Category: Tona-Totka and Tantra Abhichar
  • भूत -प्रेत से बचाव के उपाय

    भूत -प्रेत से बचाव के उपाय

    भूत -प्रेत ,वायव्य बाधाओं और तांत्रिक अभिचार से बचाव के उपाय

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                  भूत-प्रेत ,वायव्य बाधाएं अथवा तांत्रिक अभिचार व्यक्ति की शारीरिक क्षमता के साथ ही आर्थिक क्षमता पर भी प्रभाव डालते हैं ,इनके कारण पारिवारिक ,दाम्पत्य सम्बन्धी और संतान सम्बन्धी समस्याएं भी हो सकती हैं ,कभी कभी ये गंभीर रोग भी उत्पन्न करते है और मृत्यु का कारण बन जाते है अथवा दुर्घटनाएं करा कर व्यक्ति की मृत्यु के कारण बनते हैं ,कभी कभी इनके कारण शरीर की स्थिति में परिवर्तन हो जाता है और व्यक्ति विकलांग हो सकता है ,मूक-बधिर जैसा हो सकता है ,दौरे आ सकते हैं ,गूम-सुम हो सकता है ,सोचने -समझने अथवा चलने-फिरने में अक्षम हो सकता है ,कुछ शक्तियां व्यक्ति को गलत कार्यों के लिए प्रेरित करती हैं ,अथवा सीधे व्यक्ति के साथ गलत कार्य करती हैं ,कभी-कभी कोई आत्मा किसी महिला के साथ जुड़कर उसका शारीरिक शोषण कर सकती है ,यह व्यक्ति में  मांस-मदिरा की और रूचि उत्पन्न कर सकते हैं ,गलत कार्य करवा सकते हैं ,जबकि व्यक्ति ऐसा नहीं चाहता पर उसके शरीर पर उसका नियंत्रण नहीं रहता .इनके प्रभाव से व्यक्ति गलत निर्णय ले सकता है ,लड़ाई-झगडे कर सकता है ,आदि आदि

                यदि लगे की व्यक्ति पर किसी आत्मा आदि का प्रभाव है अथवा किसी अभिचार की आशंका हो ,घर में घुसने पर सर भारी हो जाए ,तनाव लगे ,मानसिक विक्षुब्धता हो ,कलह अनावश्यक हो ,हर काम बिगड़ने लगे ,उन्नति रुक जाए ,व्यक्ति विशेष के पसीने से दुर्गन्धयुक्त पसीना आये ,सर चकराए,सर गर्म रहे ,बडबडाये ,आँखे तिरछी हों ,आवेश आये ,उछले-कूड़े-गिरे,आकास की और मुह करके बातें करे ,अचानक इतना बल आ जाए की कई लोगो से मुकाबला कर सके ,शरीर पीला होता जाए ,दिन प्रतिदिन दुर्बल होता जाए ,स्त्री जातक कपडे फाड़ने लगे ,बहुत सात्विक हो जाए या तामसिक हो उग्र रहने लगे अचानक से ,किसी प्रकार का आवेश आने लगे ,बाल बिखेरे झूमे ,व्यक्ति को बुरे सपने आये ,अचानक भय लगे ,छ्या आदि दिखे ,लगे कोई साथ है ,बुरे शकुन दिखे ,बीमारी हो पर कारण पता न लगे ,दुर्घटनाये हो ,बार बार गलतियाँ होने लगें ,तामसिक व्यवहार हो जाए ,उग्रता बढ़ जाए ,कहीं मन न लगे ,एकांत पसंद होने लगे ,अधिक सफाई या गन्दगी अचानक पसंद आने लगे ,कार्य-व्यवहार अस्त-व्यस्त हो जाए ,अचानक व्यवसाय में हानि हो या व्यवसाय रुक जाए ,परिवार में बीमारियाँ बढ़ जाएँ तो यह समस्या हो सकती है ,बच्चे का बहुत रोना ,नोचना ,दांत किटकिटाना,,घर पर पत्थर या हड्डी आदि बरसना ,अचानक आग लग्न जबकि कारण पता न चले तो भी ऐसा हो सकता है ,,यद्यपि इनमे से कुछ ग्रह स्थितियों के कारण भी हो सकता है ,पर लगे की ऐसा है तो किसी योग्य व्यक्ति से संपर्क करना बेहतर होता है |

                भूत-प्रेत-चुड़ैल जैसी समस्याओं से व्यक्ति अथवा परिवार के सहयोग से मुक्ति पायी जा सकती है ,किन्तु उच्च स्तर की शक्तियां सक्षम व्यक्ति ही हटा सकता है ,कुछ शक्तियां ऐसी होती हैं की अच्छे अच्छे साधक के छक्के छुडा देती हैं और उनके तक के लिए जान के खतरे बन जाती है ,ऐसे में केवल श्मशान साधक अथवा बेहद उच्च स्तर का साधक ही उन्हें हटा या मना सकता है ,किन्तु यहाँ समस्या यह आती है की इस स्तर का साधक सब जगह मिलता नहीं ,उसे सांसारिक लोगों से मतलब नहीं होता या सांसारिक कार्यों में रूचि नहीं होती ,पैसे आदि का उसके लिए महत्व नहीं होता या यदि वह सात्विक है तो इन आत्माओं के चक्कर में पना नहीं चाहता ,क्योकि इसमें उसकी उस शक्ति का खर्च होता है जो वह अपनी मुक्ति के लिए अर्जन कर रहा होता है .

             भूत-प्रेत चुड़ैल जैसी समस्याओं को कौवा तंत्र के प्रयोग से हटाया जा सकता है किन्तु यह जानकार साधक ही कर सकता है ,प्रेत अथवा पिशाच-पिशाचिनी साधक भी इन्हें हटा सकता है ,अच्छा तांत्रिक भी इन्हें हटा सकता है ,देवी साधक,हनुमान-भैरव साधक इन्हें हटा सकता है ,किन्तु उच्च शक्तिया केवल उच्च साधक ही हटा सकता है,इन्हें देवी[दुर्गा-काली-बगला आदि महाविद्या ]साधक ,भैरव-हनुमान साधक ,श्मशान साधक ,अघोर साधक ,रूद्र साधक हटा सकता है , .

              बजरंग बाण का पाठ ,सुदर्शन कवच ,दुर्गा कवच,काली सहस्त्रनाम ,बगला सहस्त्रनाम ,काली कवच, बगला कवच, आदि के पाठ से इनके प्रभाव पर अंकुश लगता है ,उग्र शक्तियों की आराधना इनके प्रभाव को रोकती है ,,

              भूत-प्रेत बाधा,किये कराये  को निष्प्रभावी करने के लिए अथवा रोकने के लिए वनस्पति और पशु-पक्षी  तंत्र में नीली अपराजिता जी जड़ ,नागदौन की जड़ ,हत्थाजोड़ी,तगर ,मेहंदी ,काली हल्दी ,समुद्रफल ,सियार सिंगी ,श्वेतार्क गणपति ,श्वेतार्क की जड़ ,कौवा ,गोरोचन,लौंग,भालू का नाख़ून ,शेर का नाख़ून ,भालू के बाल ,गैंडे की खाल ,उल्लू के नाख़ून ,सूअर के दांत ,रुद्राक्ष ,गंध्मासी की जड़,जटामांसी की जड़ ,तेलिया कंद ,काली कनेर की जड़ ,वच ,शंखपुष्पी ,संग इ मिक्नातीस ,लाल पलाश की जड़, चिरचिटा की जड़ आदि का भी प्रयोग किया जाता है |

             भूत-प्रेत से कुछ सुरक्षात्मक उपाय पर ध्यान देने से बचाव रहता है ,,कभी भी भरी दोपहर में ,काली रात में अथवा रात में सुनसान स्थान पर ,श्मशान-कब्र-चौरी-नदी किनारे ,बड़े वृक्ष ,बांस की कोठी आदि के आसपास अकेले जाने से बचना चाहिए ,गले में कोई ताबीज आदि पहनना चाहिए विशेषकर बच्चों ,गर्भवती महिलाओं और कुँवारी कन्याओं को ,घर में गंगाजल और अभिमंत्रित जल का छिडकाव कभी कभी कर देना चाहिए ,गूगल-लोबान की धूनी देनी चाहिए ,तांत्रिक अभिचार का भय हो तो घर में योग्य व्यक्ति से कील लगवा देनी चाहिए ,,स्थान हो तो घर के दरवाजे पर श्वेतार्क का पौधा लगाना चाहिए ,शमी का पौधा लगाना चाहिए ,पूजा स्थान में शंख रखना चाहिए और संभव हो तो घर में शंख ध्वनि करनी चाहिए ,

            अकसर भूत-प्रेत ,वायव्य बाधा या अभिचार आदि का भय उन परिवारों पर अधिक होता है जहां पित्र दोष हो  अथवा जहां कुल देवता की पूजा न होती हो अथवा कुलदेवता नाराज हो अथवा ईष्ट मजबूत न हों ,,कुल देवता परिवार की रक्षा इस प्रकार की समस्याओं से करते हैं ,यदि यह नाराज हों तो सुरक्षा नहीं करते अथवा यह कमजोर हों तो सुरक्षा कर नहीं पाते ,परिणामतः कोई भी समस्या बिना रुकावट घर में प्रवेश कर जाती है ,,इसीतरह अगर पित्र दोष है तो वे जो समस्या उत्पन्न करते हैं वह तो होगा ही साथ में जैसे आपमें मित्रता होती है ,इन आत्माओं में भी मित्रता हो सकती है ,अतः पितरों के साथ उनके मित्र भी आपके परिवार के आसपास आ जाते हैं जबकि ये आपके परिवार से सम्बंधित नहीं होते और इनका कोई लगाव परिवार से नहीं होता ,अतः ये अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति परिवार से करने का प्रयास कर सकते हैं ,अर्थात यह परिवार के लिए अधिक कष्टकारक हो जाते हैं ,अतः यथा संभव पित्र दोष से मुक्ति पाने का उपाय करना चाहिए और कुलदेवता आदि की पूजा नियमानुसार जरुर करनी चाहिए ,,इसी प्रकार यदि आपके ईष्ट कमजोर हैं या ईष्ट नहीं हैं या आप नास्तिक हैं तो भी कोई समस्या प्रभावी शीघ्र हो जाती है ,…………………………………………………………………………हर-हर महादेव

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  • वुडू प्रयोग ,पुतली विद्या और काला जादू [Vudoo spell ,Putli Vidya and Black Magic]

    वुडू प्रयोग ,पुतली विद्या और काला जादू [Vudoo spell ,Putli Vidya and Black Magic]

    वुडू प्रयोग ,पुतली विद्या और काला जादू
    [Vudoo spell ,Putli Vidya and Black Magic]
    ========================== [[ भाग -१ ]]
              वूडू एक ऐसी विद्या है जो एक धर्म का रूप ले चुकी है |यह जादूगरों के धर्म के रूप में जानी जाती है और मूल रूप से इसका नाम अफ्रीका के आदिवासियों से सम्बन्ध रखता है |वुडू नाम ही अफ्रीका से सम्बंधित होता है ,जबकि इस तरह के जादू से समबन्धित प्रायोगिक धर्म दुनिया के हर हिस्से में भिन्न रूप से आदिम जनजातियों में पाए जाते हैं |हर देश और क्षेत्र में इसका नाम और प्रायोगिक तरीका थोड़े बहुत फेरबदल के साथ अलग हो सकता है लेकिन मूलतः यह जादू -टोने ,झाड़ -फूंक ,स्थानीय देवता और स्थानीय परंपरा से सम्बंधित होता है |  
              इसे पूरे अफ्रीका का धर्म माना जा सकता है, लेकिन केरीबी द्वीप समूह में आज भी यह जादू की धार्मिक परंपरा जिंदा है और यहाँ इसे वास्तविक माना जाता है । इसे यहां वूडू कहा जाता है।इसी के नाम पर पुतली विद्या को लोग वुडू के नाम से जानने लगे | हाल-फिलहाल बनीन देश का उइदा गांव वूडू बहुल क्षेत्र है। यहां सबसे बड़ा वूडू मंदिर है, जहां विचित्र देवताओं के साथ रखी है जादू-टोने की वस्तुएं। धन-धान्य, व्यापार और प्रेम में सफलता की कामना लिए अफ्रीका के कोने-कोने से यहां लोग आते हैं। कई गांवों में वूडू को देवता माना जाता है. देवता से मनोकामना पूरी करने की मांग की जाती है. एक वूडू देवता का नाम जपाटा है यानि पृथ्वी का देवता.देवताओं की पूजा के दौरान एल्कोहल, बीयर और सिगरेट भी चढ़ाई जाती है. कुछ जगहों पर मुर्गी या बकरे की बलि भी दी जाती है. लोग मानते हैं कि हर देवता का खुश होने का अपना स्टाइल है.जो लोग भविष्य जानना चाहते हैं, वे फा कहे जाने वाले ओझाओं से मिलते है. कोई भी सवाल नहीं किया जा सकता. अपनी मृत्यु के बारे में सवाल करना वर्जित है..
     वूडू प्रकृति के पंचतत्वों पर विश्वास करते हैं। जैसा की भारत के आदिवासियों में समूह में गाने और नाचने की परंपरा है वैसा ही वूडू नर्तक परंपरागत ढोल-डमरूओं की ताल पर नाच कर देवताओं का आह्वान करते हैं। ये प्रार्थनागत नाच गाना कई घंटों तक चलता है। इस तरह की परंपरा को अंग्रेजी में टेबू कह सकते हैं। यह आज भी दुनिया भर में जिंदा है। नाम कुछ भी हो पर इसे आप आदिम धर्म कह सकते हैं। इसे लगभग 6000 वर्ष से भी ज्यादा पुराना धर्म माना जाता है। ईसाई और इस्लाम धर्म के प्रचार-प्रसार के बाद इसके मानने वालों की संख्या घटती गई और आज यह पश्चिम अफ्रीका के कुछ इलाकों में ही सिमट कर रह गया है। हालांकि वूडू को आप बंजारों, आदिवासियों, जंगल में रहने वालों का काल्पनिक या पिछड़ों का धर्म मानते हैं, लेकिन गहराई से अध्ययन करने पर पता चलता है कि वूडू की परंपरा आज के आधुनिक धर्म में भी न्यू लुक के साथ मौजूद है। भारत में तांत्रिकों और शाक्तों का धर्म कुछ-कुछ ऐसा ही माना जा सकता है। क्या चर्च में भूत भगाने के उपक्रम नहीं किए जाते? मंदिर में भूत -प्रेत का निवारण नहीं होता ,तांत्रिकों में आदिम मन्त्रों का प्रयोग और आदिम पद्धतियों का प्रयोग नहीं होता |यह सब प्राचीन इन्ही परम्पराओं से स्थान विशेष के साथ थोडा थोडा बदलते हुए सूदूर क्षेत्र तक जाकर अलग रूप ले लेता है |      
                  वुडू की मुख्य विशेषता इसमें इस्तेमाल होने वाले जानवरों के शरीर के हिस्से व पुतले हैं | इसमें जानवरों के अंगों से समस्या समाधान का दावा किया जाता है। इस जादू से पूर्वजों की आत्मा किसी शरीर में बुलाकर भी अपना काम करवा सकते हैं। इसके अलावा दूर बैठे इंसान के रोग व परेशानी के इलाज के लिए पुतले का भी उपयोग किया जाता है। वूडू जानने वालों का मानना है कि इस धरती पर मौजूद हर जीव शक्ति से परिपूर्ण है। इसलिए उनकी ऊर्जा का उपयोग करके बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। काला जादू के विशेषज्ञों के अनुसार यह वो ऊर्जा (शक्ति) है जिसका इस्तेमान नहीं होता।भारतीय वैदिक परंपरा और तंत्र शास्त्र दोनों में पुतली निर्माण की अवधारणा रही है और इसका भिन्न रूपों में उपयोग भी वैदिक काल से ही रहा है जबकि वैदिक काल लाखों वर्ष पूर्व का माना जाता है ,यद्यपि प्रक्रिया और पदार्थ भिन्न हो जाते हैं |एशिया की आदिम जनजातियों में यही प्रक्रिया अलग रूप में पाने जाती है और अलग धर्म में अलग रूप में |इसे यहाँ वुडू की तरह धर्म का रूप तो नहीं प्राप्त किन्तु इसका प्रयोग हमेशा से होता आया है |जैसे किसी खोये व्यक्ति के न मिलने पर उसे मृतक मान उसका पुतला बनाकर आह्वान कर उसका शव दाह करना |पूजन में विभिन्न खाद्य वस्तुओं से विभिन्न जंतु अथवा शरीर की आकृति का निर्माण कर विविध उपयोग करना |मिटटी के पुतले आदि का निर्माण कर उसपर विभिन्न क्रियाएं करना ,धातु के पुतलों का उपयोग आदि |यह वैदिक और पुरातन काल से हो रहा अर्थात वुडू से भी प्राचीन विद्या यह हमारे संस्कृति में हैं |
                वुडू को लोग काला जादू मानते हैं ,पुतली विद्या को लोग काला जादू मानते हैं जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है |दोनों में ही मूल अवधारणा लोगों की भलाई ही थी किन्तु जिस प्रकार तंत्र का उपयोग स्वार्थ हेतु करने से वह दुरुपयोग हो गया वैसा ही वुडू के साथ हुआ और हर प्रकार की ऐसी क्रियाओं के साथ हुआ |कारण यह की यह विद्या ऊर्जा उपयोग और ऊर्जा प्रक्षेपण की है जिसको इच्छानुसार प्रयोग किया जाता है |जब यह इच्छा स्वार्थ हो तो दुरुपयोग हो जाती है और जब यह इच्छा लोगो की भलाई की हो तो सदुपयोग हो जाती है |वास्तव में वुडू ,पुतली निर्माण अथवा ऐसी समस्त विद्याएँ तंत्र विज्ञान के अंतर्गत आती हैं जिनका अपना निश्चित विज्ञान होता है जो आज के विज्ञान से भी बहुत आगे हैं |यह एक बहुत ही दुर्लभ प्रक्रिया है जिसे बहुत ही विशेष परिस्थितियों में अंजाम दिया जाता है। इसे करने के लिए उच्च स्तर की विशेषज्ञता की जरूरत होती है।कुछ ही लोग इसे करने में सक्षम होते हैं। इस प्रक्रिया में गुड़िया जैसी मूर्ति का इस्तेमाल होगा है। यह गुड़िया कई तरह की खाने की चीजों जैसे बेसन, उड़द के आटे ,कपडे ,धातु ,लकड़ी ,बाल ,वनस्पति ,पौधे अथवा उनके अवयव आदि से बनाया जाता है ,जैसी क्षेत्र विशेष अथवा समुदाय विशेष की परंपरा हो अथवा जैसी जरुरत हो । इसमें विशेष मंत्रों से जान डाली जाती है। उसके बाद जिस व्यक्ति पर जादू करना होता है उसका नाम लेकर पुतले को जागृत किया जाता है। इस प्रक्रया को सीखने के लिए व्यक्ति को विशेष प्रार्थना और पूजा पाठ करनी पड़ती है। कड़ी तपस्या के बाद ही यह सिद्धि प्राप्त होती है |
                  काला जादू हो या सफ़ेद जादू अथवा कोई भी व्यक्ति विशेष पर आधारित तांत्रिक क्रिया यह और कुछ नहीं बस एक संगृहित ऊर्जा है। जो एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जाता है या कहें एक इंसान के द्वारा दूसरे इंसान पर भेजा जाता है। विज्ञान की भाषा में ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है, न खत्म किया जा सकता है, उसे सिर्फ एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है। यदि ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल है, तो नकारात्मक इस्तेमाल भी है। ऊर्जा सिर्फ ऊर्जा होती है, वह न तो पॉजीटिव होती है, न नेगेटिव। आप उससे कुछ भी कर सकते हैं।वुडू अथवा पुतली विद्या व्यक्ति विशेष अथवा किसी एक मूल व्यक्ति पर ही मूल रूप से आधारित विद्या है जबकि भारतीय मूल तंत्र आदि बहु आयामी प्रयोग पर आधारित हैं |वुडू आदि जैसी विद्याओं में स्थानीय मन्त्रों ,स्थानीय वस्तुओं का उपयोग होता है जैसे हमारे यहाँ मूलतः व्यक्ति आधारित ग्रामीण क्रियाओं में शाबर मन्त्रों का उपयोग होता है |ऐसा ही हर जाती ,जनजाति ,धर्म ,क्षेत्र में होता है और इसमें मुख्य शक्ति भी स्थानीय देवता ही होता है |  पुतले से किसी इंसान को तकलीफ पहुंचाना इस जादू का उद्देश्य नहीं है। इसे भगवान शिव ने अपने भक्तों को दिया था भारिय परंपरा और तंत्र में ,जबकि अन्य जगह इसे वहां का स्थानीय देवता अपने लोगों की भलाई के लिए दिया अथवा बताया होता है । पुराने समय में इस तरह का पुतला बनाकर उस पर प्रयोग सिर्फ कहीं दूर बैठे रोगी के उपचार व परेशानियां दूर करने के लिए किया जाता था। कुछ समय तक ऐसा करने पर तकलीफ खत्म हो जाती थी। मगर समय के साथ-साथ इसका दुरुपयोग होने लगा।वुडू में भी यही परम्परा रही और हर प्रकार के पुतला निर्माण में भी |वैदिक पुतला निर्माण बिलकुल अलग प्रक्रिया थी जिसमे इसे मुक्ति और मोक्ष तक जोड़ा गया है |    
                  कुछ स्वार्थी लोगों ने इस प्राचीन विधा को समाज के सामने गलत रूप में स्थापित किया। तभी से इसे काला जादू नाम दिया जाने लगा। दरअसल, उन्होंने अपनी ऊर्जा का उपयोग समाज को नुकसान पहुंचाने के लिए किया। गौरतलब है जिस तरह जादू की सहायता से सकारात्मक या धनात्मक ऊर्जा पहुंचाकर किसी के रोग व परेशानी को दूर किया जा सकता है। ठीक उसी तरह सुई के माध्यम से किसी तक अपनी नकारात्मक ऊर्जा पहुंचाकर। उसे तकलीफ भी दी जा सकती है। जब यह किसी को कष्ट देती है अथवा हानि पन्हुचाती है तब यह काला जादू कहलाती है ,और जब लाभ पहुचाती है तो सफ़ेद जादू ,यद्यपि यह दोनों ही नाम बस भ्रम हैं ,जादू कोई भी न काला होता है न सफ़ेद |यह तो बस ऊर्जा का उपयोग और उसका एक स्थान से दुसरे स्थान तक स्थानान्तरण और स्वरुप परिवर्तन मात्र है |सदुपयोग -दुरुपयोग दोनों उसी प्रक्रिया से हो सकता है जो करता की इच्छा पर निर्भर करता है |……….[क्रमशः ][[अगला अंक -पुतली विद्या अथवा वुडू कैसे कार्य करता है ]]………………………………………………………हर -हर महादेव

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  • भूत -प्रेत ,नकारात्मक ऊर्जा हटाने का प्रयोग दिव्य गुटिका पर

    भूत -प्रेत ,नकारात्मक ऊर्जा हटाने का प्रयोग दिव्य गुटिका पर

    भूत -प्रेत ,नकारात्मक ऊर्जा हटाने का प्रयोग दिव्य गुटिका पर
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    ==प्रचंडा चामुंडा साधना ==
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                   जैसा की हमने अपने दिव्य गुटिका अथवा चमत्कारी डिब्बी धारक पेज के पाठकों को सूचित किया था की जो गुटिका उन्होंने कभी भी हमसे किसी भी अन्य उद्देश्य से ली हो वे उस उद्देश्य के साथ -साथ उस दिव्य गुटिका पर अनेक प्रयोग अपनी आवश्यकता अनुसार कर सकते हैं और हम क्रमशः उनकी विधि प्रस्तुत करते रहेंगे |हम विशेष रूप से प्रयोग किये जाने वाले कुछ प्रयोगों के क्रम में नकारात्मक ऊर्जा ,भूत-प्रेत ,वायव्य बाधाएं ,तांत्रिक अभिचार ,अनावश्यक वशीकरण ,उच्चाटन ,विद्वेषण आदि की क्रियाओं को हटाने का प्रयोग प्रदान कर रहे हैं |जिन धारकों को लगता हो की उनके ऊपर अथवा उनके दूकान ,व्यवसाय ,घर-परिवार पर किसी तरह की नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव है ,किसी ने कुछ किया -कराया किया हुआ है या अभिचार किया है ,या व्यवसाय -दूकान बाँध दिया है ,या उन्नति रोक दी है ,या अपने आप किसी वायव्य आत्मा परेशान कर रही है ,किसी बच्चे -स्त्री को कोई पीड़ा पहुंचा रहा हो ,घर-परिवार में अनावश्यक बीमारी -दुर्घटना -कष्ट का वातावरण बन रहा हो तो वह धारक इस प्रयोग को किसी शनिवार अथवा कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात्री शुरू कर निश्चित दिनों तक क्रिया प्रयोग कर लाभान्वित हो सकते हैं |
    सामग्री
    ———- मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुक्त दुर्लभ दिव्य गुटिका [चमत्कारी डिब्बी ],लाल रंग का वस्त्र ,इत्र ,लकड़ी की चौकी या बाजोट ,चांदी की तश्तरी [ न मिले तो पीतल ], असली सिन्दूर ,लौंग ,इलायची ,लाल फूल ,पान बीड़ा ,फल फूल ,प्रसाद चढाने को दूध की लाल मिठाई ,चावल ,सिक्का ,रुई ,देशी घी का दीपक |
    माला
    ——– मंत्र सिद्ध चैतन्य रुद्राक्ष माला
    आसन
    ——– लाल उनी आसन
    वस्त्र
    ——- लाल रंग की धोती
    दिशा
    ——- पूर्व दिशा
    दिन
    —— होली की रात्री अथवा शुभ मुहुर्तयुक्त मंगलवार अथवा नवरात्र अथवा शनिवार अथवा कृष्ण चतुर्दशी |
    समय
    ——- रात्री दस बजे
    जप संख्या अवधि
    ———————- १२५००० [सवा लाख ]अपनी सुविधानुसार रोज की जप संख्या निश्चित कर दिन की अवधि निश्चित कर लें |प्रतिदिन जप संख्या समान हो और सवा लाख जप २१ ,३१ ,४१ अथवा ५१ दिनों में संपन्न हो |इस अवधि में पूर्ण सात्विकता ,ब्रह्मचर्य पालन आवश्यक |
    मंत्र
    ——- || ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाये बिचै ||
    विधि
    ——– नवरात्र में अथवा शुभ मुहुर्त्युक्त मंगलवार को अथवा होली की रात्री अथवा कृष्ण चतुर्दशी अथवा किसी शनिवार को स्नानादि से निवृत्त हो शुद्ध हो लाल धोती धारण कर लाल उनी आसन पर पूर्व की और मुख कर अपने सामने लकड़ी के बाजोट या चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं |उस पर बीचोबीच रोली से अष्टदल कमल बनाएं फिर उस पर चांदी की तश्तरी स्थापित करें और तश्तरी के बीचोबीच रोली से या अष्टगंध से ह्रीं बनाएं |अब  उस पर दिव्यगुटिका स्थापित करें |दिव्य गुटिका के पीछे दुर्गा जी का चित्र स्थापित करें |अब दुर्गा जी का और दिव्य गुटिका का पूजन यथाशक्ति करें और जल ,अक्षत ,लाल फूल ,धुप -दीप ,प्रसाद चढ़ाएं ,असली पिला पारायुक्त सिन्दूर गुटिका के अन्दर चढ़ाएं |पान बीड़ा ,लौंग ,इलायची और एक सिक्का अर्पित करें |अब मंत्र सिद्ध चैतन्य रुद्राक्ष माला से उपरोक्त मंत्र का जप निश्चित संख्या में करें [जो आपने रोज के लिए निर्धारित की है ]|इस प्रकार रोज करते हुए सवा लाख जप पूर्ण हो जाने पर कम से कम २५०० हवन अवश्य करें |इस प्रकार यह अनुष्ठान पूर्ण होता है |अब चांदी की तश्तरी समेत दिव्य गुटिका अपने पूजा स्थान में स्थापित करें और रुद्राक्ष माला गले में धारण करें |गुटिका के बाहर चढ़ाए गए लौंग ,इलायची को उठाकर सुरक्षित रख ले यह किसी भी अभिचार ,पीड़ा ,बाधा के निवारण में मदद करेगा ,पीड़ित को खिलाने पर अथवा बाजू में बाँध देने पर |अन्य शेष सामग्री को बहते जल या तालाब ,कुएं में प्रवाहित कर दें |इस गुटिका पर सिन्दूर अर्पित करते रहें और प्रतिदिन इसकी पूजा सामान्य रूप से करते रहें |संभव हो तो एक -दो माला भी रोज करें |इस प्रयोग को संपन्न करने पर भूत-प्रेत ,वायव्य बाधा ,अभिचार ,किया कराया दूर होगा ,सब प्रकार उन्नति होगी ,शत्रु पराजित होंगे |घर के अनेक दोष समाप्त होंगे |जहाँ भी रखा जाएगा गुटिका वहां के बंधन समाप्त हो जायेंगे |आगे होने वाले अभिचार काम नहीं करेंगे |गुटिका पर चढ़ाए सिन्दूर का तिलक करने पर आकर्षण शक्ति बढ़ेगी ,लोग प्रभावित होंगे ,सब प्रकार से सुरक्षा प्राप्त होगी |लोग वशीभूत होंगे |……………………………………………………….हर-हर महादेव 
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  • तांत्रिक अभिचार रोकता है बगलामुखी कवच

    तांत्रिक अभिचार रोकता है बगलामुखी कवच

    बगलामुखी यन्त्र से रोके/हटाये भूतप्रेत ,वायव्य बाधा ,नकारात्मक ऊर्जा
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            भगवती बगलामुखी दस महाविद्याओ में से एक प्रमुख महाविद्या और शक्ति है ,जिन्हें ब्रह्मास्त्र विद्या या शक्ति भी कहा जाता है ,यह परम तेजोमय शक्ति है जिनकी शक्ति का मूलसूत्र ,प्राण सूत्र है ,,प्राण सूत्र ्रत्येक प्राणी में सुप्त अवस्था में होता है जो इनकी साधना से चैतन्य होता है ,इसकी चैतन्यता से समस्त षट्कर्म भी सिद्ध हो सकते है ,,बगलामुखी को सिद्ध विद्या भी कहा जाता है ,मूलतः यह स्तम्भन की देवी है पर समस्त षट्कर्म इनके द्वारा सिद्ध होते है और अंततः यह मोक्ष प्रदान करने में सक्षम है
              बगलामुखी यन्त्र माता बगलामुखी का निवास माना जाता है जिसमे वह अपने अंग विद्याओ ,शक्तियों ,देवों के साथ निवास करती है ,अतः यन्त्र के साथ इन सबका जुड़ाव और सानिध्य प्राप्त होता है ,,यन्त्र के अनेक उपयोग है ,यह धातु अथवा भोजपत्र पर बना हो सकता है ,पूजन में धातु के यन्त्र का ही अधिकतर उपयोग होता है ,पर सिद्ध व्यक्ति से प्राप्त भोजपत्र पर निर्मित यन्त्र बेहद प्रभावकारी होता है ,,धारण हेतु भोजपत्र के यन्त्र को धातु के खोल में बंदकर उपयोग करते है ,,जब व्यक्ति स्वयं साधना करने में सक्षम हो तो यन्त्र धारण मात्र से उसे समस्त लाभ प्राप्त हो सकते है ,..
              बगलामुखी की कृपा से व्यक्ति की सार्वभौम उन्नति होती है ,शत्रु पराजित होते है ,सर्वत्र विजय मिलती है ,मुकदमो में विजय मिलती है ,अधिकारी वर्ग की अनुकूलता प्राप्त होती है ,विरोधी की वाणी ,गति का स्तम्भन होता है ,शत्रु की बुद्धि भ्रस्त हो जाती है ,उसका विनाश होने लगता है ,,ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ,व्यक्ति के आभामंडल में परिवर्तन होने से लोग आकर्षित होते है ,प्रभावशालिता बढ़ जाती है ,वायव्य बाधाओं से सुरक्षा होती है ,तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव समाप्त हो जाते है ,सम्मान प्राप्त होता है ,वादविवाद में सफलता मिलती है ,प्रतियोगिता आदि में सफलता बढ़ जाती है ,भूतप्रेतवायव्य बाधा की शक्ति क्षीण होती है क्योकि इसमें से निकलने वाली सकारात्मक तरंगे उनके नकारात्मक ऊर्जा का ह्रास करते हैं और उन्हें कष्ट होता है ,मांगलिक और उग्र देवी होने से नकारात्मक शक्तियां इनसे दूर भागती हैं ,यह समस्त प्रभाव यन्त्र धारण से भी प्राप्त होते है और साधना से भी ,साधना से व्यक्ति में स्वयं यह शक्ति उत्पन्न होती है ,यन्त्र धारण से यन्त्र के कारण यह उत्पन्न होता है ,यन्त्र में साधक का मानसिक बल ,उसकी शक्ति से अवतरित और प्रतिष्ठित भगवती की पारलौकिक शक्ति होती है जो वह सम्पूर्ण प्रभाव प्रदान करती है जो साधना में प्राप्त होती है ,अतः आज के समय में यह साधना अथवा यन्त्र धारण बेहद उपयोगी है |
                   ताबीज आदि में एक बृहद उर्जा विज्ञानं काम करता है ,जो ब्रह्मांडीय उर्जा संरचना ,क्रिया ,तरंगों ,उनसे निर्मित भौतिक इकाइयों की उर्जा संरचना का विज्ञानं है ,,,इस उर्जा संरचना को ही तंत्र कहा जाता है |इसकी तकनीक प्रकृति की स्वाभाविक तकनीक है ,,,यही तकनीक तंत्र ,योग ,सिद्धि ,साधना में प्रयुक्त की जाती है ,-ताबीज में प्राणी के शारीर और प्रकृति की उर्जा संरचना ही कार्य करती है ,,इनका मुख्या आधार मानसिक शक्ति का केंद्रीकरण और भावना होता है ,,,,प्रकृति में उपस्थित वनस्पतियों और जन्तुओ में एक उर्जा परिपथ कार्य करता है ,मृत्यु के बाद भी इनमे तरंगे कार्य करती है ,,,,इनमे विभिन्न तरंगे स्वीकार की जाती है और निष्कासित की जाती है |जब किसी वास्तु या पदार्थ पर मानसिक शक्ति और भावना को केंद्रीकृत करके विशिष्ट क्रिया की जाती है तो उस पदार्थ से तरंगों का उत्सर्जन होने लगता है ,,,,जिस भावना से उनका प्रयोग जिसके लिए किया जाता है ,वह इच्छित स्थान पर वैसा कार्य करने लगता है,,ताबीज बनाने वाला जब अपने ईष्ट में सचमुच डूबता है तो वह अपने ईष्ट के अनुसार भाव को प्राप्त होता है ,,भाव गहन है तो मानसिक शक्ति एकाग्र होती है ,जिससे वह शक्तिशाली होती है ,यह शक्तिशाली हुई तो उसके उर्जा परिपथ का आंतरिक तंत्र शक्तिशाली होता है और शक्तिशाली तरंगे उत्सर्जित करता है |ऐसा व्यक्ति यदि किसी विशेष समय,ऋतूमॉस में विशेष तरीके से ,विशेष पदार्थो को लेकर अपनी मानसिक शक्ति और मन्त्र से उसे सिद्ध करता है तो वह ताबीज धारक व्यक्ति को उस  भाव की तरंगों से लिप्त कर देता है |यह समस्त क्रिया शारीर के उर्जा चक्र को प्रभावित करती है और तदनुसार व्यक्ति को उनका प्रभाव दिखाई देता है ,साथ ही इनका प्रभाव आस पास के वातावरण पर भी पड़ता है क्योकि तरंगों का उत्सर्जन आसपास भी प्रभावित करता है ……………………..हरहर महादेव
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  • पिशाच मोचन कुण्ड [Pishach Mochan Kund]: वाराणसी

    पिशाच
    मोचन कुण्ड : वाराणसी

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    काशी को मोक्ष की नगरी भी कहा जाता है |यह प्रलय काल में भगवान् शिव के त्रिशूल पर विराजित होता है और प्रलय में
    भी सुरक्षित होता है |यही से भगवान् शिव ने सृष्टि रचना का प्रारम्भ किया था |
    कहते हैं यहां जो इंसान अंतिम सांस लेता है उसे मोक्ष की प्राप्ती होती है। जिन लोगों की मृत्यु यहां नहीं होती उनका अंतिम संस्कार यहां  पर कर देने मात्र से ही मोक्ष मिलता है। इसके साथ ही काशी में एक ऐसा कुंड भी है जहां पर मृत आत्माओं की शांति के लिए देश भर से लोग पिंड दान के लिए आते है। कहते है कि पित्र पक्ष के दिनों इस कुंड पर भूतों का मेला लगता है। इस कुंड का नाम है पिशाचमोचन कुंड। जहां पितृपक्ष में अकाल मौत मरने वालों को श्राद्ध करने से मुक्ति मिलती है। तामसी आत्माओं से छुटकारे के लिए कुंड के पेड़ में कील ठोक कर बांधा जाता है। कुछ लोग नारायन बलि पूजा भी कराते है जिससे मरने वाले की आत्मा को शांति मिलती है।
    मंदिर के पुजारी बताते है कि काशी से पहले इस शहर को आनंदवन के नाम से जाना जाता था। यहां एक मान्यता ऐसी भी है कि अकाल मौत मरने वालों की आत्माएं तीन तरह की होती है जिसमें तामसी राजसी और सात्विक होती है तामसी प्रवित्ति की आत्माओ को यहां के विशाल काय वृक्ष में कील ठोककर बांध दिया जाता है, जिससे वो यहीं पर इस वृक्ष पर बैठ जाए और किसी भी परिवार के सदस्य को परेशान करें। इस पेड़ में अब तक लाखों कील ठोकी जा चुकी है ये परंपरा बेहद पुरानी है जो आज भी चली रही है।
    कहते हैं कि जब पुरखों की आत्माओं का
    आशीष इंसान को जिंदगी में मिलता रहता है
    , तो उसके जीवन में खुशियां ही
    खुशियां बनी रहती हैं। माना जाता है कि आकाश से हमारे पुरखे व धरती पर हमारे
    बुजुर्ग अपनी दुआओं से हमारे जिंदगी में रौशनी बिखेरते रहते हैं।ये पुरखे हमारे
    पित्र कहलाते हैं |इनकी तृप्ति के लिए
    हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी माना जाता है। मान्यतानुसार अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती और वह भूत के रूप में इस संसार में ही रह जाता है। पितरों
    के श्राद्ध के लिए विधिविधान पूर्वक तर्पण आदि करना सभी के लिए आवश्यक होता है
    जिससे जीवन सुखमय बना रहे। धर्म और आध्यात्म की नगरी काशी वैसे तो मोक्ष की नगरी
    के नाम से जानी जाती है। कहा जाता है कि यहा प्राण त्यागने वाले हर इंसान को भगवन
    शंकर खुद मोक्ष प्रदान करते हैं। मगर जो लोग काशी से बाहर या काशी में अकाल प्राण
    त्यागते हैं उनके मोक्ष की कामना से काशी के पिशाच मोचन कुण्ड पर त्रिपिंडी
    श्राद्ध किया जाता है। 
    देश भर में सिर्फ काशी के ही अति प्राचीन पिशाच मोचन कुण्ड पर यह
    त्रिपिंडी श्राद्ध होता है। जो पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के
    बाद व्याधियों से मुक्ति दिलाता है। इसीलिये पितृ पक्ष में तीर्थ स्थली पिशाच मोचन
    पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से आश्विन कृष्ण
    पक्ष अमावस्या तिथि तक पितृ पक्ष कहलाता है
    ,जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि के दिन हुई हो उनका भाद्रपद माह के पूर्णिमा तिथि के दिन ही श्राद्ध करने का नियम है। मान्यताएं ऐसी हैं कि पिशाचमोचन पर श्राद्ध कार्य करवाने से अकाल मृत्यु में मरने वाले पितरों को प्रेत बाधा से मुक्ति के साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस धार्मिक स्थल का उद्भव गंगा के धरती पर आने से पूर्व हुआ है। इस पिशाच मोचन तीर्थ स्थली का वर्णन गरुण पुराण में भी मिलता है।
     मान्यता
    के अनुसार, काशी के प्राचीन पिशाच मोचन कुंड पर होने वाले त्रिपिंडी श्राद से पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद विकारों से मुक्ति मिल जाती है। इसीलिए पितृ पक्ष के दिनों तीर्थ स्थली पिशाच मोचन पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। यह भी मान्‍यता है कि वाराणसी में पिंड दान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है क्योंकि काशी भगवान शिव की नगरी है। बताते चलें कि 12 महीने चैत्र से फाल्गुन तक 15-
    15
    दिन का शुक्ल और कृष्ण पक्ष का होता है, लेकिन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के प्रथम दिन से पित्र पक्ष शुरू होता है जो १५ दिनों तक रहता है। पितृ पक्ष के 15 दिन पितरों की मुक्ति के माने जाते हैं और इन 15 दिनों के अंदर देश के विभिन्न तीर्थ स्थलों पर श्राद्ध और तर्पण का कार्य होता है। इसके लिए काशी के अति प्राचीन पिशाच मोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद होता है। यह पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद विकारों से मुक्ति दिलाता है। इस श्राद कार्य में इस पवित्र तीर्थ पर संस्कृत के श्लोकों के साथ तीन मिट्टी के कलश की स्थापना की जाती है, जो काले, लाल और सफेद झंडों से सजाए जाते हैं।
    कर्मकांडी ब्राम्हणों के आचार्यत्व में पितरों को जौ के आटे की गोलियां, काला तिल, कुश और गंगाजल आदि से विधिविधान पूर्वक पिण्ड दान, श्राद्धकर्म तर्पण किया जाता है। मान्यता अनुसार परिवार के मुख्य सदस्य क्षोरकर्म (सिर के बाल, दाढ़ी मूंछ आदि मुंडवाना) मंत्रोच्चार की ध्वनि के साथ पितरों का श्राद्धकर्म करते हैं। श्राद्धकर्म के पश्चात् गौ, कौओं और श्वानों को आहार दिया जाता है। पिशाच मोचन में पिण्डदान की सदियों पुरानी परम्परा रही है। इसी के निमित्त आस्थावानों द्वारा हर वर्ष यहां कुण्ड पर पिण्डदान श्राद्धकर्म कर गया में श्राद्धकर्म का संकल्प लिया जाता है।
    अपने
    पितरों के मुक्ति की कामना से पिशाच मोचन कुण्ड पर श्राद्ध और तर्पण करने के लिए
    लोगों की भीड़ पितृ पक्ष के महीने में जुटती है। मान्यताएं हैं कि जिन पूर्वजों की
    मृत्य अकाल हुई है वो प्रेत योनि में जाते हैं और उनकी आत्मा भटकती है। इनकी शांति
    और मोक्ष के लिये यहां तर्पण का कार्य किया जाता है। गया का भी काफी महत्व है
    , लेकिन जो भी श्राद्ध करने की इच्छा रखता है वो
    पहले काशी आता है और उसके पश्चात् ही गया प्रस्थान करता है।
    कुंड के महत्व पर प्रकाश डालते हुए पिशाचमोचन कुंड के पंडा बताते हैं ​कि
    यह त्रेतायुग का कुंड है। उस समय पिशाच नाम का ब्राहम्ण था जो दान नहीं देता था।
    सिर्फ लोगों से दान लेता था। इन्होंने इतना दान ले लिया कि आत्मा की शांति नहीं
    मिल रही थी। एक बार जब वाल्मीकि जी यहां पूजा कर रहे थे तो पिशाच ब्राह्मण आए तो
    पूछा कि महराज मुझे आत्मा की शांति नहीं मिल रही है तो उन्होंने तालाब में नहाने
    को बोला तो जैसे ही ब्राह्मण उसमें उतरे पानी भागने लगा।
     इसके बाद गिलास में पानी लिये तो वो भी सूख गया, क्योंकि वो 1520 साल से प्यासे थे और उसके बाद उन्होंने वाल्मिकी जी से कहा कि महाराज हमारे कष्ट को दूर करें और हमें ठीक करें तो उन्होंने कहा कि मैं ठीक नहीं कर पाऊंगा। इस पर पिशाच ब्राह्मण ने कहा कि मैं आत्महत्या कर लूंगा। इसके बाद वाल्मिकी जी ने उन्हें यहां विष्णु जी शंकर जी का उनसे तपस्या कराया, जिसके बाद शंकर जी यहां आए और पिशाच से कहा कि क्या कष्ट है तो उन्होंने शिव जी को कष्ट बताया। शिव जी ने
    ब्राह्मण से पानी में उतरने को कहा। जब वो तालाब में उतरे तो ये एक कदम चले तो
    पानी दो कदम दूर भाग जाये
    , इसके बाद जब इनके शरीर पर तालाब का पानी पड़ा
    तो वो जलाशय हो गये। इसके बाद इन्होंने यहीं लोगों के मुक्ति के लिए उनसे आशिर्वाद
    मांगा और यही भोले शंकर के सामने विराजमान हो गए। जिसके बाद से यहां की मान्यता है
    कि यहां किसी के घर भी अकाल मृत्यु आदि हो तो यहां श्राद्ध करने से मुक्ति मिल
    जाती है।
    पितृ
    पक्ष में पिशाचमोचन कुंड पर श्राद्ध करने के साथ ही यहां से एक और परम्परा भी जुड़ी
    है। दरअसल समीप में ही वर्षों पुराने पीपल के वृक्ष में यहां आने वाले कुछ
    श्रद्धालु सिक्का भी गाड़ते हैं। पिशाचमोचन पर श्राद्ध कराने वाले पंडित
    बताते हैं कि पीपल के वर्षों पुराने पेड़ में सिक्का गाड़े जाने के पीछे लोगों की
    आस्था जुड़ी है। मनोकामना के लिए कुछ लोग सिक्का गाड़ते हैं। जैसे कोई
    बच्चों के लिए या कोई अप्राकृतिक मृत्यु प्राप्त हो जाये उसके लिए भी सिक्का
    गाड़ते हैं। और मनोकामना पूरी होने पर उसे निकाल लेते हैं। इतना ही नहीं मानना यह
    भी है कि अगर कोई प्रेत घर में है जिससे मुक्ति नहीं मिल रही तो यहां पीपल के पेड़
    में सिक्के गाड़ने से उससे मुक्ति भी मिल जाती है और एक को लाभ मिलता है तो कई
    अन्य और यहां आते हैं।
    प्रेत बधाएं तीन तरीके की होती हैं। इनमें सात्विक, राजस, तामस शामिल हैं। इन तीनों बाधाओं से पितरों को मुक्ति दिलवाने के लिए काला, लाल और सफेद झंडे लगाए जाते हैं। इसको भगवान शंकर, ब्रह्म और कृष्ण के ताप्‍तिक रूप में मानकर तर्पण और श्राद का कार्य किया जाता है। पुरोहितों ने बताया कि यहां अपने पितरों के साथसाथ अन्य पिशाच बाधाएं भी दूर की जाती हैं, जिनका प्रमाण सिर्फ देखने से मिलता है जिसमे प्रमुख रूप से महिला ओझा पुरोहितों के साथ बैठकर भूतों से कबूल करवाती हैं कि वह दुबारा उस मानव शरीर को परेशान नहीं करेगा। इसके लिए लोग यहां स्थित पीपल के पेड़ में उस भूत के नाम का सिक्का गाड़ते हैं। मान्यता है की वह भूत यही रहेगा और परेशान नहीं करेगा। तीर्थ पुरोहित के अनुसार, पितरों के लिए 15 दिन स्वर्ग का दरवाजा खोल दिया जाता है। उन्होंने बताया कि यहां के पूजापाठ और पिंड दान करने के बाद ही लोग गया के लिए जाते हैं। उन्‍होंने बताया कि जो कुंड वहां है वो अनादि काल से है भूतप्रेत सभी से मुक्ति मिल जाती है। पितरों का पिण्डदान व श्राद्धकर्म से जहां
    पितृ ऋण से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। वहीं पितरों से धन
    धान्य व यश की प्राप्ति के आशीष का द्वार भी खुल जाता है। इसलिए यह पूरी
    श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए।
    …………………………………………………हर
    हर महादेव

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  • घोड़े की नाल के तांत्रिक प्रयोग

    घोड़े की नाल और तंत्र प्रयोग  

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    1- काले वस्त्र में लपेट कर अनाज में रख दो तो अनाज में वृद्धि हो। 
    काले वस्त्र में लपेट कर तिजोरी में रख दो तो धन में वृद्धि हो। 
    3- अंगूठी या छल्ला बनाकर धारण करे तो शनि के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिले।
    4- द्वार पर सीधा लगाये तो दैवीय कृपा मिले।
    5- द्वार पर उल्टा लगाओ तो भूत, प्रेत, या किसी भी तंत्र मंत्र से बचाव हो।
    6- शनि के प्रकोप से बचाव हेतु काले घोड़े की नाल से बना छल्ला सीधे हाथ में धारण करें।
    7- काले घोड़े की नाल से चार कील बनवाये और शनि पीड़ित व्यक्ति के बिस्तर में चारो पायो में लगा दें।
    8- काले घोड़े की नाल से चार कील बनवाये और शनि पीड़ित व्यक्ति के घर के चारो कोने पे लगायें।
    9- काले घोड़े की नाल से एक कील बनाकर सवा किलो उरद की दाल में रख कर एक नारियल के साथ जल में प्रवाहित करे।शनि दोष और दुस्प्रभाव से मुक्ति मिले |
    10- काले घोड़े की नाल से एक कील या छल्ला बनवा ले, शनिवार के दिन पीपल के पेड़ के नीचे एक लोहे की कटोरी में सरसों का तेल भर कर है छल्ला या कील दाल कर अपना मुख देखे और पीपल के पेड़ के नीचे रख दें।
    काले
    घोड़े की नाल और तंत्र
    प्रयोग
    =====================
    तंत्र
    क्रियाओं में अनेक वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। काले घोड़े की नाल भी उन्हीं
    में से एक है। ऐसा मानते हैं कि तंत्र प्रयोग में यदि काले घोड़े की नाल का प्रयोग
    किया जाए तो असंभव कार्य भी असंभव हो जाता है। तंत्र शास्त्र के अनुसार वैसे तो
    किसी भी घोड़े की नाल बहुत प्रभावशाली होती है लेकिन यदि काले घोड़े के अगले
    दाहिने पांव की पुरानी नाल हो तो यह कई गुना अधिक प्रभावशाली हो जाती है। इसके कुछ
    प्रयोग इस प्रकार हैं
     यदि दुकान ठीक से नहीं चल रही हो या किसी ने दुकान पर तंत्र प्रयोग कर उसे
    बांध दिया हो तो दुकान के मुख्य द्वार की चौखट पर नाल को अंग्रेजी के यू अक्षर के
    आकार में लगा दें। आपकी दुकान में ग्राहकों की संख्या बढऩे लगेगी और परिस्थितियां
    अनुकूल हो जाएंगी।
     यदि घर में क्लेश रहता हो, आर्थिक
    उन्नति नहीं हो रही हो या किसी ने तंत्र क्रिया की हो तो घर के मुख्य द्वार पर नाल
    को अंग्रेजी के यू अक्षर के आकार में लगा दें। कुछ ही दिनों में नाल के प्रभाव से
    सबकुछ ठीक हो जाएगा।
     यदि किसी कार्य
    में अड़चन आ रही हो तो शनिवार के दिन काले घोड़े की नाल को विधिपूर्वक दाहिने हाथ
    की मध्यमा अंगुली में धारण कर लें। आपके बिगड़े काम बन जाएंगे और साथ ही धन लाभ भी
    होगा।
    घोड़े की नाल और घर में शान्ति
    ========================
    घोड़े की नाल घोड़े की गति बढ़ाने में तो खास भूमिका निभाती ही है, वास्तुदोष दूर कर आपकी किस्मत भी चमका सकती है।
    घोड़े की नाल को सामान्यत: धातु
    से निर्मित किया जाता है। कभी
    कभी
    इसे आधुनिक सिंथेटिक साम्रगी से भी बनाया जाता है। इसे घोड़े की खुर की रक्षा करने
    के लिए लगाया जाता है। अलबत्ता घोड़े की नाल का उपयोग महज इतना ही नहीं है। लोहे
    से बनी यह सामान्य सी वस्तु बेहद चमत्कारी है। इसे स्थापित करने से बीमारी और
    दुर्भाग्य दूर रहता है। माना यह भी जाता है कि घोड़े की नाल जादू
    टोने व बुरी नजर से भी रक्षा करती है। 
    यह लोहे से निर्मित होती है, जो धातु तत्व का प्रतीक है। इसे बनाने के लिए आग का प्रयोग किया जाता है, जिसे वास्तु और फेंग्शुई के पांच महत्वपूर्ण
    तत्वों में से एक अहम तत्व माना जाता है। घोड़े को भी भाग्यशाली जानवर माना गया
    है। यही वजह है कि घोड़े की नाल वास्तु गैजेट के रूप में अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
    घोड़े की नाल से जुड़ा एक और पहलू है। अर्ध चन्द्रमा रूपी इसके आकार के
    कारण इसे चन्द्र देव का प्रतीक भी माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि घोड़े की नाल
    को स्थापित करने से चन्द्रमा मजबूत होता है। फलस्वरूप घर में बेहतर स्वास्थ्य
    , शांति और खुशहाली का माहौल बनता है। दिलचस्प
    तथ्य यह है कि घोड़े की नाल को एक गैजेट के रूप में विदेशों में भी लोकप्रियता
    प्राप्त है। घोड़े की नाल को मुख्य प्रवेश द्वार पर अथवा लिविंग रूम के प्रवेश
    द्वार पर ऊपर व बाहर की ओर लगाना चाहिए।
    बुरी नजर और
    दुष्प्रभाव रोकती है घोड़े की नाल
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    शत्रु एवं शनि पीड़ित लोग काले घोड़े की नाल के छल्ले का प्रयोग करें तो उत्तम लाभ होता है। यह छल्ला दाहिने हाथ की बीच की (मध्यमा) उंगुली में धारण करना चाहिए। आपधापी के इस युग में मनुष्य को एक और समयभाव हैं वहीं दूसरी और अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु वह विभिन्न टोटकों एवं कुकर्मों का सहारा लेता है। किसी का अगर थोड़ा सा भी कारोबार अच्छा चला, वहीं ईर्ष्या रखेंने वाले लोग अनेक प्रकार के घृणित टोटकों का सहारा लेकर कारोबार को नष्ट प्रायः कर देते है। ऐसे लोगों की बुरी नजर से बचने का अत्यन्त सटीक उपाय है घोड़े की नाल का छल्ला। ध्यान रखेंना चाहिए वह छल्ला एकदम शुद्व एवं प्रमाणिक होना चाहिए। तभी इसका पूर्ण लाभ मिलता है घर तथा कार्य स्थान के मुख्य दरवाजे के ऊपर अन्दर की ओर यू’ के आकार में लगाई गई काले घोड़े के नाल उस स्थान की सभी प्रकार तांत्रिक प्रभाव जादूटोने, नजर आदि से रक्षा करती है।छल्ला बनवाने के लिए इसे गरम नहीं किया जाना चाहिए अपितु बिना गर्म किये बनाया जाना चाहिए |………………………………………………………हरहर महादेव

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  • अपराजिता [Aparajita ]/भगपुष्पी के चमत्कार

    सुगम
    प्रसव और अपराजिता 

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    प्रसव के समय
    कष्ट से तड़पती या मरणासन्न हुई गर्भवती स्त्री की कटी में श्वेत अपराजिता की लता
    लाकर लपेट देने से कष्ट का समापन हो जाता है और प्रसव में सुगमता हो जाती है |
    वृश्चिक
    दंश और अपराजिता 
    ===================
    जब बिच्छु काट
    ले तो दंशित स्थल पर ऊपर से नीचे की तरफ श्वेत अपराजिता की जड़ को रगड़े और उसी तरफ
    वाले हाथ में इसकी जड़ दबा दें तो कुछ समय में विष उतर जाता है |
    भूत
    बाधा और अपराजिता 
    ==================
    कृष्ण कांता
    या नीली अपराजिता की जड़ को नीले कपडे में लपेटकर शनिवार वाले दिन रोगी के कंठ में
    पहना दे तो लाभ होता है |इसके साथ ही इसके पत्ते और नीम के पत्तों की धुप दी जाए
    या इनका रस निकालकर एकसार करके नाक में टपका देने से आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त होता
    है |
    गर्भधारण
    में अपराजिता का उपयोग 
    ========================
    प्रायः
    किसी न किसी कारण से यौवनमयी कामिनियाँ चाहते हुए भी गर्भ धारण नहीं कर पाती जिस
    कारण मानहानि की भी स्थिति आती रहती है ,कभी कभी तो बाँझ भी मान लिया जाता है |ऐसी
    स्त्रियाँ नीली अपराजिता की जड़ को काली बकरी के शुद्ध दूध में पीसकर मासिक
    रजोस्राव की समाप्ति पर स्नान के पश्चात् पी लें और सारे दिन भगवान् कृष्ण की बाल
    रूप में पूजा करते हुए व्रत रखें और रात्री को गर्भधारण के हेतु पति के साथ सहवास
    करें तो गर्भ की सम्भावना बन सकती है |
    अपराजिता और प्रबल वशीकरण 
    =====================

    रवि
    पुष्य योग में विधिवत आमंत्रित करके अपराजिता के पुष्प ले आयें और छाया में सुखाकर
    सुरक्षित रखें |सूर्य ग्रहण या चन्द्र ग्रहण के समय इसकी मूल का संग्रह करके रखें
    |अब कृष्ण पक्ष की अष्टमी या चतुर्दशी को जब शनिवार पड़े तब किसी जाग्रत शिवालय में
    जाकर संग्रह की गयी सामग्री को पीसकर गोलों बना लें |इस गोली को छाया में ही
    सुखाएं |इस क्रिया को करते समय श्वेत बिना सिला वस्त्र ही धारण किये रहें |इस गोली
    के सूखने पर संभल कर रख ले |किसी अच्छे तांत्रिक मुहूर्त में इसकी पूजा विधिवत
    करें और मंत्र जप करें |अब इसे अपनी आवश्यकता अनुसार घिसकर तिलक करके जिसके सामने
    जायेंगे वह आपके वशीभूत होगा ,शत्रु भी हाँ जी ,हाँ जी करने लगेंगे |इस बटी को
    जिह्वा के नीछे रख लेने पर समूह सम्मोहन भी होता है और विवाद भी समाप्त हो जाता है
    |…………………………………………………………हर
    हर महादेव 
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  • अपराजिता /भगपुष्पी [Aparajita ] और तंत्र

    ::::::::::::::::::अपराजिता
    और तंत्र
    ::::::::::::::::::::

    ==============================
         अपराजिता एक लता जातीय बूटी है जो जो की वन
    उपवनो में विभिन्न वृक्षों या तारों के सहारे उर्ध्वगामी होकर सदा हरी भरी रहती है
    |यह समस्त भारत में पाई जाती है ,इसकी विशेष उपयोगिता बंगाल में दुर्गा देवी तथा
    काली देवी की पूजा के अवसर पर स्पष्ट दर्शित होती है |नवरात्रादी के विशिष्ट अवसर
    पर नौ वृक्षों की टहनियों की पूजा में एक अपराजिता भी होती है |
         अपराजिता के ऊपर बहुत ही सौन्दर्यमयी पुष्प
    खिले रहते है ,गर्मी के कुछ दिनों को छोड़कर शेष पुरे वर्ष यह लता पुष्पों का
    श्रृंगार किये रहती है |अपराजिता पुष्प भेद के कारण दो प्रकार की होती है नीले
    पुष्प वाली तथा श्वेत पुष्प वाली |नीले पुष्प वाली को कृष्ण कांता और श्वेत पुष्प
    वाली को विष्णु कांता कहते हैं |अपराजिता का पुष्प सीप की भांति आगे की तरफ
    गोलाकार होते हुए पीछे की तरफ संकुचित होता चला जाता है |पुष्प के मध्य में एक और
    पुष्प होता है जो की स्त्री की योनी की भांति होता है |संभवतः इसी कारण इसे तंत्र
    शास्त्रों में भगपुष्पी या योनीपुष्पा का भी नाम दिया गया है | नीले पुष्प वाली
    भगपुष्पा के भी दो भेद हैं ,इकहरे पुष्प वाली और दोहरे पुष्प वाली |

        अपराजिता की जड़ को विधिवत आमंत्रित कर पूजित
    कर धारण करने से भूत प्रेत की समस्या और ग्रह दोषों का निवारण होता है |अपराजिता
    का उपयोग प्रसव को सुगम बनाने ,वृश्चिक दंश में ,भूत बाधा में ,गर्भ धारण में
    ,चोरों -बाघों से रक्षा में ,प्रबल वशीकरण करने में होता है
    |….[अपराजिता के चमत्कार -अगले अंक में ]…………………………………………………हर
    हर महादेव 
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