरीर भी धारण कर लेते हैं।
    स्वामी विशुद्धानन्द परमहंस जो सूर्य विज्ञान में पारंगत थे ज्ञानगंज मठ से जुड़े
    हुए थे।
    इस संग्रीला घाटी में रहने वाले योगी आचार्य
    गण संसार के योग्य शिष्यों को खोज खोज कर इस घाटी में लाते हैं और उन्हें दीक्षा
    देकर पारंगत बना कर फिर इसी संसार में ज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए भेज देते
    हैं।
    इन तीनों आश्रमों के आलावा वहाँ तंत्र के भी
    अनेक केंद्र हैं जहाँ उच्च कोटि के कापालिक और शाक्त साधक निवास करते हैं। इसी
    प्रकार बौद्ध लामाओं के भी वहां मठ हैं। उनमें रहने वाले साधक स्थूल जगत के
    निवासियों से अपने को गुप्त रखे हुए हैं।
    संग्रीला
    घाटी में प्रवेश करने वाले एक योगी साधक के अनुभव के अनुसार
    वहां न सूर्य का प्रकाश है और न चाँद की चांदनी। वातावरण में एक दूधिया
    प्रकाश फैला हुआ है जो कहाँ से आ रहा है इसका पता किसी को नहीं है। एक अनिर्वचनीय
    सुंदरता और शांति का साम्राज्य है वहां। यह सम्पूर्ण घाटी एक महान योगी की इच्छा
    शक्ति के वशीभूत है।
    मैंने लामा के साथ उस आश्रम में प्रवेश किया तो मुंह बाये उस
    महान् योगी की कृति देखता ही रह गया। तभी वहां एक अद्भुत घटना घटी। मैंने देखा कि
    न जाने कहाँ से दर्जनों युवतियां वहां आ गईं। आश्चर्य की बात यह थी कि सभी की आयु
    बराबर थी। रूप
    ,रंग और कद भी समान था। 16 वर्ष की आयु से अधिक की नहीं थी वे। सभी के बाल खुले हुए थे ।शरीर पर
    गेरुये रंग की रेशमी साड़ियां थी और गले में स्फटिक की मालाएं पड़ी हुई थी। सभी के
    चहरे अपूर्व तेज से दमक रहे थे और एक विलक्षण शांति छाई थी वहां पर।
    युवतियों के
    हाव भाव से ऐसा लग रहा था कि वे किसी के आने की प्रतीक्षा कर रही हैं। मेरा अनुमान
    गलत नहीं था। थोड़ी ही देर बाद देखा की एक तेज पुंज सहसा वहां प्रकट हुआ। अद्भुत था
    वह प्रकाश पुंज
    ! प्रकाश पुंज धीरे धीरे आश्रम के भीतर के ओर
    जाने लगा। युवतियां भी उसके पीछे पीछे चलने लगीं। मेरे उस लामा से पूछने पर उसने
    बताया कि यह आत्म शरीर है। योगियों का आत्म शरीर ऐसा ही होता है। यह आत्म शरीर उसी
    परम योगी का है जिसकी यह अलौकिक सृष्टि है यह घाटी
    ! ये युवतियां योग कन्यायें हैं। कई जन्मों की
    साधना के बाद इन्होंने इस दिव्य अवस्था को प्राप्त किया है। योग में इसी को कैवल्य
    अवस्था कहते हैं। ये सब भी आत्म शरीर धारिणी हैं। लेकिन विशेष अवसर के कारण
    इन्होंने भौतिक देह की रचना कर ली है।
    आत्म शरीर को
    उपलब्ध योगत्माएँ इच्छा अनुसार कभी भी भौतिक देह की रचना कर सकती हैं।
    यह
    एक सामान्य विवरण है |इस घाटी के सम्बन्ध
    में अनेक लेखकों ने ,योगियों ने चर्चा की है ,किन्तु वास्तव में यहाँ से जुड़ने
    वाला इसके बारे में नहीं बताता |भारत के कुछ तथाकथित स्वयंभू गुरुओं -लेखकों ने तो
    खुद को इस घाटी अथवा इसमें स्थित आश्रमों से जोडकर अनेक कहानियां प्रचारित कर राखी
    हैं ,अथवा खुद को वर्षों वहां साधना किया हुआ बताया है अपनी पुस्तकों में |पर यह
    उनकी आत्म प्रशंशा मात्र है |सोचने वाली बात है जिस जगह को कोई सामान्य साधक जान
    नहीं सकता ,उच्च साधक भी अपनी इच्छा से देखा नहीं सकता ,ऐसी जगह ये लेखक और मामूली
    साधक जाकर साधना कर आयें और बताते भी रहें ,बात कुछ हजम नहीं होती |इस अवस्था को
    पहुंचा साधक जो वहां जा सके और साधना कर सके ,वापस आकर ज्ञान और साधना का प्रकाश
    फैलाएगा जरुर किन्तु आत्म प्रशंशा अथवा उस जगह के बारे में कदापि नहीं बताएगा |कुछ
    लोगों ने तो इन आश्रमों से मिलते जुलते नाम वाले आश्रम भी बना रखे हैं ,जबकि
    इन्हें गुरु तक की मान्यता नहीं मिली |खैर यह एक अलग विषय है |
    यह घाटी तो है ,क्योकि
    अनेकानेक योगियों और
    tantra गुरुओं द्वारा इनका कहीं न कहीं उल्लेख मिलता
    है |यह घाटी ही चीन के भारत पर आक्रमण का कारण रही है ,अन्यथा चीन को पहाड़ों में
    क्या मिलता ,वह उतने के बाद ही क्यों रुक जाता |कमजोर भारतीय सेना को कुचलते वह
    भारत पर भी नियंत्रण कर सकता था ,हिमांचल ,अरुणांचल तो कम से कम ले ही सकता था ,किन्तु
    उसने कोई राज्य नहीं लिया ,उन क्षेत्रों पर ही आधिपत्य किया जहाँ इस क्षेत्र के
    होने की समभावना है |माओ को अपनी आयु बढाने और चिरंजीवी होने की सनक थी और वह इस
    क्षेत्र पर कब्जा करके मृत्यु मुक्त होना चाहता था |
    विवरण
    के अनुसार चीन को पता था की संगरीला घाटी सिद्ध लामाओं ,तांत्रिकों ,योगियों का केंद्र है |यह जो चाहते हैं
    वही होता है |अतः वह बलात इसपर नियंत्रण करना चाहता था |उसकी सेना एक लामा का पीछ
    करते हुए भारत में घुसी थी |जिस क्षेत्र में उस लामा के गायब होने की आशंका थी
    वहां वहां चीन ने आक्रमण कर दिया क्योकि उसका मानना था की वह लामा इस क्षेत्र को
    जानता है |बहुत दिनों चीन की सेना ने इन क्षेत्रों के चप्पे चप्पे को छाना किन्तु
    यह उनकी दृष्टि में नहीं आया |उन क्षेत्रों पर आजतक उसने कब्जा जमाये रखा है |जब
    वहां यह क्षेत्र नहीं मिल रहा तो उसका संदेह है की सिक्किन अथवा अरुणांचल में यह
    क्षेत्र हो सकता है ,अतः गाहे बगाहे इन क्षेत्रों को अपना बताता रहता है |

    यह संग्रीला घाटी की
    अलौकिकता है जो चीन को परेशान किये हुए है |यहाँ केवल भारत ,तिब्बत ,चीन ही नहीं
    पूरे विश्व के अलौकिक ऊर्जा संपन्न साधकों को मार्गदर्शन मिलता है ,चाहे वह किसी
    धर्म के हों |यहाँ अनेकानेक ऐसे साधक -योगी होते हैं जो हजारों हजार साल से साधना
    रत होते हैं |उन पर आयु का कोई प्रभाव नहीं होता |हम सब ने अनेक कथाओं कहानियों
    में सुना है की अमुक योगी -महात्मा -साधू हिमालय पर तप करने चला गया |सोचिये वह
    हिमालय के बर्फ में कहाँ जाएगा |वह एक निश्चित योग्यता प्राप्त कर यहाँ बुला लिया
    जाता है आगे की साधना और मार्गदर्शन के लिए |यहाँ से पूर्णता प्राप्त कर कुछ वापस
    भी लौट आते हैं और यहाँ के साधकों का मार्गदर्शन करते हैं |यह क्षेत्र मानसरोवर -कैलाश
    के आसपास है ,जिसे शिव का वासस्थान माना जाता है |किन्तु दृष्टव्य नहीं है |अलुकिक
    उर्जा से घिरा और अदृश्य है |दृष्टव्य क्षेत्र में स्वर्ग की सीढियां भी मिली हैं |महाभारत
    बाद इसी क्षेत्र में पांडव भी गए |संभव है उस क्षेत्र में ही गए हों |जो भी हो पर
    निर्विवाद रूप से यह क्षेत्र तो है जो हरेक उच्च स्तर के साधकों का मार्गदर्शक
    होता है और जिन्हें इस घाटी के सिद्ध स्वयं खोज लेते हैं |……………………………………………………..हर
    हर महादेव 

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  • साधना क्या है ? यह कितने प्रकार का होता है ?

    साधनाओं
    के प्रकार और उनकी विशिष्टता
       

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                 शास्त्रों में हजारों तरह की साधनाओं का वर्णन मिलता है. साधना से सिद्धियां प्राप्त होती हैं. व्यक्ति सिद्धियां इसलिए प्राप्त करना चाहता है, क्योंकि या तो वह उनसे सांसारिक लाभ प्राप्त करना चाहता है या फिर आध्यात्मिक लाभ. मूलत: साधना के चार प्रकार माने जा सकते हैं तंत्र साधना, मंत्र साधना, यंत्र साधना और योग साधना.| चारो ही तरह की साधना के कई उपभेद हैं. आइये जानते हैं साधना के विविध तरीके उनसे प्राप्य लाभ.
    तांत्रिक साधना :
    ——————  तांत्रिक साधना दो प्रकार की होती हैएक वाम मार्गी तथा दूसरी दक्षिण मार्गी.| वाम मार्गी साधना बेहद कठिन है.| वाम मार्गी तंत्र साधना में छह प्रकार के कर्म बताये गये हैं, जिन्हें षट कर्म कहते हैं.– शांति, वक्ष्य, स्तम्भनानि, विद्वेषणोच्चाटने तथा. गोरणों तनिसति षट कर्माणि मणोषण:
    अर्थात शांति कर्म, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन, मारण. ये छह तांत्रिक षट कर्म बताये गये हैं. इनके अलावा नौ प्रयोगों का वर्णन भी है :
    मारण मोहनं स्तम्भनं विद्वेषोच्चाटनं वशम्. आकर्षण यिक्षणी चारसासनं कर त्रिया तथा॥
     मारण, मोहनं, स्तंभनं, विद्वेषण, उच्चाटन, वशीकरण, आकर्षण, यक्षणी साधना, रसायन क्रिया तंत्र के ये नौ प्रयोग हैं.
    रोग कृत्वा गृहादीनां निराण शिन्तर किता.
    विश्वं जानानां सर्वेषां निधयेत्व मुदीरिताम्॥
    पूधृत्तरोध सर्वेषां स्तम्भं समुदाय हृतम्.
    स्निग्धाना द्वेष जननं मित्र, विद्वेषण मतत॥
    प्राणिनाम प्राणं हरपां मरण समुदाहृमत्.
    जिससे रोग, कुकृत्य और ग्रह आदि की शांति होती है, उसको शांति कर्म कहा जाता है और जिस कर्म से सब प्राणियों को वश में किया जाये, उसको वशीकरण प्रयोग कहते हैं तथा जिससे प्राणियों की प्रवृत्ति रोक दी जाए, उसको स्तंभन कहते हैं तथा दो प्राणियों की परस्पर प्रीति को छुड़ा देने वाला नाम विद्वेषण है और जिस कर्म से किसी प्राणी को देश आदि से पृथक कर दिया जाए, उसको उच्चाटन प्रयोग कहते हैं तथा जिस कर्म से प्राण हरण किया जाए, उसको मारण कर्म कहते हैं.
    * मंत्र साधना :
    —————-  मंत्र साधना भी कई प्रकार की होती है. मंत्र से किसी देवी या देवता को साधा जाता है और मंत्र से किसी भूत या पिशाच को भी साधा जाता है. मंत्र का अर्थ है मन को एक तंत्र में लाना. मन जब मंत्र के अधीन हो जाता है तब वह सिद्ध होने लगता है. मंत्र साधना भौतिक बाधाओं का आध्यात्मिक उपचार है.
    * मुख्यत: तीन प्रकार के मंत्र होते हैं– 1. वैदिक मंत्र 2. तांत्रिक मंत्र और 3. शाबर मंत्र.
    * मंत्र जप के भेद– 1. वाचिक जप, 2. मानस जप और 3. उपाशु जप.
    वाचिक जप में ऊंचे स्वर में स्पष्ट शब्दों में मंत्र का उच्चारण किया जाता है. मानस जप का अर्थ है मन ही मन जप करना. उपांशु जप में जप करने वाले की जीभ या ओष्ठ हिलते हुए दिखाई देते हैं लेकिन आवाज नहीं सुनायी देती. बिल्कुल धीमी गति में जप करना ही उपांशु जप है.
    * मंत्र नियम : मंत्रसाधना में विशेष ध्यान देने वाली बात हैमंत्र का सही उच्चारण. दूसरी बात जिस मंत्र का जप अथवा अनुष्ठान करना है, उसका अर्घ पहले से लेना चाहिए. मंत्र सिद्धि के लिए आवश्यक है कि मंत्र को गुप्त रखा जाये. प्रतिदिन के जप से ही सिद्धि होती है.
    किसी विशिष्ट सिद्धि के लिए सूर्य अथवा चंद्रग्रहण के समय किसी भी नदी में खड़े होकर जप करना चाहिए. इसमें किया गया जप शीघ्र लाभदायक होता है. जप का दशांश हवन करना चाहिए और ब्राह्मणों या गरीबों को भोजन कराना चाहिए.
    * यंत्र साधना :
    —————— यंत्र साधना सबसे सरल है. बस यंत्र लाकर और उसे सिद्ध करके घर में रखने पर अपने आप कार्य सफल होते जायेंगे. यंत्र साधना को कवच साधना भी कहते हैं. यंत्र को दो प्रकार से बनाया जाता है अंक द्वारा और मंत्र द्वारा. यंत्र साधना में अधिकांशत: अंकों से संबंधित यंत्र अधिक प्रचलित हैं. श्रीयंत्र, घंटाकर्ण यंत्र आदि अनेक यंत्र ऐसे भी हैं जिनकी रचना में मंत्रों का भी प्रयोग होता है और ये बनाने में अति क्लिष्ट होते हैं.
    इस साधना के अंतर्गत कागज अथवा भोजपत्र या धातु पत्र पर विशिष्ट स्याही से या किसी अन्यान्य साधनों के द्वारा आकृति, चित्र या संख्याएं बनायी जाती हैं. इस आकृति की पूजा की जाती है अथवा एक निश्चित संख्या तक उसे बारबार बनाया जाता है. इन्हें बनाने के लिए विशिष्ट विधि, मुहूर्त और अतिरिक्त दक्षता की आवश्यकता होती है.
    यंत्र या कवच भी सभी तरह की मनोकामना पूर्ति के लिए बनाये जाते हैं जैसे वशीकरण, सम्मोहन या आकर्षण, धन अर्जन, सफलता, शत्रु निवारण, भूत बाधा निवारण, होनीअनहोनी से बचाव आदि के लिए यंत्र या कवच बनाये जाते हैं.
    * दिशा: प्रत्येक यंत्र की दिशाएं निर्धारित होती हैं. धन प्राप्ति से संबंधित यंत्र या कवच पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके रखे जाते हैं तो सुखशांति से संबंधित यंत्र या कवच पूर्व दिशा की ओर मुंह करके रख जाते हैं. वशीकरण, सम्मोहन या आकर्षण के यंत्र या कवच उत्तर दिशा की ओर मुंह करके, तो शत्रु बाधा निवारण या क्रूर कर्म से संबंधित यंत्र या कवच दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके रखे जाते हैं. इन्हें बनाते या लिखते वक्त भी दिशाओं का ध्यान रखा जाता है.
    * योग साधना :
    —————–  सभी साधनाओं में श्रेष्ठ मानी गयी है योग साधना. यह शुद्ध, सात्विक और प्रायोगिक है. इसके परिणाम भी तुरंत और स्थायी महत्व के होते हैं. योग कहता है कि चित्त वृत्तियों का निरोध होने से ही सिद्धि या समाधि प्राप्त की जा सकती है. योगिश्चत्तवृत्तिनिरोध:

    मन, मस्तिष्क और चित्त के प्रति जाग्रत रहकर योग साधना से भाव, इच्छा, कर्म और विचार का अतिक्रमण किया जाता है. इसके लिए यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार ये 5 योग को प्राथमिक रूप से किया जाता है. उक्त 5 में अभ्यस्त होने के बाद धारणा और ध्यान स्वत: ही घटित होने लगते हैं. योग साधना द्वारा अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति की जाती है. सिद्धियों के प्राप्त करने के बाद व्यक्ति अपनी सभी तरह की मनोकामना पूर्ण कर सकता है.|…………………………………………………….हरहर महादेव 
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  • कमियों /बुराइयों /दोष /दुर्गुण को भी हटाया जा सकता है उच्चाटन क्रिया से

    बिगड़े अथवा असम्मानजनक प्यारमुहब्बत में पड़े को सुधारें उच्चाटन क्रिया से

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     अक्सर सुनने में आता है की संतान अथवा बच्चा बिगड़ रहा है या बिगड़ गया है ,बात नहीं मानता ,गलत आदतों का शिकार हो गया है ,गलत सांगत में पड़ गया है ,गलत या अनुचित कार्य ही उसे पसंद आते हैं |परिवार -खानदानमाँबाप  की प्रतिष्ठा को ठेस पंहुचा रहा है ,अपना भविष्य बिगाड़ रहा है | दुर्जनों के बहकावे में आ जा रहा है ,माँबाप या परिवार के विरोधियों के भड़काने में आकर अपने ही लोगों को अपना दुश्मन समझ रहा है ,अपने लोगों की अवहेलना कर रहा है ,अनुचित कार्यों -प्यारमुहब्बत में रूचि ले रहा है जिसके परिणामों की उसे समझ नहीं रही ,सम्मान की चिंता नहीं है ,भविष्य की चिंता नहीं है ,|यह आज के समय में बहुत अधिक दिख रहा है ,जिसके अनेक कारण है ,नैतिकता का पतन,संस्कार हीनता ,नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव ,कुलदेवता/देवी दोष आदि अनेकानेक  कारण हैं इनके और अक्सर रोकथाम के उपाय या समझाना व्यर्थ जाता है |कभी कभी ऐसा भी होता है की हमारे किसी प्रिय यथा पतिपत्नीसंतान आदि पर कोई अन्य व्यक्ति तांत्रिक अभिचार यथा वशीकरण आदि करके अपने अनुकूल कर लेता है और हमारा प्रिय व्यक्ति हमसे विमुख हो उससे जुड़ने और उसकी बात मानने लगता है |किसी अन्य के प्यार में पड़कर अपनों को छोड़ने पर आमादा हो जाता है |अपनों के कष्ट और भावनाएं उसे नहीं दीखते हैं |इस प्रकार के मामले किसी के भी साथ हो सकते हैं |स्त्रीपुरुषबालकबालिका सभी में किन्ही परिवारों में यह देखा जाता है |यह स्थिति परिवारीजन या सम्बंधित व्यक्ति से जुड़े लोगों के लिए बहुत कष्टकारक होती है |

    इस तरह की समस्याओं के निदान और पारिवारिक शांतिसंतुष्टिसमझ बनाये रखने के अनेक उपाय तंत्र में हैं |इनमे उच्चाटन भी एक क्रिया है जो तांत्रिक षट्कर्म के अंतर्गत आती है |यह क्रिया किसी के मन , स्थिति , समस्या ,स्थान ,व्यक्ति सम्बन्ध आदि को उच्चाटित करने के लिए की जाती है |यह क्रिया किसी भी समस्या पर की जा सकती है जिसमे अलगाव की आवश्यकता हो |समस्या विशेष के साथ मंत्र -विधिप्रक्रिया और वस्तु बदल जाते हैं |इस क्रिया में विभिन्न शक्तियों और वस्तुओं की उर्जा का उपयोग समस्या विशेष के अनुसार किया जाता है |किसी के प्रति किसी पर यह क्रिया कर देने पर उसके प्रति व्यक्ति का मन उचट जाता है |किसी समस्या के प्रति क्रिया कर देने पर उस समस्या या आदत के प्रति मन उचट जाता है |नशे आदि के प्रति मन उचट जाता है यदि इस समस्या के लिए विशिष्ट क्रिया कर दी जाए तो |उच्चाटन की क्रिया से ग्रह बाधा का उच्चाटन ,नकारात्मक ऊर्जा का उच्चाटन आदि भी हो सकता है |इस विधा से किसी के द्वारा किये गए तांत्रिक अभिचार आदि अथवा वशीकरण आदि के प्रभाव का भी उच्चाटन हो सकता है |किसी का किसी पर अनुचित प्रभाव हटाया जा सकता है |प्रभाव के उच्चाटन पर व्यक्ति अपने दिमाग से अच्छा बुरा समझने लगता है और सुधर जाता है |सम्बंधित व्यक्ति या समस्या के प्रति जब मन उच्चाटित ही जाता है तो वह छूट जाता है और व्यक्ति समस्या या प्रभाव से मुक्त हो जाता है |इस क्रिया का दुरुपयोग भी हो सकता है अतः कोई प्रक्रिया सार्वजनिक रूप से नहीं दी जा सकती |यदि किसी के यहाँ ऐसी कोई समस्या हो तो किसी अच्छे तंत्र के जानकार से संपर्क करना चाहिए और उसके बताये अनुसार चलना चाहिए |वह आपको कुछ क्रियाएं बता भी सकता है और कुछ स्वयं कर सकता है ,जो सम्बंधित समस्या के लिए निर्दिष्ट  होते हैं |प्रक्रिया करने पर सम्बंधित समस्या समाप्त हो जाती है |………………………………………………………………हरहर महादेव 

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